Q. भारतीय जेलों में जाति-आधारित भेदभाव के ऐतिहासिक संदर्भ और औपनिवेशिक काल की प्रथाओं में इसके प्रभाव पर प्रकाश डालिए। सुकन्या शांता बनाम भारत संघ (वर्ष 2024) मामले में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के आलोक में, न्यायालय ने इन दीर्घकालिक भेदभावपूर्ण प्रथाओं को कैसे संबोधित किया? (15 अंक, 250 शब्द)

January 2, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ऐतिहासिक संदर्भ और औपनिवेशिक जड़ें
  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप: सुकन्या शांता बनाम भारत संघ (2024)।

उत्तर

भारतीय जेलों में जाति आधारित भेदभाव एक गंभीर संवैधानिक चुनौती बना हुआ है। अस्पृश्यता के उन्मूलन के बावजूद, कई राज्य कारागार नियमावली ने ऐतिहासिक रूप से जन्म के आधार पर श्रम और अलगाव को संस्थागत रूप दिया है, जो गरिमा और समानता के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

ऐतिहासिक संदर्भ और औपनिवेशिक जड़ें

  • आपराधिक जनजाति अधिनियम: औपनिवेशिक कानूनों ने कुछ समुदायों को “वंशानुगत अपराधी” करार दिया, जिसके कारण व्यवस्थित निगरानी और भेदभावपूर्ण कारावास प्रथाएँ प्रचलित हुईं, जो मनोवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों को जन्म देती हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम ने “जन्मजात अपराधी” की धारणा को संस्थागत रूप दिया, जिसका प्रभाव आज भी गैर-अधिसूचित जनजातियों पर है।
  • औपनिवेशिक नियमावली का निर्माण: ब्रिटिश प्रशासकों ने जेलों में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने और “उच्च जाति” के विद्रोह को रोकने के लिए स्थानीय जातिगत पूर्वाग्रहों को जेल नियमावली में संहिताबद्ध किया।
    • उदाहरण: वर्ष 1894 के जेल अधिनियम ने “स्थानीय रीति-रिवाजों” को आंतरिक प्रबंधन निर्धारित करने की अनुमति दी, जिससे जाति-आधारित अलगाव को प्रभावी रूप से संरक्षण मिला।
  • पदानुक्रमित श्रम आवंटन: परंपरागत रूप से नियमावली में खाना पकाने जैसे “पवित्रता-आधारित” कार्य उच्च जातियों को और कूड़ा बीनने जैसे “अपवित्र” कार्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों को सौंपे जाते थे।
  • स्थानिक पृथक्करण प्रथाएँ: औपनिवेशिक काल की अवसंरचना अक्सर कैदियों को उनकी कथित सामाजिक स्थिति या “आदतों” के आधार पर अलग-अलग वार्डों में विभाजित करने की अनुमति देती थी।
  • पवित्रता की विरासत: देशी धार्मिक प्रथाओं में “अहस्तक्षेप” की ब्रिटिश नीति का अर्थ था कि जेलों में जाति-आधारित खान-पान और स्वच्छता नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता था।
  • प्रशासनिक निष्क्रियता: वर्ष 1947 के बाद, कई राज्यों ने भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाए बिना ही औपनिवेशिक नियमावली को अपना लिया, जिसके परिणामस्वरूप दशकों तक असंवैधानिक प्रथाएँ चलती रहीं।

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप: सुकन्या शांता बनाम भारत संघ (वर्ष 2024)

  • नियमों को निरस्त करना: न्यायालय ने राज्य कारागार नियमावली में जाति आधारित श्रम विभाजन और पृथक्करण से संबंधित सभी प्रावधानों को असंवैधानिक तथा अमान्य घोषित किया।
  • गरिमा का अधिकार: न्यायालय ने फैसला सुनाया कि “जाति आधारित भेदभाव” अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
    • उदाहरण: मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि “जाति के आधार पर काम का वितरण” अनुच्छेद-17 के तहत निषिद्ध अस्पृश्यता का एक रूप है।
  • जबरन श्रम पर रोक: न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि हाशिए पर पड़ी जातियों को “निम्न-स्तरीय” सफाई कार्य में जबरन लगाना अनुच्छेद-23 के तहत “बेगार” या जबरन श्रम है।
  • जाति संबंधी कॉलम पर प्रतिबंध: न्यायालय ने निर्देश दिया कि कैदियों के रजिस्टरों में “जाति संबंधी कॉलम” को हटा दिया जाए ताकि जेल अधिकारियों द्वारा भेदभाव को रोका जा सके।
    • उदाहरण: राज्यों को आदेश दिया गया कि वे जेल प्रवेश रजिस्टरों को संशोधित करें और उनमें से कैदी की जाति का कोई भी उल्लेख हटा दें।
  • नियमावली में संशोधन का निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को वर्ष 2016 की आदर्श कारागार नियमावली में बदलाव करने का आदेश दिया और राज्यों से भी ऐसा ही करने का आग्रह किया।
  • स्वयं निगरानी: न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए इन सुधारों की प्रगति की निगरानी का अधिकार सुरक्षित रखा कि “वास्तविक” भेदभाव जारी न रहे।
    • उदाहरण: निर्णय में इस बात पर जोर दिया गया कि “प्रथागत प्रथाएँ” एक समतावादी समाज के संवैधानिक दायित्व को दरकिनार नहीं कर सकतीं।

निष्कर्ष

सुकन्या शांता का निर्णय भारतीय कारागार प्रणाली के विऔपनिवेशीकरण में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। जेलों के भीतर ‘जाति की कानूनी संरचना’ को ध्वस्त करके, सर्वोच्च न्यायालय ने जेलों को सामाजिक पुनरुत्पादन के स्थलों से वास्तविक पुनर्वास संस्थानों में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अब प्रभावी सुधार जेल कर्मचारियों की संवेदनशीलता और कठोर प्रशासनिक निगरानी पर निर्भर करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘जातिगत भेदभाव’ का साया अंततः जेलों से मिट जाए।

Highlight the historical context of caste-based discrimination in Indian prisons and its roots in colonial-era practices. In light of the recent Supreme Court intervention in Sukanya Shantha vs Union of India (2024) case, how did the Court address these longstanding discriminatory practices?  in hindi

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