संदर्भ
हाल ही में केरल तट के निकट एमएससी एल्सा 3 (MSC Elsa 3) और एमवी वान हाई 503 (MV Wan Hai 503) जहाज संबंधी दुर्घटनाओं (Shipwrecks) ने तेल रिसाव (Oil Spill) के गंभीर जोखिमों को उजागर किया है, जिसके परिणामस्वरूप प्राधिकरणों ने ‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना (OSCP)’ को तैयार करने के प्रयासों को तीव्र कर दिया।
संबंधित तथ्य
OSCP में हाइड्रोडायनामिक अध्ययन, ऑयल स्पिल मॉडलिंग, और नेट पर्यावरणीय लाभ का विश्लेषण किया जाता है।
‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ (OSCP) के बारे में
- ‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ (OSCP) एक राज्य-स्तरीय आपातकालीन प्रतिक्रिया ढाँचा है, जिसका उद्देश्य केरल तटरेखा के साथ समुद्री तेल रिसाव आपदाओं की रोकथाम, प्रबंधन और शमन करना है।
- प्रस्तुतकर्ता: ‘केरल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ (KSPCB) ने ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण’ (NGT) के निर्देशों के तहत OSCP का मसौदा तैयार किया गया है।
- नोडल निकाय: भारतीय तटरक्षक, समुद्री तेल प्रदूषण प्रतिक्रिया और कार्यान्वयन हेतु समर्थन के लिए केंद्रीय समन्वय एजेंसी के रूप में कार्य करेगा।
- क्षेत्राधिकार : योजना में निम्नलिखित शामिल है:
- केरल तटरेखा से 12 नौटिकल मील (24 किमी.) के अंतर्गत होने वाले समुद्री तेल रिसाव।
- नदीय तंत्र, जो 40 किमी. अंदर तक या जहाँ तक ज्वारीय प्रभाव स्पष्ट हो विस्तारित हैं।
- OSCP के प्रमुख प्रावधान
- पर्यावरणीय मानचित्रण: यह योजना एनवायरनमेंटल सेंसिटिव इंडेक्स (ESI) जोन, पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों, मत्स्यन क्षेत्र और संवेदनशील समुद्री आवासों का मानचित्रण करती है।
- आपातकालीन प्रतिक्रिया: यह संकट-प्रबंधन प्रोटोकॉल, कमांड सीरीज, विभागीय जिम्मेदारियाँ और तेल रिसाव घटनाओं के दौरान समुद्री आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र प्रदान करती है।
एनवायरनमेंटल सेंसिटिव इंडेक्स (ESI) जोन्स के बारे में
- एनवायरनमेंटल सेंसिटिव इंडेक्स (ESI) जोन्स ऐसे मानचित्रित तटीय और समुद्री क्षेत्र होते हैं, जिन्हें तेल रिसाव और अन्य समुद्री प्रदूषण घटनाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- ये प्राधिकरणों को पहचानने में सहायता करते हैं:
- पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र।
- तेल रिसाव के दौरान प्राथमिकता से संरक्षण की आवश्यकता वाले क्षेत्र।
- उपयुक्त प्रतिक्रिया और सफाई रणनीतियाँ।
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- तटरेखा की सफाई: यह ढाँचा तटरेखा सफाई प्रक्रियाओं, उपकरण तैनाती, तेल-विशेषताओं के आकलन, और टैक्टिकल बूमिंग/स्थल प्रतिक्रिया संचालन का विवरण प्रदान करता है।
- वन्यजीव संरक्षण: OSCP में वन्यजीव बचाव योजनाएँ, जहाजों के लिए प्रदूषण आपातकालीन दिशा-निर्देश और तेल रिसाव के दौरान जैव विविधता संरक्षण के लिए शमन उपाय शामिल हैं।
केरल-विशिष्ट ‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ की आवश्यकता
- बढ़ते समुद्री जोखिम: केरल की 590-किमी. लंबी तटरेखा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों के निकट स्थित है, जिससे टैंकर दुर्घटनाओं और खतरनाक कार्गो रिसाव के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
- 14 जिलों में से 9 जिले तेल रिसाव-प्रवण हैं।
- हालिया जहाज दुर्घटनाएँ: MSC Elsa 3 के डूबने (जिसमें खतरनाक कार्गो और कैल्शियम कार्बाइड था) के कारण समन्वित रिसाव-प्रतिक्रिया ढाँचे की अनुपस्थिति है।
- तटीय प्रदूषण का खतरा: प्लास्टिक पेलेट्स (नर्डल्स) और खतरनाक पदार्थ तट पर आ गए, जिससे मत्स्यपालन, पर्यटन, मैंग्रोव, और समुद्री जैव विविधता पर खतरा उत्पन्न हुआ है।
- आपदा तैयारी में कमी: उपकरणों के समन्वित डेटाबेस, तटरेखा प्रतिक्रिया तंत्र और अंतर-एजेंसी समन्वय की कमी के कारण प्रभावी नियंत्रण और सफाई प्रयासों में देरी हुई है।
‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ का महत्त्व
- तीव्र प्रतिक्रिया तंत्र: एक पूर्व-निर्धारित कमांड संरचना और संसाधन डेटाबेस तेल रिसाव के दौरान तेजी से नियंत्रण, सफाई और आपातकालीन समन्वय को सक्षम बनाएँगे।
- तटीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण: यह योजना पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता देती है, जिससे कोरल पारिस्थितिकी तंत्र, मैंग्रोव, मत्स्यपालन और तटीय आजीविकाओं को प्रदूषण से होने वाली क्षति से सुरक्षित किया जा सके।
- वैज्ञानिक रिसाव प्रबंधन: हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग, समुद्री संवेदनशीलता मानचित्रण और पर्यावरणीय लाभ विश्लेषण साक्ष्य-आधारित आपदा प्रतिक्रिया योजना को सुदृढ़ करेंगे।
- संस्थागत समन्वय: ‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ KSPCB, बंदरगाह, हार्बर, मत्स्य विभाग, आपदा प्राधिकरणों, और भारतीय तटरक्षक के मध्य समन्वय को मजबूत करता है।
- राष्ट्रीय ढाँचे के साथ अनुपालन: यह योजना केरल की तैयारी को नेशनल ऑयल स्पिल डिजास्टर कंटिंजेंसी प्लान (NOS-DCP) के वर्ष 2015, वर्ष 2018 और वर्ष 2024 के दिशा-निर्देशों के साथ संरेखित करती है।
‘राष्ट्रीय तेल रिसाव आपदा आकस्मिक योजना’ (NOS-DCP) के बारे में
- ‘राष्ट्रीय तेल रिसाव आपदा आकस्मिक योजना’ (NOS-DCP) भारत का शीर्ष ढाँचा है, जो समुद्री क्षेत्रों में तेल रिसाव घटनाओं के लिए तैयारी, समन्वय, और प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है।
- निर्माण: यह योजना भारतीय तटरक्षक (ICG) द्वारा तैयार की गई और वर्ष 1993 में सचिवों की समिति द्वारा अनुमोदित की गई।
- आवधिक संशोधन: इस योजना में समय-समय पर संशोधन किए गए ताकि यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप बनी रहे।
- विस्तारित ढाँचा: वर्ष 2014–15 के संशोधित ढाँचे में हैजर्डस एंड नॉक्सियस सब्स्टेन्सेज (HNS) घटनाओं और हितधारकों द्वारा ऑनलाइन कंटिंजेंसी प्लान/आकस्मिक योजना को प्रस्तुत किया गया।
- नोडल कार्यान्वयन निकाय: भारतीय तटरक्षक भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर तेल रिसाव तैयारी और प्रतिक्रिया के कार्यान्वयन, समन्वय तथा निगरानी के लिए राष्ट्रीय नोडल प्राधिकरण है।
- अध्यक्ष: भारतीय तटरक्षक के महानिदेशक NOS-DCP समिति के अध्यक्ष होते हैं।
- NOS-DCP के प्रमुख प्रावधान
- स्तरीय प्रतिक्रिया तंत्र: योजना एक तीन-स्तरीय प्रतिक्रिया संरचना स्थापित करती है:
- टियर I – स्थानीय बंदरगाह/ऑपरेटर प्रतिक्रिया
- टियर II – क्षेत्रीय सहायता
- टियर III – राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय समर्थन।
- इंसिडेंट कमांड सिस्टम: यह ‘मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर्स’ (MRCCs) के माध्यम से प्रभावी आपातकालीन प्रतिक्रिया और संचार के लिए समन्वित कमांड तंत्र स्थापित करता है।
- हितधारक: बंदरगाह और तेल प्रबंधन एजेंसियाँ (OHAs) को स्वीकृत कंटिंजेंसी प्लान, प्रशिक्षित मानव संसाधन और प्रदूषण नियंत्रण उपकरण बनाए रखना अनिवार्य है।
- पर्यावरण संरक्षण उपाय: यह ढाँचा तीव्र नियंत्रण, उपयोग, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और प्रदूषकों की पहचान कर कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल देता है।
- रिपोर्टिंग और समन्वय: समुद्री क्षेत्रों में सभी तेल रिसाव घटनाओं की सूचना तुरंत तटरक्षक MRCCs को दी जानी चाहिए।
- क्षमता निर्माण: यह योजना नियमित मॉक ड्रिल और राष्ट्रीय स्तर के अभ्यास जैसे नेशनल पॉल्यूशन रिस्पॉन्स एक्सरसाइज (NATPOLREX) को अनिवार्य करती है, ताकि तैयारी तथा अंतर-एजेंसी समन्वय को सुदृढ़ किया जा सके।
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निष्कर्ष
‘तेल रिसाव आकस्मिकता योजना’ (OSCP) वैज्ञानिक तैयारी, तीव्र प्रतिक्रिया तंत्र और समन्वित संस्थागत कार्रवाई के माध्यम से केरल की तटीय लचीलेपन को सुदृढ़ कर सकता है, जिससे बढ़ते समुद्री प्रदूषण खतरों का प्रभावी रूप से समाधान किया जा सके।