संदर्भ
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वच्छ, विकेंद्रीकृत ऊर्जा को बढ़ावा देने तथा भारत में ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ करने हेतु लघु जलविद्युत विकास परियोजना (2026–31) को स्वीकृति प्रदान की।
लघु जलविद्युत विकास परियोजना के बारे में
- यह योजना लघु जलविद्युत परियोजनाओं (1–25 मेगावाट) को प्रोत्साहित करती है, जिससे विशेषकर दूरस्थ एवं पर्वतीय क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार हो सके।
- नोडल मंत्रालय: इसका कार्यान्वयन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जो भारत में लघु जलविद्युत विकास का प्रबंधन करता है।
- मुख्य उद्देश्य
- स्वच्छ एवं विश्वसनीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार करना।
- दूरस्थ क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देना।
- क्षेत्रीय विकास एवं ऊर्जा पहुँच को सुदृढ़ करना।

- लक्ष्य: यह योजना लगभग 1,500 मेगावाट क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखती है, जिसके लिए कुल ₹2,584.60 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- भारत में लघु जलविद्युत की संभावनाएँ: भारत में लगभग 21,133 मेगावाट की संभावित क्षमता 7,000 से अधिक स्थलों पर उपलब्ध है, जिसमें से केवल लगभग 5,171 मेगावाट (लगभग 24.5%) का ही दोहन किया गया है।
- उत्तरी क्षेत्र (लगभग 38%): हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड
- पूर्वोत्तर क्षेत्र (लगभग 15%): अरुणाचल प्रदेश प्रमुख
- दक्षिणी क्षेत्र (लगभग 26%): कर्नाटक अग्रणी।
- यह विशेष रूप से पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में विशाल अप्रयुक्त क्षमता को दर्शाता है।
- कार्यान्वयन तंत्र
- विभेदित वित्तीय सहायता: योजना के अंतर्गत स्तरीकृत केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है—
- पूर्वोत्तर एवं सीमावर्ती जिले: ₹3.6 करोड़/मेगावाट या परियोजना लागत का 30% (अधिकतम ₹30 करोड़ प्रति परियोजना)।
- अन्य क्षेत्र: ₹2.4 करोड़/मेगावाट या परियोजना लागत का 20% (अधिकतम ₹20 करोड़ प्रति परियोजना)।
- परियोजना पाइपलाइन विकास (DPRs का समर्थन): कम-से-कम 200 परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPRs) तैयार करने हेतु ₹30 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिससे व्यवहार्य परियोजनाओं की एक सुदृढ़ शृंखला सुनिश्चित हो सके।
- निजी निवेश का संवर्द्धन: यह योजना प्रारंभिक जोखिमों में कमी एवं परियोजना व्यवहार्यता में सुधार के माध्यम से लगभग ₹15,000 करोड़ के निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए डिजाइन की गई है।
- स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहन: यह देश में निर्मित टरबाइन, उपकरण एवं मशीनरी के उपयोग को बढ़ावा देती है, जो आत्मनिर्भर भारत के अनुरूप आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करता है।
- रोजगार सृजन पर बल: योजना से विशेषतः ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में निर्माण, संचालन एवं रखरखाव गतिविधियों में लगभग 51 लाख मानव-दिवस का रोजगार सृजित होने की अपेक्षा है।
लघु जलविद्युत संयंत्र (SHP) के बारे में
- लघु जलविद्युत संयंत्र प्राकृतिक जल प्रवाह का उपयोग किए बिना बड़े बाँधों के विद्युत उत्पादन करते हैं, जिनकी क्षमता सामान्यतः 25 मेगावाट तक होती है।
- उदाहरण
- हिमाचल प्रदेश: बास्पा-II जलविद्युत परियोजना (बास्पा नदी)
- उत्तराखंड: मनेरी भाली परियोजना (चरण I एवं II) (भागीरथी नदी)
- कर्नाटक: शिवनासमुद्र जलविद्युत संयंत्र (कावेरी नदी)।
- मुख्य विशेषताएँ
- नदी प्रवाह आधारित प्रौद्योगिकी: अधिकांश लघु जलविद्युत परियोजनाएँ प्राकृतिक नदी प्रवाह का उपयोग करती हैं, जिससे पारिस्थितिकी व्यवधान न्यूनतम होता है।
- कम पर्यावरणीय प्रभाव: इन परियोजनाओं के लिए कम भूमि की आवश्यकता होती है तथा विस्थापन न्यूनतम होता है, जिससे सततता सुनिश्चित होती है।
- विकेंद्रीकृत उत्पादन: संयंत्रों को उपभोग केंद्रों के निकट स्थापित किया जाता है, जिससे प्रेषण हानियाँ कम होती हैं।
- दीर्घ परिचालन आयु: लघु जलविद्युत संयंत्रों की सतत् क्षमता अधिक तथा संचालन लागत कम होती है, जिससे ये आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनते हैं।
- लघु जलविद्युत संयंत्र का महत्त्व
- ऊर्जा सुरक्षा एवं ग्रिड स्थिरता: लघु जलविद्युत निरंतर एवं विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति प्रदान करता है, जो सौर एवं पवन जैसे अनियत स्रोतों से भिन्न है।
- ग्रामीण एवं क्षेत्रीय विकास: यह दूरस्थ क्षेत्रों में विद्युत पहुँच को बढ़ाता है, जिससे आजीविका एवं अवसंरचना का विकास होता है।
- पर्यावरणीय रूप से सतत् ऊर्जा: यह बिना उत्सर्जन एवं ईंधन उपयोग के ऊर्जा उत्पादन करता है, जिससे जलवायु लक्ष्यों में योगदान मिलता है।
- रोजगार एवं आर्थिक विकास: निर्माण एवं संचालन के दौरान रोजगार सृजन होता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है।
निष्कर्ष
लघु जलविद्युत एक सतत् एवं विकेंद्रीकृत ऊर्जा समाधान प्रदान करता है, जो ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, समावेशी विकास को समर्थन देता है तथा भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को आगे बढ़ाता है।