संदर्भ
जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर उच्चस्तरीय समिति (HLCDC) ने वर्ष 2011 की जनगणना के बाद हुए देशव्यापी जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के आकलन की प्रक्रिया प्रारंभ की है। इस अध्ययन का मुख्य फोकस जनसंख्या में परिवर्तन, बसावट के प्रतिरूप, मतदाता सूची के पुनरीक्षण तथा अवैध प्रवासन के प्रभाव का मूल्यांकन करना है।

जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर उच्चस्तरीय समिति (HLCDC) के बारे में
- गठन: गृह मंत्रालय (MHA) ने मई 2026 में HLCDC का गठन अवैध प्रवासन तथा अन्य असामान्य कारणों से उत्पन्न जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का अध्ययन करने तथा उपयुक्त नीतिगत उपायों की सिफारिश करने के लिए किया।
- अध्यक्ष: समिति की अध्यक्षता न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर (सेवानिवृत्त), सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, कर रहे हैं।
- संरचना: समिति में प्रशासन, पुलिस व्यवस्था, जनसंख्या अध्ययन तथा सुशासन के विशेषज्ञ शामिल हैं, जिनमें जनगणना आयुक्त, वरिष्ठ सेवानिवृत्त सिविल सेवक तथा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य शामिल हैं।
- पृष्ठभूमि: इस समिति का गठन प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उच्च-शक्ति जनसांख्यिकी मिशन की घोषणा के बाद किया गया।
समिति के उद्देश्य
- जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का आकलन: वर्ष 2011 की जनगणना के बाद जनसंख्या वितरण, आवासीय प्रतिरूप तथा जनसांख्यिकीय संरचना में हुए परिवर्तनों का अध्ययन करना।
- अवैध प्रवासन का अध्ययन: अवैध प्रवासन एवं अन्य असामान्य जनसांख्यिकीय कारकों से उत्पन्न परिवर्तनों का मूल्यांकन करना, जो राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सुशासन को प्रभावित करते हैं।
- संस्थागत ढाँचे की सिफारिश: अवैध प्रवासियों की पहचान, निरोध एवं निर्वासन के लिए विधि के अनुरूप एक स्थायी, साक्ष्य-आधारित एवं समयबद्ध संस्थागत तंत्र की सिफारिश करना।
- साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को समर्थन: योजना निर्माण, सुशासन, सुरक्षा एवं संसाधनों के आवंटन के लिए विश्वसनीय जनसांख्यिकीय आँकड़े उपलब्ध कराना।
अभ्यास की प्रमुख विशेषताएँ
- राज्य-स्तरीय प्रश्नावली: मुख्य सचिवों को विस्तृत प्रश्नावली भेजी जाएगी, जिसमें वर्ष 2011 की जनगणना के बाद जनसंख्या, बसावट एवं प्रवास के प्रतिरूपों में हुए परिवर्तनों से संबंधित जानकारी माँगी जाएगी।
- ‘फील्ड’ सत्यापन: समिति जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का सत्यापन करने तथा राज्यों एवं केंद्रीय मंत्रालयों से प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने के लिए फील्ड सत्यापन करेगी।
- जनभागीदारी: नागरिकों को जनसांख्यिकीय परिवर्तनों से संबंधित सुझाव, प्रतिक्रिया एवं अन्य प्रासंगिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए एक समर्पित ई-मेल मंच उपलब्ध कराया जाएगा।
- जनगणना आँकड़ों से तुलना: इस अभ्यास में वर्ष 2011 की जनगणना की तुलना चल रही जनगणना वर्ष 2027 से की जाएगी, ताकि दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों को समझा जा सके।
PWOnlyIAS विशेष
जनगणना 2027 से संबंध
- गृह सूचीकरण एवं आवासीय संक्रियाएँ (HLO): जनगणना 2027 का प्रथम चरण परिवारों, आवासों एवं गणना खंडों से संबंधित अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराता है, जो जनसांख्यिकीय आकलन के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
- अद्यतन जनसंख्या प्रोफाइल: 16 वर्षों के अंतराल के बाद होने वाली जनसंख्या गणना व्यापक जनसांख्यिकीय आँकड़े उपलब्ध कराएगी, जिससे अधिक सटीक नीति-निर्माण संभव होगा।
- विकास योजना में सुधार: अद्यतन जनसांख्यिकीय जानकारी के आधार पर वित्तीय संसाधनों, सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का साक्ष्य-आधारित आवंटन किया जा सकेगा।
मतदाता सूची पुनरीक्षण से संबंध
- विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): समिति भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान हटाए गए नामों से संबंधित आँकड़े प्राप्त करेगी।
- विलोपन का सत्यापन: हटाए गए नामों एवं उनके कारणों का विवरण जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का आकलन करने तथा आगे सत्यापन की आवश्यकता वाले मामलों की पहचान करने में सहायक होगा।
- निर्वाचन की शुचिता: सटीक मतदाता सूची स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को सुदृढ़ करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि केवल पात्र नागरिक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लें।
संवैधानिक एवं सुशासन संबंधी परिप्रेक्ष्य
- अनुच्छेद-355: संघ पर प्रत्येक राज्य को बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अशांति से संरक्षण प्रदान करने का दायित्व डालता है, जिससे जहाँ आवश्यक हो, वहाँ अवैध प्रवासन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने का संवैधानिक आधार प्राप्त होता है।
- अनुच्छेद-326: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता बनाए रखने के लिए सटीक मतदाता सूची आवश्यक हो जाती है।
- अनुच्छेद-21: पहचान, निरोध अथवा निर्वासन की किसी भी प्रक्रिया में विधिसम्मत प्रक्रिया, निष्पक्षता तथा जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण के सिद्धांतों का पालन किया जाना आवश्यक है।
- सहकारी संघवाद: चूँकि जनसंख्या प्रबंधन, कानून एवं व्यवस्था, सीमा सुरक्षा, निर्वाचन प्रशासन तथा कल्याणकारी सेवाओं का क्रियान्वयन शासन के विभिन्न स्तरों से जुड़ा है, इसलिए प्रभावी कार्यान्वयन के लिए संघ, राज्यों, भारत के महापंजीयक, भारत निर्वाचन आयोग तथा स्थानीय प्राधिकरणों के मध्य घनिष्ठ समन्वय आवश्यक है।
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पहल का महत्त्व
- साक्ष्य-आधारित सुशासन: अद्यतन जनसांख्यिकीय जानकारी के आधार पर शहरीकरण, प्रवास, अवसंरचना, रोजगार तथा लोक सेवा वितरण से संबंधित अधिक प्रभावी नीति-निर्माण संभव हो सकेगा।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: जनसांख्यिकीय परिवर्तनों की बेहतर समझ सीमा प्रबंधन को सुदृढ़ करने, अवैध प्रवासन से प्रभावी ढंग से निपटने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक होगी।
- संतुलित क्षेत्रीय विकास: विश्वसनीय जनसांख्यिकीय आँकड़े वित्त आयोग जैसी संस्थाओं के माध्यम से वित्तीय संसाधनों के समान वितरण तथा क्षेत्रीय योजना निर्माण को अधिक प्रभावी बनाएँगे।
- आपदा प्रबंधन में सुधार: अद्यतन बसावट संबंधी आँकड़े आपदा तैयारी, निकासी योजना तथा आपातकालीन राहत के प्रभावी वितरण में सहायता करेंगे।
- कल्याणकारी योजनाओं के वितरण को सुदृढ़ करना: सटीक जनसंख्या अनुमान के आधार पर कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान अधिक प्रभावी होगी तथा अपवर्जन एवं दोहराव में कमी आएगी।
निष्कर्ष
वर्ष 2011 के बाद से भारत की जनसांख्यिकीय संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों का वैज्ञानिक, पारदर्शी एवं संविधानसम्मत आकलन विकास योजना निर्माण, निर्वाचन की शुचिता, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा लोक सेवा वितरण को सुदृढ़ कर सकता है, साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि सुशासन साक्ष्य-आधारित एवं समावेशी बना रहे।