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भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का विकास

24 Jun 2026

संदर्भ 

विगत 12 वर्षों में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का रूपांतरण विश्वास, विकास और जन कल्याण की त्रि-आयामी भावना को प्रतिबिंबित करता है।

  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जोकि आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया तथा विकसित भारत, 2047 की प्रेरणा से संचालित है, एक पृथक वैज्ञानिक प्रयास से आगे बढ़कर राष्ट्रीय रणनीतिक संपदा के रूप में विकसित हुई है।

भारत की विकसित होती अंतरिक्ष संबंधी अवसंरचना के बारे में 

  • वर्तमान समय में पारंपरिक अवसंरचना एक अत्यधिक वाणिज्यिक, गतिशील तथा द्वि-उद्देशीय पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित हो चुकी है।
  • आधुनिक मॉडल अंतरिक्ष-आधारित परिसंपत्तियों का उपयोग पृथ्वी की समस्याओं के समाधान हेतु करता है—जैसे कृषि मानचित्रण का अनुकूलन, पीएम ई-विद्या के माध्यम से ग्रामीण दूरसंचार का विस्तार, रियल टाइम आपदा चेतावनियाँ प्रदान करना तथा क्षेत्रीय रणनीतिक नौवहन स्वायत्तता सुनिश्चित करना।

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भारत की पहलें एवं कार्यवाही

  • नीतिगत एवं शासन संबंधी सुधार 
    • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: इस नीति ने एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन के रूप में कार्य करते हुए राज्य के एकाधिकार को समाप्त किया तथा गैर-सरकारी संस्थाओं (NGEs) को विनिर्माण, रॉकेट निर्माण तथा उपग्रह-आधारित अनुप्रयोगों सहित संपूर्ण अंतरिक्ष गतिविधियों के संचालन की अनुमति प्रदान की।

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    • मानदंड, दिशा-निर्देश एवं प्रक्रियाएँ (NGP), 2024: इसने मानकीकृत प्रोटोकॉल तथा स्पष्ट अनुपालन ढाँचा स्थापित किया, जिससे आने वाले वैश्विक निवेशकों के लिए संस्थागत पूर्वानुमेयता को सुदृढ़ किया गया।
    • IN-SPACe पोर्टल: इसे एक स्वायत्त, सिंगल विंडो नोडल नियामक के रूप में स्थापित किया गया। इस पोर्टल के द्वारा इसरो ने निजी घरेलू एयरोस्पेस निर्माताओं के साथ 71 विशिष्ट प्रौद्योगिकी हस्तांतरणों को सफलतापूर्वक अधिकृत किया है।
  • वाणिज्यिक एवं पूँजीगत पहलें 
    • NSIL का विस्तार: न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से अपने परिचालनों का विस्तार किया है, परिणामस्वरूप इसका वाणिज्यिक राजस्व वित्तीय वर्ष 2021-22 के ₹321.77 करोड़ से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024-25 में ₹3,246.09 करोड़ हो गया है।

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    • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का उदारीकरण: उच्च-स्तरीय प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए वैश्विक पूँजी को आकर्षित करने के उद्देश्य से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमाओं को स्वचालित मार्ग या ऑटोमेटिक रूट्स के अंतर्गत तीन पृथक स्तरों में संरचित किया गया है:
      • 100% तक (स्वचालित मार्ग): अवयवों एवं उप-प्रणालियों का विनिर्माण।
      • 74% तक (स्वचालित मार्ग): अंतरिक्ष यान परिचालन, उपग्रह डेटा उत्पाद तथा उपयोगकर्ता खंड परिचालन।
      • 49% तक (स्वचालित मार्ग): प्रक्षेपण यानों का मूल विनिर्माण, प्रणाली संयोजन तथा निजी अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्रों का निर्माण।

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  • संप्रभु नौवहन एवं डेटा अवसंरचना 
    • नाविक  प्रणाली: NVS शृंखला के माध्यम से एक स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह-आधारित स्थिति निर्धारण समूह का संचालन किया जा रहा है, जो भारतीय मुख्यभूमि को कवर करता है तथा जिसका विस्तार भारत की सीमाओं से 1,500 किमी. आगे तक है।
    • वैश्विक सार्वजनिक संपदा: आदित्य-L1 वेधशाला द्वारा निर्मित 27 टेराबाइट (TB) से अधिक सतत् सौर प्रेक्षण आँकड़ों को वैश्विक वैज्ञानिक सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध कराया गया है।

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भविष्य के लक्ष्य

  • गगनयान संबंधी चरणबद्ध लक्ष्य: प्रमुख मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन अपने महत्त्वपूर्ण चरणों में आगे बढ़ रहा है। मानवरहित गगनयान-1 (G1) की कक्षीय उड़ान वर्ष 2026 के उत्तरार्द्ध में व्योममित्र मानवाकृति रोबोट के साथ निर्धारित है, जो मानवयुक्त कक्षीय उड़ान से पूर्व एक अग्रदूत मिशन के रूप में कार्य करेगी।
  • लूनर सैंपल रिटर्न (चंद्रयान-4): वर्ष 2027 के लिए निर्धारित यह मल्टी-मॉड्यूल मिशन सॉफ्ट लैंडिंग, चंद्रमा की सतह से रेगोलिथ नमूनों का संग्रहण तथा उन्हें पृथ्वी पर लाने हेतु स्वायत्त चंद्र आरोहण का लक्ष्य रखता है।
  • संप्रभु अंतरिक्ष स्टेशन (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन – BAS): इसके आधारभूत मॉड्यूल BAS-01 को वर्ष 2028 तक कक्षा में स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान की गई है, जबकि वर्ष 2035 तक पूर्णतः परिचालित मॉड्यूलर अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  • गहन अंतरिक्ष मिशन (शुक्रयान): शुक्र कक्षीय मिशन का प्रक्षेपण मार्च 2028 में प्रस्तावित है, जिसके माध्यम से वायुगतिकीय मंदन (Aerobraking) तथा उन्नत तापीय प्रबंधन प्रणालियों जैसी क्षमताओं का परीक्षण किया जाएगा।

द्विपक्षीय संयुक्त अन्वेषण

  • चंद्रयान-5 (LUPEX): ISRO–JAXA का संयुक्त मिशन (2027–28), जिसके अंतर्गत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जल एवं बर्फ भंडारों की खोज हेतु एक विशेषीकृत रोवर तैनात किया जाएगा।
  • TRISHNA (2026): CNES (फ्राँस) के सहयोग से विकसित एक जलवायु-विज्ञान उपग्रह, जो उच्च-रिजॉल्यूशन तापीय अवरक्त चित्रण का उपयोग करके शहरी ऊष्मा द्वीपों तथा फसलों पर जल तनाव की निगरानी करेगा।
  • अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान (NGLV): निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 30 टन पेलोड क्षमता तथा आंशिक रूप से पुनः प्रयोज्य विन्यास (14 टन पुनः प्रयोज्य क्षमता) वाले एक भार प्रक्षेपण तंत्र का विकास किया जा रहा है, जिससे कक्षा तक पहुँच की लागत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सके।

भारत के अंतरिक्ष रूपांतरण का रणनीतिक महत्त्व

  • सामाजिक-आर्थिक कल्याण: परिशुद्ध कृषि, पूर्व चेतावनी आधारित आपदा प्रतिक्रिया तथा क्षेत्रीय संपर्कता में उपग्रह-आधारित समाधानों के माध्यम से शासन व्यवस्था को रूपांतरित करता है।
  • आर्थिक गति: वर्ष 2014 में केवल एक पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्ट-अप से बढ़कर वर्ष 2026 की शुरुआत तक 400 से अधिक सक्रिय कंपनियाँ हो गई हैं, जिन्होंने 500 मिलियन डॉलर से अधिक के निजी निवेश को आकर्षित किया है तथा उच्च-कौशल रोजगार का सृजन किया है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: NavIC जैसी स्वदेशी अवसंरचनाओं पर निर्भरता महत्त्वपूर्ण सैन्य एवं नागरिक लॉजिस्टिक्स को बाह्य भू-रणनीतिक दबावों से सुरक्षित रखती है।
  • अंतरिक्ष कूटनीति: दक्षिण एशिया उपग्रह (GSAT-9) जैसी पहलों के माध्यम से भारत के क्षेत्रीय नेतृत्व को सुदृढ़ करता है तथा डिजिटल शिक्षा एवं टेलीमेडिसिन सेवाओं को समर्थन प्रदान करता है।

प्रमुख बाधाएँ एवं उभरती चुनौतियाँ

  • वैश्विक बाज़ार में कम हिस्सेदारी: उन्नत अंतरिक्ष क्षमताओं के बावजूद भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 8 बिलियन डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष बाजार का केवल 2–3% हिस्सा है।
  • विनिर्माण संबंधी अवरोध: उन्नत प्रयोगशाला-आधारित डिजाइन को बड़े पैमाने पर उत्पादन में परिवर्तित करना अभी भी उच्च-सटीकता विनिर्माण क्षमता की सीमाओं के कारण बाधित है।
  • जीवन जोखिम संबंधी सीमाएँ: मानव-उपयुक्त प्रणालियों, विश्वसनीय जीवन-समर्थन प्रौद्योगिकियों तथा स्वायत्त अंतरिक्ष यान डॉकिंग तंत्रों का विकास अभी भी तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
  • प्रतिकूल ग्रह संबंधी परिस्थितियाँ: शुक्र ग्रह के उच्च दाब, उच्च तापमान (लगभग 460°C) तथा संक्षारणकारी वातावरण में कार्य करने में सक्षम इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों का विकास एक प्रमुख अभियांत्रिकी चुनौती है।
  • वित्तीय पूंजी का दबाव: ग्रहों के अन्वेषण मिशनों, मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों, भारी-भार प्रक्षेपण यानों तथा नए अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्रों के विकास के लिए एक साथ वित्तपोषण करना पर्याप्त वित्तीय दबाव उत्पन्न करता है।

आगे की राह

  • वर्ष 2030 के बाजार लक्ष्यों की प्राप्ति: निजी क्षेत्र की भागीदारी तथा प्रक्षेपण आवृत्ति में वृद्धि करके वर्ष 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की 8% हिस्सेदारी के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए।
  • नई अवसंरचना को परिचालित करना: कुलसेकरपट्टिनम अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र (तमिलनाडु) को SSLV प्रक्षेपणों के लिए शीघ्र पूर्ण किया जाए तथा श्रीहरिकोटा में तृतीय प्रक्षेपण पैड का विकास किया जाए।
  • NavIC का व्यापक उपयोग: क्वालकॉम (Qualcomm) जैसे वैश्विक चिपसेट निर्माताओं के साथ साझेदारी को सुदृढ़ कर NavIC को बड़े पैमाने पर उपयोग होने वाले स्मार्टफोनों में एकीकृत किया जाए।
  • प्रक्षेपण लागत में कमी: पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ाया जाए तथा क्रायोजेनिक प्रणोदन प्रणालियों में सुधार करके प्रति किलोग्राम प्रक्षेपण लागत को कम किया जाए।

निष्कर्ष

चंद्रयान-3, अंतरिक्ष क्षेत्र के उदारीकरण तथा एक सशक्त स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र जैसी उपलब्धियों के साथ भारत एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति के रूप में उभर रहा है। पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियों, मानव अंतरिक्ष उड़ान तथा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन में प्रगति अमृत काल 2047 तक वैश्विक अंतरिक्ष शासन में भारत की भूमिका को और अधिक सुदृढ़ करेगी।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का विकास

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