संदर्भ:
जबकि यरुशलम ईसाई धर्म का हृदय है और मक्का/मदीना इस्लाम का केंद्र है, भारत ने वैश्विक तीर्थयात्रियों और प्रभाव को आकर्षित करने के लिए बौद्ध धर्म के जन्मस्थान के रूप में अपनी स्थिति का पूरी तरह से लाभ नहीं उठाया है।
भारत के बौद्ध परिदृश्य के बारे में:
- ऐतिहासिक प्रमाणिकता: भारतीय उपमहाद्वीप से बौद्ध धर्म का उदय भारत को बौद्ध दर्शन और परंपरा के प्रामाणिक जन्मस्थान तथा पोषण स्थल के रूप में स्थापित करता है।
- भारत में बौद्ध धर्म का पवित्र भूगोल:
- बोधगया: ज्ञान प्राप्ति का स्थल
- सारनाथ: प्रथम उपदेश का स्थान (धर्मचक्र प्रवर्तन)
- कुशीनगर: महापरिनिर्वाण स्थल
- नालंदा: ऐतिहासिक रूप से ज्ञान का वैश्विक केंद्र
बौद्ध धर्म का प्रसार और विकास:
- स्रोत विस्तार से बताते हैं, कि कैसे बौद्ध धर्म भारत से बाहर गया और स्थानीय संस्कृतियों के अनुकूल बन गया, जिससे थेरवाद (श्रीलंका), वज्रयान (तिब्बत), चान (चीन) और ज़ेन (जापान) बौद्धिज़म का निर्माण हुआ।
- अखिल भारतीय बौद्ध पदचिह्न: बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा, दक्षिण भारत (अमरावती, नागार्जुनकोंडा), पश्चिम भारत (अजंता-एलोरा), मध्य भारत (सांची स्तूप) और उत्तर-पूर्व (तवांग) में महत्त्वपूर्ण बौद्ध स्थल मौजूद हैं।
- सभ्यतागत अभिसरण बिंदु के रूप में भारत: बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे स्थलों पर केंद्रित भारत का बौद्ध सर्किट सभी बौद्ध परंपराओं के लिए एक वैश्विक मिलन स्थल के रूप में कार्य कर सकता है।
- सभ्यतागत पुनर्मिलन, पर्यटन नहीं: यह एकीकरण केवल एक पर्यटन पहल नहीं बल्कि एक सभ्यतागत पुनर्मिलन है, जहाँ विभिन्न बौद्ध परंपराएँ प्रतीकात्मक रूप से भारत में अपने साझा मूल की ओर लौटती हैं।
आर्थिक क्षमता:
- बौद्ध पर्यटन विदेशी पर्यटकों के आगमन में 6% का योगदान देता है; इसे बढ़ाने से जीडीपी (वर्तमान में पर्यटन से 5.22%) में वृद्धि हो सकती है तथा बिहार जैसे पिछड़े क्षेत्रों का विकास हो सकता है।
वर्तमान चुनौतियाँ
- एकीकृत सर्किट योजना की कमी और स्थलों के बीच खराब कनेक्टिविटी।
- कमजोर बुनियादी ढाँचा, जिसमें विश्व स्तरीय होटलों और बहुभाषी गाइडों की कमी शामिल है।
- राज्य नीतियों (उत्तर प्रदेश बनाम बिहार) के बीच खंडित शासन।
- नेपाल के लुंबिनी के साथ सीमा पार बाधाएँ।
भविष्य की रणनीति:
- सिंगल-विंडो क्लीयरेंस के लिए बौद्ध पर्यटन हेतु एक समर्पित प्राधिकरण स्थापित करना।
- बोधगया को एक अंतर्राष्ट्रीय विमानन हब के रूप में विकसित करना, और हाई-स्पीड रेल लिंक में सुधार करना।
- बौद्धिक नेतृत्व को पुनः प्राप्त करने के लिए पाली विद्वत्ता और वैश्विक अनुसंधान को पुनर्जीवित करना।
- वैश्विक प्रासंगिकता: बौद्ध धर्म ‘मध्यमार्ग’ कूटनीति, मानसिक स्वास्थ्य (माइंडफुलनेस), नैतिक शासन और जलवायु परिवर्तन लचीलापन (परस्पर निर्भरता की अवधारणा) के माध्यम से आधुनिक संघर्षों के समाधान प्रदान करता है।
निष्कर्ष
भारत को बौद्ध धर्म को एक सभ्यतागत पुनर्मिलन उपकरण के रूप में देखना चाहिए, तथा वैश्विक संबंधों को मजबूत करने के लिए ‘अवशेष कूटनीति’ (Relic Diplomacy) का उपयोग करना चाहिए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की सॉफ्ट पावर और ‘अवशेष कूटनीति’ (Relic Diplomacy) को बढ़ाने में भारत की बौद्ध विरासत की भूमिका का परीक्षण कीजिए। बौद्ध सर्किट की आर्थिक क्षमता में कौन-सी प्रणालीगत बाधाएँ बाधक हैं?
(15 अंक, 250 शब्द)
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