एलीफेंटा द्वीप में प्राचीन जलाशय की खोज

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भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ने एलीफेंटा द्वीप पर 1,500 वर्ष प्राचीन सीढ़ीनुमा जलाशय का पता लगाया है।
एलीफेंटा द्वीप पर स्थित सीढ़ीनुमा जलाशय के बारे में
- संरचना: यह जलाशय एक विशाल T-आकार की संरचना है, जिसकी लंबाई लगभग 14.7 मीटर है तथा चौड़ाई 6.7 और 10.8 मीटर है, जो उन्नत योजना को दर्शाता है।
- निर्माण सामग्री: सीढ़ियाँ पत्थर के खंडों से निर्मित की गई हैं, जिन्हें मुख्य स्थलीय क्षेत्र से लाया गया था, जो उस समय की लॉजिस्टिक क्षमता और संसाधन जुटाने की दक्षता को दर्शाता है।
- जल प्रबंधन: यह संरचना वर्षा जल संचयन की उन्नत प्रणाली को दर्शाती है, जिसे द्वीप के चट्टानी भू-भाग के अनुसार विकसित किया गया था, जहाँ समुद्र में जल तेजी से प्रवाहित हो जाता है।
एलीफेंटा द्वीप से संबंधित हाल के उत्खनन
- संबंधित संरचनाएँ: खुदाई में ईंटों से निर्मित एक गोलाकार संरचना मिली है, जिसका उपयोग संभवतः वस्त्रों की रंगाई के लिए किया जाता था, साथ ही भंडारण पात्र और अन्य कलाकृतियाँ भी मिली हैं।
- कलाकृतियाँ: टेराकोटा की मूर्तियाँ, काँच और चूड़ियाँ तथा कार्नेलियन और क्वार्ट्ज के मनके मिले हैं, जो एक समृद्ध भौतिक संस्कृति का संकेत देते हैं।
- समुद्री व्यापार: लगभग 3,000 एंफोरा (Amphorae) के टुकड़े भूमध्य सागर क्षेत्र से तथा पश्चिम एशिया से लाए गए टॉरपीडो जार मिले हैं, जो व्यापक अंतरमहाद्वीपीय व्यापार नेटवर्क का प्रमाण हैं।
- बंदरगाह के प्रमाण: पत्थरों से निर्मित बंदरगाह की खोज से यह सिद्ध होता है कि एलीफेंटा प्राचीन समुद्री व्यापार मार्गों का सक्रिय केंद्र था।
- सिक्के: लगभग 60 ताँबे, सीसे और चाँदी के सिक्के मिले हैं, जो महत्त्वपूर्ण कालानुक्रमिक और आर्थिक जानकारी प्रदान करते हैं।
- वंशानुगत संबंध: विशिष्ट प्रतिमा विज्ञान के आधार पर, कई सिक्के कलचुरी वंश (छठी शताब्दी ईसवी) के संस्थापक कृष्णराज से संबंधित माने जाते हैं।
- महत्त्व: यह खोज दर्शाती है कि एलीफेंटा द्वीप केवल उन्नत जल प्रबंधन और जल अभियंत्रिकी का केंद्र ही नहीं था, बल्कि यह प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में सक्रिय समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्त्वपूर्ण केंद्र भी था।
एलीफेंटा द्वीप के बारे में
- स्थान: एलीफेंटा द्वीप (घरापुरी) अरब सागर में मुंबई तट से लगभग 10 किमी. दूर स्थित है।
- एलीफेंटा की गुफाओं को वर्ष 1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई थी।
- ऐतिहासिक काल: ये गुफाएँ लगभग 5वीं से 8वीं शताब्दी ईसवी की हैं और प्रारंभिक मध्यकालीन राजवंशों जैसे कलचुरी और चालुक्य से संबंधित मानी जाती हैं।
- धार्मिक महत्त्व: ये गुफाएँ भगवान शिव को समर्पित हैं, जिनमें प्रसिद्ध मूर्तियाँ जैसे त्रिमूर्ति (महेशमूर्ति) शामिल हैं।
- वास्तुकला: यह स्थल अपनी चट्टान काटकर बनाई गई गुफा-स्थापत्य कला, स्तंभयुक्त सभागृहों और बेसाल्ट पत्थर की जटिल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है, जो उस समय की उन्नत शिल्पकला को दर्शाता है।
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जियोफैगी (geophagy)

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‘नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जिब्राल्टर में पाए जाने वाले बार्बरी मकाॅक (Barbary Macaques) पर्यटकों द्वारा दिए गए जंक फूड से उत्पन्न पाचन संबंधी तनाव (Digestive Stress) को कम करने के लिए ‘जियोफैगी’ (Geophagy) यानी मिट्टी खाने का सहारा लेते हैं।
जियोफैगी के बारे में
- परिभाषा: जियोफैगी (Geophagy) का तात्पर्य मिट्टी, चिकनी मिट्टी या कीचड़ जैसे प्राकृतिक भू-पदार्थों के जानबूझकर किए जाने वाले सेवन से है, जो वन्यजीवों और कुछ विशेष परिस्थितियों में मनुष्यों द्वारा किया जाता है।
- पाचन में भूमिका: मिट्टी एक बंधनकारी तत्त्व की तरह कार्य करती है, जो विषाक्त पदार्थों को अवशोषित करती है, अम्लता को कम करती है और आँतों के सूक्ष्मजीवों को बेहतर बनाती है।
- उदाहरण: अमेजन के तोते नदी किनारों पर मिट्टी चाटने के माध्यम से मिट्टी का सेवन करते हैं, ताकि आवश्यक खनिज प्राप्त कर सकें और विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय कर सकें।
- मनुष्यों में प्रचलन: ह्यूमन जियोफैगी को पिका (Pica) अर्थात् गैर-खाद्य पदार्थों के सेवन की तीव्र इच्छा और उनका उपभोग, का एक रूप माना जाता है।
- ‘डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर्स’ (DSM) के अनुसार, यदि यह व्यवहार सामाजिक या सांस्कृतिक रूप से स्वीकृत न हो, तो इसे एक ‘ईटिंग डिसऑर्डर’ (खाद्य संबंधी विकार) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- यह व्यवहार प्रायः बच्चों और गर्भवती महिलाओं में अधिक देखा जाता है।
- सांस्कृतिक एवं अनुकूलनशील व्यवहार: यह व्यवहार आहार या पर्यावरणीय तनाव के प्रति एक अनुकूलन प्रतिक्रिया के रूप में कार्य कर सकता है।
- कुछ समाजों में यह सांस्कृतिक रूप से निहित होता है और लाभकारी माना जाता है।
- संदर्भ-आधारित व्याख्या: इसका वर्गीकरण व्यवहार लाभकारी या हानिकारक है, यह परिस्थिति, आवृत्ति और व्यक्ति के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
- पोषण संबंधी पहलू: जियोफैगी हमेशा खनिज की कमी से संबंधित नहीं होती; यह पर्याप्त पोषण की स्थिति में भी हो सकती है।
- जानवरों में सामाजिक अधिगम: कई प्रजातियों में जियोफैगी (मिट्टी खाने की आदत) एक सामाजिक रूप से सीखा गया व्यवहार है, जिसे जीव अपने समूह के अन्य सदस्यों के अवलोकन और सामाजिक संचार के माध्यम से अपनाते हैं।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- खाद्य संरचना: पर्यटकों द्वारा दिया गया भोजन कुल आहार का लगभग 18.8% है, जो कैलोरी, शर्करा, नमक और डेयरी से भरपूर है, परंतु आवश्यक खनिजों की कमी के कारण मतली और दस्त उत्पन्न करता है।
- उपभोग की गई मिट्टी के प्रकार: लाल मिट्टी का उपयोग 82.6% मामलों में होता है, जबकि पीली और काली मिट्टी 6.5% तथा तारकोल 4.3% मामलों में पाया गया।
- समयगत संबंध: अध्ययन के अनुसार, लगभग 15% मामलों में बिस्कुट, आइसक्रीम और ब्रेड जैसे खाद्य पदार्थों के सेवन के ठीक बाद जियोफैगी की प्रवृत्ति देखी गई।
- आवृत्ति: जियोफैगी सप्ताह में लगभग 12 बार होती है, जो मकाॅक वंश में दर्ज सबसे अधिक दरों में से एक है।
- स्थानिक भिन्नता: जिब्राल्टर रॉक जैसे उच्च-पर्यटन क्षेत्रों में मकाॅक 2.5 गुना अधिक जंक फूड का सेवन करते हैं, जबकि मिडिल हिल समूह में जियोफैगी नहीं देखी गई।
- मौसमी पैटर्न: गर्मी में जियोफैगी 56.5% तक बढ़ जाती है और सर्दियों में 39.1% तक घट जाती है, जो पर्यटकों की संख्या के अनुरूप है।
- व्यवहार की प्रकृति: लगभग 90% घटनाएँ अन्य मकाॅक की उपस्थिति में होती हैं, जो मजबूत सामाजिक अधिगम को दर्शाती हैं।
- पूरक परिकल्पना: गर्भावस्था या स्तनपान के दौरान इसमें कोई विशेष वृद्धि नहीं पाई गई, जिससे स्पष्ट होता है कि यह व्यवहार केवल पोषण की आवश्यकता से प्रेरित नहीं है।
प्रबंधन
- भोजन विनियमन: प्राधिकरण निर्धारित स्थानों पर फल, सब्जियाँ और पानी उपलब्ध कराते हैं तथा पर्यटकों द्वारा मकाॅक को भोजन खिलाने पर प्रतिबंध लगाते हैं।
महत्त्व
- मानवीय प्रभाव: यह वन्यजीवों के आहार और व्यवहार पर पर्यटन तथा मानव-जनित भोजन के गहरे प्रभाव को दर्शाता है।
- अनुकूली व्यवहार: यह जियोफैगी को एक कार्यात्मक तथा सांस्कृतिक रूप से प्रसारित अनुकूलन के रूप में प्रस्तुत करता है।
- पारिस्थितिकी अंतर्दृष्टि: यह दर्शाता है कि प्राइमेट्स के खाद्य की तलाश संबंधी व्यवहार को निर्धारित करने में पारिस्थितिक दबाव और सामाजिक अधिगम किस प्रकार अंतःक्रिया करते हैं।
- भविष्य का अनुसंधान: यह अध्ययन जियोफैगी के स्थायित्व और प्रसार को पूर्णतः समझने के लिए रासायनिक विश्लेषण, माइक्रोबायोम शोध और दीर्घकालिक व्यवहारिक अध्ययनों के एकीकरण की आवश्यकता पर बल देता है।
बार्बरी मकाॅक के बारे में
- भौगोलिक वितरण: ये जिब्राल्टर तथा मोरक्को और अल्जीरिया के एटलस पर्वतों में पाए जाते हैं।
- यह यूरोप का एकमात्र जंगली प्राइमेट है।
- वर्गीकरण: ‘मकाॅक’ जीनस से संबंधित इसे ‘ओल्ड वर्ल्ड मंकी’ कहा जाता है।
- आवास: यह विभिन्न प्रकार के पर्यावरणों में पाया जाता है, जैसे देवदार, फर (Fir) और ओक (Oak) के वन, घासभूमि तथा वनस्पति युक्त पथरीली ढलानें।
- शारीरिक विशेषताएँ: यह बिना पूँछ वाला बंदर है, जिसके पास ठंडे जलवायु के अनुकूल घना फर और मजबूत, मध्यम आकार का शरीर होता है।
- पर्यावरणीय देखभाल: इस प्रजाति में, नर और मादा दोनों ही ऐसे शिशुओं की देखभाल एवं सुरक्षा करते हैं, जिन्हें वे स्वयं जन्म नहीं देते हैं।
- संरक्षण स्थिति: इसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।
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लैंगिक समावेशन पर यूनेस्को चेयर

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यूनेस्को (UNESCO) ने सिम्बायोसिस स्किल्स एंड प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (SSPU) के सहयोग से पुणे में ‘लैंगिक समावेशन और कौशल विकास’ पर एशिया की पहली ‘यूनेस्को चेयर’ स्थापित की है। यह पहल “कार्य के भविष्य का नेतृत्व महिलाएँ करेंगी” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे संस्करण के दौरान शुरू की गई।
मुख्य विशेषताएँ
- उद्योग-संलग्न कौशल विकास: रोजगार-उन्मुख प्रशिक्षण मॉडल, जो कौशल विकास को उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ता है।
- उदीयमान क्षेत्र: रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, सेमीकंडक्टर तकनीक, उन्नत विनिर्माण और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण।
- प्रशिक्षण का विस्तार: लगभग 10,000 वंचित लड़कियों को भविष्य कौशलों में प्रशिक्षित किया गया है।
- रोज़गार परिणाम: उच्च प्लेसमेंट दर, जहाँ प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद प्रतिभागियों को नौकरी के प्रस्ताव प्राप्त हुए।
- नोडल मंत्रालय: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (भारत सरकार)।
महत्त्व
- एशिया में पहला: यह लैंगिक समावेशन और कौशल विकास पर केंद्रित एशिया का पहला ‘यूनेस्को चेयर’ है।
- यूनेस्को के लक्ष्यों के अनुरूप: यह पहल समावेशी शिक्षा, लैंगिक समानता और भविष्य की कार्यबल तैयारी से जुड़े यूनेस्को के उद्देश्यों के अनुरूप है।
लैंगिक समावेशन पर ‘यूनेस्को चेयर’ के बारे में
- पहल की प्रकृति: यह एक अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक पहल है, जिसका उद्देश्य शिक्षा और कौशल विकास प्रणालियों में लैंगिक समावेशन को बढ़ावा देना है।
- कार्यक्रम का आधार: यह UNESCO UNITWIN (University Twinning and Networking)/यूनेस्को चेयर्स कार्यक्रम 1992) के अंतर्गत स्थापित की गई है, जो वैश्विक शैक्षणिक सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है।
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विश्व बौद्धिक संपदा दिवस

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विश्व बौद्धिक संपदा दिवस के अवसर पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने खेल नवाचार और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख बौद्धिक संपदा (IP) सुधारों की घोषणा की।
विश्व बौद्धिक संपदा दिवस के बारे में
- तिथि: प्रत्येक वर्ष 26 अप्रैल को मनाया जाता है।
- थीम: ‘IP एंड स्पोर्ट्स: रेडी, सेट, इनोवेट’।
- उत्पत्ति: वर्ष 2000 में स्थापित, यह विश्व बौद्धिक संपदा संगठन अभिसमय (1970) के लागू होने की स्मृति में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर बौद्धिक संपदा संरक्षण को बढ़ावा देना है।
- उद्देश्य: नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा देने में बौद्धिक संपदा (IP) की भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
- आयोजक: यह विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) के तहत मनाया जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी है।
- मुख्य फोकस क्षेत्र: आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सांस्कृतिक उन्नति में पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और डिजाइन के महत्त्व को रेखांकित करता है।
घोषित प्रमुख IP सुधार
- खेल IP पर शुल्क छूट: खेल से संबंधित सभी IP पंजीकरणों पर 3 वर्ष की शुल्क छूट की घोषणा की गई, ताकि नवाचार को प्रोत्साहन मिले।
- IP पारिस्थितिकी तंत्र का संवर्द्धन: सरकार मौजूदा योजनाओं के तहत नवप्रवर्तकों, छात्रों और कारीगरों को IP अधिकारों के लिए आवेदन और संरक्षण में सहायता प्रदान करेगी।
- GI टैग और कश्मीर विलो: GI-टैग प्राप्त कश्मीर विलो बैट को भारत की शिल्पकला और IP क्षमता के प्रतीक के रूप में रेखांकित किया गया, साथ ही इसके वैश्विक प्रचार पर जोर दिया गया।
- नवाचार और IP रणनीति: विचारों को बौद्धिक संपदा संपत्तियों में परिवर्तित करने और मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के माध्यम से वैश्विक बाजारों का लाभ उठाने के लिए ‘नवाचार करना, पेटेंट कराना, उत्पादन करना, समृद्ध होना’ की परिकल्पना को बढ़ावा दिया गया।
- हैकथॉन लॉन्च: ‘स्मार्ट वियरेबल्स’ और बौद्धिक संपदा आधारित नवाचार पर केंद्रित ‘विकसित भारत डिजिटल मैट्रिक्स 2026’ हैकाथॉन का शुभारंभ किया गया, जो DPIIT और आईआईटी दिल्ली की एक संयुक्त पहल है।
- CSR और अवसंरचना प्रोत्साहन: दूरदराज क्षेत्रों में ओपन जिम और खेल सुविधाओं के लिए CSR फंड के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया।
- खेल नीति समर्थन: यह पहल खेल नीति 2025 के अनुरूप है, जिसमें जमीनी स्तर के विकास, समावेशन और अवसंरचना विस्तार पर ध्यान दिया गया है।
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