बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति

बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति 14 May 2026

संदर्भ:

समकालीन वैश्विक परिदृश्य अत्यधिक अस्थिरता और बदलते शक्ति-संतुलन से परिभाषित होता है।

  • इस संदर्भ में, सी. राजा मोहन जैसे विशेषज्ञों का सुझाव है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता से प्रभावी ढंग से निपटने और अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत को पाँच प्रमुख सिद्धांत अपनाने चाहिए—
    पारस्परिकता (Reciprocity),

    •  विविधीकरण (Diversification),
    • रणनीतिक लचीलापन (Strategic Flexibility),
    • रणनीतिक विकल्पिता (Strategic Optionality),
    • घरेलू पुनर्नवीकरण (Domestic Renewal)।

वैश्विक संदर्भ: असाधारण अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता

वर्त्तमान में क्या हो रहा है?

  • अमेरिका-ईरान दुर्बल/नाजुक युद्धविराम: एक तीव्र संघर्ष काल के बाद, जिसमें ईरान ने सऊदी अरब, UAE और क़तर जैसे पड़ोसी देशों पर मिसाइलें दागीं, वर्त्तमान में एक नाजुक युद्धविराम लागू है, हालाँकि इसकी स्थिरता अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
  • प्रधानमंत्री मोदी का UAE दौरा: यूरोप की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने UAE का एक छोटा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण दौरा किया, जो क्षेत्रीय तनावों के बीच गहरी कूटनीतिक एकजुटता का संकेत देता है।
  • अमेरिका-चीन पुनर्संरेखण: पूर्व आलोचनाओं के बावजूद, अमेरिकी नेतृत्व (ट्रंप) ने चीन के साथ प्रत्यक्ष वार्ता की है, जो शक्ति संक्रमण सिद्धांत (Power Transition Theory) को दर्शाता है। यह सिद्धांत बताता है कि जब एक शक्ति दूसरी शक्ति का स्थान लेती है, तो संघर्ष अपरिहार्य होता है, लेकिन वर्त्तमान में सहभागिता की शर्तें प्रतिस्पर्धा और सहयोग के मिश्रण की ओर बदल रही हैं।

सिद्धांत 1 – पारस्परिकता (Reciprocity)

पारस्परिकता क्या है?

  • विदेश नीति में पारस्परिकता का अर्थ है किसी साझेदार देश द्वारा दिए गए समर्थन और सहयोग के बदले समान रूप से प्रतिक्रिया देना।

भारत-UAE – एक गहन साझेदारी

  • UAE ने कश्मीर और सीमा-पार आतंकवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर लगातार भारत का समर्थन किया है।
  • इसके बदले में, भारत की हालिया कूटनीतिक पहल ईरान से जुड़े अपने सुरक्षा संबंधी चिंताओं के संदर्भ में UAE के प्रति एकजुटता (solidarity) को दर्शाती है।
  • यह संबंध अब केवल तेल-आधारित व्यापार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसमें भारत में UAE के बड़े निवेश, सुरक्षा सहयोग, खाद्य सुरक्षा और नई प्रौद्योगिकियाँ भी शामिल हो गई हैं।

सिद्धांत 2 – विविधीकरण (Diversification)

मूल उद्देश्य:

  • मूल उद्देश्य मौजूदा साझेदारियों की रक्षा करना तथा साथ ही नए संबंधों की सक्रिय रूप से खोज और निर्माण करना है, ताकि भारत किसी एक ही गुट पर अत्यधिक निर्भर न हो।

भारत-यूरोप: एक ऐतिहासिक मोड़:

  • ऐतिहासिक रूप से, भारत यूरोप को सोवियत संघ के साथ अपने संबंधों के दृष्टिकोण से देखता था।
  • अब भारत ने यूरोप के साथ प्रत्यक्ष और रणनीतिक जुड़ाव की ओर रुख किया है, और उसे पूँजी, उन्नत हरित प्रौद्योगिकी तथा भारतीय निर्यात के लिए एक विशाल बाजार के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में पहचान दी है।
  • यह बदलाव हालिया मुक्त व्यापार समझौतों, जैसे कि EFTA के साथ समझौता, तथा नॉर्डिक देशों के साथ बढ़ते सहयोग से स्पष्ट होता है।

सिद्धांत 3 – रणनीतिक लचीलापन (Strategic Flexibility)

ब्रिक्स बनाम क्वाड – मिथक का खंडन:

  • भारत इस विचार को अस्वीकार करता है कि ये समूह “वैचारिक युद्ध-गुट” हैं।
  • ब्रिक्स स्वाभाविक रूप से “पश्चिम-विरोधी” नहीं है, क्योंकि भारत इस समूह के भीतर भी चीन के साथ अपने अलग मतभेद बनाए रखता है।
  • इसी प्रकार, ‘क्वाड’ कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, और भारत एक सुरक्षा समझौते के बजाय, इसे एक सहयोग मंच के रूप में बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध है।

बहु-संरेखण = US – मूल्यवान, किंतु प्रतिक्रियात्मक

  • एस. जयशंकर के ‘मल्टी-अलाइनमेंट (Multi-Alignment)’ सिद्धांत का पालन करते हुए, भारत किसी निश्चित गुट में शामिल होने से बचता है, और इसके बजाय अपने विशिष्ट राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न देशों के साथ संबंध स्थापित करता है।
  • हालाँकि अमेरिका एक महत्वपूर्ण साझेदार है, भारत प्रतिक्रियात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वह अपनी स्वायत्तता का त्याग न करे, जबकि अमेरिका और चीन जैसी प्रमुख शक्तियाँ अपने आपसी संबंधों को पुनर्गठित कर रही हैं।

सिद्धांत 4 – रणनीतिक विकल्पिता (Strategic Optionality)

भारत के लिए अगला अवसर: अफ्रीका

  • अफ्रीका को “अगला फ्रंटियर” के रूप में पहचाना गया है, जहाँ सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध हैं, साथ ही एक तेजी से बढ़ता हुआ युवा बाज़ार भी विद्यमान है।
  • भारत को ऐतिहासिक भावनाओं से आगे बढ़कर परिणामों (Delivery) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; यद्यपि भारत के प्रति सद्भावना मौजूद है, लेकिन अवसंरचना परियोजनाओं को पूरा करने की गति में यह अक्सर चीन से पीछे रह जाता है।

सिद्धांत 5 – घरेलू पुनर्नवीकरण (Domestic Renewal)

मुख्य अवधारणा – आर्थिक जड़ता (Economic Sclerosis): 

  • विदेश नीति की प्रभावशीलता सीधे आंतरिक शक्ति से जुड़ी होती है; यदि भारत की अर्थव्यवस्था आर्थिक जड़ता (स्थिरता या अक्षमता) से ग्रस्त होती है, तो उसका वैश्विक प्रभाव समाप्त हो जाएगा।
  • घरेलू सुधार: भारत को विकास सुनिश्चित करने के लिए भ्रष्टाचार और नौकरशाही की यथास्थिति बनाए रखने वाली मानसिकता से लड़ना होगा।
  • आंतरिक समस्याओं के उदाहरण: भूमि सौदों में अधिकारियों द्वारा कथित गबन या खेल निधियों का नौकरशाही के विशेष लाभों के लिए उपयोग जैसे उदाहरण उस आंतरिक भ्रष्टाचार को दर्शाते हैं, जिसे “विश्व गुरु” की स्थिति बनाए रखने के लिए दूर करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

  • भारत की रणनीतिक संभावनाओं की अंतिम सफलता कुशल कूटनीति और आंतरिक सुधारों के आपसी समन्वय पर निर्भर करती है।
  • जहाँ पहले चार सिद्धांत अस्थिर विश्व में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, वहीं पाँचवाँ सिद्धांत—घरेलू पुनर्नवीकरण (Domestic Renewal)—सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि कमजोर अर्थव्यवस्था और भ्रष्ट आंतरिक प्रणालियाँ किसी भी विदेश नीति रणनीति को अस्थिर और अव्यवहार्य बना देंगी।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक एकजुटता से आगे बढ़कर व्यावहारिक रणनीतिक विस्तार की ओर परिवर्तित हुई है। भारत-अफ्रीका संबंधों के विकास तथा रणनीतिक लचीलेपन (Strategic Flexibility) के सिद्धांतों के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति

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