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भारत में शहरी अग्नि सुरक्षा

26 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में शहरी भारत में हुई आग की घटनाओं (दिल्ली अग्निकांड, लखनऊ वाणिज्यिक परिसर के अग्निकांड) ने भवन अग्नि सुरक्षा में मौजूद प्रणालीगत कमियों को उजागर किया है, जिनमें भवन संहिताओं का कमजोर अनुपालन, तैयारी का अभाव, अग्निशमन पहुँच की अपर्याप्तता तथा भवनों में असुरक्षित संशोधन शामिल हैं।

भारत में शहरी अग्नि सुरक्षा के बारे में

  • शहरी अग्नि सुरक्षा से तात्पर्य उन उपायों से है, जिनका उद्देश्य सुरक्षित भवनों, प्रभावी विनियमों तथा आपातकालीन तैयारी के माध्यम से शहरों में अग्नि जोखिमों की रोकथाम, नियंत्रण तथा उनसे निपटना है।
    • तीव्र शहरीकरण, उच्च घनत्व वाली बस्तियों तथा वाणिज्यिक गतिविधियों के विस्तार ने भारतीय शहरों में अग्नि जोखिमों को बढ़ा दिया है।

भारतीय शहर अग्नि आपदाओं के प्रति संवेदनशील क्यों हैं?

  • असुरक्षित भवन डिजाइन एवं निर्माण पद्धतियाँ
    • कई शहरी भवनों में पर्याप्त अग्नि-प्रतिरोधी डिजाइन, आपातकालीन निकास तथा सुरक्षा योजना का अभाव होता है, जिससे आपातकाल के दौरान निकासी कठिन हो जाती है।
    • खराब निर्माण पद्धतियाँ तथा पुरानी संरचनाएँ आग के प्रसार की गति एवं तीव्रता को बढ़ा देती हैं।
  • एकल सीढ़ी प्रणाली पर निर्भरता
    • अनेक भवन निकासी के लिए केवल एक सीढ़ी पर निर्भर रहते हैं, जो आग लगने पर धुएँ, अत्यधिक तापमान तथा लपटों के कारण उपयोग योग्य नहीं रहती।
    • वैकल्पिक निकास मार्गों का अभाव लोगों को भवन के भीतर फँसा देता है तथा बचाव कार्यों में विलंब करता है।
  • अपर्याप्त वेंटिलेशन एवं धूम्र नियंत्रण तंत्र
    • अपर्याप्त वेंटिलेशन प्रणालियाँ भवनों के भीतर विषैले धुएँ एवं गैसों को तेजी से एकत्र होने देती हैं।
    • शहरी आग की घटनाओं में धुआँ प्रायः लपटों के प्रत्यक्ष संपर्क की तुलना में अधिक मृत्यु का कारण बनता है।
  • अग्नि-प्रतिरोधी खंडों का अभाव
    • कई भवनों को अग्नि-प्रतिरोधी खंडों में विभाजित नहीं किया गया है, जो लपटों के प्रसार को सीमित कर सकें।
    • अग्नि-प्रतिरोधी खंडों के अभाव में आग शीघ्र ही पूरे तलों में फैल जाती है तथा निकासी के लिए उपलब्ध समय कम हो जाता है।
  • असुरक्षित भवन अग्रभाग एवं बाहरी संरचनाएँ
    • प्लास्टिक पैनल, होर्डिंग तथा असुरक्षित क्लैडिंग जैसी ज्वलनशील सामग्री भवन के अग्रभाग से आग फैलने के जोखिम को बढ़ा देती है।
    • बाह्य आग ऊर्ध्वाधर दिशा में विभिन्न तलों तक फैल सकती है तथा अग्निशमन कार्यों को अधिक जटिल बना देती है।
  • अग्नि सुरक्षा विनियमों का कमजोर प्रवर्तन
    • अग्नि अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC), भवन संबंधी सुरक्षा मानकों का अनुपालन न होना शहरों में एक प्रमुख चिंता बना हुआ है।
    • नियमित निरीक्षण एवं रखरखाव का अभाव अग्नि रोकथाम प्रणालियों की प्रभावशीलता को कम कर देता है।
  • घने शहरी क्षेत्रों में अग्निशमन कर्मियों की अपर्याप्त पहुँच
    • संकीर्ण सड़कें, अतिक्रमण तथा सड़क किनारे पार्किंग आपातकाल के दौरान अग्निशमन वाहनों की आवाजाही को बाधित करते हैं।
    • पहुँच में विलंब होने से प्रभावी कार्रवाई प्रारंभ होने से पहले ही आग गंभीर रूप धारण कर लेती है।
  • अनियोजित शहरीकरण एवं मिश्रित भूमि उपयोग
    • तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण उच्च घनत्व वाली बस्तियों में वृद्धि हुई है तथा आवासीय भवनों को असुरक्षित रूप से वाणिज्यिक परिसरों में परिवर्तित किया जा रहा है।
    • ऐसे परिवर्तन प्रायः अग्नि सुरक्षा अवसंरचना तथा निकासी व्यवस्थाओं को उन्नत किए बिना ही किए जाते हैं।

प्रमुख अग्नि सुरक्षा सिद्धांत

  • अग्नि निकास मार्ग
    • अग्नि निकास मार्ग प्राथमिक जीवनरक्षक अवसंरचना हैं, जो आपातकाल के दौरान त्वरित एवं सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करते हैं।
    • स्पष्ट गलियारे, धुआँ-रहित सीढ़ियाँ, अग्नि-प्रतिरोधी द्वार तथा अवरोध-रहित निकास मृत्यु को रोकने तथा फ्लैशओवर से पहले निकासी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
  • अग्नि-प्रतिरोधी खंड
    • अग्नि-प्रतिरोधी खंड विभाजन में भवन को छोटे-छोटे अग्नि-प्रतिरोधी क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है, ताकि लपटों एवं धुएँ की गति को सीमित किया जा सके।
    • यह आग को नियंत्रित रखने में सुधार करता है, निकासी के लिए अतिरिक्त समय प्रदान करता है तथा प्रभावी अग्निशमन कार्यों में सहायता करता है।
  • स्प्रिंकलर प्रणाली
    • स्वचालित स्प्रिंकलर प्रणाली ताप को नियंत्रित करके तथा लपटों के तीव्र प्रसार को रोककर प्रारंभिक अवस्था में ही आग को नियंत्रित करती है।
    • इसकी प्रभावशीलता उचित स्थापना, नियमित परीक्षण तथा रखरखाव पर निर्भर करती है, ताकि आपातकाल के दौरान इसकी कार्यक्षमता सुनिश्चित की जा सके।
  • दूसरी सीढ़ी’ की व्यवस्था
    • दूसरी सीढ़ी अग्नि आपातकाल के दौरान एक वैकल्पिक निकासी मार्ग के रूप में कार्य करती है तथा केवल एक निकास पर निर्भरता को कम करती है।
    • यह विशेष रूप से मिश्रित उपयोग वाले भवनों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जहाँ आवासीय संरचनाओं को कार्यालयों अथवा कोचिंग केंद्रों जैसे वाणिज्यिक परिसरों में परिवर्तित कर दिया जाता है।
  • अग्नि-प्रतिरोधी सामग्री
    • अज्वलनशील निर्माण सामग्री का उपयोग आग के फैलने की गति को कम करता है तथा संरचनात्मक सुरक्षा में सुधार करता है।
    • अग्नि-रोधी दीवारें, छतें तथा आंतरिक परिष्करण सामग्री क्षति को सीमित करने तथा भवन में उपस्थित लोगों की सुरक्षा करने में सहायता करती हैं।
  • धूम्र प्रबंधन प्रणाली
    • वेंटिलेशन एवं धुआँ निष्कर्षण प्रणालियों के माध्यम से प्रभावी धुआँ नियंत्रण भवनों के भीतर विषैली गैसों के संचय को बाधित करता है।
    • उचित धूम्र प्रबंधन दृश्यता में सुधार करता है, निकासी को सुगम बनाता है तथा अग्निशमन कर्मियों को बचाव कार्यों में सहायता प्रदान करता है।
  • नियमित अग्नि सुरक्षा लेखापरीक्षण
    • समय-समय पर किए जाने वाले अग्नि सुरक्षा लेखापरीक्षण सुरक्षा मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करते हैं तथा आपदा घटित होने से पूर्व संभावित जोखिमों की पहचान करते हैं।
    • अलार्म, अग्निशामक यंत्रों तथा विद्युत प्रणालियों का नियमित निरीक्षण निवारक अग्नि प्रबंधन को सुदृढ़ बनाता है।
  • आपातकालीन तैयारी एवं प्रशिक्षण
    • अग्निशमन अभ्यास तथा जन-जागरूकता कार्यक्रम समुदाय की आपातकालीन तैयारी में सुधार करते हैं तथा आपातकाल के दौरान सही प्रतिक्रिया सुनिश्चित करते हैं।
    • प्रशिक्षित व्यक्ति शीघ्र निकासी कर सकते हैं तथा घबराहट के कारण होने वाली जनहानि को कम कर सकते हैं।

भारत में प्रमुख अग्नि सुरक्षा कमियाँ

  • अग्नि अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC) के अनुपालन का अभाव
    • कई भवन अनिवार्य अग्नि अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC) के बिना संचालित होते हैं अथवा सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करते हैं।
    • इसके कारण अग्नि जोखिमों के बावजूद असुरक्षित भवन संचालित होते रहते हैं।
  • भवन के उपयोग में परिवर्तन
    • आवासीय भवनों को प्रायः अग्नि सुरक्षा अवसंरचना को उन्नत किए बिना वाणिज्यिक परिसरों में परिवर्तित कर दिया जाता है।
    • ऐसे परिवर्तन अधिभोग भार को बढ़ाते हैं तथा निकासी संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
  • अतिक्रमण एवं अवरोध
    • अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक पहुँच मार्गों को अवरुद्ध कर देते हैं।
    • अग्निशमन वाहन एवं बचाव दल प्रभावित भवनों तक शीघ्र पहुँचने में कठिनाई का सामना करते हैं।
  • संकीर्ण सड़कें एवं खराब पहुँच
    • भीड़भाड़ वाली शहरी संरचना तथा संकीर्ण मार्ग अग्निशमन वाहनों की आवाजाही में विलंब करती हैं।
    • पहुँच में विलंब होने से बचाव कार्य प्रारंभ होने से पूर्व ही आग नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
  • अग्नि सुरक्षा प्रणालियों का खराब रखरखाव
    • फायर अलार्म, स्प्रिंकलर तथा अग्निशमन प्रणालियाँ अपर्याप्त रखरखाव के कारण प्रायः विफल हो जाती हैं।
    • नियमित निरीक्षण का अभाव निवारक उपायों की प्रभावशीलता को कम कर देता है।
  • ज्वलनशील आंतरिक सामग्रियों का उपयोग
    • असुरक्षित दीवार पैनल, फर्नीचर तथा सजावटी सामग्री जैसी ज्वलनशील सामग्रियाँ, आग के प्रसार को तीव्र कर देती हैं।
    • लपटों एवं धुएँ का तीव्र प्रसार जनहानि तथा संपत्ति की क्षति को बढ़ा देता है।

भारत में अग्नि सुरक्षा हेतु विधिक एवं संस्थागत ढाँचा

  • NBCS 2026 का परिचय: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी राष्ट्रीय भवन निर्माण मानक (NBCS), 2026 भारत में भवनों की योजना, अभिकल्प, निर्माण, संचालन तथा प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
    • यह पूर्ववर्ती राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC), 2016 का स्थान लेता है तथा अधिक अनुकूल एवं मार्गदर्शन-आधारित ढाँचा विकसित करने का उद्देश्य रखता है।
  • राज्य-विशिष्ट अग्नि सुरक्षा अधिनियम: चूँकि अग्निशमन सेवाएँ संविधान की राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए राज्यों को अग्नि रोकथाम एवं अग्नि सुरक्षा प्रवर्तन के लिए अपने स्वयं के कानून एवं विनियम बनाने का अधिकार प्राप्त है।
    • महाराष्ट्र अग्नि रोकथाम एवं जीवन सुरक्षा उपाय अधिनियम, 2006 भवनों में अग्नि रोकथाम उपायों तथा जीवन सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
    • तमिलनाडु अग्निशमन सेवा अधिनियम, 1985 अग्निशमन सेवाओं, अग्नि रोकथाम गतिविधियों तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र के विनियमन हेतु रूपरेखा प्रदान करता है।
  • आदर्श भवन उपविधियाँ
    • आदर्श भवन उपविधियाँ स्थानीय स्तर पर सुरक्षित भवन योजना एवं निर्माण के लिए मानक प्रदान करती हैं।
    • इनमें अग्नि सुरक्षा उपायों, अग्निशमन कर्मियों के लिए आपातकालीन पहुँच तथा संरचनात्मक सुरक्षा आवश्यकताओं से संबंधित प्रावधान सम्मिलित हैं।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
    • आपदा प्रबंधन अधिनियम आपदाओं के दौरान तैयारी, शमन, प्रतिक्रिया तथा पुनर्प्राप्ति के लिए संस्थागत ढाँचा स्थापित करता है।
    • यह अग्नि-संबंधी आपात स्थितियों सहित प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को सक्षम बनाता है।
  • शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका
    • नगरपालिका प्राधिकरण भवन विनियमों को लागू करने, स्वीकृतियाँ जारी करने तथा सुरक्षा मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी हैं।
    • असुरक्षित भवनों के संचालन को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी एवं नियमित निरीक्षण आवश्यक हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देश
    • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) आपदा प्रबंधन एवं जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों में सुधार हेतु नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करता है।
    • यह क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण तथा आपदा प्रतिक्रिया एजेंसियों के मध्य बेहतर समन्वय को बढ़ावा देता है।
  • भारतीय मानकों (IS Codes) का अनुपालन: अग्नि सुरक्षा के लिए निर्धारित भारतीय मानकों (IS Codes) का अनुपालन आवश्यक है, ताकि उपकरण एवं प्रणालियाँ गुणवत्ता तथा प्रदर्शन के निर्धारित मानकों को पूर्ण करें।
    • महत्त्वपूर्ण मानकों में शामिल हैं:
      • IS 2189: स्वचालित अग्नि अलार्म प्रणालियों की स्थापना एवं रखरखाव के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
      • IS 15683: पोर्टेबल अग्निशामक यंत्रों के लिए आवश्यकताओं एवं मानकों को निर्दिष्ट करता है।
      • IS 16947: अग्नि-प्रतिरोधी काँच तथा संरचनात्मक अग्नि सुरक्षा अवयवों के लिए सुरक्षा मानकों को परिभाषित करता है।
  • कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत औद्योगिक सुरक्षा ढाँचा
    • कारखाना अधिनियम, 1948 औद्योगिक एवं विनिर्माण इकाइयों में कार्यस्थल पर अग्नि जोखिमों की रोकथाम हेतु सुरक्षा दायित्व निर्धारित करता है।
    • कारखाना मालिकों की जिम्मेदारी है कि वे आपातकालीन निकास, अग्निशमन व्यवस्थाएँ, श्रमिक प्रशिक्षण तथा नियमित सुरक्षा अभ्यास सुनिश्चित करें, ताकि कर्मचारियों की सुरक्षा की जा सके।
  • सरकारी पहलों के माध्यम से अग्निशमन सेवाओं का आधुनिकीकरण
    • गृह मंत्रालय द्वारा प्रारंभ की गई राज्यों में अग्निशमन सेवाओं के विस्तार एवं आधुनिकीकरण की योजना (2023) का उद्देश्य अग्निशमन प्रतिक्रिया क्षमता को सुदृढ़ करना है।
    • ₹5,000 करोड़ के आवंटन के साथ यह योजना आधुनिक अग्निशमन वाहन, ऊँची इमारतों में बचाव कार्यों के लिए हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म तथा डिजिटल संचार प्रणालियों पर केंद्रित है।

आगे की राह

  • भवन संहिताओं का कठोर क्रियान्वयन: राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC), 2016 तथा स्थानीय भवन संहिताओं का प्रभावी प्रवर्तन नियमित निरीक्षणों एवं दंडात्मक प्रावधानों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: मुंबई एवं दिल्ली जैसे शहरों की ऊँची इमारतों में अनिवार्य अग्नि सुरक्षा अनुपालन जाँच उल्लंघनों को कम कर सकती है।
  • नियमित अग्नि सुरक्षा लेखापरीक्षण एवं अग्नि अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC) का अनुपालन
    • वाणिज्यिक भवनों, विद्यालयों, अस्पतालों तथा उच्च जोखिम वाले भवनों के लिए समय-समय पर अग्नि सुरक्षा लेखापरीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।
      • उदाहरण: कोचिंग सेंटर तथा वाणिज्यिक परिसरों का नियमित निरीक्षण अग्नि अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC) के बिना होने वाले असुरक्षित संचालन को रोक सकता है।
  • अग्नि-प्रतिरोधी भवन डिजाइन को बढ़ावा देना
    • भवनों में योजना निर्माण के चरण से ही एकाधिक निकास, अग्नि-प्रतिरोधी सामग्री, अग्नि-प्रतिरोधी खंड तथा धूम्र प्रबंधन प्रणालियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए।
      • उदाहरण: अग्नि-प्रतिरोधी द्वारों तथा पृथक निकासी सीढ़ियों वाली ऊँची इमारतें आपातकाल के दौरान अधिक सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करती हैं।
  • भवनों के उपयोग में असुरक्षित परिवर्तन को रोकना
    • आवासीय भवनों को कार्यालयों, दुकानों अथवा कोचिंग केंद्रों में परिवर्तित करने के लिए नई सुरक्षा स्वीकृतियाँ तथा अवसंरचना उन्नयन अनिवार्य होना चाहिए।
      • उदाहरण: कोचिंग केंद्रों में परिवर्तित आवासीय भवनों में अतिरिक्त निकास मार्ग तथा अग्निशमन प्रणालियाँ स्थापित की जानी चाहिए।
  • अग्निशमन कर्मियों की पहुँच एवं शहरी नियोजन में सुधार
    • शहरों में चौड़ी सड़कें, अतिक्रमण हटाना तथा अग्निशमन वाहनों के लिए समर्पित आपातकालीन पहुँच मार्ग सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
      • उदाहरण: नई नियोजित शहरी टाउनशिप भीड़भाड़ वाली पुरानी बस्तियों की तुलना में अग्निशमन वाहनों की बेहतर आवाजाही सुनिश्चित करती हैं।
  • अग्निशमन सेवाओं की क्षमता को सुदृढ़ करना
    • अग्निशमन विभागों को आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित कार्मिक, उन्नत संचार प्रणालियाँ तथा पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
      • उदाहरण: हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म तथा आधुनिक बचाव उपकरणों का उपयोग ऊँची इमारतों में लगने वाली आग के दौरान प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार कर सकता है।
  • जन-जागरूकता एवं आपातकालीन तैयारी में वृद्धि
    • आवासीय एवं वाणिज्यिक भवनों में नियमित अग्निशमन अभ्यास, निकासी प्रशिक्षण तथा जन-जागरूकता अभियान आयोजित किए जाने चाहिए।
      • उदाहरण: विद्यालयों तथा कार्यालयों में आयोजित मॉक फायर ड्रिल निकासी प्रतिक्रिया में सुधार करती है तथा घबराहट को कम करती है।
  • अग्नि रोकथाम एवं निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग
    • शीघ्र पहचान के लिए स्मार्ट सेंसर, स्वचालित अलार्म, सीसीटीवी-आधारित निगरानी तथा डिजिटल अनुपालन प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
      • उदाहरण: भवनों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित अग्नि पहचान प्रणालियाँ आग के अनियंत्रित होने से पूर्व ही संबंधित प्राधिकरणों को सतर्क कर सकती हैं।

निष्कर्ष

शहरी अग्नि सुरक्षा के लिए प्रतिक्रियात्मक अग्निशमन दृष्टिकोण से निवारक जोखिम प्रबंधन की ओर परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें सुरक्षित भवन डिजाइन, कठोर विनियमन, प्रौद्योगिकीय समर्थन तथा सामुदायिक तैयारी का समन्वय हो।

भारत में शहरी अग्नि सुरक्षा

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