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27 Feb 2026

कांगो बेसिन की झीलों से प्राचीन कार्बन रिसाव

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कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) की दो प्रमुख झीलें (माई न्डोम्बे और टुंबा) हजारों वर्षों से आस-पास के पीटलैंड्स में जमा प्राचीन कार्बन को मुक्त कर रही हैं।

कांगो बेसिन के बारे में

  • कार्बन भंडारण: कांगो बेसिन के पीटलैंड्स और दलदली क्षेत्र पृथ्वी की स्थलीय सतह का केवल 0.3% भाग घेरते हैं, किंतु विश्व के उष्णकटिबंधीय पीटलैंड में संगृहीत कुल कार्बन का लगभग एक-तिहाई भाग इनमें निहित है।
  • ये पारिस्थितिकी तंत्र पृथ्वी के सबसे बड़े और अब तक कम-अध्ययित कार्बन भंडारों में से हैं, जो वैश्विक जलवायु के महत्त्वपूर्ण नियामक के रूप में कार्य करते हैं।
  • स्थान: कांगो बेसिन मध्य अफ्रीका में विस्तृत है और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य सहित कई पड़ोसी देशों के भागों को आच्छादित करता है।
  • वर्षावन: यह अमेजन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन है।
  • जैव-विविधता: यह बेसिन जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ वन हाथी, गोरिल्ला, चिंपैंजी, बोनोबो तथा हजारों वनस्पति और प्राणी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • कांगो नदी: कांगो नदी, जो इस बेसिन से होकर प्रवाहित होती है, विश्व की सबसे गहरी नदी है तथा जल प्रवाह की दृष्टि से अमेजन के बाद दूसरी सबसे बड़ी नदी है।

माई न्डोम्बे (Mai Ndombe) और टुम्बा (Tumba) के बारे में

  • माई न्डोम्बे झील: यह पश्चिमी DRC में टुंबा–न्गीरी–माई न्डोम्बे आर्द्रभूमि क्षेत्र के अंतर्गत अवस्थित है।
  • टुंबा झील: यह उत्तर-पश्चिमी DRC में, कांगो नदी के समीप, टुंबा–न्गीरी–माई न्डोम्बे आर्द्रभूमि क्षेत्र में अवस्थित है।
  • विशेषताएँ: ये झीलें ब्लैकवॉटर या ह्यूमिक झीलें हैं, जिनका जल आस-पास के पौधों के अवशेषों से उत्पन्न घुलित कार्बनिक पदार्थ के कारण गहरे रंग का दिखाई देता है।

अध्ययन की प्रमुख विशेषताएँ

  • अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि इन झीलों से उत्सर्जित होने वाले CO₂ का लगभग 40% भाग हालिया वनस्पति पदार्थ से नहीं, बल्कि प्राचीन पीट निक्षेपों से उत्पन्न होता है, जिनमें से कुछ की आयु 3,000 वर्ष से अधिक है।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन इस कार्बन उत्सर्जन को और अधिक बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे समग्र रूप से परिस्थितियाँ अधिक शुष्क हो सकती हैं।
    • उच्च तापमान सूक्ष्मजीव अपघटन की प्रक्रिया को पुनः सक्रिय कर सकते हैं तथा प्राचीन कार्बन के झीलों और वायुमंडल में तीव्र प्रवाह को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • भूमि-उपयोग परिवर्तन का प्रभाव: वन क्षेत्रों को कृषि भूमि में परिवर्तित करने से यह समस्या और गंभीर हो सकती है, क्योंकि इससे भू-दृश्य में जल धारण क्षमता घटती है और शुष्क परिस्थितियों को बढ़ावा मिलता है।

पीटलैंड्स क्या हैं?

  • पीटलैंड्स एक विशिष्ट प्रकार का आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जहाँ जलभराव की स्थिति मृत वनस्पति पदार्थ के पूर्ण अपघटन को धीमा कर देती है या रोक देती है।
  • हजारों वर्षों में इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप आंशिक रूप से विघटित जैविक पदार्थ की एक मोटी परत बनती है, जिसे पीट कहा जाता है।
  • पीट निम्नलिखित परिस्थितियों में बनता है
    • जब पौधे स्थायी रूप से आर्द्र और निम्न-ऑक्सीजन (anoxic) वातावरण में मृत हो जाते हैं।
    • जलभराव, उच्च अम्लता, निम्न तापमान (विशेषकर ठंडे क्षेत्रों में) या पोषक तत्त्वों की कमी के कारण सूक्ष्मजीवों और कवकों द्वारा अपघटन अत्यंत धीमा हो जाता है।
    • मृत वनस्पति अवशेष उनके विघटन की तुलना में अधिक तीव्र गति से एकत्रित होते रहते हैं, जिससे सदियों या सहस्राब्दियों में परत-दर-परत पीट का निर्माण होता है।
  • पीटलैंड्स की प्रमुख विशेषताएँ
    • वर्ष भर जलभराव: यह इनकी परिभाषात्मक विशेषता है, जो अवायवीय (ऑक्सीजन-न्यून) परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है।
    • अम्लीय एवं पोषक तत्वों की कमी: ऐसी कठोर परिस्थितियों के अनुकूलित विशिष्ट और विशेषीकृत वनस्पतियाँ यहाँ पनपती हैं।
    • मोटी पीट परतें: सामान्यतः इनकी गहराई 30–40 सेंटीमीटर से अधिक होती है और कई बार यह कई मीटर तक विस्तृत होती हैं।
  • कार्बन का उत्सर्जन: जब पीट सूखने लगता है, तो सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं, पुराने वनस्पति पदार्थ का अपघटन करते हैं और संचित कार्बन को CO₂ के रूप में पुनः वायुमंडल में मुक्त कर देते हैं।

शिंगल्स (shingles)  रोग

हाल ही में किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण ने भारत में वृद्ध वयस्कों, विशेषकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त व्यक्तियों पर शिंगल्स (Shingles) के महत्त्वपूर्ण प्रभाव को रेखांकित किया है।

शिंगल्स (Shingles) रोग के बारे में

  • शिंगल्स [जिसे हर्पीस जोस्टर (Herpes Zoster) भी कहा जाता है] एक विषाणुजनित संक्रमण है, जिसमें फफोलों सहित दर्दनाक त्वचा-चकत्ते उत्पन्न होते हैं।
  • कारक तत्व: यह वैरिसेला-जोस्टर वायरस (Varicella-Zoster Virus) के कारण होता है, जो चिकनपॉक्स (Chickenpox) का भी कारण है।
  • पुनर्सक्रियण रोग: चिकनपॉक्स के ठीक हो जाने के बाद भी यह वायरस तंत्रिका ऊतकों में निष्क्रिय अवस्था में बना रहता है और बाद में (अक्सर कई दशकों पश्चात) पुनः सक्रिय हो सकता है।
  • प्रसार का तरीका: यह चिकनपॉक्स की भाँति प्रत्यक्ष रूप से अत्यधिक संक्रामक नहीं है, किंतु शिंगल्स से पीड़ित व्यक्ति उस व्यक्ति को वैरिसेला-जोस्टर वायरस संचारित कर सकता है, जिसे पहले कभी चिकनपॉक्स नहीं हुआ हो या जिसने टीकाकरण न कराया हो।
  • उच्च जोखिम समूह
    • वृद्धजन (विशेषकर 50 वर्ष से अधिक आयु वाले)
    • प्रतिरक्षा-तंत्र से दुर्बल व्यक्ति (जैसे- HIV संक्रमित, कैंसर रोगी, अंग-प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ता)
    • अत्यधिक तनावग्रस्त व्यक्ति।
  • रोकथाम: 50 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों के लिए शिंगल्स टीका (जैसे- Shingrix) की अनुशंसा की जाती है।
  • उपचार: एंटीवायरल औषधियाँ (जैसे- एसाइक्लोविर, वैलासाइक्लोविर) तथा दर्द-प्रबंधन उपचार का उपयोग किया जाता है।

दैनिक जीवन पर शिंगल्स का प्रभाव

  • जिन भारतीय प्रतिभागियों को शिंगल्स हुआ था, उनमें से 43% ने अत्यंत तीव्र और दैनिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करने वाले दर्द की शिकायत की।
  • प्रत्येक तीन में से एक से अधिक व्यक्ति ने बताया कि शिंगल्स के कारण वे कार्य पर जाने या सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने में असमर्थ रहे।
  • सर्वाधिक शारीरिक बाधा: दीर्घकालिक गुर्दा रोग तथा हृदय-रक्तवाहिनी रोग से ग्रस्त रोगियों में देखी गई।
  • सर्वाधिक भावनात्मक प्रभाव (तनाव/चिंता): मधुमेह तथा हृदय-रक्तवाहिनी रोग से पीड़ित व्यक्तियों में पाया गया।

AI4एग्री शिखर सम्मेलन 2026

AI4एग्री शिखर सम्मेलन 2026, इंडिया AI इंपैक्ट समिट 2026 के एक उप-आयोजन के रूप में मुंबई में आयोजित किया गया।

AI4एग्री शिखर सम्मेलन 2026 के बारे में

  • यह कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका पर विशेष रूप से केंद्रित एक वैश्विक सम्मेलन एवं निवेशक शिखर सम्मेलन है।
  • स्थान: जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर, मुंबई।
  • आयोजक: महाराष्ट्र सरकार द्वारा आयोजित तथा राष्ट्रीय AI रणनीतियों और वैश्विक साझेदारियों के अनुरूप।
  • प्रमुख उद्देश्य
    • AI-संचालित कृषि प्रौद्योगिकियों एवं समाधानों में निवेश को प्रोत्साहित करना।
    • कृषि मूल्य शृंखला में (खेत परामर्श से लेकर जलवायु सहनशीलता तक) AI के अंगीकरण पर वैश्विक विमर्श को दिशा देना।
    • लघु एवं सीमांत किसानों के लिए समावेशी, उत्तरदायी और विस्तार योग्य AI समाधानों को बढ़ावा देना।
  • प्रमुख घोषणाएँ: इस शिखर सम्मेलन में AI को भारत की ‘अगली कृषि क्रांति’ का प्रेरक तत्त्व बताया गया। 
    • मुख्य प्रस्तावों में राष्ट्रीय कृषि-AI अनुसंधान नेटवर्क तथा संघटित कृषि डेटा कॉमन्स की स्थापना शामिल थी।
  • आर्थिक प्रभाव: कृषि में AI के उपयोग से अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष अनुमानित ₹70,000 करोड़ की अतिरिक्त वृद्धि संभव है।
    • यह अनुमान इस आधार पर है कि लगभग 14 करोड़ किसान बेहतर परामर्श सेवाओं के माध्यम से प्रतिवर्ष औसतन ₹5,000 की बचत कर सकते हैं।
  • नए AI उपकरण: सरकार ने ‘एग्री परम’ नामक AI मॉडल को रेखांकित किया, जो 22 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। साथ ही, शीघ्र ही ‘भारत-विस्तार’ नामक बहुभाषी परामर्श उपकरण प्रारंभ किए जाने की घोषणा की गई।

भारत का प्रथम राज्य नवाचार मिशन (SIM) 

नीति आयोग के अंतर्गत अटल नवाचार मिशन (AIM) ने त्रिपुरा में देश का प्रथम राज्य नवाचार मिशन (SIM) प्रारंभ किया है।

त्रिपुरा राज्य नवाचार मिशन के बारे में

  • त्रिपुरा भारत का पहला राज्य बन गया है, जिसने एक समर्पित राज्य नवाचार मिशन (SIM) की स्थापना की है।
  • अटल नवाचार मिशन का भाग: इसे अटल नवाचार मिशन 2.0 के अंतर्गत, नीति आयोग की राज्य सहयोग मिशन (SSM) पहल के तहत प्रारंभ किया गया है।
  • राज्य सहयोग मिशन (SSM): यह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सुदृढ़, समावेशी नवाचार एवं उद्यमिता पारितंत्र विकसित करने में सहायता प्रदान करने हेतु एक दीर्घकालिक संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करता है।
  • संस्थागत ढाँचा: राज्य नवाचार मिशन को त्रिपुरा इंस्टिट्यूशन फॉर ट्रांसफॉरमेशन (TIFT) के अंतर्गत संस्थागत रूप दिया गया है।
  • उद्देश्य: क्षमता निर्माण, नीतिगत सहयोग, साझेदारियों तथा पारस्परिक शिक्षण के माध्यम से राज्य-नेतृत्व वाले नवाचार पारितंत्र को सुदृढ़ करना।
  • लक्षित प्रमुख क्षेत्र: राज्य नवाचार मिशन कृषि, हरित प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाएँ, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवा तथा अन्य क्षेत्रों में समस्याओं के समाधान विकसित करने वाले उद्यमों को प्रोत्साहित करेगा।

प्रारंभ की गई प्रमुख पहलें

  • T-NEST (त्रिपुरा: नर्चरिंग एंटरप्रेन्योरशिप एंड स्टार्ट-अप्स): त्रिपुरा की पहली समर्पित इनक्यूबेशन एवं नवाचार सुविधा के रूप में उद्घाटित, जिसका उद्देश्य नवप्रवर्तनों एवं स्टार्ट-अप्स को समर्थन प्रदान करना है।
  • जिला-स्तरीय नवाचार पारितंत्र: जिला स्तर पर नवाचार को संस्थागत स्वरूप देने तथा स्थानीय विचारों के वाणिज्यीकरण को प्रोत्साहित कर उन्हें विस्तार योग्य स्टार्ट-अप्स में रूपांतरित करने के लिए।

कोरोनल मास इजेक्शन (CME)

भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (IIA) की एक टीम ने सूर्य के निकट कोरोनल मास इजेक्शन (CME) से उत्पन्न आघात तरंगों (Shock Waves) का अब तक का सर्वाधिक निकट अवलोकन दर्ज कर एक महत्त्वपूर्ण खोज की है।

कोरोनल मास इजेक्शन (CME) क्या है?

  • कोरोनल मास इजेक्शन (CME) सौर प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के अत्यंत विशाल विस्फोटक उत्सर्जन होते हैं, जो सूर्य के बाह्य वायुमंडल, जिसे कोरोना कहा जाता है, से अंतरिक्ष में बाहर की ओर निष्काषित किए जाते हैं।
  • ये घटनाएँ अरबों टन पदार्थ को अत्यधिक वेग से अंतरिक्ष में प्रसारित करती हैं।
  • आघात तरंगें (Shock Waves): जब तीव्र गति से गतिमान CME अंतरिक्ष में आगे बढ़ते हैं, तो वे आघात तरंगें उत्पन्न कर सकते हैं। ये तरंगें उसी प्रकार होती हैं, जैसे ध्वनि अवरोध को पार करते समय अतिध्वनिक विमान द्वारा उत्पन्न सोनिक बूम (सोनिक बूम)
  • आघात तरंगों का प्रभाव: ये आघात तरंगें पृथ्वी के आकर्षण क्षेत्र को संपीडित कर देती हैं, जिससे भू-चुंबकीय तूफान उत्पन्न होते हैं, जो-
    • उपग्रहों, GPS, रेडियो संचार तथा विद्युत ग्रिडों को बाधित कर सकते हैं।
    • ऑरोरा (उत्तरी/दक्षिणी ज्योति) की तीव्रता बढ़ा सकते हैं।
    • अंतरिक्ष यात्रियों तथा उच्च ऊँचाई पर उड़ान भरने वाले विमानों के लिए विकिरण जोखिम बढ़ा सकते हैं।

CME पर IIA अध्ययन की प्रमुख विशेषताएँ

  • भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (IIA) द्वारा किए गए अध्ययन में सूर्य के निकट कोरोनल मास इजेक्शन (CME) से प्रेरित आघात तरंग का अब तक का सर्वाधिक निकट और स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।
  • गौरीबिदनूर रेडियो दूरबीन (भारत की एकमात्र समर्पित निम्न-आवृत्ति सौर रेडियो वेधशाला): इसने आघात तरंग द्वारा उत्पन्न तीव्र प्रकार–II सौर रेडियो विस्फोटों को अभिलेखित किया।
  • आदित्य-L1 पर स्थापित दृश्य उत्सर्जन रेखा कोरोनाग्राफ (VELC): इस उपकरण ने कोरोना का उच्च-रिजॉल्यूशन दृश्य-प्रकाश चित्रण तथा आँकड़े उपलब्ध कराए, जिनकी सहायता से मूल CME की पहचान, उसकी स्थिति एवं ऊँचाई का मापन तथा रेडियो संकेतों के साथ उसका सटीक सहसंबंध स्थापित किया गया।

अध्ययन का महत्त्व एवं निहितार्थ

  • सौर तूफानों की उत्पत्ति की समझ में वृद्धि: तीव्र गति वाले सीएमई ऐसी आघात तरंगें उत्पन्न करते हैं (जैसे- सोनिक बूम), जो आवेशित कणों को तीव्रित करती हैं और पृथ्वी तक पहुँचने पर अंतरिक्ष मौसम संबंधी प्रभाव उत्पन्न करती हैं।
  • अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान में सुधार: आघात तरंगों के प्रारंभिक गठन की बेहतर समझ से भू-चुंबकीय तूफानों का अधिक सटीक पूर्वानुमान संभव होगा, जो उपग्रहों, GPS, संचार प्रणालियों और विद्युत ग्रिडों को बाधित कर सकते हैं तथा विकिरण जोखिम बढ़ा सकते हैं।

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