भारत में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में हो रहे बदलाव: रुझान और निहितार्थ (NSO का 80वाँ दौर)

30 Apr 2026

संदर्भ

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 80वें दौर के स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष सरकारी हस्तक्षेपों, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और व्यापक बीमा कवरेज के कारण स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में महत्त्वपूर्ण सुधार का संकेत देते हैं।

भारत में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार के बारे में

  • स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार से तात्पर्य उन निर्णयों और कार्यों से है, जो व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने, बीमारी से बचाव करने और आवश्यकता पड़ने पर उपचार प्राप्त करने के लिए करते हैं।
  • मुख्य घटक
    • बीमारी की पहचान: लक्षणों और देखभाल की आवश्यकता को पहचानने की क्षमता।
    • देखभाल का निर्णय: उपचार करवाना।
    • प्रदाता का चुनाव: सार्वजनिक, निजी या पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देना।
    • समयबद्धता: शीघ्र उपचार बनाम विलंबित उपचार।
    • स्वास्थ्य व्यय: स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का तरीका।
  • भारतीय संदर्भ में निर्धारक कारक
    • पहुँच: स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
    • किफायती: आय, बीमा और ‘आउट ऑफ पाॅकेट’ व्यय का प्रभाव।
    • जागरूकता और शिक्षा: स्वास्थ्य साक्षरता और सूचना तक पहुँच।
    • सामाजिक-सांस्कृतिक कारक: मान्यताएँ, लैंगिक मानदंड और पारंपरिक प्रथाएँ।
    • सरकारी हस्तक्षेप: आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी योजनाएँ।

संबंधित तथ्य

  • राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के इस सर्वेक्षण में 1.39 लाख परिवारों (76,296 ग्रामीण और 63,436 शहरी) को सम्मिलित किया गया, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, वहनीयता और उपयोग के संबंध में व्यापक एवं विश्वसनीय डेटा प्राप्त हुआ।

बीमारियों को रिपोर्ट करने वाली जनसंख्या का अनुपात (Proportion of Population Reporting Ailments-PPRA) के बारे में

  • PPRA से तात्पर्य किसी निर्दिष्ट संदर्भ अवधि (आमतौर पर पिछले 15 दिन) के दौरान बीमार होने की सूचना देने वाले व्यक्तियों के अनुपात (प्रतिशत) से है।
  • मापन उपकरण: इसका उपयोग राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जनसंख्या में रुग्णता स्तर का आकलन करने के लिए किया जाता है।
  • जागरूकता और पहुँच का सूचक: उच्च PPRA बेहतर स्वास्थ्य जागरूकता, बेहतर निदान और स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।
  • कम रिपोर्टिंग का मुद्दा: कम PPRA खराब पहुँच, सामर्थ्य संबंधी बाधाओं या जागरूकता की कमी के कारण कम रिपोर्टिंग को दर्शा सकता है।
  • नीतिगत प्रासंगिकता: PPRA स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार का विश्लेषण करने और स्वास्थ्य प्रणाली की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने में सहायक है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 80वें दौर के स्वास्थ्य सर्वेक्षण के प्रमुख रुझान

  • बीमारी से पीड़ित लोगों की बढ़ती संख्या: भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति लोगों का व्यवहार सुधर रहा है, क्योंकि वर्ष 2025 में बीमार लोगों की संख्या (PPRA) का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2017-18 में लगभग दोगुना होकर 6.8% से 12.2% और शहरी क्षेत्रों में 9.1% से 14.9% हो गया है।
  • स्वास्थ्य बीमा कवरेज में वृद्धि: सरकारी स्वास्थ्य बीमा और वित्तपोषण योजनाओं के अंतर्गत कवरेज में तीन गुना से अधिक की वृद्धि हुई है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में 12.9% से बढ़कर 45.5% और शहरी क्षेत्रों में 8.9% से बढ़कर 31.8% हो गया है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता उपयोग: बढ़ती माँग के जवाब में, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग मजबूत हुआ है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बाह्य रोगी देखभाल के लिए, जहाँ उपयोग 33% से बढ़कर 35% हो गया है।
  • सरकारी दृष्टिकोण: यह सुधार व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के कारण संभव हुआ है, जिसमें निवारक, प्रोत्साहक और प्रारंभिक निदान देखभाल पर जोर दिया गया है, साथ ही मुफ्त दवाओं और निदान उपकरणों की उपलब्धता से इसे और भी बल मिला है।
  • वित्तीय जोखिम सुरक्षा में वृद्धि: आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) और विभिन्न राज्य योजनाओं सहित सरकार द्वारा वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा कवरेज के तेजी से विस्तार के साथ वित्तीय जोखिम सुरक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • बीमा कवरेज में विस्तार: देश में इन सरकारी स्वास्थ्य वित्तपोषित/बीमा योजनाओं के अंतर्गत आने वाली जनसंख्या का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में 12.9% से बढ़कर 45.5% और शहरी क्षेत्रों में 8.9% से बढ़कर 31.8% हो गया है, जो तीन गुना से अधिक की वृद्धि दर्शाता है।
  • मातृ स्वास्थ्य परिणामों में सुधार: सर्वेक्षण में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में निरंतर प्रगति को भी दर्शाया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव वर्ष 2017-18 में 90.5% से बढ़कर 2025 में 95.6% हो गए हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी अवधि में यह आँकड़ा 96.1% से बढ़कर 97.8% हो गया है।
    • सरकारी दृष्टिकोण: यह सरकार द्वारा सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देने और गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को मजबूत करने के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों को दर्शाता है। इन प्रयासों में गुणवत्ता आश्वासन, जननी सुरक्षा योजना (JSY), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) जैसी योजनाएँ शामिल हैं।
  • ग्रामीण प्रसवों में सरकारी सुविधाओं का प्रभुत्व: सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग दो-तिहाई (66.8%) प्रसव सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में होते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आँकड़ा 47% (लगभग आधा) है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग में दीर्घकालिक वृद्धि: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के सर्वेक्षण के परिणाम पिछले तीन दौरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग में निरंतर बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
    • इससे पता चलता है कि जहाँ वर्ष 2014 में ग्रामीण आबादी का लगभग 28% हिस्सा बाह्य रोगी देखभाल के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का सहारा लेता था, वहीं वर्ष 2025 में यह बढ़कर 35% हो गया है।

संवैधानिक एवं नीतिगत ढाँचा एवं स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार

भारत में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक परिकल्पना में गहराई से निहित है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों द्वारा निर्देशित है।

संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद-21 – जीवन का अधिकार

  • न्यायपालिका द्वारा इसकी व्याख्या स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल के अधिकार को शामिल करने के रूप में की गई है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि राज्य को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करनी होंगी।
  • यह नागरिकों के समय पर उपचार प्राप्त करने के अधिकार को मजबूत करता है।

राज्य के नीति निर्देश सिद्धांत (DPSP)

  • अनुच्छेद-39(e)
    • श्रमिकों और संवेदनशील समूहों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करता है।
    • सुरक्षित कार्य और जीवन स्थितियों को प्रोत्साहित करता है।
  • अनुच्छेद-41
    • यह विधेयक बीमारी, विकलांगता और वृद्धावस्था के मामलों में राज्य द्वारा सहायता प्रदान करने का प्रावधान करता है।
    • यह सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बढ़ावा देता है।
  • अनुच्छेद-47
    • यह विधेयक जन स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का प्राथमिक कर्तव्य बनाता है।
    • इसका मुख्य उद्देश्य पोषण, जीवन स्तर और रोगों की रोकथाम है।

बेहतर स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार के प्रेरक कारक

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश में वृद्धि: बजट आवंटन में निरंतर वृद्धि ने प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तरों पर स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे के व्यापक विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे न केवल मानव संसाधन सुदृढ़ हुए हैं, बल्कि निवारक (Preventive), प्रोत्साहक (Promotive) और उपचारात्मक (Curative) देखभाल पर केंद्रित प्रमुख पहलों को भी गति मिली है।
  • महामारी विज्ञान संबंधी परिवर्तन: संक्रामक रोगों से गैर-संक्रामक रोगों (NCD) जैसे मधुमेह और हृदय संबंधी स्थितियों की ओर परिवर्तन बेहतर रोग नियंत्रण और बदलती जीवनशैली को दर्शाता है।
  • प्रभावी सरकारी हस्तक्षेप: निरंतर सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) प्रयासों, ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति जैसे मंचों के माध्यम से अंतरक्षेत्रीय समन्वय और प्राथमिक तथा सामुदायिक स्तरों पर बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग से शीघ्र निदान एवं जागरूकता को मजबूती मिली है।
  • मुफ्त दवाओं और निदान की बेहतर उपलब्धता: सार्वजनिक सुविधाओं पर आवश्यक दवाओं और निदान सेवाओं के प्रावधान से ‘आउट ऑफ पाॅकेट’ व्यय कम हुआ है तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में विश्वास बढ़ा है।

स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार के अंतर्संबंध

  • शासन
    • मानव पूँजी निर्माण से संबंध
      • स्वस्थ व्यक्ति उच्च उत्पादकता, बेहतर शिक्षण परिणामों और आर्थिक विकास में योगदान देते हैं।
      • शीघ्र निदान और समय पर उपचार दीर्घकालिक रुग्णता को कम करते हैं, जिससे कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है।
      • यह शिक्षा और पोषण में निवेश का पूरक है, जो मानव पूँजी के आधार स्तंभ का निर्माण करता है।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की दिशा में प्रगति: सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज यह सुनिश्चित करता है:
    • गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच
    • अत्यधिक खर्चों से वित्तीय सुरक्षा
    • बीमारियों को रिपोर्ट करने वाली जनसंख्या का अनुपात (PPRA) से संकेत मिलता है:
      • बेहतर जागरूकता और निदान।
      • अदृश्य रोगों की व्यापकता में कमी।
  • सतत् विकास लक्ष्य (SDGs)
    • SDG 3: उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली
      • समय पर निदान और उपचार को प्रोत्साहित करता है, जिससे रुग्णता और मृत्यु दर में कमी आती है।
      • टीकाकरण, स्क्रीनिंग और मातृ देखभाल जैसी निवारक स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों को बढ़ावा देता है।
      • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का अधिक उपयोग सेवा वितरण दक्षता और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करता है।
      • आवश्यक सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करके सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की दिशा में प्रगति को मजबूत करता है।
    • SDG 1: गरीबी उन्मूलन (‘आउट ऑफ पाॅकेट’ व्यय में कमी के माध्यम से)
      • स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति बेहतर जागरूकता, विशेषकर सार्वजनिक सुविधाओं के माध्यम से, स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्चों को कम करती है।
      • सरकारी बीमा योजनाओं का विस्तार परिवारों की आर्थिक असुरक्षा को कम करता है।
      • यह परिवारों को चिकित्सा खर्चों के कारण गरीबी के जाल में फँसने से बचाता है।
      • यह कमजोर आबादी की आय और बचत की सुरक्षा करके आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।

भारत में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में चुनौतियाँ

  • आउट ऑफ पाॅकेट’ व्यय (OOPE) में निरंतर वृद्धि: विभिन्न सुधारों के बावजूद, निजी स्वास्थ्य सेवाएँ अभी भी एक भारी वित्तीय बोझ बनी हुई हैं। विशेष रूप से विशिष्ट उपचारों की उच्च लागत के कारण कई परिवारों को अत्यधिक वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है।
  • शहरी-ग्रामीण और अंतर-राज्यीय असमानताएँ: स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, बुनियादी ढाँचे और गुणवत्ता में क्षेत्रों के बीच महत्त्वपूर्ण असमानताएँ बनी हुई हैं, जिसमें ग्रामीण एवं पिछड़े राज्य पीछे रह गए हैं।
  • गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) का बढ़ता बोझ: मधुमेह और हृदय रोगों की बढ़ती व्यापकता के लिए दीर्घकालिक, महँगी देखभाल की आवश्यकता होती है, जिससे परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली दोनों पर दबाव पड़ता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में गुणवत्ता और क्षमता संबंधी बाधाएँ: भीड़भाड़, विशेषज्ञों की कमी और सेवाओं की असमान गुणवत्ता जैसे मुद्दे चिकित्सकीय दक्षता को कम करते हैं।
  • उन्नत देखभाल के लिए निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता: तृतीयक और विशिष्ट देखभाल अभी भी निजी प्रदाताओं के प्रभुत्व में है, जिससे बीमा कवरेज के बावजूद समान पहुँच सीमित हो जाती है।
  • वंचित वर्गों में स्वास्थ्य जागरूकता की कमी: सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ, लैंगिक मानदंड और स्वास्थ्य साक्षरता की कमी, कमजोर आबादी में समय पर स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने में देरी का कारण बनती हैं।
  • विखंडित स्वास्थ्य प्रशासन: केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की कमी स्वास्थ्य नीतियों और योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन को प्रभावित करती है।

आगे की राह

  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को सुदृढ़ बनाना: जमीनी स्तर पर व्यापक निवारक और उपचारात्मक सेवाएँ प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य तथा कल्याण केंद्रों का विस्तार एवं उन्नयन करना।
    • उदाहरण: गैर-संचारी रोगों की जाँच और शीघ्र निदान के लिए आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों का विस्तार करना।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य वित्तपोषण बढ़ाना: बुनियादी ढाँचे, कार्यबल और सेवा गुणवत्ता में सुधार के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 2.5% के लक्ष्य की ओर सरकारी स्वास्थ्य व्यय बढ़ाना।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता में सुधार: उपचार प्रोटोकॉल को मानकीकृत करना और गुणवत्ता आश्वासन तंत्र को सुदृढ़ करना।
    • जिला अस्पतालों में गुणवत्ता आश्वासन पहलों का विस्तार करना।
  • निजी स्वास्थ्य सेवा लागतों को विनियमित करना: मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और शोषण को कम करने के लिए मानक उपचार दिशा-निर्देशों को बढ़ावा देना।
    • आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी बीमा योजनाओं के तहत मूल्य सीमा निर्धारित करना।
  • गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना: जीवनशैली में परिवर्तन, नियमित जाँच और समुदाय-आधारित हस्तक्षेपों को बढ़ावा देना।
    • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर पर उच्च रक्तचाप और मधुमेह के लिए जनसंख्या-आधारित जाँच सुनिश्चित करना।
  • डिजिटल स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाना: देखभाल की पहुँच और निरंतरता में सुधार के लिए टेलीमेडिसिन, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करना।
  • सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता को मजबूत करना: IEC अभियानों को बढ़ावा देना और व्यवहार परिवर्तन तथा शीघ्र स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने के लिए ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता तथा पोषण समिति जैसी आधारभूत संस्थाओं का उपयोग करना।

निष्कर्ष

स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील व्यवहार संवैधानिक आदर्शों और जमीनी स्तर के परिणामों के मध्य एक सेतु का कार्य करता है, जो दर्शाता है कि शासन किस प्रकार प्रभावी रूप से स्वास्थ्य के अधिकार को सभी के लिए सुलभ, किफायती तथा न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा में परिवर्तित करता है।

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