संदर्भ
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने एक सक्रिय अलनीनो (El Niño) चक्र के कारण 315 जिलों को ‘मौसमी रूप से संवेदनशील’ (Meteorologically vulnerable) घोषित किया है।
- इस घटना के परिणामस्वरूप मानसून के आगमन में विलंब हुआ है, जिससे वर्षा की मात्रा दीर्घकालिक औसत की तुलना में 43% तक कम हो गई है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव आगामी खरीफ फसल चक्र पर पड़ने की आशंका है।

प्रमुख परिवर्तन एवं रणनीतिक वर्गीकरण
सरकार ने जल-संकट का सामना करने की क्षमता के आधार पर जिलों का वर्गीकरण किया है, जिसमें विशेष रूप से उनकी सिंचाई अवसंरचना का आकलन किया गया है:
- उच्च-प्राथमिकता क्षेत्र (111 जिले): ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ 25% से कम सिंचाई अवसंरचना उपलब्ध है। ये जिले लगभग पूर्णतः वर्षा पर निर्भर हैं और सर्वाधिक जोखिम का सामना कर रहे हैं।
- महाराष्ट्र में ऐसे 20 जिले शामिल हैं।
- मध्यम-प्राथमिकता क्षेत्र (76 जिले): ऐसे क्षेत्र जहाँ 25% से 50% तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध है।
- निम्न-प्राथमिकता क्षेत्र (128 जिले): ऐसे क्षेत्र जहाँ 50% से अधिक सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, जो बाँधों, नहरों और बारहमासी जलाशयों द्वारा समर्थित है।
- भौगोलिक विस्तार: संवेदनशील जिले 12 राज्यों में हैं, जिनमें प्रमुख रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं।
कार्ययोजना एवं हस्तक्षेप
इस शुष्क अवधि से निपटने के लिए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएँ लागू की हैं:
- फसल पुनर्संरचना: किसानों को फसल विफलता के जोखिम से बचाने के लिए सूखा-सहिष्णु बीजों को बढ़ावा देने तथा तीव्र फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- चारा सुरक्षा व्यवस्था: पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु जलवायु-अधिशेष क्षेत्रों से शुष्क क्षेत्रों तक पशु-चारा आपूर्ति शृंखलाओं की पूर्व-व्यवस्था की जा रही है, ताकि मवेशियों में चारे के अभाव की स्थिति उत्पन्न न हो।
- जल संसाधन एकीकरण: मनरेगा के अंतर्गत जल संरक्षण कार्यों को विकसित भारत ग्राम अभियान (VB-GRAMG) जैसे आगामी ग्रामीण कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जा रहा है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में जल भंडारण क्षमता का निर्माण हो सके तथा साथ ही ग्रामीण रोजगार के अवसर भी सृजित हों।
अल-नीनो के बारे में
- अल-नीनो के बारे में: अलनीनो, अल-नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के उष्ण चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
- अलनीनो स्पेनिश भाषा में “छोटा लड़का” अथवा “क्राइस्ट चाइल्ड” का एक सामान्य अनुवाद है।

- प्रमुख विशेषताएँ: यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भागों में समुद्र सतह के असामान्य रूप से उच्च तापमान द्वारा चिह्नित होता है।
- पेरू एवं इक्वाडोर के तटों के समीप पोषक तत्त्वों से समृद्ध शीतल जल के ऊपर उठने (Upwelling) की प्रक्रिया दब जाती है।
- अल-नीनो की परिस्थितियों में व्यापारिक पवनें (Trade Winds) कमजोर हो जाती हैं।
- अलनीनो का संबंध प्रायः कमजोर भारतीय मानसून से होता है।
- अल-नीनो के दौरान वायुमंडलीय तंत्र: अल-नीनो के दौरान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर वायुमंडलीय दाब सामान्य से कम हो जाता है।
- पूर्वी प्रशांत के ऊपर वायु के ऊपर उठने से वर्षा एवं तूफानी गतिविधियों में वृद्धि होती है।
- पश्चिमी प्रशांत में वायु के नीचे उतरने से उच्च दाब तथा अधिक स्थिर मौसमीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
- वैश्विक जलवायु पर प्रभाव: दाब एवं वर्षा में होने वाले ये परिवर्तन विश्वभर में प्रसारित होते हैं।
- ये प्रशांत महासागर से दूर स्थित क्षेत्रों, जिनमें दक्षिण एशिया भी शामिल है, के मौसम प्रतिरूपों को प्रभावित करते हैं।
अल-नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के बारे में
- ENSO एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर समुद्री सतह के तापमान तथा वायुमंडलीय दाब में आवधिक उतार-चढ़ाव होता है।
- ENSO के चरण: इसमें 3 चरण होते हैं: अल-नीनो, ला-नीना तथा तटस्थ चरण।
- अल-नीनो
- ला-नीना (शीत चरण): भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भागों में समुद्री सतह का असामान्य रूप से कम तापमान; व्यापारिक पवनों को सशक्त बनाता है; प्रायः अधिक सशक्त भारतीय मानसून से संबंधित होता है।
- तटस्थ (सामान्य) चरण: समुद्र सतह का तापमान औसत के निकट रहता है।
अल-नीनो एवं ला-नीना के मध्य प्रमुख अंतर: (UPSC CSE Prelims 2011)
- अल-नीनो की विशेषता भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भागों में समुद्र सतह के असामान्य रूप से उच्च तापमान है, जबकि ला-नीना की विशेषता उसी क्षेत्र में समुद्र सतह के असामान्य रूप से कम तापमान है।
- अल-नीनो सामान्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है तथा भारत में सामान्य से कम वर्षा से संबंधित होता है, जबकि ला-नीना सामान्यतः मानसून को सशक्त बनाता है तथा सामान्य से अधिक वर्षा से संबंधित होता है।
- अल-नीनो और ला-नीना, दोनों अल-नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के विपरीत चरण हैं तथा वैश्विक मौसम एवं जलवायु प्रतिरूपों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
|
संभावित अल-नीनो के संकेतक
- समुद्र सतह तापमान (SST) विसंगतियाँ: राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के समुद्र सतह तापमान विसंगति आँकड़े भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में प्रारंभिक ऊष्मीकरण के संकेत प्रदर्शित करते हैं, जो वर्तमान ला-नीना परिस्थितियों के कमजोर होने में योगदान दे रहे हैं।
- उपसतही महासागरीय ऊष्मा सामग्री: उपसतही तापमान विसंगतियाँ पश्चिमी प्रशांत महासागर में एक विशाल उष्ण जल क्षेत्र की उपस्थिति दर्शाती हैं।
- यह उष्ण जल क्षेत्र लगभग 100–250 मीटर की गहराई पर स्थित है।
- ये उष्ण तापमान विसंगतियाँ महासागर की सतह के नीचे विस्तार कर रही हैं।
- यह उपसतही ऊष्मीकरण पश्चिमी प्रशांत महासागर की ओर से ला-नीना को कमजोर कर रहा है।
- सीवियर वेदर यूरोप (Severe Weather Europe) के पूर्वानुमान: नवीनतम पूर्वानुमान आँकड़े संकेत देते हैं कि अल-नीनो वर्ष 2026 में पुनः लौट सकता है तथा वर्ष के उत्तरार्द्ध में अधिक सशक्त हो सकता है।
- यूरोपीय मध्यम-अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ECMWF) का मौसमी पूर्वानुमान: ECMWF का मौसमी पूर्वानुमान दर्शाता है कि ENSO की परिस्थितियाँ वर्ष 2026 की ग्रीष्म ऋतु तक अल-नीनो की श्रेणी में प्रवेश कर सकती हैं।
संभावित जलवायु प्रभाव
- सीमा के निकट तापमान: अल-नीनो की पुनरावृत्ति वैश्विक तापमान को 1.5°C की सीमा के निकट या उससे ऊपर पहुँचा सकती है।
- वैज्ञानिकों ने अधिक बार और अधिक तीव्र ऊष्ण लहरों, सूखे, वनाग्नि तथा चरम मौसमीय घटनाओं के बढ़ते जोखिम की चेतावनी दी है।
- भारत पर प्रभाव: भारत में अतीत के कई मानसूनी सूखे भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल-नीनो की परिस्थितियों से जुड़े रहे हैं।
- अल-नीनो की घटनाओं के दौरान परिवर्तित दाब प्रतिरूप प्रायः भारत में मानसूनी वर्षा को दबा देते हैं।
नए परिवर्तनों का महत्त्व
- सक्रिय शासन: यह नीति को आपदा के बाद राहत प्रदान करने की प्रतिक्रिया-आधारित व्यवस्था से हटाकर निवारक कृषि नियोजन की ओर ले जाती है, जिससे शुष्क परिस्थितियों के चरम पर पहुँचने से पूर्व ही किसानों की आजीविका की रक्षा की जा सके।
- वैज्ञानिक जोखिम वर्गीकरण: सिंचाई प्रतिशत से संबंधित आँकड़ों का उपयोग प्रशासन को संसाधनों का आवंटन सीधे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में करने में सहायता करता है, बजाय इसके कि सहायता को अत्यधिक प्रकीर्णित रूप से वितरित किया जाए।
- खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं का संरक्षण: समय रहते उठाए गए कदम धान, दलहन एवं तिलहन जैसी महत्त्वपूर्ण खरीफ फसलों की सुरक्षा करते हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है।
संबद्ध चुनौतियाँ
- वर्षा-आश्रित कृषि की गहन संवेदनशीलता: भारत की लगभग आधी कृषि भूमि नहरों अथवा पंप-आधारित सिंचाई सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में अल-नीनो के कारण मानसून में होने वाला दीर्घकालिक विलंब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर तत्काल दबाव उत्पन्न करता है।
- भूजल का अत्यधिक दोहन: सतही जल की कमी के दौरान मध्यम एवं निम्न-प्राथमिकता क्षेत्रों में अधिक जल पंपिंग की आवश्यकता उथले जलभृतों (Aquifers) के और अधिक क्षरण का कारण बन सकती है।
- लॉजिस्टिक बाधाएँ: विभिन्न राज्यों के बीच बड़ी मात्रा में पशु-चारा परिवहन करने के लिए उच्च स्तर के अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता होती है, ताकि स्थानीय स्तर पर आपूर्ति अवरोध उत्पन्न न हों।
आगे की राह
- सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) जैसी पहलों के माध्यम से ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देकर उपलब्ध जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- जलवायु-स्मार्ट बीजों को प्रोत्साहन: अल्पावधि एवं ऊष्मा-सहिष्णु बीज किस्मों पर सब्सिडी प्रदान की जानी चाहिए, ताकि मानसूनी वर्षा अवधि कम होने की स्थिति में भी फसलें परिपक्व हो सकें।
- स्थानीय जल भंडारण संरचनाओं में सुधार: अस्थायी मृदा-आधारित जल संरचनाओं के स्थान पर स्थायी, गाद-मुक्त सामुदायिक तालाबों एवं चेक-डैमों का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि अनिश्चित एवं तीव्र वर्षा से प्राप्त जल का प्रभावी संचयन किया जा सके।