संक्षिप्त समाचार

9 Apr 2026

अभ्यास साइक्लोन-IV

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भारतीय सेना का एक दल मिस्र के लिए रवाना हुआ है, जहाँ वह भारत–मिस्र संयुक्त विशेष बल अभ्यास ‘साइक्लोन-IV’ के चौथे संस्करण में भाग लेगा।

अभ्यास साइक्लोन के बारे में

  • अभ्यास साइक्लोन भारत और मिस्र के बीच आयोजित एक द्विपक्षीय संयुक्त विशेष बल अभ्यास है, जिसका उद्देश्य रक्षा सहयोग और परिचालन समन्वय को सुदृढ़ करना है।
  • उत्पत्ति: यह एक वार्षिक अभ्यास है, जो बारी-बारी से भारत और मिस्र में आयोजित किया जाता है, और दोनों देशों के मध्य गहराते सैन्य संबंधों तथा रणनीतिक साझेदारी को दर्शाता है।
    • अभ्यास साइक्लोन-I” का आयोजन वर्ष 2023 में राजस्थान के जैसलमेर में किया गया था।
  • अभ्यास साइक्लोन-IV (2026): चौथा संस्करण अप्रैल 2026 में मिस्र के अंशास (Anshas) में, रेगिस्तानी और अर्द्ध-रेगिस्तानी परिस्थितियों में आयोजित किया गया।
  • प्रतिभागी: भारतीय दल में भारतीय सेना की विशिष्ट इकाइयों के 25 कर्मी शामिल हैं, जो मिस्र के विशेष बलों के साथ प्रशिक्षण ले रहे हैं।
  • मुख्य क्षेत्र: यह अभ्यास संयुक्त मिशन योजना, आतंकवाद-रोधी अभियानों तथा विशेष अभियानों की रणनीतियों, तकनीकों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित है, जिन्हें यथार्थवादी युद्ध परिस्थितियों में अभ्यास किया जाता है।
  • महत्त्व: यह अभ्यास पारस्परिक संचालन क्षमता को बढ़ाता है, आपसी विश्वास को सुदृढ़ करता है, पेशेवर विशेषज्ञता के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है और भारत तथा मिस्र के बीच सैन्य-से-सैन्य सहयोग को और गहरा करता है।

“लुनार रिंग” परियोजना

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जापान की शिमिजु कॉरपोरेशन (Shimizu Corporation) ने चंद्रमा से सौर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक महत्त्वाकांक्षी “लुनार रिंग” नामक भविष्यवादी परियोजना का प्रस्ताव रखा है।

  • इस प्रस्ताव ने अंतरिक्ष-आधारित सौर ऊर्जा1 को एक संभावित स्वच्छ ऊर्जा स्रोत के रूप में लेकर चर्चाओं को पुनर्जीवित किया है।

लुनार रिंग परियोजना के बारे में

  • यह परियोजना निरंतर सौर ऊर्जा प्राप्त करने और उसे पृथ्वी तक प्रेषित करने के लिए बड़े पैमाने पर अवसंरचना की परिकल्पना करती है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • विस्तृत सौर अवसंरचना: इस परियोजना में चंद्रमा के भूमध्य रेखा के साथ लगभग 11,000 किमी. लंबी सौर पैनलों की पट्टी के निर्माण का प्रस्ताव है, ताकि सौर ऊर्जा का दोहन किया जा सके।
    • निरंतर सौर ऊर्जा संग्रह: इसे लगभग निरंतर सूर्यप्रकाश प्राप्त करने के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें चंद्रमा के घूर्णन और परिक्रमण की विशेषताओं का उपयोग कर बिना अवरोध ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित किया जाएगा।
    • पृथ्वी तक वायरलेस ऊर्जा प्रेषण: उत्पन्न सौर ऊर्जा को माइक्रोवेव में परिवर्तित कर पृथ्वी तक भेजा जाएगा, जिससे इसका व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर उपयोग संभव हो सके।
    • निर्माण दृष्टिकोण: इस परियोजना में निर्माण कार्य के लिए रोबोट और स्वचालित प्रणालियों के उपयोग का प्रस्ताव है।
      • यह चंद्र मृदा (स्थानिक संसाधन उपयोग) का उपयोग करता है, जिससे पृथ्वी से सामग्री ले जाने की आवश्यकता न्यूनतम हो जाती है।

अंतरिक्ष-आधारित सौर ऊर्जा (Space-Based Solar Power) के बारे में

  • इसमें अंतरिक्ष (कक्षा या चंद्र सतह) में सौर पैनल स्थापित कर निरंतर (24×7) सूर्यप्रकाश प्राप्त किया जाता है।
  • ऊर्जा को माइक्रोवेव या लेजर किरणों में परिवर्तित कर पृथ्वी तक प्रेषित किया जाता है।
  • यह वायुमंडलीय हानि या रात्रिकालीन अवरोध (अंतरिक्ष में) न होने का लाभ प्रदान करता है।

SMOPS-2026

वैश्विक अंतरिक्ष विशेषज्ञ SMOPS-2026 में भाग लेने के लिए बंगलुरू में एकत्र हुए हैं, जहाँ अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष यान मिशन संचालित और विकसित होते अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में उभरती चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है।

SMOPS-2026 के बारे में

  • SMOPS-2026 अंतरिक्ष यान मिशन संचालन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा संस्करण है, जिसका फोकस स्मार्ट और सतत् अंतरिक्ष मिशन प्रबंधन पर है।
  • आयोजक: इसका आयोजन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एस्ट्रोनॉटिक्स द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।

मुख्य उद्देश्य

  • मिशन संचालन को उन्नत करना: यह सम्मेलन नवीन परिचालन रणनीतियों के माध्यम से मिशन डिजाइन, योजना और निष्पादन को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखता है।
  • उभरती प्रौद्योगिकियों का एकीकरण: यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग(ML) और स्वचालन के उपयोग को बढ़ावा देता है, ताकि अंतरिक्ष मिशन संचालन अधिक कुशल और स्वायत्त बन सके।
  • जटिल अंतरिक्ष चुनौतियों का समाधान: इसमें अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन, बड़े उपग्रह समूह, साइबर सुरक्षा, और अंतर्ग्रहीय मिशनों के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहन: यह वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों, उद्योग, अकादमिक जगत और स्टार्ट-अप्स के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है।

महत्त्व 

  • भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को सुदृढ़ करना: यह मानव अंतरिक्ष उड़ान, गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण, और उन्नत मिशन संचालन में भारत की महत्त्वाकांक्षाओं को समर्थन देता है।
  • सतत अंतरिक्ष प्रथाओं को बढ़ावा: यह अंतरिक्ष अपशिष्ट, भीड़भाड़, और सुरक्षित अंतरिक्ष संचालन जैसी चुनौतियों को संबोधित करता है।
  • नई अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: यह नवाचार, निजी क्षेत्र की भागीदारी, और वाणिज्यिक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को प्रोत्साहित करता है।
  • क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण: यह विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और युवा पेशेवरों को विचारों के आदान-प्रदान और भविष्य-उन्मुख कौशल विकसित करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

मृदा सखी

महाराष्ट्र के सूखा-प्रवण क्षेत्रों में ‘मृदा सखी’ जमीनी स्तर पर परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण वाहक के रूप में उभर रही हैं, जो वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन के माध्यम से कृषि उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने में योगदान दे रही हैं।

मृदा सखी के बारे में

  • मृदा सखी  प्रशिक्षित ग्रामीण महिलाएँ हैं, जो सामुदायिक स्तर पर मृदा सलाहकार के रूप में कार्य करती हैं और वैज्ञानिक ज्ञान तथा किसानों के बीच की दूरी को पाटती हैं, विशेषकर सूखा-प्रवण क्षेत्रों में।
  • प्रशिक्षण: इन्हें माण देशी फाउंडेशन की पहल के अंतर्गत जलवायु-सुदृढ़ं कृषि कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षित किया जाता है।
    • माण देशी फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1996 में हुई थी। यह मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के सूखा-प्रवण क्षेत्रों में ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए कार्य करता है।
  • भूमिका: मृदा सखी मृदा नमूने एकत्र करती हैं, मृदा परीक्षण में सहायता करती हैं, और किसानों को फसल चयन, उर्वरक के उपयोग तथा सतत् कृषि पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन देती हैं, जिससे उपज और मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • महत्त्व: ये जलवायु-सुदृढ़ कृषि को बढ़ावा देती हैं, उर्वरकों के दुरुपयोग और उत्सर्जन को कम करती हैं, कृषि उत्पादकता में वृद्धि करती हैं तथा आय सृजन और निर्णय लेने की भूमिका के माध्यम से वंचित महिलाओं को सशक्त बनाती हैं।

मृदा संरक्षण हेतु सरकारी पहलें

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (2015): यह योजना किसानों को मृदा के पोषक तत्त्वों की स्थिति (12 मानकों) का विश्लेषण करते हुए कार्ड जारी करती है, जिससे संतुलित और परीक्षण-आधारित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा मिलता है तथा दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है
    • परीक्षित मानक:
      • वृहत पोषक तत्त्व: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K)
      • द्वितीयक पोषक तत्त्व: सल्फर (S)
      • सूक्ष्म पोषक तत्त्व: जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज, बोरॉन
      • भौतिक गुण: pH, विद्युत चालकता (Electrical Conductivity – EC), कार्बनिक कार्बन (Organic Carbon – OC)
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना – वाटरशेड विकास घटक (2015): यह “पर्वत-पहाड़ी से घाटी तक” दृष्टिकोण पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य मृदा अपरदन को रोकना, जल संरक्षण करना और वनीकरण तथा चेक डैम के माध्यम से अवनत भूमि का पुनर्वास करना है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना (2015-16): यह जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधन-आधारित, जलवायु-लचीली कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और मृदा संरचना में सुधार होता है।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

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केंद्रीय गृह मंत्री ने 8 अप्रैल, 2026 को प्रसिद्ध देशभक्त और साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की 132वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

परिचय

  • प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म वर्ष 1838 में बंगाल प्रेसीडेंसी के नैहाटी में हुआ था।
  • शिक्षा: उन्होंने हुगली कॉलेज में अध्ययन किया और वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातकों में शामिल थे।
  • भारतीय सिविल सेवा: वर्ष 1858 में उन्हें ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा में डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया।
  • साहित्यिक योगदान: उन्हें आधुनिक बंगाली गद्य का जनक माना जाता है।
    • उनकी रचनाओं में औपनिवेशिक भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक वास्तविकताओं का सजीव चित्रण मिलता है।
  • प्रमुख कृतियाँ
    • दुर्गेशनंदिनी (1865) – पहला प्रमुख बंगाली उपन्यास।
    • कपालकुंडला (1866) – प्रेम और आध्यात्मिक विषयों का संगम।
    • आनंदमठ (1882) – वंदे मातरम् का परिचय और राष्ट्रवाद का प्रचार।
    • देवी चौधरानी (1884) – महिला सशक्तीकरण और प्रतिरोध पर प्रकाश डाला।
  • विरासत और प्रभाव: उन्होंने श्री अरविंद, रबींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे प्रमुख नेताओं को प्रभावित किया।
    • उनके विचारों ने भारत में बौद्धिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
    • “वंदे मातरम्” को 24 जनवरी 1950 को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया।

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