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संक्षेप में समाचार

26 Jun 2026

तुंगभद्रा बाँध पुनर्वास 

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कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सरकार ने तुंगभद्रा बाँध के नवस्थापित स्पिलवे गेटों (Spillway Gates) का उद्घाटन किया, जो जलाशय की सुरक्षा तथा अंतर-राज्यीय जल सहयोग को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

परियोजना की प्रमुख विशेषताएँ

  • वर्ष 2024 में स्पिलवे गेट की विफलता के बाद सभी 33 स्पिलवे गेटों (Spillway Gates) को प्रतिस्थापित किया गया, जिससे बाँध की संरचनात्मक सुरक्षा एवं परिचालनिक विश्वसनीयता में वृद्धि हुई।
  • केंद्र सरकार ने जलाशयों की भंडारण क्षमता बढ़ाने तथा जल संरक्षण को सुदृढ़ करने के लिए देशव्यापी बाँध ड्रेजिंग (Dam Dredging) कार्यक्रम की घोषणा की।
    • बाँध ड्रेजिंग (Dam Dredging) वह प्रक्रिया है, जिसमें बाँध के पीछे स्थित जलाशय के तल में समय के साथ जमा हुई रेत, गाद (Silt) एवं अन्य अवसाद को निकालकर जलाशय की क्षमता पुनर्स्थापित की जाती है।

तुंगभद्रा नदी के बारे में

  • तुंगभद्रा नदी कृष्णा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी तथा प्रायद्वीपीय भारत की एक प्रमुख पूर्ववाहिनी (East-Flowing) नदी है।
  • उद्गम: इसका उद्गम कर्नाटक के कूडलि (जिला शिवमोगा) में तुंगा एवं भद्रा नदियों के संगम से होता है।
    • तुंगा एवं भद्रा नदियों का उद्गम: दोनों नदियाँ कुद्रेमुख पर्वतमाला के गंगामूला (वराह पर्वत) क्षेत्र, पश्चिमी घाट से निकलती हैं।
  • प्रवाह: यह नदी पूर्व दिशा में बहते हुए कर्नाटक से गुजरती है, कर्नाटक–आंध्र प्रदेश सीमा के एक भाग का निर्माण करती है तथा आगे आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है।
  • प्रमुख सहायक नदियाँ
    • वेदावती (हागरी), वरदा, कुमुदवती, हंड्री तथा चिक्का हागरी
  • संगम (मुहाना): यह आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के संगमेश्वरम् के निकट कृष्णा नदी में मिलती है।
  • प्रमुख संरक्षण एवं धरोहर स्थल
    • कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान (कर्नाटक): पश्चिमी घाट में स्थित; तुंगा एवं भद्रा नदियों का उद्गम क्षेत्र।
    • भद्रा वन्यजीव अभयारण्य एवं बाघ अभयारण्य (कर्नाटक): चिक्कमगलूरु एवं शिवमोगा जिलों में तुंगभद्रा बेसिन के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में स्थित है।
    • दारोजी स्लॉथ बियर अभयारण्य (कर्नाटक): बल्लारी जिले में स्थित; तुंगभद्रा बेसिन के निकट तथा भारत का स्लॉथ बियर (Sloth Bears) के लिए समर्पित पहला अभयारण्य।
    • हंपी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (कर्नाटक): विजयनगर जिले में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित; विजयनगर साम्राज्य की ऐतिहासिक राजधानी।
    • संगमेश्वर वन्यजीव अभयारण्य (आंध्र प्रदेश): यह आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में, तुंगभद्रा एवं कृष्णा नदियों के संगम क्षेत्र के निकट स्थित है।

संविधान हत्या दिवस 

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संस्कृति मंत्रालय ने 25 जून, 2026 को संविधान हत्या दिवस (Samvidhan Hatya Diwas) मनाया। इस अवसर पर वर्ष 1975 के आपातकाल (Emergency) के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा जन-जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया।

‘संविधान हत्या दिवस’ के बारे में

  • संविधान हत्या दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जून को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य आंतरिक आपातकाल (1975–77) की घोषणा को स्मरण करना तथा लोकतंत्र एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ करना है।
  • उद्देश्य: नागरिकों में मौलिक अधिकारों, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा विधि के शासन के महत्त्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना।
  • ऐतिहासिक महत्त्व
    • 25 जून, 1975 को अनुच्छेद-352 के अंतर्गत “आंतरिक अशांति” के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया।
    • आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए, राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में लिया गया तथा प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई।
  • 44वाँ संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए “आंतरिक अशांति” शब्द के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द का प्रयोग किया गया।

राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित प्रमुख प्रावधान

  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-352 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि यदि भारत अथवा उसके किसी भाग की सुरक्षा को खतरा हो, तो वे राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।
  • घोषणा के आधार: युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह (44वें संविधान संशोधन से पूर्व “आंतरिक अशांति” आधार था)
  • संसदीय अनुमोदन: आपातकाल की उद्घोषणा को एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से अनुमोदित किया जाना आवश्यक है।
    • अनुमोदन के बाद यह छह माह तक प्रभावी रहता है तथा प्रत्येक छह माह पर संसद की पुनः स्वीकृति से इसका विस्तार किया जा सकता है।
  • भारत में राष्ट्रीय आपातकाल
    • वर्ष 1962 – भारत–चीन युद्ध (बाह्य आक्रमण)।
    • वर्ष 1971 – भारत–पाकिस्तान युद्ध (बाह्य आक्रमण)।
    • वर्ष 1975आंतरिक अशांति के आधार पर आंतरिक आपातकाल।
  • अन्य प्रकार की संवैधानिक आपात स्थितियाँ
    • राज्य आपातकाल / राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद-356): जब किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है।
    • वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360): जब भारत की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा हो; यह अब तक भारत में लागू नहीं किया गया है।
  • मौलिक अधिकारों पर प्रभाव
    • अनुच्छेद-358: केवल युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद-19 के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रताएँ स्वतः निलंबित हो जाती हैं।
    • अनुच्छेद-359: राष्ट्रपति निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित कर सकते हैं; किंतु 44वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978 के बाद अनुच्छेद-20 एवं अनुच्छेद-21 को किसी भी राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान निलंबित नहीं किया जा सकता है।

महर्षि सुश्रुत (Sushruta)

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विश्व के सबसे प्राचीन शल्य चिकित्सा महाविद्यालयों में से एक रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग (Royal College of Surgeons of Edinburgh) द्वारा महर्षि सुश्रुत की 90 किलोग्राम की कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया है।

  • यह कांस्य प्रतिमा तमिलनाडु के कुंभकोणम के निकट स्थित स्वामीमलाई में तैयार की गई, जो अपनी पारंपरिक कांस्य मूर्ति-निर्माण कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • इससे पूर्व मेलबर्न स्थित रॉयल ऑस्ट्रेलेशियन कॉलेज ऑफ सर्जन्स (Royal Australasian College of Surgeons) ने भी महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित की थी।

महर्षि सुश्रुत के बारे में

  • महर्षि सुश्रुत एक प्राचीन भारतीय चिकित्सक थे, जिनका काल लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 2,600 वर्ष पूर्व) माना जाता है।
  • उन्हें व्यापक रूप से “प्लास्टिक सर्जरी के जनक (Father of Plastic Surgery)” के रूप में जाना जाता है।
  • वे प्राचीन भारत में शल्य तंत्र (Shalya Tantra) अर्थात् शल्य चिकित्सा विज्ञान के अग्रदूत थे।
  • उन्होंने शल्य चिकित्सा को सुव्यवस्थित रूप से शिक्षित, प्रलेखित तथा विनियमित चिकित्सा शाखा के रूप में स्थापित किया।
  • उन्होंने वैज्ञानिक शल्य प्रशिक्षण, व्यावहारिक शिक्षा तथा नैतिक चिकित्सा अभ्यास पर विशेष बल दिया।
  • इतिहासकारों के अनुसार, महर्षि सुश्रुत ने हिप्पोक्रेट्स (Hippocrates), ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस (Aulus Cornelius Celsus) तथा गैलेन (Galen) से कई शताब्दियों पूर्व उन्नत शल्य प्रक्रियाओं का सफलतापूर्वक अभ्यास एवं प्रलेखन किया था।

महर्षि सुश्रुत संहिता के बारे में

  • महर्षि सुश्रुत संहिता विश्व के सबसे प्राचीन एवं सर्वाधिक व्यापक चिकित्सा ग्रंथों में से एक है, जिसकी रचना लगभग 2,000 वर्ष पूर्व महर्षि सुश्रुत द्वारा की गई। यह शल्य तंत्र (Shalya Tantra) पर उनके शिक्षण का सुव्यवस्थित संकलन है।
  • यह ग्रंथ दो प्रमुख भागों में विभाजित है—पूर्व तंत्र (Purva Tantra) एवं उत्तर तंत्र (Uttara Tantra)।

महर्षि सुश्रुत संहिता की प्रमुख विशेषताएँ

  • व्यापक चिकित्सीय प्रलेखन: इसमें 1,120 रोगों, 700 से अधिक औषधीय पौधों, 300 से अधिक चिकित्सीय एवं शल्य प्रक्रियाओं तथा 120 से अधिक शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है।
  • व्यापक विषय-वस्तु: इसमें शल्य चिकित्सा, सामान्य चिकित्सा, बाल चिकित्सा, विषविज्ञान (Toxicology), औषधिविज्ञान (Pharmacology), मनोचिकित्सा, नेत्र विज्ञान, कर्ण-नाक-गला (ENT) तथा जेरियाट्रिक केयर सहित अनेक चिकित्सा शाखाओं का वर्णन है।
  • उन्नत शल्य प्रक्रियाएँ: इसमें राइनोप्लास्टी (Rhinoplasty/Plastic Surgery), लिथोटॉमी (Lithotomy – मूत्राशय की पथरी निकालना) तथा मृत भ्रूण को निकालने जैसी उन्नत शल्य प्रक्रियाओं का उल्लेख है।
  • शल्य तकनीकों का वर्गीकरण: शल्य चिकित्सा को आठ श्रेणियों में विभाजित किया गया है—छेदन (Excision), चीरा लगाना (Incision), खरौंचना (Scarification), भेदन (Puncturing), जाँच/प्रोबिंग (Probing), निष्कर्षण (Extraction), निकासी (Drainage) तथा टाँका लगाना (Suturing)।
  • वैज्ञानिक शल्य प्रशिक्षण: विद्यार्थियों को रोगियों पर शल्य क्रिया करने से पूर्व सब्जियों, चमड़े तथा पशु ऊतकों पर अभ्यास करने की अनुशंसा की गई है।
  • शल्य उपकरणों का वर्गीकरण: महर्षि सुश्रुत ने शल्य उपकरणों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया—
    • शस्त्र (Shastra): काटने एवं चीरा लगाने के लिए प्रयुक्त तीक्ष्ण उपकरण।
    • यंत्र (Yantra): पकड़ने, जाँचने तथा निष्कर्षण के लिए प्रयुक्त कुंद उपकरण।
  • प्रमुख शल्य उपकरण
    • वृद्धिपत्र (Vriddhipatra): छुरी (Scalpel)।
    • मंडलाग्र (Mandalagra): वक्रीय चीरा लगाने वाला चाकू।
    • करपत्र (Karapatra): अस्थि काटने का उपकरण।
    • एषणी (Eshani): जाँच हेतु उपकरण।
    • संदंश (Sandamsa): चिमटी (Forceps)।
    • नाड़ी यंत्र (Nadi Yantra): नलिकाकार उपकरण।
  • शल्य स्वच्छता पर बल: घाव की सफाई, घाव की देखभाल, शल्य उपकरणों के स्टेरिलाइजेशन (Sterilisation) तथा रक्तस्राव नियंत्रित करने के लिए कॉटराइजेशन (Cauterisation) पर विशेष बल दिया गया है।
  • समय से आगे की चिकित्सीय समझ: इसमें मधुमेह, मोटापा तथा हृदय-वाहिका संबंधी विकारों (Cardiovascular Disorders) से मिलती-जुलती अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
    • साथ ही अनेक रोगों को जीवनशैली कारकों से जोड़ा गया तथा उपचार के भाग के रूप में शारीरिक गतिविधियों की अनुशंसा की गई।
    • इसमें जलन, हीट स्ट्रोक (Heat Stroke), फ्रॉस्टबाइट (Frostbite) तथा बिजली गिरने से होने वाली चोटों को तापीय आघात (Thermal Trauma) की व्यापक अवधारणा के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया, जिसे आधुनिक चिकित्सा ने बहुत बाद में व्यापक रूप से स्वीकार किया।

महत्त्वपूर्ण औषधियों के लिए QR कोड-आधारित औषधि अनुरेखण प्रणाली 

सरकार ने नकली दवाओं पर अंकुश लगाने तथा औषधि विनियमन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण औषधियों के लिए QR कोड-आधारित अनुरेखण प्रणाली (QR Code-based Traceability) को अनिवार्य कर दिया है।

पहल के बारे में

  • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 (Drugs Rules, 1945) में संशोधन करते हुए अनुसूची H2 (Schedule H2) का विस्तार किया है। इसके अंतर्गत टीके (Vaccines), रोगाणुरोधी औषधियाँ, कैंसर-रोधी दवाएँ तथा मादक एवं मनःप्रभावी पदार्थ (NDPS) संबंधी औषधियाँ शामिल की गई हैं।
  • यह निर्णय नकली कैंसर-रोधी दवाओं से जुड़ी चिंताओं के बाद लिया गया, जिनमें कीट्रूडा (Keytruda) की खाली शीशियों में कथित रूप से एंटीफंगल दवाएँ भरकर रोगियों को बेचे जाने के मामले सामने आए थे।
  • औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (DTAB) ने सभी कैंसर-रोधी दवाओं तथा अन्य महत्वपूर्ण औषधियों के लिए अनिवार्य QR कोड-आधारित ट्रैक-एंड-ट्रेस (Track-and-Trace) प्रणाली लागू करने की अनुशंसा की थी।

नियमों की प्रमुख विशेषताएँ

  • अनिवार्य QR कोड: अनुसूची H2 (Schedule H2) के अंतर्गत आने वाली प्रत्येक औषधि की प्राथमिक अथवा द्वितीयक पैकेजिंग पर एक विशिष्ट QR कोड अंकित करना अनिवार्य होगा।
  • व्यापक सूचना उपलब्धता: QR कोड में उत्पाद पहचान संख्या (Product ID), जेनेरिक एवं ब्रांड का नाम, निर्माता का विवरण, बैच संख्या, निर्माण एवं समाप्ति तिथि, लाइसेंस संख्या तथा सहायक पदार्थों की जानकारी संगृहीत होगी।
  • आपूर्ति शृंखला अनुरेखण: यह प्रणाली औषधि आपूर्ति शृंखला के प्रत्येक चरण में उत्पाद के प्रमाणीकरण एवं सत्यापन को संभव बनाएगी।
  • विस्तारित दायरा: पहले यह व्यवस्था केवल शीर्ष 300 औषधि ब्रांडों तक सीमित थी, जिसे अब अनुसूची H2 के अंतर्गत आने वाली सभी महत्त्वपूर्ण औषधियों तक विस्तारित कर दिया गया है।
  • चरणबद्ध क्रियान्वयन: 1 जुलाई 2027 से – टीके, कैंसर-रोधी दवाएँ एवं NDPS औषधियाँ तथा 1 जुलाई 2028 से – रोगाणुरोधी औषधियाँ।

इस पहल का महत्त्व

  • नकली दवाओं की रोकथाम: विशेष रूप से उच्च-मूल्य वाली दवाओं, खासकर कैंसर-रोधी औषधियों, की नकली दवाओं के निर्माण को काफी हद तक कठिन बनाता है।
  • रोगी सुरक्षा को सुदृढ़ करना: डिजिटल प्रमाणीकरण के माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि रोगियों तक केवल वास्तविक एवं प्रमाणिक दवाएँ ही पहुँचें।
  • AMR नियंत्रण में सहायक: नकली एवं निम्न-गुणवत्ता वाली एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान में सहायता करता है, जिससे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) के विरुद्ध प्रयासों को मजबूती मिलती है।
  • WHO की नियामकीय परिपक्वता आवश्यकताओं के अनुरूप: यह भारत को औषधि विनियमन के क्षेत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ग्लोबल बेंचमार्किंग टूल (GBT) के मैच्योरिटी लेवल–4 के मानकों को प्राप्त करने में सहायता करता है।

नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम के लिए अंतिम परिचालन स्वीकृति (FOC) प्राप्त कर ली है। इससे भारतीय वायु सेना (IAF) की हवाई निगरानी तथा नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम के बारे में

  • नेत्र AEW&C भारत की प्रथम स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) प्रणाली है, जिसे भारतीय वायु सेना (IAF) के लिए वास्तविक समय हवाई निगरानी, कमान, नियंत्रण एवं युद्ध प्रबंधन उपलब्ध कराने हेतु विकसित किया गया है।
  • विकसितकर्ता: इस प्रणाली का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS), बंगलूरू द्वारा किया गया है।
    • इसे ब्राज़ील के एम्ब्रेयर EMB-145I विमान मंच पर एकीकृत किया गया है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार से सुसज्जित, जो लॉन्ग-रेंज सर्विलांस एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रदान करता है।
    • इसमें आईडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (IFF), मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM), कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स (CSM) तथा सुरक्षित संचार नेटवर्क सहित उन्नत मिशन प्रणालियाँ एकीकृत हैं।
    • यह हवाई एवं समुद्री दोनों प्रकार के लक्ष्यों का पता लगाने, उनकी  ट्रैकिंग, पहचान तथा निगरानी करने में सक्षम है, जिससे वास्तविक समय की स्थितिजन्य जागरूकता प्राप्त होती है।
    • इसे वर्ष 2015 में प्रारंभिक परिचालन स्वीकृति (IOC) प्राप्त हुई, वर्ष 2017 में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया तथा अब इसे अंतिम परिचालन स्वीकृति (FOC) प्राप्त हो गई है।

महत्त्व

नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) प्रणाली भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करती है, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध की क्षमता को बढ़ाती है तथा भारत को स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल प्रणाली विकसित करने वाला विश्व का पाँचवाँ देश बनाती है।

भवाइया लोक परंपरा 

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने भवाइया लोक परंपरा पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन किया तथा भारत की समृद्ध अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

भवाइया लोक परंपरा के बारे में

  • भवाइया (Bhawaiya) पूर्वी भारत की एक पारंपरिक लोकसंगीत शैली है, जो कोच-राजबंशी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करती है।
  • क्षेत्र: इसका उद्गम उत्तर बंगाल के तराई एवं दुआर क्षेत्र (कूचबिहार एवं जलपाईगुड़ी) में हुआ।
    • यह असम के गोलपाड़ा क्षेत्र तथा बांग्लादेश के रंगपुर मंडल में भी प्रचलित है।
  • संबद्ध समुदाय: यह मुख्यतः कोच-राजबंशी एवं कामतापुरी समुदायों से जुड़ी हुई परंपरा है।
  • प्रमुख विषय: इसमें विरह (Biraha) अर्थात् बिछड़ने एवं मिलन की लालसा की भावना प्रमुख होती है, विशेषकर आजीविका के कारण अलग रहने वाले पति-पत्नी के भावनात्मक संबंधों का चित्रण किया जाता है।
    • इसमें महावत (हाथी संचालक), महिशाल (भैंस चराने वाले), गरियाल (बैलगाड़ी चालक) तथा अन्य ग्रामीण श्रमिक समुदायों के जीवन का चित्रण मिलता है।
    • यह कृषि परंपराओं, मौसमी त्योहारों, प्रकृति तथा ग्रामीण जीवन को भी अभिव्यक्त करती है।
  • संगीतात्मक विशेषताएँ
    • दीर्घ: धीमी एवं भावपूर्ण शैली, जो गहरे दुःख और विरह को व्यक्त करती है।
    • चटका: तीव्र गति, जीवंत एवं हास्यप्रधान शैली, जिसमें घरेलू एवं सामाजिक जीवन का चित्रण होता है।
    • मुख्य वाद्य यंत्र: दोतारा (Dotara); इसके साथ बाँसुरी, ढोल तथा करताल का प्रयोग किया जाता है।
  • महत्त्व 
    • भवाइया को भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है, जो सांस्कृतिक विविधता एवं क्षेत्रीय पहचान को सुदृढ़ करता है।

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