भारत में विद्युत-जनित अग्नि संबंधी जोखिम

13 May 2026

संदर्भ

मई 2026 में दिल्ली में लगी आग की एक बड़ी घटना, जो संभवतः एयर-कंडीशनर से संबंधित ‘इलेक्ट्रिक फॉल्ट’ के कारण उत्पन्न हुई, ने भारत में बढ़ते विद्युत-जनित अग्नि संबंधी जोखिम को लेकर चिंताओं को पुनः बढ़ा दिया है।

विद्युत-जनित अग्नि के बारे में

  • विद्युत-जनित अग्नि वह होती है, जो ‘इलेक्ट्रिक फॉल्ट’, जैसे- शॉर्ट सर्किट, ओवरलोडिंग, खराब वायरिंग, अत्यधिक तापमान या खराब विद्युत उपकरणों के कारण उत्पन्न होती हैं।

विद्युत-जनित अग्नि की घटनाओं की स्थिति

  • शहरी आग में विद्युत दोषों की उच्च हिस्सेदारी: भारत में शहरी आग की घटनाओं में इलेक्ट्रिक फॉल्ट’ का बड़ा हिस्सा होता है।
  • आग की घटनाएँ और मौतों में वृद्धि: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने वर्ष 2022 में 7,566 आग की घटनाएँ और 7,435 मौतें दर्ज कीं, जिनमें विद्युत शॉर्ट सर्किट प्रमुख कारण रहा।
  • विद्युत कारणों का कम रिपोर्ट किया जाना: कई मामलों को “अन्य” श्रेणी में रखा जाता है, जिससे वास्तविक विद्युत कारणों की कम रिपोर्टिंग हुई है।
  • विद्युत मांग में रिकॉर्ड वृद्धि: अत्यधिक गर्मी की स्थिति के बीच अप्रैल 2026 में भारत की शीर्ष विद्युत माँग 256.11 गीगावाट तक पहुँच गई।
  • शीतलन भार का विस्तार: शीतलन की माँग पहले से ही लगभग 50 गीगावाट के शीर्ष स्तर पर है और वर्ष 2035 तक 180 गीगावाट तक बढ़ सकती है।
    • शीतलन माँग का अर्थ: शीतलन माँग से आशय एयर-कंडीशनर, कूलर और रेफ्रिजरेशन प्रणालियों जैसे उपकरणों को चलाने के लिए आवश्यक विद्युत से है।
  • एयर-कंडीशनर की संख्या में तीव्र वृद्धि: भारत में वर्ष 2025 में 15.4 मिलियन एयर-कंडीशनर बेचे गए।
    • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान: भारत में स्थापित एयर-कंडीशनर का आधार वर्ष 2024 में 93 मिलियन इकाइयों से बढ़कर वर्ष 2030 तक 240 मिलियन इकाइयों तक पहुँचने का अनुमान है।

विद्युत-जनित अग्नि के मुख्य कारण 

  • सामान्य तकनीकी विफलता: सामान्य रूप से तकनीकी विफलता में शॉर्ट सर्किट, ओवरलोड, ढीले कनेक्शन, आर्क फाल्ट्स, ग्राउंड फाल्ट्स और पुराने होते उपकरण शामिल हैं।
  • घटिया विद्युत घटकों का उपयोग: नकली तार, खराब गुणवत्ता के ब्रेकर, कम क्षमता वाले सर्किट और दोषपूर्ण ‘स्विचबोर्ड टर्मिनेशन’ जोखिम को बढ़ाते हैं।
  • ढीले विद्युत जोड़ों के कारण ताप का उत्पन्न होना: ढीले विद्युत जोड़ धीरे-धीरे ताप उत्पन्न कर सकते हैं और आग लगने से पहले इन्सुलेटर को जला सकते हैं।
  • पुरानी विद्युत अवसंरचना की संवेदनशीलता
    • पुरानी घरेलू वायरिंग प्रणालियाँ: पुराने आवासीय वायरिंग सिस्टम मूलतः कम-लोड वाले उपकरणों जैसे पंखे और बल्ब के लिए डिजाइन किए गए थे।
      • यूरोपीय घरेलू विद्युत सुरक्षा मंच (FEEDS) के अनुसार, यूरोपीय संघ में लगभग आधे आवासीय भवनों में ऐसी विद्युत वायरिंग प्रणालियाँ हैं, जो 30 वर्ष से अधिक पुरानी हैं और कभी नवीनीकृत नहीं की गई हैं।
    • विद्युत सर्किटों का धीमा उन्नयन: तीव्र विद्युतीकरण और उपकरणों की वृद्धि ने घरेलू सर्किटों के नवीनीकरण और उन्नयन को पीछे छोड़ दिया है।
    • खराब रखरखाव और स्थापना गुणवत्ता: खराब गुणवत्ता और अनुचित रूप से रखरखाव आग की संवेदनशीलता को और बढ़ाती हैं।

संस्थागत और विनियामक से संबंधित अंतराल 

  • आवधिक निरीक्षण व्यवस्था का अभाव: भारत में आवासीय विद्युत स्थापनाओं के लिए मजबूत आवधिक निरीक्षण व्यवस्था का अभाव है।
  • आधुनिक अग्नि-सुरक्षा उपकरणों की कमी: आर्क-फॉल्ट सर्किट इंटरप्टर (AFCIs), जो वर्ष 1999 से संयुक्त राज्य अमेरिका के घरों में अनिवार्य रूप से लागू हैं, भारत के अधिकांश आवासों में अनुपस्थित हैं।
    • आर्क-फॉल्ट सर्किट इंटरप्टर (AFCIs): ये विद्युत सुरक्षा उपकरण हैं, जो खतरनाक विद्युत आर्क का पता लगाकर स्वचालित रूप से बिजली की आपूर्ति बंद कर देते हैं, ताकि आग लगने की घटना को रोका जा सके।
  • अग्नि और फॉरेंसिक अवसंरचना का अभाव: भारत में अग्नि अवसंरचना और फॉरेंसिक जाँच क्षमता की अत्यधिक कमी है।
  • अपर्याप्त अग्नि-संबंधी डेटा प्रणालियांँ: संगठित और समन्वित अग्नि डेटाबेस का अभाव साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को कमजोर करता है।

विद्युत-जनित अग्नि से निपटने हेतु पहलें 

  • विद्युत-जनित अग्नि सुरक्षा पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देश
    • विद्युत लोड ऑडिट: ओवरलोडिंग और असुरक्षित विद्युत उपयोग की पहचान के लिए नियमित विद्युत लोड ऑडिट करना।
      • अग्नि-रोधी विद्युत अवसंरचना:फ्लेम-रेटार्डेंट वायरिंग’, उच्च गुणवत्ता वाले विद्युत घटकों के उपयोग को सुनिश्चित करना।
      • स्वचालित अग्नि पहचान प्रणाली: धुआँ डिटेक्टर, फायर अलार्म और स्वचालित स्प्रिंकलर सिस्टम स्थापित करना ताकि आग का शीघ्र पता लगाया जा सके और समय पर प्रतिक्रिया की जा सके।
      • विद्युत ओवरलोडिंग की रोकथाम: ओवरलोडेड सर्किट, अवैध वायरिंग और घटिया विद्युत उपकरणों के उपयोग से बचना।
      • आपातकालीन तैयारी उपाय: नियमित निकासी अभ्यास आयोजित करना और भवन-स्तरीय आपदा प्रबंधन योजनाएँ बनाना।
    • राष्ट्रीय विद्युत सुरक्षा मानक: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने सुरक्षित विद्युत स्थापनाओं और प्रथाओं के लिए राष्ट्रीय विद्युत संहिता (NEC) को SP 30: 2023 के माध्यम से जारी किया है।
    • SP 30:2023: यह नवीनतम राष्ट्रीय विद्युत संहिता है, जो विद्युत डिजाइन, स्थापना, संचालन और रखरखाव के लिए मानक निर्धारित करती है, ताकि विद्युत सुरक्षा और अग्नि रोकथाम में सुधार हो सके।
      • अग्नि और जीवन सुरक्षा प्रावधान: राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC), 2016 का भाग 4 भवनों में अग्नि और जीवन सुरक्षा उपायों से संबंधित है।

अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएँ 

  • अनिवार्य निरीक्षण प्रणाली: जापान और दक्षिण कोरिया ने अनिवार्य आवधिक निरीक्षण प्रणाली लागू की, जिसके परिणामस्वरूप आग की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।
  • उभरते विद्युत जोखिमों की पहचान: यूरोपीय संघ (EU) के वर्ष 2024 भवन ऊर्जा प्रदर्शन निदेश के रेसिटल 36 (Recital 36) में हीट पंप, सौर फोटोवोल्टिक, बैटरियाँ और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जर को अग्नि-सुरक्षा जोखिम के रूप में मान्यता दी गई है।
  • स्मार्ट निगरानी प्रौद्योगिकियाँ: संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘टिंग’ सेंसर जैसे स्मार्ट निगरानी उपकरण सूक्ष्म आर्किंग का पता लगाते हैं और आग लगने से पहले उपयोगकर्ताओं को चेतावनी देते हैं।

आगे की राह

  • विद्युत सुरक्षा मानकों का सुदृढ़ीकरण
    • अनिवार्य विद्युत-गुणवत्ता निगरानी: अस्पतालों, ईवी-चार्जिंग हब और वाणिज्यिक परिसरों जैसे उच्च-लोड भवनों में हार्मोनिक-अनुपालन और विद्युत-गुणवत्ता निगरानी को अनिवार्य बनाया जाए।
    • उन्नत सुरक्षा उपकरणों को अपनाना: आवासीय भवनों में आर्क-फॉल्ट सर्किट इंटरप्टर (AFCIs) और अन्य आधुनिक सुरक्षा उपकरणों को अपनाने को बढ़ावा दिया जाए।
  • आवधिक निरीक्षण और पुनर्संरचना
    • अनिवार्य सुरक्षा निरीक्षण: पुरानी विद्युत प्रणालियों के लिए, विशेषकर सौर पैनल, ईवी चार्जर या उच्च-लोड उपकरणों की स्थापना के बाद, अनिवार्य आवधिक निरीक्षण शुरू किए जाएँ।
    • पुरानी विद्युत अवसंरचना का उन्नयन: पुराने भवनों में ‘री-वायरिंग’ और लोड-क्षमता उन्नयन को प्रोत्साहित किया जाए।
  • विद्युत-जनित अग्नि फॉरेंसिक तंत्र: प्रमुख विद्युत-जनित अग्नि की घटनाओं के लिए पारदर्शी पश्च-घटना फॉरेंसिक जांच तंत्र विकसित किया जाए, जैसे:
    • यूनाइटेड किंगडम का मरीन दुर्घटना जाँच शाखा (MAIB) और
    • संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड (NTSB) मॉडल, ताकि तकनीकी विफलताओं की व्यवस्थित पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
  • समन्वित राष्ट्रीय विद्युत-जनित अग्नि डेटाबेस: अग्नि सेवा निदेशालय (DFS), नगर अग्निशमन दल (MFBs), राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के बीच डेटा का एकीकरण तथा मानकीकरण किया जाए, ताकि साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और जोखिम मानचित्रण में सुधार हो सके।
  • उपभोक्ता जागरूकता और निवारक उपाय
    • प्रमाणित विद्युत उत्पादों का उपयोग: ISI द्वारा चिह्नित विद्युत उत्पादों के उपयोग और भारी उपकरणों के लिए उचित सर्किट निर्माण को प्रोत्साहित किया जाए।
    • नियमित रखरखाव और तापीय स्कैनिंग: आवधिक ‘थर्मोग्राफी स्कैन’ और वार्षिक ‘एयर-कंडीशनर सर्विसिंग’ को बढ़ावा दिया जाए।
    • प्रारंभिक चेतावनी संकेतों की जागरूकता: प्रकाश और जलने की गंध जैसे चेतावनी संकेतों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाई जाए।

निष्कर्ष

बढ़ते तापमान और बढ़ती विद्युत माँग के कारण भारत की पुरानी होती विद्युत अवसंरचना पर दबाव बढ़ रहा है, ऐसे में आवश्यकता है कि छोटी कमियों के बड़े आपदाओं में बदलने से पूर्व एक निवारक विद्युत सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाए।

भारत में विद्युत-जनित अग्नि संबंधी जोखिम

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