भारत द्वारा मालदीव को खसरा प्रकोप से निपटने में सहायता प्रदान

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भारत सरकार ने वर्ष 2026 में खसरे (Measles) के बढ़ते मामलों का सामना कर रहे मालदीव को खसरा वैक्सीन तथा चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई है।
भारत द्वारा खसरा प्रकोप के दौरान मालदीव की सहायता
- वैक्सीन सहायता: भारत ने मालदीव में टीकाकरण कवरेज को सुदृढ़ करने तथा खसरा प्रकोप को नियंत्रित करने में सहायता हेतु 20,000 खसरा वैक्सीन खुराकें भेजीं।
- चिकित्सीय एवं मानवीय सहायता: भारत ने लगभग तीन टन चिकित्सा सामग्री भी उपलब्ध कराई, जिससे नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी तथा विजन महासागर के अंतर्गत एक विश्वसनीय फर्स्ट रिस्पॉन्डर (First Responder) के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि की।
खसरा (Measles) के बारे में
- खसरा एक अत्यधिक संक्रामक विषाणुजनित रोग है, जो विशेष रूप से बच्चों एवं कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों में गंभीर जटिलताएँ उत्पन्न कर सकता है।
- कारण: यह मीजल्स वायरस (Measles Virus – MeV) के कारण होता है, जो पैरामिक्सोविरिडी (Paramyxoviridae) परिवार का सदस्य है।
- सर्वाधिक संवेदनशील समूह: पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे, टीकाकरण से वंचित व्यक्ति, कुपोषित बच्चे तथा कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग इसके प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं।
- संचरण: यह रोग संक्रमित व्यक्ति के खाँसने, छींकने या साँस लेने पर निकलने वाली रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट्स (Respiratory Droplets) तथा वायुजनित संचरण के माध्यम से फैलता है।
- टीकाकरण: खसरे की प्रभावी रोकथाम खसरा-युक्त वैक्सीन (Measles-containing Vaccine) की दो खुराकों द्वारा की जा सकती है, जो दीर्घकालिक प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं।
भारत के खसरा उन्मूलन प्रयास
- उच्च टीकाकरण कवरेज: सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के अंतर्गत भारत ने खसरा वैक्सीन की पहली खुराक के लिए 93% से अधिक तथा दूसरी खुराक के लिए 92% से अधिक कवरेज प्राप्त किया है।
- मामलों में उल्लेखनीय कमी: भारत में वर्ष 2024 में रिपोर्ट किए गए खसरा मामलों में 2023 की तुलना में 73% की कमी दर्ज की गई, जो सघन टीकाकरण एवं निगरानी प्रयासों के माध्यम से खसरा उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में प्रगति को दर्शाती है।
महत्त्व: यह पहल क्षेत्रीय स्वास्थ्य कूटनीति (Regional Health Diplomacy) में भारत की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है तथा दक्षिण एशिया में खसरा उन्मूलन के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में योगदान देती है। |
डीआरडीओ द्वारा अगली पीढ़ी की रक्षा प्रौद्योगिकी क्षमता का सफल प्रदर्शन

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने तीन लगातार उड़ान परीक्षणों के माध्यम से बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (Ballistic Missile Defence – BMD) प्रणाली तथा नेवल एंटी-शिप मिसाइल–मीडियम रेंज (NASM-MR) का सफल प्रदर्शन किया।
बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) प्रणाली के बारे में
- यह एक रक्षात्मक मिसाइल कवच है, जिसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने, ट्रैक करने (Track) तथा उन्हें इंटरसेप्ट (Intercept) करने के लिए विकसित किया गया है।
- मुख्य विशेषताएँ: उन्नत रडार, सेंसर, कमांड एवं नियंत्रण प्रणालियों तथा इंटरसेप्टर मिसाइलों के नेटवर्क का उपयोग करती है।
- उड़ान के विभिन्न चरणों में खतरों को निष्क्रिय करके बहु-स्तरीय सुरक्षा प्रदान करती है।
- उभरते हुए मिसाइल खतरों का सामना करने तथा रणनीतिक परिसंपत्तियों, सैन्य प्रतिष्ठानों एवं प्रमुख शहरों की सुरक्षा करने में सक्षम है।
नेवल एंटी-शिप मिसाइल–मीडियम रेंज (NASM-MR) के बारे में
- यह DRDO द्वारा विकसित एक स्वदेशी मध्यम-दूरी की एंटी-शिप मिसाइल है।
- मुख्य विशेषताएँ: शत्रु के युद्धपोतों (Warships) तथा अन्य समुद्री लक्ष्यों को निशाना बनाकर नष्ट करने के लिए डिजाइन की गई है।
- समुद्र में गतिशील लक्ष्यों के विरुद्ध सटीक प्रहार क्षमता (Precision Strike Capability) प्रदान करती है।
- भारतीय सशस्त्र बलों की आक्रामक एवं समुद्री प्रहार क्षमता को सुदृढ़ करती है।
बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) के बारे में
- यह एक बहु-स्तरीय मिसाइल रक्षा कवच है, जो आने वाले बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से सुरक्षा प्रदान करता है।
- कार्यप्रणाली
- पता लगाना: उन्नत रडार एवं सेंसरों की सहायता से आने वाली मिसाइलों की पहचान करता है।
- ट्रैकिंग: मिसाइल की प्रक्षेपवक्र (Trajectory) एवं उड़ान पथ (Flight Path) की निरंतर निगरानी करता है।
- अवरोधन: लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही आने वाली मिसाइल को नष्ट कर देता है।
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व्हेल ग्रेवयार्ड (Whale Graveyard)

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वैज्ञानिकों ने दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर के डायमेंटिना क्षेत्र (Diamantina Zone) में विश्व के सबसे बड़े, सबसे गहरे तथा सबसे प्राचीन ज्ञात व्हेल ग्रेवयार्ड (Whale Graveyard) की खोज की है।
व्हेल ग्रेवयार्ड क्या है?
- व्हेल ग्रेवयार्ड समुद्र तल का वह क्षेत्र है, जहाँ लंबे समय तक अनेक व्हेलों के अवशेष एकत्रित होते रहते हैं, जिससे “व्हेल फॉल्स (Whale Falls)” नामक पोषक तत्त्वों से समृद्ध पारितंत्र विकसित होते हैं।
- व्हेल फॉल (Whale Fall) एक प्राकृतिक घटना है, जिसमें मृत व्हेल समुद्र की गहराई में तल तक डूब जाती है और वहाँ एक स्थानीयकृत तथा अत्यधिक विशिष्ट पारितंत्र का निर्माण करती है।
- भूमि पर एलिफेंट ग्रेवयार्ड (Elephant Graveyards) की भाँति, व्हेल ग्रेवयार्ड भी ऐसे क्षेत्र होते हैं, जहाँ बड़े स्तनधारियों के अवशेष पाए जाते हैं। हालाँकि, व्हेलों के मामले में यह स्थिति मुख्यतः महासागरीय एवं भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण उत्पन्न होती है।
सबसे प्राचीन व्हेल ग्रेवयार्ड के बारे में
- शोधकर्ताओं ने लगभग 500 व्हेल कंकालों एवं जीवाश्म स्थलों की खोज की है, जिससे यह अब तक ज्ञात सबसे बड़ा, सबसे गहरा एवं सबसे प्राचीन व्हेल ग्रेवयार्ड बन गया है।
- अवस्थिति: यह ग्रेवयार्ड दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर के डायमेंटिना फ्रैक्चर जोन (Diamantina Fracture Zone) में स्थित है, जो लगभग 1,200 किमी. लंबा है तथा समुद्र तल से लगभग 7,000 मीटर की गहराई पर, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में स्थित है।
- मुख्य विशेषताएँ
- असाधारण प्राचीनता: कुछ व्हेल जीवाश्म लगभग 5.3 मिलियन वर्ष प्राचीन हैं, जिससे यह पृथ्वी पर ज्ञात सबसे प्राचीन व्हेल ग्रेवयार्ड बन जाता है।
- असाधारण विस्तार: वैज्ञानिकों ने 485 व्हेल-फॉल एवं जीवाश्म स्थलों का दस्तावेजीकरण किया है तथा अनुमान लगाया है कि इस क्षेत्र में लाखों व्हेलों के अवशेष पाए जा सकते हैं।
- जैव विविधता का हॉटस्पॉट: व्हेलों के अवशेष गहरे समुद्र के अनेक जीवों, जैसे जेलीफिश, ब्रिटल स्टार, बोन-ईटिंग वर्म्स (Bone-Eating Worms) तथा विज्ञान के लिए संभावित रूप से नई प्रजातियों को पोषण प्रदान करते हैं।
- विकासवादी साक्ष्य: इस स्थल से विलुप्त बीक्ड व्हेल (Beaked Whale) के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं तथा टेरोसीटस डायमंटिनाए नामक एक नई प्रजाति की पहचान हुई है, जिससे व्हेलों के विकासक्रम को समझने में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है।
- इस खोज का महत्त्व
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- गहरे समुद्री पारितंत्रों की समझ: यह खोज दर्शाती है कि व्हेल फॉल्स (Whale Falls) किस प्रकार विशिष्ट रसायन-संश्लेषी (Chemosynthetic) पारितंत्रों को बनाए रखते हैं तथा हाइड्रोथर्मल वेंट्स (Hydrothermal Vents) और कोल्ड सीप (Cold Seep) समुदायों के बीच पारिस्थितिकी सेतु के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- जलवायु एवं विकासवादी अंतर्दृष्टियाँ: व्हेलों के अवशेषों का विशाल संचय कार्बन की महत्त्वपूर्ण मात्रा को संगृहीत करता है तथा अतीत की समुद्री जैव विविधता, व्हेलों के प्रवासन पैटर्न और महासागरीय पर्यावरणीय परिवर्तनों के पुनर्निर्माण हेतु मूल्यवान साक्ष्य प्रदान करता है।
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ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2026
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ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2026 में भारत को 163 देशों में 127वाँ स्थान प्राप्त हुआ है।
ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2026 के प्रमुख निष्कर्ष
- समग्र आकलन: इस सूचकांक में 163 स्वतंत्र राज्यों एवं क्षेत्रों का आकलन किया गया, जो विश्व की लगभग 99.7% जनसंख्या को कवर करते हैं।
- शांति की स्थिति में गिरावट: वैश्विक शांति के स्तर में गिरावट का क्रम जारी रहा, जहाँ शांति संकेतकों में सुधार की तुलना में अधिक देशों में स्थिति खराब हुई।
- शीर्ष 3 सर्वाधिक शांतिपूर्ण देश
- आइसलैंड, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैंड।
- सबसे कम शांतिपूर्ण 3 देश
- रूस, सूडान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
- दक्षिण एशिया का प्रदर्शन
- क्षेत्रीय रुझान: राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक संघर्षों तथा सुरक्षा चुनौतियों के कारण दक्षिण एशिया में शांति का स्तर हाल के वर्षों के सबसे निम्न स्तरों में से एक दर्ज किया गया।
- दक्षिण एशिया का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनकर्ता: भूटान क्षेत्र का सबसे शांतिपूर्ण देश बना रहा।
- श्रीलंका का प्रदर्शन: श्रीलंका वैश्विक स्तर पर 67वें स्थान पर रहा तथा 14 स्थानों का सुधार करते हुए दक्षिण एशिया का दूसरा सबसे शांतिपूर्ण देश बन गया।
- भारत की स्थिति: भारत 127वें स्थान पर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में तीन स्थान नीचे है। इसका प्रमुख कारण आंतरिक सुरक्षा एवं स्थानीय तनावों से जुड़ी चिंताएँ रहीं।
- चीन 118वें स्थान पर रहा, जबकि पाकिस्तान 152वें स्थान पर रहा।
ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) के बारे में
- ग्लोबल पीस इंडेक्स (Global Peace Index – GPI) विश्व में देशों की सापेक्षिक शांति की स्थिति को मापने वाला प्रमुख वैश्विक सूचकांक है।
- प्रकाशन: ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2026 का 20वाँ संस्करण सिडनी स्थित अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ‘इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (Institute for Economics and Peace – IEP)’ द्वारा जारी किया गया।
- मुख्य मानदंड: सूचकांक तीन प्रमुख आयामों के अंतर्गत 23 गुणात्मक एवं मात्रात्मक संकेतकों के आधार पर देशों का मूल्यांकन करता है:
- सामाजिक सुरक्षा एवं संरक्षा: अपराध दर, राजनीतिक स्थिरता, आतंकवाद तथा सार्वजनिक सुरक्षा का आकलन करता है।
- चल रहे घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय संघर्ष: आंतरिक एवं बाह्य संघर्षों की तीव्रता तथा अवधि का मूल्यांकन करता है।
- सैन्यीकरण: सैन्य व्यय, सशस्त्र बलों की संख्या, हथियारों के आयात तथा सैन्य क्षमता का परीक्षण करता है।
- महत्त्व: ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) शांति, स्थिरता एवं सुरक्षा से संबंधित वैश्विक प्रवृत्तियों के आकलन हेतु एक तुलनात्मक रूपरेखा प्रदान करता है तथा इसका व्यापक उपयोग नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं एवं अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा किया जाता है।
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वीनस फ्लाइट्रैप (Venus Flytrap)

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वैज्ञानिकों ने वीनस फ्लाइट्रैप (Venus Flytrap) के अपने जाल (Trap) को बंद करने की प्रक्रिया से जुड़े एक शताब्दी पुराने रहस्य का समाधान कर लिया है।
वीनस फ्लाइट्रैप (Venus Flytrap) के बारे में
- वीनस फ्लाइट्रैप एक मांसाहारी (कीटभक्षी) पौधा है, जो पोषक तत्त्वों की कमी वाली मिट्टी से आवश्यक पोषण प्राप्त करने के लिए विशेष स्नैप-ट्रैप (Snap-Trap) पत्तियों की सहायता से कीटों को पकड़ता एवं पचाता है।
- वैज्ञानिक नाम: डायोनिया म्यूसिपुला , यह ड्रोसेरेसी (Droseraceae / Sundew) कुल से संबंधित है।
- मूल क्षेत्र: यद्यपि वीनस फ्लाइट्रैप को अन्य क्षेत्रों में भी लगाया गया है और वहाँ इसकी प्राकृतिक आबादी विकसित हुई है, लेकिन यह प्राकृतिक रूप से केवल दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के अटलांटिक तटीय मैदान में, मुख्यतः नॉर्थ कैरोलिना और साउथ कैरोलिना राज्यों में पाया जाता है।
- यह स्वाभाविक रूप से अम्लीय दलदलों (Acidic Bogs), आर्द्रभूमियों तथा पोषक तत्त्वों की कमी वाली रेतीली मिट्टियों में उगता है।
- जाल (ट्रैप): इसकी पत्तियाँ स्प्रिंग-युक्त ट्रैप की तरह कार्य करती हैं। जब कोई कीट अल्प समयांतराल में दो बार ट्रिगर हेयर्स (Trigger Hairs) को स्पर्श करता है, तो एक विद्युत संकेत उत्पन्न होता है।
- खोजी गई प्रक्रिया: जाल का बंद होना पत्ती की बाहरी एपिडर्मल परत की कोशिका भित्तियों के त्वरित नरम पड़ने से प्रेरित होता है।
- पादप गति: इसका जाल लगभग 0.1 सेकंड में बंद हो जाता है, जिससे यह पादप जगत की सबसे तेज गतियों में से एक माना जाता है।
- पोषणीय अनुकूलन: यह पौधा अम्लीय एवं पोषक तत्त्वों की कमी वाले वातावरण में, जहाँ नाइट्रोजन की कमी होती है, जीवित रहने के लिए मांसाहारी प्रकृति में विकसित हुआ है।
- पाचन प्रक्रिया: शिकार को पकड़ने के बाद यह एंजाइम स्रावित करता है, पोषक तत्त्वों को अवशोषित करता है तथा बाद में जाल पुनः खुल जाता है, जिससे कीट का बाह्य कंकाल पीछे रह जाता है।
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भारत में सड़क दुर्घटना जनित मृत्यु में वृद्धि
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सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, भारत में वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.77 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु दर्ज की गई, जो औसतन प्रतिदिन लगभग 485 मौतों के बराबर है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- सड़क दुर्घटनाओं की संख्या: वर्ष 2024 में भारत में 4.88 लाख सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें 1.77 लाख लोगों की मृत्यु हुई तथा 4.71 लाख से अधिक लोग घायल हुए। यह स्थिति एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती को दर्शाती है।
- बढ़ती प्रवृत्ति: वर्ष 2023 की तुलना में सड़क दुर्घटनाओं में 1.5%, मृत्यु मामलों में 2.5% तथा घायलों की संख्या में 1.9% की वृद्धि दर्ज की गई, जो सड़क सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बने रहने को दर्शाती है।
- उत्पादक जनसंख्या पर प्रभाव: सड़क दुर्घटनाओं का सर्वाधिक प्रभाव देश की युवा एवं कार्यशील आयु वर्ग पर पड़ा, जिससे उल्लेखनीय सामाजिक एवं आर्थिक हानि हुई।
सड़क दुर्घटना जनित मौतों के प्रमुख कारण
- अत्यधिक गति एवं लापरवाहीपूर्ण वाहन संचालन: ओवर-स्पीडिंग अकेले ही सड़क दुर्घटना जनित कुल मौतों में 70% से अधिक के लिए जिम्मेदार रही, जिससे यह मृत्यु का प्रमुख कारण बन गई।
- सुरक्षा नियमों का उल्लंघन: हेलमेट एवं सीट बेल्ट का उपयोग न करने के कारण 68,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, जो बुनियादी सड़क सुरक्षा मानकों के कमजोर अनुपालन को दर्शाता है।
- अयोग्य एवं असुरक्षित वाहन संचालन: दुर्घटनाओं का एक बड़ा हिस्सा वैध ड्राइविंग लाइसेंस के बिना वाहन चलाने, लर्नर लाइसेंस धारकों, नशे की अवस्था में वाहन चलाने तथा गलत दिशा (Wrong-Side Driving) में वाहन चलाने से जुड़ा था।
- सड़क एवं वाहन संबंधी कमियाँ: खतरनाक मोड़, गड्ढे, ओवरलोडेड वाहन तथा अनुपयुक्त पुराने वाहन दुर्घटना जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक रहे।
सड़क दुर्घटनाओं से निपटने हेतु प्रमुख सरकारी पहलें
- कैशलेस उपचार योजना, 2025: पात्र सड़क दुर्घटना पीड़ितों को दुर्घटना के बाद पहले सात दिनों के दौरान ₹1.5 लाख तक का कैशलेस चिकित्सा उपचार प्रदान करती है।
- पीएम राहत (PM RAHAT): इस पहल के अंतर्गत हिट-एंड-रन दुर्घटनाओं में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजा बढ़ाकर ₹2 लाख कर दिया गया है। साथ ही दुर्घटना पीड़ितों को ₹1.5 लाख तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा भी प्रदान की जाती है।
- राह-वीर योजना: सड़क दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले गुड समैरिटन्स को कानूनी संरक्षण एवं ₹25,000 तक का पुरस्कार प्रदान करती है।
- भारत एनकैप (BNCAP): क्रैश-टेस्टिंग मानकों के माध्यम से सुरक्षित वाहनों को प्रोत्साहित करता है तथा एयरबैग (Airbags) और एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS) जैसी अनिवार्य सुरक्षा सुविधाओं को बढ़ावा देता है।
- ई-डीएआर एवं ई-चालान एकीकरण: डिजिटल सड़क सुरक्षा प्रणालियों के माध्यम से वास्तविक समय दुर्घटना रिपोर्टिंग, डेटा-आधारित प्रवर्तन तथा बेहतर निगरानी सुनिश्चित करता है।
- 4E ढाँचे को सुदृढ़ करना: शिक्षा (Education), इंजीनियरिंग (Engineering), प्रवर्तन (Enforcement) एवं आपातकालीन देखभाल (Emergency Care) पर आधारित 4E ढाँचे को मजबूत करना सुरक्षित सड़कों के निर्माण एवं सड़क दुर्घटना जनित मौतों में कमी लाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha)
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हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) को भारत की सिक्योरिटी आर्किटेक्चर (Security Architecture) के लिए एक “गेम चेंजर” बताया।
प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) के बारे में
- प्रोजेक्ट कुशा एक स्वदेशी लंबी दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली मिसाइल (Surface-to-Air Missile – SAM) आधारित वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों के विरुद्ध बहु-स्तरीय सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिए विकसित किया जा रहा है।
- विकसितकर्ता: इस परियोजना का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा किया जा रहा है।
- प्रोजेक्ट कुशा की प्रमुख विशेषताएँ
- लंबी दूरी की अवरोधन क्षमता: यह प्रणाली लगभग 150 किमी., 250 किमी. तथा 400 किमी. की मारक क्षमता वाले तीन इंटरसेप्टर संस्करणों का उपयोग करेगी, जिससे बहु-स्तरीय वायु रक्षा कवरेज सुनिश्चित होगी।
- उन्नत खतरों से सुरक्षा: प्रोजेक्ट कुशा को स्टील्थ विमानों, ड्रोन, क्रूज मिसाइलों तथा हाइपरसोनिक हथियारों सहित विभिन्न प्रकार के उन्नत खतरों को निष्क्रिय करने हेतु डिज़ाइन किया गया है।
- बहु-स्तरीय रक्षा संरचना: यह प्रणाली एक एकीकृत वायु रक्षा नेटवर्क के रूप में कार्य करेगी, जो विभिन्न दूरी एवं ऊँचाई पर शत्रु हवाई लक्ष्यों का पता लगाने, ट्रैक करने एवं अवरोधित करने में सक्षम होगी।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास: यह परियोजना मिसाइल प्रौद्योगिकी, रडार प्रणालियों, कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क तथा उन्नत रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत की बढ़ती विशेषज्ञता को प्रदर्शित करती है।
- प्रोजेक्ट कुशा का महत्त्व
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- राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना: प्रोजेक्ट कुशा भारत की सैन्य प्रतिष्ठानों, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना तथा नागरिक आबादी वाले क्षेत्रों को हवाई हमलों से सुरक्षित रखने की क्षमता को मजबूत करेगा।
- रणनीतिक बल गुणक: वर्ष 2028 से 2030 के बीच परिचालनात्मक होने की संभावना वाले प्रोजेक्ट कुशा को मिशन सुदर्शन चक्र के अंतर्गत प्रस्तावित भारत की बहु-स्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली का एक प्रमुख घटक माना जा रहा है।
मिशन सुदर्शन चक्र के बारे में
- मिशन सुदर्शन चक्र का शुभारंभ 15 अगस्त, 2025 को एक स्वदेशी, बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा कवच विकसित करने के उद्देश्य से किया गया था।
- इसका लक्ष्य वर्ष 2035 तक देश की रणनीतिक परिसंपत्तियों, नागरिक अवसंरचना तथा धार्मिक स्थलों को हवाई, स्थल, समुद्री एवं साइबर खतरों से सुरक्षा प्रदान करना है।
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