प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा

21 Mar 2026

संदर्भ

मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु से विदेशी और आक्रामक प्रजाति प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा (सीमै करुवेलम) के उन्मूलन के लिए 34 निर्देशों का एक सेट जारी किया।

आक्रामक विदेशी प्रजातियों (Invasive Alien Species- IAS) के बारे में

  • जैविक विविधता पर सम्मेलन (CBD) द्वारा परिभाषित: यह आक्रामक वन्यजीव प्रजातियों को “ऐसी प्रजातियों के रूप में परिभाषित करता है, जिनका उनके प्राकृतिक वितरण क्षेत्र से बाहर प्रवेश और/या प्रसार जैविक विविधता के लिए खतरा पैदा करता है”।
    • इनमें जानवर, पौधे, कवक और यहाँ तक ​​कि सूक्ष्मजीव भी शामिल हैं और ये सभी प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • भारत में आक्रामक वन्यजीवों के कुछ उदाहरण
    • भारत में आक्रामक वन्यजीवों की सूची में मुख्य रूप से कुछ मत्स्य प्रजातियाँ जैसे अफ्रीकी कैटफिश, निले तिलापिया (Nile Tilapia), रेड बेल्लीड पिरान्हा (Red-Bellied Piranha) और एलिगेटर गार (Alligator Gar), और कछुए की प्रजातियाँ जैसे रेड इयर्ड स्लाइडर (Red-eared Slider) शामिल हैं।
    • लैंटाना कैमरा: इसके अतिक्रमण के परिणामस्वरूप जंगली शाकाहारी जीवों के लिए चारा के रूप में उपयोग होने वाले देशज पौधों की कमी हो गई है; इसने भारत के बाघों के क्षेत्र के 40% से अधिक हिस्से पर अतिक्रमण कर लिया है।

मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देश

  • सभी निजी भू-स्वामियों को 30 दिनों के भीतर अपनी संपत्तियों से प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा के पौधे उखाड़ने होंगे, अन्यथा संबंधित जिला प्रशासन उन्हें जड़ से उखाड़ देगा और भू-स्वामियों से लागत वसूल करेगा।

प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा के बारे में

  • उत्पत्ति: प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा मध्य और दक्षिण अमेरिका का मूल निवासी है।
  • कुल: फैबिएसी
  • यह एक आक्रामक विदेशी पौधा है।
  • इसे स्थानीय रूप से विलायती कीकर या गंडो बावल के नाम से जाना जाता है।
  • इसे औपनिवेशिक काल के दौरान भारत में वनरोपण, मृदा स्थिरीकरण और ईंधन की आपूर्ति जैसे उद्देश्यों के लिए लाया गया था।
    • इस वृक्ष ने दिल्ली रिज पर व्यवस्थित रूप से विस्तार कर लिया है, जिससे अन्य देशी प्रजातियों का विकास मुश्किल हो गया है।

 प्रमुख विशेषताएँ

  • सूखा प्रतिरोधी: यह सूखा प्रतिरोधी और अत्यधिक कठोर प्रजाति है, जो चरम जलवायु परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती है।
  • विस्तृत जड़ तंत्र: यह तेजी से बढ़ने वाला पौधा है, जिसका जड़ तंत्र गहरा और विस्तृत होता है, जिससे यह भूजल को कुशलतापूर्वक अवशोषित कर पाता है।
  • शुष्क परिस्थितियों में पनपने की क्षमता: यह शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में, यहाँ तक कि खराब और क्षारीय मिट्टी में भी पनप सकता है।
  • घने और अभेद्य झाड़ियाँ: यह घनी और अभेद्य झाड़ियाँ बनाता है, जिससे इसे हटाना कठिन और महँगा हो जाता है।

भारत में वितरण

  • यह राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु और दक्कन पठार के कुछ हिस्सों जैसे राज्यों में व्यापक रूप से वितरित है।

प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा का प्रभाव

  • भूमि क्षरण: प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा ने उपजाऊ भूमि, घास के मैदानों और वन पारिस्थितिकी तंत्रों को बंजर क्षेत्रों में परिवर्तित करके गंभीर रूप से उनका क्षरण किया है।
  • मृदा संरचना क्षति: यह वन मृदा की प्राकृतिक काईयुक्त और स्पंजी संरचना को नष्ट कर देता है, जिससे मृदा की उर्वरता और उत्पादकता कम हो जाती है।
  • जैव विविधता का नुकसान: इस प्रजाति ने देशी वनस्पतियों को आक्रामक रूप से विस्थापित कर दिया है, जिससे जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन में भारी कमी आई है।
  • आक्रामक प्रभुत्व: यह एक प्रमुख आक्रामक प्रजाति के रूप में कार्य करता है, जिससे एक ही प्रकार की वनस्पति का निर्माण होता है और बड़े क्षेत्रों पर पारिस्थितिकी एकाधिकार प्राप्त होता है।
  • भूजल की कमी: प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा अत्यधिक भूजल का उपभोग करता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावित क्षेत्रों में भूजल स्तर में कमी आती है।
  • मृदा नमी में कमी: यह मृदा नमी के स्तर को कम कर देता है, जिससे वातावरण अन्य पौधों की प्रजातियों के विकास के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।
  • पारिस्थितिकी असंतुलन: इसके प्रसार ने पारिस्थितिकी असंतुलन उत्पन्न किया है और उत्पादक भूमि तथा चरागाह संसाधनों की उपलब्धता को कम कर दिया है।

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