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राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में ग्राम सभा में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट (2026)

2 Jul 2026

संदर्भ 

पंचायती राज मंत्रालय ने ‘राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट’ जारी की।

संबंधित तथ्य

  • यह रिपोर्ट राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान द्वारा तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य नागरिकों की कम भागीदारी के कारणों की पहचान करना तथा जमीनी लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए सुधारों की अनुशंसा करना है।
  • इस अध्ययन में 26 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों तथा लगभग 400 ग्राम पंचायतों का आकलन किया गया, जिनमें 50 पेसा ग्राम पंचायतें तथा 130 महिला-अनुकूल ग्राम पंचायतें शामिल थीं।
  • अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि ग्राम सभाओं में कम भागीदारी एक बहुआयामी समस्या है, जो किसी एक कारण के बजाय सामाजिक-आर्थिक, संस्थागत, प्रशासनिक तथा व्यवहारगत कारकों से प्रभावित होती है।

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काल-क्रम: पंचायती राज एवं ग्राम सभा का विकास

अवधि/वर्ष प्रमुख विकास
स्वतंत्रता-पूर्व काल भारत के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक ग्राम सभाएँ एवं सामुदायिक शासन व्यवस्थाएँ विद्यमान थीं, जो सामूहिक विचार-विमर्श एवं विवाद समाधान के स्थानीय मंच के रूप में कार्य करती थीं।
वर्ष 1882 रिपन प्रस्ताव ने स्थानीय स्वशासन के महत्त्व पर बल दिया तथा ब्रिटिश भारत में स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने की आधारशिला रखी।
वर्ष 1957 बलवंत राय मेहता समिति ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की अनुशंसा की तथा स्थानीय शासन में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण एवं जनभागीदारी पर बल दिया।
वर्ष 1959 राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था का औपचारिक शुभारंभ हुआ, जिससे स्वतंत्र भारत में संस्थागत विकेंद्रीकृत ग्रामीण शासन की शुरुआत हुई।
वर्ष 1978 अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को सुदृढ़ करने तथा सहभागी स्थानीय शासन तंत्र को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
वर्ष 1992–93 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया तथा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया।
अनुच्छेद-243A (भाग IX) ग्राम सभा को स्थानीय शासन प्रक्रियाओं में नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु संवैधानिक निकाय के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभा सहभागी स्थानीय शासन, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) की तैयारी, सामुदायिक जवाबदेही, लाभार्थियों की पहचान तथा ग्राम-स्तरीय निर्णय-निर्माण का प्रमुख मंच है।

ग्राम सभा एवं सतत् विकास लक्ष्य (SDGs)

  • SDG 1 (गरीबी का उन्मूलन): ग्राम सभा लाभार्थियों की पहचान करती है, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) को अनुमोदित करती है तथा गरीबी उन्मूलन एवं आजीविका संबंधी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करती है।
  • SDG 5 (लैंगिक समानता): ग्राम सभा एवं महिला सभा के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी एवं नेतृत्व को बढ़ावा देती है तथा लैंगिक समावेशी निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करती है।
  • SDG 10 (असमानताओं में कमी): अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं, युवाओं, दिव्यांगजनों तथा अन्य वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाकर समावेशी शासन को प्रोत्साहित करती है।
  • SDG 11 (सतत् समुदाय): सतत् अवसंरचना, स्वच्छता, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा आपदा सहनशीलता के लिए समुदाय-आधारित योजना निर्माण को बढ़ावा देती है।
  • SDG 16 (शांति, न्याय एवं सशक्त संस्थाएँ): पारदर्शिता, जवाबदेही, सामाजिक अंकेक्षण, शिकायत निवारण तथा भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर सुदृढ़ करती है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • आजीविका संबंधी बाधाएँ: आजीविका एवं समय की कमी भागीदारी में सबसे बड़ी बाधा (55.5%) के रूप में सामने आई, जबकि जागरूकता एवं संचार संबंधी समस्याएँ (16.22%) दूसरे स्थान पर रहीं। इससे स्पष्ट होता है कि आजीविका के अनुरूप बैठकों का समय निर्धारण तथा नागरिक जागरूकता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
  • व्यावसायिक दायित्वों के कारण कम उपस्थिति: व्यस्त कार्य-तालिका (41.74%) तथा कृषि कार्य (30.26%) ग्राम सभा की बैठकों में भागीदारी को प्रभावित करने वाली प्रमुख व्यावसायिक बाधाएँ पाई गईं।
  • वंचित समूहों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: प्रवासी परिवार (17.61%), युवा (16.73%), वरिष्ठ नागरिक (15.80%) तथा महिलाएँ (13.40%) ग्राम सभा की प्रक्रियाओं में सबसे कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के रूप में चिह्नित किए गए।
  • ग्राम सभा के कार्यकरण से संबंधित जागरूकता में कमी: अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि ग्राम सभा की बैठकों की जानकारी होना और ग्राम सभा की प्रक्रियाओं की समझ होना दो अलग-अलग बातें हैं।
    • यद्यपि ग्राम सभा की बैठकों के आयोजन के संबंध में सामान्य जागरूकता अपेक्षाकृत अधिक थी, किंतु नागरिक अधिकारों, गणपूर्ति (कोरम) की आवश्यकता, निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया तथा ग्राम सभा की संस्थागत भूमिका से संबंधित जानकारी अनेक क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम पाई गई।
  • ‘ग्राम सभा सहभागिता असमर्थता’ का उभरना: अध्ययन में एक नई प्रवृत्ति की पहचान की गई, जिसे ‘ग्राम सभा सहभागिता असमर्थता’ कहा गया है। इसका आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें बार-बार बैठकें होने के बावजूद ठोस परिणाम न दिखाई देना, शिकायतों का समाधान न होना, एक ही विषय पर बार-बार चर्चा होना तथा निर्णयों पर प्रभावी अनुवर्ती कार्रवाई का अभाव लोगों की भागीदारी के प्रति उत्साह को धीरे-धीरे कम कर देता है।

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  • सहभागिता में असमर्थता के प्रमुख कारण: अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि सहभागिता में असमर्थता मुख्यतः पारदर्शिता संबंधी चिंताओं (45.46%), चर्चाओं की प्रासंगिकता के अभाव (42.0%), विश्वास की कमी (32.7%), राजनीतिक हस्तक्षेप (27.9%) तथा कमजोर शिकायत निवारण व्यवस्था (16.2%) के कारण उत्पन्न होती है।
    • ये सभी कारक मिलकर धीरे-धीरे जनता का विश्वास एवं ग्राम सभा में भागीदारी की आकांक्षा कम कर देते हैं।
  • जागरूकता एवं सामुदायिक लामबंदी: भागीदारी बढ़ाने के प्रमुख उपाय: उत्तरदाताओं ने जागरूकता एवं सामुदायिक लामबंदी को भागीदारी बढ़ाने के सबसे प्रभावी उपायों के रूप में चिह्नित किया। जागरूकता एवं प्रचार-प्रसार (48.2%) को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त हुई, इसके बाद घर-घर संपर्क अभियान (22.2%), बैठकों का सुविधाजनक समय निर्धारण (10.6%) तथा अधिक संवादात्मक ग्राम सभा बैठकों (7.0%) को महत्त्वपूर्ण उपाय माना गया।
  • स्थायी जनविश्वास के लिए पारदर्शिता एवं जवाबदेही: उत्तरदाताओं ने यह भी बल दिया कि पारदर्शिता, निर्णयों का प्रभावी क्रियान्वयन, प्रभावी शिकायत निवारण, महिलाओं की भागीदारी, बेहतर पहुँच तथा अधिकारियों की नियमित उपस्थिति जैसे उपाय ग्राम सभा के प्रति जनविश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
  • भागीदारीपूर्ण शासन के लिए नवाचारी सर्वोत्तम प्रथाएँ: अध्ययन में विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में अपनाई जा रही अनेक नवाचारी सर्वोत्तम प्रथाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें स्वयं सहायता समूह (SHG) आधारित जन-लामबंदी, विषय-आधारित ग्राम सभाएँ, बाल सभाएँ, महिला-केंद्रित पहलें तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम संचार प्रणाली शामिल हैं। ये पहलें भागीदारीपूर्ण स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने के व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करती हैं।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय जागरूकता एवं प्रक्रियात्मक साक्षरता मिशन: नागरिकों में जागरूकता, प्रक्रियात्मक समझ तथा लोकतांत्रिक भागीदारी को सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय ग्राम सभा जागरूकता, प्रक्रियात्मक साक्षरता एवं जन-लामबंदी मिशन प्रारंभ किया जाए।
  • संस्थागत सामुदायिक जन-लामबंदी: व्यापक जनसंपर्क सुनिश्चित करने हेतु वार्ड सदस्यों, स्वयं सहायता समूह (SHGs), अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं, युवा समूहों तथा सामुदायिक संस्थाओं के माध्यम से ग्राम सभा से पूर्व संरचित जन-लामबंदी को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • आजीविका-अनुकूल बैठक समय निर्धारण: कृषि चक्र, स्थानीय कार्य-प्रणाली, प्रवासन की वास्तविकताओं तथा सामुदायिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए ग्राम सभा की बैठकों का आजीविका-अनुकूल समय निर्धारण किया जाए।
  • समावेशी भागीदारी मंचों को सुदृढ़ करना: महिला सभाओं, वार्ड सभाओं, युवा सभाओं तथा अन्य समावेशी भागीदारी मंचों को मजबूत बनाकर महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, युवाओं तथा अन्य कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए।
  • पारदर्शिता एवं जवाबदेही का संस्थानीकरण: कार्यवाही प्रतिवेदन (ATR), शिकायत अनुश्रवण प्रणाली, सार्वजनिक समीक्षा तंत्र तथा अनुवर्ती कार्यवाही को संस्थागत रूप देकर पारदर्शिता, जवाबदेही तथा जनविश्वास को सुदृढ़ किया जाए।
  • सार्वजनिक सूचनाओं का अग्रिम प्रकटीकरण: ग्राम सभा के एजेंडा, लाभार्थी सूची, बजट, विकास प्राथमिकताओं तथा क्रियान्वयन की स्थिति का भौतिक एवं डिजिटल माध्यमों से अग्रिम सार्वजनिक प्रकटीकरण सुनिश्चित किया जाए।
  • संस्थागत अभिसरण को सुदृढ़ करना: पंचायती राज संस्थाओं एवं विभागीय एजेंसियों के बीच अभिसरण को मजबूत बनाकर सेवा वितरण, शिकायत निवारण तथा सामुदायिक आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायित्व में सुधार किया जाए।
  • नागरिक सहभागिता के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग: SMS अलर्ट, व्हाट्स-ऐप समूह, IVRS प्रणाली, पंचायत डिजिटल सूचना बोर्ड तथा eGramSwaraj से जुड़े संचार तंत्र का उपयोग कर नागरिक सहभागिता को बढ़ावा दिया जाए।
  • नागरिक-केंद्रित एवं परिणामोन्मुख शासन को बढ़ावा: सार्थक चर्चाओं, स्थानीय समस्याओं के समाधान, दृश्यमान अनुवर्ती कार्यवाही तथा समुदाय-आधारित निर्णय-निर्माण को प्रोत्साहित करते हुए नागरिक-केंद्रित एवं परिणामोन्मुख ग्राम सभा प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जाए।

पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) से संबंधित प्रमुख सरकारी पहलें 

  • ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP): ग्राम सभाओं के परामर्श के माध्यम से ग्राम पंचायतों को भागीदारीपूर्ण, आवश्यकता-आधारित एवं अभिसरण आधारित स्थानीय विकास योजनाएँ तैयार करने में सक्षम बनाती है।
  • ई-ग्राम स्वराज पोर्टल: योजना निर्माण, बजट, लेखांकन, निगरानी तथा रिपोर्टिंग के लिए एक डिजिटल सुशासन मंच, जो पंचायतों में पारदर्शिता एवं दक्षता को बढ़ावा देता है।
  • ऑनलाइन लेखा-परीक्षण: पंचायत खातों के ऑनलाइन लेखा-परीक्षण की सुविधा प्रदान करता है, जिससे वित्तीय जवाबदेही एवं पारदर्शिता सुदृढ़ होती है।
  • राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA): पंचायती राज संस्थाओं एवं निर्वाचित प्रतिनिधियों के क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण तथा संस्थागत सुदृढ़ीकरण के लिए एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है।
  • स्वामित्व योजना (SVAMITVA): ड्रोन आधारित मानचित्रण के माध्यम से संपत्ति कार्ड प्रदान करती है, जिससे भूमि स्वामित्व स्पष्ट होता है, विवादों में कमी आती है तथा पंचायत स्तर पर योजना निर्माण एवं राजस्व सृजन में सुधार होता है।
  • पंचायत उन्नति सूचकांक (PAI): नौ स्थानीयकृत सतत् विकास लक्ष्यों (LSDGs) के आधार पर पंचायतों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने वाला ढाँचा, जो साक्ष्य-आधारित योजना निर्माण एवं सुशासन को बढ़ावा देता है।
  • मिशन अंत्योदय: ग्राम स्तर पर अवसंरचना, लोक सेवाओं एवं सामाजिक-आर्थिक संकेतकों का आकलन कर समेकित ग्रामीण विकास योजना को समर्थन प्रदान करता है।
  • सतत् विकास लक्ष्यों का स्थानीयकरण (LSDGs): ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (GPDPs) में सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को समाहित कर समावेशी एवं सतत् स्थानीय विकास को प्रोत्साहित करता है।
  • मेरी पंचायत मोबाइल ऐप: नागरिकों एवं पंचायत प्रतिनिधियों को पंचायत संबंधी जानकारी प्राप्त करने, विकास कार्यों की निगरानी करने तथा नागरिक सहभागिता को बढ़ावा देने में सक्षम बनाता है।
  • राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान: प्रशिक्षण, कार्यशालाओं एवं जन-जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से पंचायत प्रतिनिधियों में सुशासन, भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र एवं जागरूकता को प्रोत्साहित करता है।

निष्कर्ष

ग्राम सभा में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन यह दर्शाता है कि ग्राम सभा में भागीदारी को सुदृढ़ करने के लिए केवल उपस्थिति बढ़ाने पर आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर जागरूकता, प्रक्रियात्मक साक्षरता, समावेशिता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा शासन के दृश्यमान परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। यह अध्ययन ग्रामीण भारत में ग्राम सभा को भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र, स्थानीय जवाबदेही तथा समुदाय-आधारित विकास की एक सशक्त संस्था के रूप में विकसित करने के लिए साक्ष्य-आधारित मार्गदर्शिका प्रस्तुत करता है।

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