Q. राष्ट्रीय औसत में गिरावट के बावजूद, भारत में बाल विवाह राज्यों और सामाजिक-आर्थिक समूहों में असमान रूप से जारी है। इस असमानता के लिए जिम्मेदार संरचनात्मक कारकों का विश्लेषण कीजिए और नीतिगत प्रतिबद्धताओं को सामाजिक परिवर्तन में बदलने के लिए आवश्यक संस्थागत हस्तक्षेपों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

December 27, 2025

GS Paper IIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • असमानता के लिए उत्तरदायी संरचनात्मक कारक।
  • सामाजिक परिवर्तन के लिए संस्थागत हस्तक्षेप।

उत्तर

जहाँ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण–5 के अनुसार बाल विवाह की राष्ट्रीय दर वर्ष 2015–16 के 27 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2019–21 में 23.3 प्रतिशत हो गई है, वहीं यह प्रगति देश भर में समान रूप से परिलक्षित नहीं होती। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में बनी हुई क्षेत्रीय विषमताएँ इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि समग्र स्तर पर हुआ सुधार अक्सर स्थानीय संरचनात्मक कमजोरियों तथा गहरे सामाजिक-आर्थिक अंतरालों को ढक देता है।

विषमता के लिए उत्तरदायी संरचनात्मक कारक

  • आर्थिक अभाव: सबसे निम्न आय वर्ग के परिवार प्रायः घरेलू आकार को सीमित करने और आर्थिक बोझ को कम करने के उद्देश्य से विवाह को एक प्रकार के ‘निपटान उपाय’ के रूप में अपनाते हैं।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण–5 के अनुसार, सबसे गरीब परिवारों की 40% किशोरियों की कम आयु में विवाह हो जाता हैं, जबकि सबसे अमीर परिवारों में यह आँकड़ा 8% है।
  • शैक्षिक बहिष्करण: माध्यमिक शिक्षा तक पहुँच की कमी एक ऐसी ‘रिक्तता’ उत्पन्न करती है, जहाँ किशोरियों के लिए विवाह ही एकमात्र सामाजिक उपलब्धि मानी जाती है।
    • उदाहरण: भारत में बिना शिक्षा प्राप्त 48% किशोरियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हुआ।
  • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: संवेदनशील क्षेत्रों में माता-पिता अल्पवयस्क किशोरियों के लिए विवाह को यौन हिंसा या सामाजिक असुरक्षा के विरुद्ध एक “रक्षात्मक ढाल” मानते हैं।
  • जलवायु संकट: पर्यावरणीय समस्याएँ और उससे उत्पन्न आर्थिक अस्थिरता संकटग्रस्त प्रवासन को जन्म देती है, जिसके परिणामस्वरूप बेटियों की “सुरक्षा” सुनिश्चित करने हेतु “दवाव में विवाह” किए जाते हैं।
  • पितृसत्तात्मक मानदंड: “पितृसत्ता पर आघात” से जुड़ी गहरी मान्यताएँ और बेटियों को पराया धन  मानने की धारणा कम आयु में विवाह को बढ़ावा देती है।
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की रिपोर्ट  ‘प्रगति के स्तर का आकलन’ के अनुसार  बिहार और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सामाजिक मानदंड प्रमुख कारक बने हुए हैं।
  • कानूनी अंतराल: व्यक्तिगत कानूनों की निरंतरता और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत दोषसिद्धि की कम दर कुछ क्षेत्रों में “दंडमुक्ति की संस्कृति” को जन्म देती है।

सामाजिक परिवर्तन के लिए संस्थागत हस्तक्षेप

  • सशर्त अंतरण: ऐसी नकद प्रोत्साहन योजनाओं का क्रियान्वयन, जो विद्यालय उपस्थिति से कठोरता से जुड़ी हों और 18 वर्ष की आयु के बाद विवाह को प्रोत्साहित करें।
    • उदाहरण: कन्याश्री प्रकल्प (संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त) शिक्षा में बने रहने हेतु छात्रवृत्तियाँ प्रदान करता है।
  • प्रभावी निगरानी: अग्रिम पंक्ति के कार्मिकों के माध्यम से “जोखिमग्रस्त” किशोरियों की पहचान और संभावित विवाहों की सूचना जिला मजिस्ट्रेट को देना।
    • उदाहरण: ओडिशा की अद्विका पहल में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किशोरियों का अनुकरण करती हैं और जीवन-कौशल प्रशिक्षण देती हैं।
  • सामुदायिक संवेदनशीलता: विवाह से परे बालिका के “मूल्य” के बारे में प्रचलित धारणा को बदलने के लिए धार्मिक नेताओं और स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: “बाल विवाह मुक्त भारत” अभियानों में पंचायतों की भूमिका से बाल-विवाह-मुक्त गाँवों की घोषणा।
  • अवसंरचना विकास: किशोरावस्था में प्रवेश कर रही लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के लिए स्कूलों में सुरक्षित परिवहन और कार्यात्मक शौचालयों की व्यवस्था करना।
    • उदाहरण: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान नामांकन बनाए रखने में विद्यालयी अवसंरचना की भूमिका पर बल देता है।
  • कानूनी अभिसरण: कठोर दंड सुनिश्चित करने और अपराधियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली कानूनी कमियों को दूर करने के लिए PCMA को POCSO अधिनियम के साथ एकीकृत करना।
    • उदाहरण: वर्ष 2021 का बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक समानता और लैंगिक न्याय हेतु वैधानिक आयु 21 वर्ष करने का लक्ष्य रखता है।
  • सशक्तीकरण केंद्र: ऐसे सुरक्षित स्थानों का निर्माण, जहाँ लड़कियाँ व्यावसायिक प्रशिक्षण और प्रजनन स्वास्थ्य जानकारी प्राप्त कर आर्थिक स्वायत्तता विकसित कर सकें।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यूनिसेफ के “जिला मॉडल” किशोरों के सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं ताकि गरीबी के अंतरपीढ़ीगत चक्र को तोड़ा जा सके।

निष्कर्ष

बाल विवाह की समस्या से निपटने के लिए “दंडात्मक प्रक्रिया” से “समग्र सशक्तीकरण” की ओर बदलाव आवश्यक है। आर्थिक प्रोत्साहनों को सशक्त शिक्षा और समुदाय-आधारित व्यवहार परिवर्तन के साथ जोड़कर भारत राज्य-स्तरीय अंतर को कम कर सकता है। वर्ष 2030 के सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक महिला को बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रगति के संभावित चालक के रूप में देखा जाए।

Despite a decline in national averages, child marriage in India continues to persist unevenly across States and socio-economic groups. Examine the structural factors responsible for this disparity and discuss the institutional interventions needed to translate policy commitments into social change. in hindi

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