संक्षेप में समाचार

28 Apr 2026

वर्ष  2038 के  एशियाई खेलों की मेजबानी के लिए भारत ने दिखाई रुचि

भारतीय ओलंपिक संघ ने 2038 एशियाई खेलों की मेजबानी के लिए एशियाई ओलंपिक परिषद के समक्ष ‘एक्स्प्रेसन ऑफ इंटरेस्ट’ प्रस्तुत की है।

2038 एशियाई खेलों के लिए भारत की बोली के बारे में

  • मेजबान शहर: अहमदाबाद को भारत के बहु-खेल केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहाँ वर्ष 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी भी प्रस्तावित है तथा वर्ष 2036 ओलंपिक के लिए भी दावेदारी की योजना है।
  • प्रारंभिक प्रतिक्रिया: एशियाई ओलंपिक परिषद के नेतृत्व ने सकारात्मक संकेत दिए हैं और एक मूल्यांकन समिति के भारत दौरे की संभावना है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: भारत ने पहले वर्ष 1951 और 1982 में (नई दिल्ली) एशियाई खेलों की तथा वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की है।

एशियाई खेलों के बारे में

  • महाद्वीपीय बहु-खेल प्रतियोगिता: यह एशिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, जिसमें पूरे महाद्वीप के खिलाड़ी भाग लेते हैं।
  • संचालन निकाय: इसका आयोजन एशियाई ओलंपिक परिषद (OCA) द्वारा किया जाता है।
  • आवृत्ति: ठीक ओलंपिक की तरह, यह हर चार वर्ष में आयोजित होते हैं।
  • उत्पत्ति और इतिहास: पहला आयोजन वर्ष 1951 में नई दिल्ली में हुआ था, जो एशिया की उपनिवेशोत्तर खेल एकता का प्रतीक था।
  • आगामी मेजबान: भविष्य के एशियाई खेलों की मेजबानी नागोया (2026), दोहा (2030) और रियाद (2034) करेंगे।

साइबोर्ग बॉटनी (Cyborg Botany)

शोधकर्ता साइबोर्ग बॉटनी का विकास कर रहे हैं, जिससे पौधों के तनाव संकेतों की वास्तविक समय में निगरानी संभव हो सके तथा कृषि को ‘आधुनिक’ बनाया जा सके।

साइबोर्ग बॉटनी क्या है?

  • परिभाषा: साइबोर्ग बॉटनी का अर्थ है जीवित पौधों और इलेक्ट्रॉनिक घटकों का एकीकरण, जिससे ऐसे सँकर तंत्र निर्मित होते हैं, जो जैविक संकेतों को महसूस और संप्रेषित कर सकते हैं।
  • अवधारणा की उत्पत्ति: यह “साइबरनेटिक ऑर्गेनिज्म” की अवधारणा से निकला है, जहाँ जीव विज्ञान और प्रौद्योगिकी का संयोजन होता है।
  • अंतर-विषयक क्षेत्र: इसमें जीव विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, नैनोप्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी का समावेश होता है।
  • कार्य प्रणाली
    • जैव-रासायनिक संकेत पहचान: पौधे जल, कीट या तापमान जैसे तनाव पर आंतरिक संकेत उत्पन्न करते हैं, जिन्हें कोशिकीय स्तर पर पहचाना जाता है।
    • अंतर्निहित इलेक्ट्रॉनिक्स: नैनोवायर और चालक पॉलिमर (जैसे PEDOT) को पौधों के ऊतकों में एकीकृत किया जाता है, जो बायोसेंसर और संकेत वाहक का कार्य करते हैं।
    • वास्तविक समय संचार: प्राप्त संकेतों को बाहरी उपकरणों तक भेजा जाता है, जिससे पौधों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की तत्काल निगरानी संभव होती है।
  • महत्त्व: यह तकनीक पौधों में सूखा या रोग जैसे तनाव का प्रारंभिक स्तर पर पता लगाने में सक्षम है, जिससे समय पर हस्तक्षेप कर उत्पादकता और सततता बढ़ाई जा सकती है।
  • अनुप्रयोग: यह सटीक कृषि और पर्यावरण निगरानी में उपयोगी है, जहाँ फसल स्वास्थ्य, मिट्टी की स्थिति और प्रदूषण के बारे में वास्तविक समय में जानकारी मिलती है।

मिथोस एआई (Mythos AI)

एंथ्रोपिक ने ‘क्लॉड मिथोस’ नामक एक उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकसित किया है, लेकिन गंभीर साइबर सुरक्षा जोखिमों के कारण इसे सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है।

मिथोस एआई क्या है?

  • विकास: मिथोस एक अगली पीढ़ी की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली है, जिसे जटिल सॉफ्टवेयर तंत्रों में गहरी कमजोरियों की पहचान के लिए विकसित किया गया है।
  • सुभेद्यता की पहचान: यह ऐसे अज्ञात (“शून्य-दिवस”) दोषों का पता लगा सकता है, जिन्हें अभी तक डेवलपर्स ने न तो पहचाना है और न ही ठीक किया है।
  • गतिशील विश्लेषण: पारंपरिक उपकरणों के विपरीत, मिथोस सॉफ्टवेयर के साथ सक्रिय रूप से अंतःक्रिया कर इनपुट और प्रतिक्रिया का परीक्षण करता है, जिससे छिपी हुई कमजोरियाँ उजागर होती हैं।
  • बहु-चरणीय आक्रमण अनुकरण: यह वास्तविक हैकर व्यवहार के अनुरूप बहु-स्तरीय साइबर हमलों की योजना बनाने तथा उनका अनुकरण करने में सक्षम है।
  • सीमित पहुँच: इसकी शक्तिशाली क्षमताओं और जोखिमों के कारण इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है और केवल चयनित संस्थाओं को नियंत्रित कार्यक्रमों के तहत उपलब्ध कराया गया है।

मिथोस एआई से जुड़ी समस्याएँ

  • अनधिकृत पहुँच का जोखिम: सीमित और नियंत्रित प्रणाली होने के बावजूद, अगर लीक हुई जानकारी के माध्यम से किसी को अनधिकृत पहुँच प्राप्त हो जाती है, तो यह स्पष्ट रूप से सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमजोरियों को दर्शाता है।
  • व्यवस्था में कमियों का दुर्भावना रूपी प्रयोग: विभिन्न दोषों की पहचान करके समाधान संबंधी क्षमता, यदि गलत लोगों के प्रभाव में आ जाए, तो वे साइबर हमलों के लिए एक स्पष्ट योजना (मैप) तैयार कर सकते हैं।
  • लंबित समस्या: व्यवस्था में उपस्थित कमियों के 1% से भी कम को ठीक किया जाता है, जिससे शोषण योग्य कमियों की समस्या बनी रहती है।
  • गति असंतुलन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमलों की समयावधि को कम कर देती है, जबकि रक्षा तंत्र अभी भी धीमी सुधार प्रक्रिया से संबंधित हैं।
  • शक्ति का केंद्रीकरण: सीमित पहुँच के कारण कुछ ही संस्थाओं पर महत्त्वपूर्ण साइबर जानकारी का नियंत्रण केंद्रित हो जाता है।
  • खतरों का प्रसार: भविष्य में ऐसी क्षमताएँ सस्ते या ‘ओपन मॉडल’ के माध्यम से उपलब्ध हो सकती हैं, जिससे आक्रामक साइबर उपकरणों तक व्यापक पहुँच संभव हो जाएगी।

विरली खंडार में महापाषाणकालीन स्थल 

3 22

महाराष्ट्र के भंडारा जिले के पवनी तहसील के विरली खंडार में लगभग 2500 वर्ष प्राचीन एक महापाषाणकालीन समाधि स्थल की खोज की गई है।

  • इसे सबसे पहले वर्ष 2008 में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा रिपोर्ट किया गया था।

स्थल से जुड़े प्रमुख बिंदु

  • विशिष्ट समाधि संरचना
    • इस स्थल पर पत्थर के वृत्त, मेन्हिर  (पत्थर) तथा बोल्डर सर्किल्स (Boulder circles) के साथ मिश्रित संरचनाएँ पाई गई हैं।
    • यह दो प्रकार की समाधि परंपराओं के संयोजन को दर्शाता है, जो पिंपलगाँव निपानी और तिरोटा खेरी जैसे निकटवर्ती स्थलों से भिन्न है।
  • प्राप्त पुरावशेष
    • ताँबे के आभूषण जैसे हार तथा लोहे के औजार जैसे कुल्हाड़ी, छेनी, करछुल और तीर के अग्रभाग मिले हैं।
    • इसके अलावा अर्द्ध-कीमती पत्थर (नक्काशीदार कार्नेलियन मनके), स्वर्ण कुंडल और अस्थि अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
  • मिट्टी के बर्तनों की विशिष्ट व्यवस्था
    • एक ही समाधि में लगभग 50 बर्तन पाए गए।
    • इन्हें व्यवस्थित रूप से रखा गया था और इनमें लाल मृद्भांड और काले-लाल मृद्भांड शामिल हैं।
  • अद्वितीय मृद्भांड विशेषता
    • लगभग सभी बर्तन उल्टी अवस्था में रखे गए थे, जहाँ एक बर्तन दूसरे को ढक रहा था।
    • कोई भी बर्तन सीधी स्थिति में नहीं मिला।
  • समाधि प्रथाएँ और मृदा संदर्भ
    • संभावना है कि बर्तनों में खाद्यान्न या तरल पदार्थ रखे गए थे, जो मृतक के साथ रखी जाने वाली वस्तुएँ थीं।
    • इन बर्तनों को लैटेराइट निर्मित आधार के ऊपर काली कपासीय मिट्टी की तैयार परत पर रखा गया था, जिससे स्थिरता और संरक्षण सुनिश्चित हुआ।
  • काल निर्धारण: चारकोल के अवशेषों का त्वरक द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमेट्री (AMS) तकनीक से काल निर्धारण किया जाएगा।
    • त्वरक द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमेट्री (AMS): यह एक अत्यंत संवेदनशील तकनीक है जो पुरातात्विक अवशेषों की आयु का सटीक निर्धारण करने के लिए छोटे नमूनों में कार्बन 14 जैसे दुर्लभ समस्थानिकों को सीधे मापती है।
  • महत्त्व: यह खोज विदर्भ क्षेत्र में महापाषाणकालीन अंतिम संस्कार परंपराओं, दफन प्रथाओं और सांस्कृतिक पैटर्न को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।

महापाषाणकालीन स्थलों के बारे में:

  • ये ऐसे पुरातात्विक स्थल होते हैं जहाँ बड़े पत्थर के ढाँचे पाए जाते हैं, जो मुख्यतः समाधि और अंतिम संस्कार प्रथाओं से जुड़े होते हैं और परलोक में विश्वास और स्मारक परंपराओँ को दर्शाते हैं।
  • भारत में कालक्रम: सामान्यत: इन्हें लौह युग (लगभग 1500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी) के बीच का माना जाता है, हालांकि क्षेत्रीय भिन्नताएँ मौजूद हैं।
  • भारत में महापाषाणों के प्रकार:
    • बहुपाषाण प्रकार: कई पत्थरों से निर्मित संरचनाएँ।
    • एकाश्म प्रकार: एक ही पत्थर से निर्मित संरचनाएँ।

‘वेला सुपरक्लस्टर’ (Vela Supercluster)

4 21

खगोलविदों ने ‘वेला वांजी’ (Vela Banzi) सुपरक्लस्टर की खोज की है, जो आकाशगंगा की धूल के पीछे छिपा एक विशाल सुपरक्लस्टर है।

सुपरक्लस्टर के बारे में

  • यह ब्रह्मांड की सबसे बड़ी ज्ञात संरचना होती है, जिसमें गुरुत्वाकर्षण द्वारा जुड़े आकाशगंगाओं के समूह और क्लस्टर शामिल होते हैं।
    • उदाहरण: लानिआकिया सुपरक्लस्टर, जिसमें मिल्की वे सहित लगभग 1 लाख आकाशगंगाएँ शामिल हैं।

मुख्य बिंदु

  • खोज की विधि: इसे हाइब्रिड मैपिंग के माध्यम से पहचाना गया, जिसमें आकाशगंगा रेडशिफ्ट डेटा और रेडियो अवलोकनों (MeerKAT दूरबीन) को मिलाया गया, जिससे धूल से ढके क्षेत्रों को भी देखा जा सका।
    • आकाशगंगा रेडशिफ्ट: यह वह प्रक्रिया है, जिसमें दूरस्थ आकाशगंगाओं से आने वाला प्रकाश ब्रह्मांड के विस्तार के कारण लाल सिरे की ओर खिसकता है जिससे दूरी और वेग का अनुमान लगाया जाता है।
    • MeerKAT: यह दक्षिण अफ्रीका के नॉर्दर्न केप प्रांत में स्थित रेडियो दूरबीनों का एक संयोजित समूह है।
  • वेला सुपरक्लस्टर की स्थिति और विस्तार
    • यह पृथ्वी से लगभग 80 करोड़ प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है।
    • इसका विस्तार लगभग 30 करोड़ प्रकाश-वर्ष तक विस्तृत है।
    • यह परिहार क्षेत्र (Zone of Avoidance) में स्थित है-
      • यह आकाश का वह क्षेत्र है, जो ‘मिल्की वे’ की सघन धूल और तारों के कारण दृश्य प्रकाश दूरबीनों से छिपा रहता है।
      • यह प्रकाशीय दूरबीनों द्वारा किए गए प्रेक्षणों के लिए एक महत्त्वपूर्ण ब्लाइंड स्पॉट बनाता है।
      • यह प्रेक्षणीय आकाश का लगभग 20 प्रतिशत भाग है, जो दूरस्थ ब्रह्मांडीय संरचनाओं के हमारे दृश्य को सीमित करता है।
  • पूर्व में छिपे रहने के कारण:मिल्की वे’ की सघन अंतरतारकीय धूल और तारों के समूहों ने दृश्य अवलोकनों को बाधित किया, जिससे एक प्रकार का ब्रह्मांडीय “ब्लाइंड स्पॉट” बन गया।
  • महत्त्व: यह कॉस्मिक वेब में एक प्रमुख नोड के रूप में कार्य करता है।
    • यह कॉस्मिक फ्लो (गुरुत्वाकर्षण के कारण आकाशगंगाओं की बड़े पैमाने पर गति) को समझाने में सहायक है।
    • यह स्थानीय ब्रह्मांड में द्रव्यमान वितरण की समझ को बेहतर बनाता है।
      • द्रव्यमान वितरण: ब्रह्मांड में पदार्थ (दृश्य और डार्क मैटर) के प्रसार का पैटर्न, जो गुरुत्वीय अंतःक्रियाओं को प्रभावित करता है।
  • वैज्ञानिक प्रभाव: यह आकाशगंगा विकास और गुरुत्वाकर्षण बलों के मॉडलों को और सटीक बनाता है।
    • यह ब्रह्मांड की वृहद संरचना के मानचित्रण में एक महत्त्वपूर्ण कमी को पूरा करता है।
    • साथ ही, यह दर्शाता है कि रेडियो खगोलशास्त्र दृश्य अवलोकनों की सीमाओं से परे छिपी ब्रह्मांडीय संरचनाओं को उजागर करने में कितना महत्त्वपूर्ण है।

Follow Us

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.