UPSC PYQs

Prelims, Mains & Optional PYQs

UPSC Notes

Comprehensive & Short Notes

संक्षिप्त समाचार

26 Mar 2026

आवश्यकता का सिद्धांत (Doctrine of Necessity)

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के स्वयं को अलग रखने से यह स्पष्ट होता है कि चूँकि सभी न्यायाधीशों को इसी तरह के हितों के टकराव का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए आवश्यकता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय मामले की सुनवाई करे।

संबंधित तथ्य

  • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 ने चयन पैनल से मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया जिससे कार्यपालिका के प्रभुत्व को लेकर चिंताएँ बढ़ीं।
  • न्यायमूर्ति सूर्यकांत और पूर्व में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई से हितों के टकराव (conflict of interest) के कारण स्वयं को अलग कर लिया।
  • चूँकि सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश भविष्य में मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं, यह मामला एक संरचनात्मक टकराव (structural conflict) उत्पन्न करता है, जिससे आवश्यकता सिद्धांत का महत्व बढ़ जाता है।

‘आवश्यकता का सिद्धांत’ के बारे में:

  • यह सिद्धांत न्यायाधीश को हितों के टकराव के बावजूद मामले की सुनवाई की अनुमति देता है, जब कोई वैकल्पिक मंच उपलब्ध न हो।
  • मूल सिद्धांत: यह इस विचार पर आधारित है कि निष्पक्ष निर्णायक के अभाव में न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता
  • प्राकृतिक न्याय का अपवाद: यह कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता’ के सिद्धांत का अपवाद है।
  • उत्पत्ति: यह सिद्धांत सामान्य विधि से विकसित हुआ है।
  • न्यायिक मान्यता: इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एनजेएसी मामले (2015) में लागू किया गया था।
    • न्यायमूर्ति खेहर ने कहा कि जब सभी न्यायाधीशों के सामने समान टकराव हो, तो स्वयं को अलग रखने से न्यायिक व्यवस्था समाप्त हो सकती है।
  • लागू होने की शर्तें: यह केवल तभी लागू होता है जब सभी या अधिकांश न्यायाधीश अयोग्य हों और कोई वैकल्पिक मंच उपलब्ध न हो।
  • सीमा: यदि कोई निष्पक्ष वैकल्पिक प्राधिकरण उपलब्ध हो, तो इस सिद्धांत का उपयोग नहीं किया जा सकता।

संशोधित उड़ान योजना

हाल ही में सरकार ने संशोधित उड़ान (Modified UDAN) योजना को मंजूरी दी, जिसमें सब्सिडी अवधि को 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।

संशोधित उड़ान योजना के बारे में

  • संशोधित उड़ान योजना क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना का उन्नत संस्करण है, जो संचालन की स्थिरता, अवसंरचना विस्तार और बंद हो चुके मार्गों के पुनरुद्धार पर केंद्रित है।
  • कार्यान्वयन अवधि: वर्ष 2026 से 2036 तक
  • बजट प्रावधान: कुल ₹28,840 करोड़ (लगभग छह गुना वृद्धि), जिसमें सब्सिडी समर्थन, हवाई अड्डा पुनर्विकास और हेलीपैड निर्माण शामिल हैं।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • मार्गों की व्यवहार्यता के लिए सब्सिडी समर्थन को 3 से 5 वर्ष तक बढ़ाना
    • हवाई किराया शुल्क के बजाय प्रत्यक्ष सरकारी सहायता के माध्यम से धन उपलब्ध कराना
    • 100 हवाई अड्डों और 200 हेलीपैड का विकास
    • दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों में अंतिम-मील कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना
    • कम यातायात वाले हवाई अड्डों पर एयरलाइन संचालन और रखरखाव में सहायता करना

उड़ान योजना के बारे में 

  • UDAN (उड़े देश का आम नागरिक) एक क्षेत्रीय हवाई संपर्क योजना है, जिसका उद्देश्य हवाई यात्रा को सुलभ और किफायती बनाना है।
  • उत्पत्ति: इसे राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति (NCAP), 2016 के तहत नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया।
  • पहली उड़ान: पहली उड़ान 27 अप्रैल 2017 को शिमला–दिल्ली के बीच संचालित हुई।
  • नोडल एजेंसी: भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI)
  • चरण:
    • उड़ान 1.0–4.0: बिना सेवा वाले हवाई अड्डों, पर्यटन और दूरस्थ क्षेत्रों पर ध्यान
    • उड़ान 5.0 और उसके आगे: हेलीकॉप्टर, छोटे विमान और अंतिम-मील कनेक्टिविटी पर जोर
    • संशोधित उड़ान(2026–36): सततता और अवसंरचना विस्तार पर विशेष बल
  • मुख्य विशेषताएँ
    • हवाई किराया सीमा: उड़ान सीटों के एक निश्चित अनुपात पर हवाई किराए को सीमित करके किफायती बनाती है, जिससे हवाई यात्रा आम नागरिक के लिए सुलभ हो जाती है।
    • व्यवहार्यता अंतर निधि (VGF): VGF एक प्रतिस्पर्द्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से आवंटित वित्तीय सहायता है, जो एयरलाइंस को अव्यवहार्य क्षेत्रीय मार्गों पर परिचालन घाटे की क्षतिपूर्ति के लिए प्रदान की जाती है।
    • क्षेत्रीय कनेक्टिविटी निधि (RCF): यह एक समर्पित निधि है जो VGF को वित्तपोषित करने और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी संचालन को बनाए रखने के लिए गैर-उड़ान मार्गों पर शुल्क लगाकर बनाई जाती है।
    • ATF करों में कमी और सहकारी संघवाद: राज्य विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) पर वैट (VAT) कम करते हैं और रियायतें प्रदान करते हैं, जिससे केंद्र-राज्य सहयोग के माध्यम से व्यवहार्यता सुनिश्चित होती है।

उड़ान का महत्व

  • क्षेत्रीय संपर्क और संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा
  • पर्यटन, व्यापार और आर्थिक विकास को प्रोत्साहन (विशेषकर टियर-2/3 शहरों में)
  • दूरस्थ और रणनीतिक क्षेत्रों में पहुँच में सुधार
  • समावेशी विमानन और रोजगार सृजन को समर्थन
  • राष्ट्रीय एकीकरण और अवसंरचना विकास को सुदृढ़ करना

CALM-ब्रेन  (CALM-Brain)

भारत ने बेंगलुरु में CALM-Brain लॉन्च किया, जो मनोवैज्ञानिक विकारों के डेटा का पहला ओपन-सोर्स राष्ट्रीय भंडार है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान, निदान और व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को उन्नत करना है।

CALM-Brain के बारे में

  • CALM (कॉम्प्रिहेन्सिव एक्सेलेरेटर फॉर लर्निंग एंड मॉडलिंग)-Brain भारत का पहला व्यापक डिजिटल भंडार है, जो न्यूरो-मानसिक विकारों के डेटा को एकीकृत कर उनकी बेहतर समझ, निदान और उपचार को सक्षम बनाता है।
  • विकास: रोहिणी नीलकेनी सेंटर फॉर ब्रेन एंड माइंड (CBM), जो NIMHANS और NCBS-TIFR के सहयोग से स्थापित है।
  • इसे रोहिणी नीलेकानी सेंटर फॉर ब्रेन एंड माइंड (CBM) ने विकसित किया है, जो राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) और राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र – टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (NCBS-TIFR) का एक संयुक्त प्रयास है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • बहु-आयामी डेटा एकीकरण: यह प्लेटफॉर्म क्लिनिकल, न्यूरो-इमेजिंग, व्यवहारिक और आनुवंशिक डेटा को एकीकृत करता है, जिससे मस्तिष्क विकारों की समग्र समझ विकसित होती है।
    • प्रमुख मानसिक विकारों पर केंद्रित: इसमें पाँच प्रमुख विकारों- व्यसन (एडिक्शन), बाइपोलर डिसऑर्डर, डिमेंशिया, ओसीडी, और सिजोफ्रेनिया से संबंधित डेटा शामिल है।
    • बायोरिपॉजिटरी से जुड़ाव: यह स्टेम-सेल बायोरिपॉजिटरी से जुड़ा है, जो उन्नत जैविक और ट्रांसलेशनल अनुसंधान को सक्षम बनाता है।
      • स्टेम-सेल बायोरिपॉजिटरी विशेष एवं सुरक्षित सुविधाएँ हैं, जो अनुसंधान और चिकित्सीय उपयोग के लिए स्टेम सेल लाइन, अम्बिलिकल कॉर्ड और संबंधित जैविक सामग्री का संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण और वितरण करती हैं।
    • ओपन-सोर्स एवं सहयोगी मंच: यह एक ओपन-एक्सेस डेटाबेस है, जो वैश्विक स्तर पर अनुसंधान सहयोग और नवाचार को बढ़ावा देता है।

महत्त्व

  • प्रारंभिक निदान एवं बायोमार्कर पहचान: यह न्यूरोकॉग्निटिव बायोमार्कर्स की पहचान में सहायक है, जिससे मानसिक रोगों की शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप संभव होता है।
  • व्यक्तिगत उपचार को बढ़ावा: यह व्यक्तिगत जैविक प्रोफाइल के आधार पर लक्षित और व्यक्तिगत उपचारों के विकास को समर्थन देता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान को बढ़ावा: तंत्रिका विज्ञान अनुसंधान में भारत की क्षमता को मजबूत करता है और परिशुद्ध चिकित्सा में वैश्विक प्रयासों के साथ सामंजस्य स्थापित करता है।

कावेरी नदी

3 19

हाल ही में IIT गांधीनगर के एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि कावेरी बेसिन में वर्ष 2026–2050 के बीच जल उपलब्धता में लगभग 3.5% की कमी हो सकती है, जिससे जल-वितरण विवाद और अधिक तीव्र हो सकते हैं।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • प्रवाह में संभावित कमी: कावेरी नदी के जल प्रवाह में 3.5% की कमी की संभावना है, जबकि अधिकांश भारतीय नदियों में वृद्धि का अनुमान है।
  • ऐतिहासिक गिरावट का रुझान: इस नदी में पहले ही वर्ष 1951–2012 के बीच 28% की कमी दर्ज की जा चुकी है, जो दीर्घकालिक दबाव को दर्शाती है।
  • जलवायु मॉडल के निष्कर्ष: CMIP6 आधारित सीमित जलवायु मॉडल से पता चला कि केवल कुछ मॉडल ही भारतीय मानसून पैटर्न को सटीकता से दर्शाते हैं, जिससे पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता बढ़ती है।
  • क्षेत्रीय भिन्नता: जहाँ गंगा और सिंधु जैसी उत्तरी नदियों में जल प्रवाह बढ़ने की संभावना है, वहीं कावेरी बेसिन में जल संकट की स्थिति बन सकती है।
  • जल-वितरण पर प्रभाव: जल प्रवाह में कमी से विशेषकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच अंतर-राज्यीय विवाद बढ़ सकते हैं, जिससे नदी जोड़ो परियोजनाओं जैसी पहलों की आवश्यकता बढ़ती है।

कावेरी नदी के बारे में

  • परिचय: कावेरी नदी दक्षिण भारत की एक प्रमुख बारहमासी नदी है, जो सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • उद्गम: यह कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित ब्रह्मगिरी पहाड़ियों के तलाकावेरी से लगभग 1,341 मीटर की ऊँचाई पर उद्गमित होती है।
  • प्रवाह मार्ग: नदी कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी से होकर लगभग 800 किमी बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • सहायक नदियाँ:
    • बाएँ तट: हरंगी, हेमावती, शिम्शा, अर्कावती
    • दाएँ तट: लक्ष्मणतीर्था, काबिनी, भवानी, नोय्यल, अमरावती
  • जल बँटवारा: कावेरी जल विवाद में कर्नाटक और तमिलनाडु प्रमुख तटीय राज्य हैं, जबकि केरल और पुडुचेरी का भी हिस्सा है।
    • 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार जल आवंटन: तमिलनाडु: 404.25 tmcft, कर्नाटक: 284.75 tmcft, केरल: 30 tmcft तथा पुडुचेरी: 7 tmcft
  • डेल्टा निर्माण: कुड्डालोर के निकट बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले यह एक उपजाऊ डेल्टा बनाती है, जिसे “दक्षिण भारत का उद्यान ” कहा जाता है।

एंटीप्रोटॉन (Antiprotons)

4 12

जेनेवा स्थित यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन (CERN) के वैज्ञानिकों ने मार्च 2026 में पहली बार एंटीप्रोटॉन का सड़क मार्ग से परिवहन सफलतापूर्वक किया, जो एंटीमैटर के प्रबंधन और गतिशीलता में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

संबंधित तथ्य 

  • यह प्रयोग उन्नत अनुसंधान के लिए एंटीमैटर के सुरक्षित संचालन और परिवहन में एक महत्त्वपूर्ण सफलता को दर्शाता है
  • यह कण भौतिकी की एक मौलिक अवधारणा का प्रतिनिधित्व करता है

एंटीप्रोटॉन के बारे में

  • एंटीप्रोटॉन, प्रोटॉन के प्रतिकण (antiparticles) होते हैं।
  • ये एक प्रकार के एंटीमैटर कण हैं, जिनका द्रव्यमान प्रोटॉन के समान होता है, लेकिन इन पर ऋणात्मक आवेश होता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • द्रव्यमान: प्रोटॉन के समान
    • आवेश: ऋणात्मक (जबकि प्रोटॉन का धनात्मक होता है)
    • स्पिन एवं गुण: परिमाण में समान, परंतु प्रकृति में विपरीत
  • वैज्ञानिक आधार 
    • इसका सिद्धांत पॉल डिराक (Paul Dirac) ने सापेक्षिक क्वांटम सिद्धांत के माध्यम से प्रस्तुत किया।
    • इसका खोज वर्ष 1955 में एमिलियो सेग्रे (Emilio Segrè) और ओवेन चेम्बरलिन (Owen Chamberlain) द्वारा की गई।
  • उत्पादन
    • प्राकृतिक रूप से यह कॉस्मिक किरणों में पाया जाता है।
    • कृत्रिम रूप से CERN जैसे पार्टिकल एक्सेलेरेटर में उत्पन्न किया जाता है, जहाँ:
      • उच्च-ऊर्जा प्रोटॉनों को धातु लक्ष्य से टकराया जाता है।
  • महत्त्व:
    • मौलिक भौतिकी: यह निम्न सिद्धांतों की जाँच में सहायक है:
      • मानक मॉडल
      • पदार्थ–एंटीमैटर समरूपता
    • ब्रह्मांड विज्ञान: यह समझने में मदद करता है कि ब्रह्मांड में पदार्थ (matter) का प्रभुत्व क्यों है।
    • अनुप्रयुक्त अनुसंधान: इसका उपयोग कैंसर उपचार (antiproton therapy) में संभावित रूप से किया जा सकता है।

आयुर्वेद और आधुनिक टीबी उपचार

भारत ने आयुर्वेद और आधुनिक टीबी उपचार को एकीकृत करते हुए एक वैश्विक स्तर का पहला क्लिनिकल अध्ययन शुरू किया है, जिसका उद्देश्य उपचार परिणामों में सुधार करना और टीबी उन्मूलन प्रयासों को तीव्र करना है।

‘क्लिनिकल’ अध्ययन के बारे में

  • यह एक अद्वितीय वैश्विक अध्ययन है, जिसमें आयुर्वेद को मानक एंटी-ट्यूबरकुलोसिस उपचार (ATT) के साथ एक पूरक के रूप में उपयोग कर समग्र रोगी देखभाल का मूल्यांकन किया जा रहा है।
  • संस्थागत सहयोग: यह जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और आयुष मंत्रालय की संयुक्त पहल है।
  • दायरा: इस अध्ययन में 1,200 से अधिक मरीजों को शामिल किया गया है और रिकवरी, पोषण, सुरक्षा तथा जीवन गुणवत्ता जैसे पहलूओं का मूल्यांकन किया जा रहा है।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • समग्र टीबी देखभाल: पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के एकीकरण से केवल संक्रमण के उपचार के स्थान पर समग्र स्वास्थ्य सुधार पर ध्यान।
    • आयुर्वेद का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण: जीनोमिक्स, मेटाबोलोमिक्स, MRI, और इम्यून प्रोफाइलिंग जैसे उन्नत उपकरणों के माध्यम से साक्ष्य-आधारित प्रभावशीलता स्थापित करना।
    • उपचार संबंधी चुनौतियों का समाधान: दवा प्रतिरोध (Drug resistance), विषाक्तता (Toxicity), कुपोषण तथा मधुमेह जैसी सह-रोग स्थितियों को लक्षित करना।

भारत की टीबी रोधी प्रगति:

  • घटनाओं में कमी : भारत ने वर्ष 2015 से अब तक टीबी मामलों में 21% की कमी हासिल की है, और वर्ष 2024 में इसकी दर लगभग 187 प्रति 100,000 जनसंख्या है।
  • नीतिगत ढाँचा: यह राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) द्वारा संचालित है, जो शीघ्र पहचान और रोगी-केंद्रित देखभाल पर केंद्रित है।
    • नाम परिवर्तन: वर्ष 2020 में RNTCP का नाम बदलकर NTEP रखा गया, ताकि भारत में वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को बल मिल सके, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2030 लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले है।
  • टीबी के संबंध में SDG लक्ष्य (आधार रेखा 2015) इस प्रकार हैं:
    • घटनाओं में 80% की कमी
    • मृत्यु दर में 90% की कमी
    • किसी भी टीबी रोगी या उसके परिवार को अत्यंत खर्च का सामना न करना पड़े

पहल का महत्व 

  • समेकित स्वास्थ्य दृष्टिकोण: यह आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के बीच समन्वय को बढ़ावा देता है।
  • टीबी अनुसंधान को बढ़ावा: यह जीनोमिक सर्विलांस और ‘कोहोर्ट’ अध्ययन जैसी पहलों को सुदृढ़ करता है, विशेषकर दवा-प्रतिरोधी टीबी के संदर्भ में।
  • टीबी उन्मूलन की दिशा में कदम: यह नवाचार, सामुदायिक भागीदारी और बेहतर उपचार परिणामों के माध्यम से भारत को टीबी-मुक्त राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को सशक्त करता है।

संक्षिप्त समाचार

Explore UPSC Foundation Batches

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Free Counselling for UPSC Aspirants

Connect with our experts and take the right next step.

Expert Guidance
Personalized Strategy
100% Free

Book Your Free Session

NEED ASSISTANCE?

Request a Callback

Our counsellor will connect with you and help you choose the right course and centre.

  • Expert Guidance
  • Course & Fee Information
  • Quick Callback Support

Request a Callback

Books
UPSC PYQs
UPSC Notes
Current Affairs
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.