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कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT)

24 Feb 2026

संदर्भ

हाल ही में जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2013–2019 के बीच कीटनाशकों से कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (Total Applied Toxicity – TAT) में वैश्विक स्तर पर वृद्धि हुई है।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2022 में, संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन में देशों ने वर्ष 2030 तक कीटनाशक जोखिम को 50% तक कम करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • वैश्विक कीटनाशक विषाक्तता में प्रमुख योगदानकर्ता: चीन, ब्राजील, अमेरिका और भारत, वैश्विक स्तर पर कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) का लगभग 70% योगदान करते हैं।
  • अधिक कीटनाशक उपयोग वाली फसलें: फलों, सब्जियों, मक्का, सोयाबीन, चावल तथा अन्य अनाजों पर कीटनाशकों का व्यापक उपयोग किया जाता है।
  • क्षेत्रीय विषाक्तता प्रवृत्तियाँ
    • TAT में वृद्धि: भारत, अमेरिका, ब्राजील तथा अनेक अफ्रीकी देश।
    • लक्ष्य की दिशा में अग्रसर: चिली एकमात्र देश है, जिसके संयुक्त राष्ट्र 2030 कीटनाशक जोखिम-घटाव लक्ष्य को प्राप्त करने का अनुमान है।
  • प्रभावित जीव: कीटनाशकों से विषाक्तता निम्नलिखित क्रम में बढ़ी:
    • अकशेरुकी प्रजातियाँ
    • स्थलीय पौधे
    • स्थलीय आर्थ्रोपोड
    • मृदा जीव
    • मछलियाँ
  • TAT में सर्वाधिक वृद्धि वाले क्षेत्र
    • उप-सहारा अफ्रीका
    • भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ भाग
    • दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया

कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) क्या है?

  • यह पर्यावरण पर कीटनाशकों के समग्र जोखिम को मापता है। इसकी गणना प्रयुक्त कीटनाशक की मात्रा को विभिन्न जीवों के प्रति उसकी विषाक्तता से गुणा करके की जाती है।
  • केवल मात्रा-आधारित मापों के विपरीत, TAT मनुष्यों, पशुओं और पर्यावरण को संभावित हानि की अधिक यथार्थवादी समझ प्रदान करता है।

कीटनाशकों के बारे में

  • कीटनाशक वह कोई भी पदार्थ या पदार्थों का मिश्रण है, जिसका उद्देश्य किसी कीट को रोकना, नष्ट करना या नियंत्रित करना है।
  • कीटों के विभिन्न लक्ष्यों के आधार पर कीटनाशकों का वर्गीकरण
    • उदाहरण, फफूँदनाशी – फफूँद
    • कीटनाशी – कीट
    • शाकनाशी – पौधे
    • कृंतकनाशी – कृंतक (चूहे)
  • भारत में कीटनाशक उपयोग
    • कीटनाशकों में सर्वाधिक हिस्सा कीटनाशकों (51.4%) का है, इसके बाद फफूँदनाशक (32.6%) तथा शाकनाशक (15.8%) आते हैं।

TAT में वृद्धि से उत्पन्न चुनौतियाँ

  • मानव स्वास्थ्य जोखिम: रसायन दैनिक जीवन (भोजन, जल, घरेलू उत्पाद) में उपस्थित रहते हैं और बीमारी का कारण बन सकते हैं।
    • उदाहरण: जनवरी 2026 में, 13 यूरोपीय देशों में परीक्षण किए गए 64% सेबों में स्थायी “फॉरएवर केमिकल्स” पाए गए, जो अपघटन का प्रतिरोध करते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य हेतु चुनौती: TAT में वृद्धि से वर्ष 2030 तक कीटनाशक जोखिम में 50% कमी के संयुक्त राष्ट्र लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन बनाती है।
    • उदाहरण: उप-सहारा अफ्रीका में तेजी से बढ़ता कीटनाशक भार सतत् कृषि के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।
  • दीर्घकालिक पारितंत्रीय जोखिम: उच्च TAT पारितंत्रों को अस्थिर कर सकता है, मृदा उर्वरता को कम कर सकता है और खाद्य जाल को प्रभावित कर सकता है।
    • उदाहरण: दक्षिण-पूर्व एशिया के जलीय पारितंत्रों में स्थायी कीटनाशक अपवाह के कारण मछलियों की आबादी में गिरावट देखी गई है।
    • जैव विविधता और संयुक्त राष्ट्र लक्ष्यों के लिए खतरा: वैश्विक स्तर पर बढ़ती TAT प्रवृत्तियाँ संयुक्त राष्ट्र के कीटनाशक जोखिम-घटाव लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चुनौती प्रस्तुत करती हैं तथा जैव विविधता के प्रति वैश्विक खतरों की उपस्थिति को दर्शाती हैं।

कीटनाशक अधिनियम, 1968 की सीमाएँ

  • अधिनियम पुराना हो चुका है; वर्ष 1968 के बाद से कीटनाशकों का उपयोग और उनकी विषाक्तता बढ़ी है।
  • उच्च-विषाक्त तथा दीर्घकालिक प्रभाव वाले रसायन (जैसे: पैराक्वाट) अभी भी उपयोग में हैं।
  • गैर-कृषि क्षेत्रों (घर, होटल, परिवहन, सार्वजनिक स्थानों) में कीटनाशक संपर्क के लिए विनियमन कमजोर है।

भारत में कीटनाशकों से संबंधित ढाँचा

  • कीटनाशक अधिनियम, 1968: भारत में कीटनाशकों के निर्माण, बिक्री, परिवहन और उपयोग को विनियमित करने वाला प्रमुख कानून। मुख्यतः कृषि उपयोग पर केंद्रित, जबकि घरेलू या वाणिज्यिक अनुप्रयोगों के लिए सीमित प्रावधान।
  • कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025
    • लोगों और पर्यावरण की सुरक्षा: कीटनाशकों के हानिकारक प्रभावों को कम करने का उद्देश्य।
    • सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा: जैविक कीटनाशकों तथा पारंपरिक ज्ञान आधारित समाधानों के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
    • सावधानीपूर्वक मसौदा तैयार करने की आवश्यकता: विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि सुझावों की अनदेखी की गई तो नया कानून, पुराने वर्ष 1968 के अधिनियम से भी कमजोर हो सकता है।
    • दीर्घकालिक कृषि परिवर्तन का समर्थन: भारत को रसायन प्रधान कृषि से दूर करने, जलवायु परिवर्तन, किसान मुद्दों एवं रासायनिक अवशेषों को संबोधित करने तथा दुरुपयोग के लिए उपयोगकर्ताओं को कानूनी रूप से उत्तरदायी बनाने पर बल देता है।
  • नियामक प्राधिकरण
    • केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड: कीटनाशक मानकों और स्वीकृतियों पर सलाह देता है।
    • पंजीकरण समिति: सुरक्षा और प्रभावशीलता के आधार पर नए कीटनाशकों के पंजीकरण को स्वीकृति देती है।
    • राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में बिक्री, भंडारण और उपयोग को विनियमित करती हैं।

आगे की राह

  • निगरानी और शमन: TAT की वैश्विक निगरानी नीति और हस्तक्षेप रणनीतियों का मार्गदर्शन कर सकती है।
    • उदाहरण: यूरोपीय संघ का “ईयू कीटनाशक डेटाबेस” रसायनों के उपयोग और विषाक्तता प्रवृत्तियों की निगरानी करने में सहायता करता है।
  • बेहतर विनियमन एवं सतत् प्रथाओं की आवश्यकता: सुरक्षित कीटनाशक विकल्पों, समेकित कीट प्रबंधन (IPM) और जैविक खेती का उपयोग TAT से निपटने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
    • उदाहरण: वियतनाम और भारत में जैव-कीटनाशकों को अपनाने से स्थानीय कीटनाशक विषाक्तता में कमी आई।
  • जैविक कृषि की ओर परिवर्तन: जैविक कृषि को व्यापक रूप से अपनाना तथा कम विषैले कीटनाशकों की ओर स्थानांतरण इस समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है।
  • वैश्विक सहयोग: राष्ट्रीय नीतियों को संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्यों के अंतर्गत कीटनाशक जोखिम-घटाव लक्ष्यों के अनुरूप समायोजित करना।
कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT)

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