संदर्भ
एम्स (AIIMS) नई दिल्ली के एक अध्ययन में पाया गया है, कि एक वर्ष से कम आयु के बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम तीन वर्ष की आयु तक ऑटिज्म (autism) से संबंधित लक्षणों के जोखिम को बढ़ा सकता है।
स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म पर एम्स की रिपोर्ट:
- अध्ययन का केंद्र: 250 बच्चे, उनमें से 150 में समस्या पाई गई।
- मुख्य खोज: 0 से 3 वर्ष की आयु के बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम का 3 वर्ष की आयु तक ऑटिज्म के लक्षणों की शुरुआत के साथ एक व्यापक संबंध दिखाई देता है।
- ऑटिज्म की विशेषताएँ: विकासात्मक विकार जो सोचने, समझने, सामाजिक कौशल और दूसरों के साथ वार्ता करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
- हालाँकि अभी तक इसका सीधा ‘कारण-प्रभाव’ प्रमाण नहीं है, लेकिन एक मजबूत संबंध है जिसके लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है।
‘बच्चों में स्क्रीन टाइम’ के बारे में:
स्क्रीन टाइम वह समय है जो बच्चे फोन, टीवी, टैबलेट और कंप्यूटर जैसे उपकरणों का उपयोग करने में बिताते हैं।
वैज्ञानिक आधार: स्क्रीन विकासशील मस्तिष्क को किस प्रकार नुकसान पहुँचाती है?
- प्रारंभिक मस्तिष्क लचीलापन (0-3 वर्ष): आरंभिक तीन वर्षों में मस्तिष्क का तीव्र विकास और तंत्रिका तंत्र निर्माण होता है, जिससे यह चरण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
- इस आयु में मस्तिष्क “गीली मिट्टी” की तरह होता है; यह उस वातावरण का आकार ले लेता है जिसके संपर्क में आता है।
- ध्यान अवधि (Attention Span): तीव्र गति वाली और अत्यधिक उत्तेजक सामग्री मस्तिष्क को निरंतर संबंध खोजने के लिए प्रशिक्षित करती है।
- यह वास्तविक दुनिया की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने की बच्चे की क्षमता को कम कर सकता है।
- भाषा विकास: प्रारंभिक भाषा अधिग्रहण देखभाल करने वालों के साथ सक्रिय श्रवण क्षमता और द्वि-मार्गी संचार पर निर्भर करता है।
- निष्क्रिय स्क्रीन टाइम मौखिक वार्ता को कम करता है, जिससे बोलने में देरी और कमजोर भाषा कौशल विकसित हो सकता है।
- मेलाटोनिन (नींद विनियमन): स्क्रीन एक्सपोजर, विशेष रूप से रात में, नीली रोशनी उत्सर्जित करता है जो मेलाटोनिन (नींद हॉर्मोन) को दबा देती है।
- यह नींद प्रतिरूप को बाधित करता है, और मस्तिष्क के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
- डोपामाइन निर्भरता: कार्टून/शॉर्ट्स से निरंतर उत्तेजना डोपामाइन रिलीज लूप की ओर ले जाती है, जिससे इसका एडिक्शन हो जाता है।
- पैसिव लर्निंग (निष्क्रिय अधिगम): स्क्रीन बच्चों को “पैसिव लर्नर” बनाती है, जबकि माता-पिता के साथ बातचीत करना महत्त्वपूर्ण तंत्रिका तंत्र और भाषा कौशल का विकास करती है।
आधिकारिक दिशानिर्देश (WHO और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स):
- 0-18 महीने: जीरो स्क्रीन टाइम (कोई मोबाइल, टीवी या टैबलेट नहीं)।
- आदर्श रूप से 3 वर्ष तक: इष्टतम विकास के लिए किसी स्क्रीन टाइम की सिफारिश नहीं की जाती है।
- 3-5 वर्ष : प्रति दिन अधिकतम 1 घंटा केवल गुणवत्तापूर्ण सामग्री के लिए।
बढ़ते स्क्रीन टाइम के मूल कारण:
- पहुँच: सस्ते स्मार्टफोन और इंटरनेट डेटा।
- पारिवारिक संरचना में बदलाव: संयुक्त परिवारों (जहाँ कई रिश्तेदार बच्चे का ध्यान रख सकते थे) से एकल परिवारों और दुहरी आय वाले घरों की ओर बढ़ना।
- प्लेटफॉर्म डिजाइन: यूट्यूब/सोशल मीडिया “ऑटो-प्ले” विशेषताएँ, जो बच्चों को बांधे रखती हैं।
- कोविड के बाद का प्रभाव: शिक्षा का डिजिटलीकरण और मोबाइल उपकरणों की “ऑल-इन-वन” प्रकृति।
- शहरीकरण: शहरों में बाहरी खेल के मैदानों और पार्कों की कमी।
- माता-पिता की गलत धारणा: माता-पिता के काम करने या खाना पकाने के दौरान, बच्चों को व्यस्त रखने के लिए फोन का “डिजिटल बेबी सिटर” के रूप में उपयोग करना।
प्रमुख चुनौतियाँ:
- संज्ञानात्मक विकास: कमजोर याद रखने की क्षमता, खराब आलोचनात्मक चिंतन और निम्न ध्यान अवधि।
- शारीरिक स्वास्थ्य: बाह्य गतिविधियों की कमी के कारण मोटापा और कम आयु में चश्मे की आवश्यकता।
- भावनात्मक और व्यवहार संबंधी: क्रोध, चिंता और जिद्दी/चिड़चिड़ा होने की समस्याएँ।
- सामाजिक कौशल: साझा करना, सहयोग और अन्य बच्चों से बात करना सीखने में असमर्थता।
- शैक्षणिक: शॉर्ट-फॉर्म सामग्री में मिलने वाली “तत्काल संतुष्टि” की इच्छा के कारण पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई।
- डिजिटल अंतराल: उन लोगों के बीच का अंतर जो टेक्नोलॉजी का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, और उन लोगों के बीच जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और जिनकी तकनीकी तक पहुँच नहीं है।
सरकारी और संस्थागत पहल:
- कर्नाटक डिजिटल डिटॉक्स नीति, 2026: इसका उद्देश्य सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करना और बच्चों के स्क्रीन टाइम को 1 घंटे तक सीमित करना है।
- NEP-2020 / NCERT / CBSE: स्कूल पाठ्यक्रम में साइबर सुरक्षा और डिजिटल नागरिकता को शामिल करना।
- नो गैजेट ऑवर्स: कर्नाटक और केरल के स्कूलों द्वारा अपनाए गए मॉडल।
- खेलो इंडिया कार्यक्रम: स्क्रीन निर्भरता को कम करने के लिए शारीरिक खेलों को प्रोत्साहित करने पर सरकार का ध्यान।
आगे की राह:
- प्रभावी कार्यान्वयन: 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए ‘जीरो स्क्रीन टाइम’ के WHO और बाल रोग विशेषज्ञ के दिशानिर्देशों का कठोरता से पालन करें।
- माता-पिता की जागरूकता: माता-पिता को बच्चों को अकेले डिवाइस देने की बजाय उनके साथ समय बिताना चाहिए।
- सामुदायिक भागीदारी: जमीनी स्तर पर माता-पिता को शिक्षित करने के लिए आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का उपयोग करना।
- विनियमन: बच्चों को लक्षित करने वाले व्यसनी एल्गोरिदम को रोकने के लिए तकनीकी प्लेटफार्मों को विनियमित करना।
- अवसंरचना विकास : बाह्य अवसंरचना और खेल के मैदानों को मज़बूत बनाना।
महत्त्वपूर्ण शब्दावली
- डिजिटल बेबी सिटर: बच्चों को व्यस्त या शांत करने के लिए, सक्रिय देखभाल की जगह स्क्रीन या डिवाइस का प्रयोग करना।
- शुरुआती ब्रेन प्लास्टिसिटी: शुरुआती वर्षों में मस्तिष्क की अत्यधिक निर्माण क्षमता, जहाँ अनुभव न्यूरल विकास को बहुत ज़्यादा प्रभावित करते हैं।
- डोपामाइन निर्भरता चक्र: एक ऐसा चक्र, जिसमें तुरंत मिलने वाले डिजिटल पुरस्कार बार-बार डोपामाइन रिलीज़ करते हैं, जिससे स्क्रीन की ओर जाने का व्यवहार और मज़बूत होता है।
- निष्क्रिय सामग्री उपभोग: बिना किसी बातचीत या जुड़ाव के सामग्री देखना, जिससे सक्रिय अधिगम प्रक्रिया सीमित हो जाती है।
- डिजिटल डिटॉक्स: मानसिक एकाग्रता और स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए स्क्रीन के प्रयोग से जान-बूझकर लिया गया एक ब्रेक।
- एल्गोरिद्मिक व्यसन: एल्गोरिदम द्वारा संचालित संबंध, जो निरंतर व्यक्तिगत और ध्यान खींचने वाली सामग्री प्रदान करते हैं।
- संज्ञानात्मक विराम: मानसिक आराम या चिंतन का एक समय, जो मस्तिष्क को सूचना प्रोसेस करने और अपनी एकाग्रता वापस पाने का अवसर प्रदान करता है।
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मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम अब केवल जीवनशैली का मुद्दा नहीं है; यह एक गहन विकासात्मक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। बच्चों पर अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। इस चुनौती को कम करने के लिए व्यापक नीतिगत उपायों को सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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