संक्षिप्त समाचार

11 Apr 2026

IUCN द्वारा एम्पेरर पेंगुइन और अंटार्कटिक फर सील का पुनर्वर्गीकरण 

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अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण एम्पेरर पेंगुइन और अंटार्कटिक फर सील को लुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में वर्गीकृत किया है।

एम्पेरर पेंगुइन के बारे में

  • एम्पेरर पेंगुइन (Aptenodytes forsteri) अंटार्कटिका में पाए जाने वाली सबसे बड़ी पेंगुइन प्रजाति है।
  • भौतिक विशेषताएँ: इसके पास अत्यधिक ठंड से बचने के लिए घने पंख और वसा की परत (Fat insulation) होती है।
  • आवास: इसका प्रमुख आवास फास्ट आइस है, जो समुद्री बर्फ होती है तथा तटरेखा से जुड़ी रहती है।
  • प्रजनन व्यवहार: ययह एकमात्र पेंगुइन प्रजाति है, जो अंटार्कटिक में शीतकाल के दौरान प्रजनन करती है, जिसमें नर अपने पैरों पर स्थित अंडों को ब्रूड पाउच के नीचे रखकर सेते हैं।
  • आहार एवं पारिस्थितिकी: यह मुख्य रूप से क्रिल, मछली और स्क्विड खाता है और अंटार्कटिक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक प्रजाति है।
  • भोजन क्षेत्र: ये मुख्यतः समुद्री बर्फ में पॉलिन्या (Polynyas), खुले जल क्षेत्र, दरारों और हिम गर्तों में शिकार करते हैं।
  • जनसंख्या प्रवृत्ति: वर्ष 2009 से 2018 के बीच लगभग 10% (20,000 से अधिक वयस्क) की कमी के बाद, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्ष 2080 तक इनकी संख्या आधी रह जाएगी।
  • पारिस्थितिकी भूमिका: एम्पेरर पेंगुइन एक संवेदी प्रजाति (Sentinel species) के रूप में कार्य करते हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और उत्सर्जन नियंत्रण की प्रभावशीलता का संकेत देते हैं।
    • संवेदी प्रजाति वह प्रजाति है, जो किसी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों या खतरों के बारे में प्रारंभिक चेतावनी संकेत प्रदान करती है।
  • संरक्षण स्थिति: वर्तमान में IUCN द्वारा लुप्तप्राय (Endangered) के रूप में सूचीबद्ध।

अंटार्कटिक फर सील (Antarctic Fur Seal) के बारे में

  • अंटार्कटिक फर सील एक समुद्री स्तनधारी है, जो मुख्यतः उप-अंटार्कटिक द्वीपों और दक्षिणी महासागर के आस-पास पाया जाता है।
  • भौतिक विशेषताएँ: यह अंटार्कटिक की सबसे छोटी सील प्रजाति है, जिसमें घने फर, कर्ण खंड (Ear flaps) और मजबूत तैराकी क्षमता होती है; नर आकार में मादाओं से काफी बड़े होते हैं।
  • आहार: यह मुख्य रूप से क्रिल, मछली और स्क्विड पर निर्भर करता है और अंटार्कटिक समुद्री खाद्य शृंखला में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • जनसंख्या प्रवृत्ति: वर्ष 1999 से 2025 के बीच इसकी संख्या में 50% से अधिक गिरावट दर्ज की गई है।
  • ऐतिहासिक शोषण: 19वीं शताब्दी में फर के लिए वाणिज्यिक शिकार के कारण यह लगभग विलुप्त हो गया था।
  • संरक्षण एवं पुनर्प्राप्ति: अंटार्कटिक सील संरक्षण सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से इसकी आबादी में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
  • खतरे: जलवायु परिवर्तन, समुद्री कचरे में उलझना और क्रिल के वितरण में परिवर्तन इसके अस्तित्व के लिए प्रमुख खतरे हैं।
  • पारिस्थितिकी महत्त्व: यह दक्षिणी महासागर के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में एक महत्त्वपूर्ण शीर्ष शिकारी के रूप में कार्य करता है।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN द्वारा लुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में उन्नत किया गया।

महात्मा ज्योतिबा फुले

11 अप्रैल, 2026 को भारत सामाजिक सुधारक ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती मना रहा है, जिसे व्यापक रूप से ज्योतिबा फुले जयंती के रूप में जाना जाता है।

महात्मा ज्योतिबा फुले के बारे में

  • पूरा नाम: ज्योतिराव गोविंदराव फुले (लोकप्रिय रूप से महात्मा ज्योतिबा फुले)।
  • जन्म: 11 अप्रैल 1827, पुणे, महाराष्ट्र।
  • विवाह: 13 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले से विवाह हुआ, जो बाद में उनके सामाजिक सुधार कार्यों में सहभागी बनीं।
  • शिक्षा और जागरूकता
    • पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त की।
    • थॉमस पेन (Age of Reason, The Rights of Man) और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे पाश्चात्य विचारकों से प्रभावित हुए।
    • वर्ष 1848 में एक ब्राह्मण मित्र के विवाह में जातिगत भेदभाव का सामना करना उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण मोड़ बना, जिससे उन्हें सामाजिक अन्याय का बोध हुआ।
    • उन्होंने महिलाओं और निम्न वर्गों की शिक्षा एवं सशक्तीकरण को सामाजिक असमानताओं के उन्मूलन की कुँजी माना।
  • ज्योतिबा फुले की विचारधारा
    • समानता और न्याय: जाति और लिंग भेदभाव से मुक्त समाज की वकालत की।
    • तर्कवाद: अंधविश्वास, ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और रूढ़ियों का विरोध किया।
    • सामाजिक न्याय: जाति या लिंग की परवाह किए बिना सभी मनुष्यों की गरिमा पर बल दिया।
  • ‘महात्मा’ की उपाधि: ज्योतिराव फुले को 11 मई, 1888 को महाराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्ता विठ्ठलराव कृष्णाजी वांडेकर द्वारा “महात्मा” की उपाधि से सम्मानित किया गया।

प्रमुख सामाजिक योगदान

  • जाति व्यवस्था की आलोचना: उन्होंने ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और जाति-आधारित भेदभाव का कड़ा विरोध किया।
    • उन्होंने शिक्षा और तर्कशील सोच के माध्यम से जाति व्यवस्था के उन्मूलन का आह्वान किया।
  • रूढ़िवाद के विरुद्ध सशक्त आवाज: फुले ने विष्णु शास्त्री चिपलूणकर और बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादियों से मतभेद रखते हुए, दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए ब्रिटिश शासन के साथ कार्य करना उचित समझा।
  • महिला सशक्तीकरण: उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, विशेषकर बालिका शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
    • उन्होंने सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर लैंगिक असमानता के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया।
  • सत्यशोधक समाज की स्थापना (1873): सितंबर 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जो ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज जैसे उच्च जाति-प्रधान सुधार आंदोलनों के विकल्प के रूप में कार्य करता था।
  • प्रथम बालिका विद्यालय (1848): फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया।
    • इस विद्यालय के पाठ्यक्रम में विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन और व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल थे।
  • वंचित वर्गों के लिए विद्यालय: उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए विद्यालय स्थापित किए।
  • रात्रि विद्यालय: वर्ष 1855 तक उन्होंने पुणे में रात्रि विद्यालय भी शुरू किए, जो दिन में व्यस्त रहने वाले मजदूरों, किसानों और कामकाजी महिलाओं के लिए शिक्षा का केंद्र बने।

प्रमुख साहित्यिक योगदान 

  • गुलामगिरी (दासता): भारत में जाति-आधारित उत्पीड़न की सशक्त आलोचना, जिसकी तुलना उन्होंने अमेरिका की दास प्रथा से की।
  • शेतकारी (किसान व्हिप), 1881: किसानों की स्थिति पर केंद्रित, उनके उत्थान के लिए व्यावहारिक सुधारों का सुझाव देता है।
  • सत्सर (Satsar): फुले ने पंडिता रमाबाई के ईसाई धर्म में धर्मांतरण का समर्थन किया था। इस रचना को एक ब्राह्मण और एक शूद्र के बीच संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • मानव मोहम्मद: पैगंबर मोहम्मद की प्रशंसा में रचित काव्य, जिसमें उन्हें अंधविश्वास और रूढ़िवाद से मुक्ति दिलाने वाला बताया गया है।
  • सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक: इसे उनका दार्शनिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें सार्वभौमिक मानवता, तर्कवाद और सांप्रदायिक धर्म की आलोचना पर बल दिया गया है।

“ब्लू बुक” प्रोटोकॉल

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पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिका–ईरान वार्ता के लिए अपने कड़े “ब्लू बुक” सुरक्षा प्रोटोकॉल को सक्रिय किया है, जिसके तहत आवाजाही पर प्रतिबंध और पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है।

भारत में ब्लू बुक प्रोटोकॉल की अवधारणा

  • ब्लू बुक एक आधिकारिक मार्गदर्शिका है, जिसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की घरेलू यात्राओं के दौरान सुरक्षा से संबंधित दिशा-निर्देश तथा प्रोटोकॉल निर्धारित किए जाते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • नोडल मंत्रालय: इसे गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय से तैयार और समय-समय पर अद्यतन किया जाता है।
  • औपचारिक स्वागत व्यवस्था: आगंतुक गणमान्य व्यक्ति का स्वागत और विदाई सामान्यतः राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है या मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में नामित मंत्री द्वारा।
  • समग्र सुरक्षा ढाँचा: इसमें जिला प्रशासन और पुलिस के बीच बहु-स्तरीय समन्वय की आवश्यकता होती है।
  • अधिकृत सूची की पूर्व स्वीकृति: जिन अधिकारियों को गणमान्य व्यक्ति से मिलने या स्वागत के लिए नामित किया जाता है, उनकी सूची संबंधित सचिवालयों (राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति/प्रधानमंत्री) से पूर्व स्वीकृत होती है।
  • संचालन और लॉजिस्टिक योजना: इसमें परिवहन, स्थल सुरक्षा, मार्ग योजना, भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन तैयारियों से संबंधित व्यवस्थाएँ शामिल होती हैं।
  • संवैधानिक वरीयता क्रम: इसमें पदानुक्रम निर्धारित किया गया है—राष्ट्रपति प्रथम, उसके बाद उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री।

महत्त्व 

  • समान सुरक्षा मानक सुनिश्चित करना: ब्लू बुक प्रोटोकॉल पूरे देश में एकसमान और मजबूत सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करता है, जिससे सभी स्थानों पर प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एक सुसंगत ढाँचा उपलब्ध होता है।
  • सहकारी संघवाद को बढ़ावा: यह प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य घनिष्ठ समन्वय तथा सहयोग को बढ़ावा देकर सहकारी संघवाद को मजबूत करता है। 
  • सुरक्षा उल्लंघनों की रोकथाम: यह प्रोटोकॉल शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारियों से जुड़े सुरक्षा उल्लंघनों को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे राष्ट्रीय नेतृत्व और संस्थागत अखंडता की रक्षा होती है।

ECOSOC में भारत

भारत ने संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के अंतर्गत प्रमुख निकायों में सर्वसम्मति से (निर्विरोध) चुनाव जीतकर अपनी वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को और मजबूत किया है।

चुनाव की प्रमुख विशेषताएँ

  • कई निकायों में निर्विरोध जीत: भारत को ECOSOC के चार निकायों में बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के चुना गया, जो अंतरराष्ट्रीय समर्थन और विश्वसनीयता को दर्शाता है।
  • CESCR में पुनर्निर्वाचन: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार समिति (CESCR) में राजनयिक प्रीति सरन को पुनः चुना गया।
  • प्रमुख कार्यात्मक निकायों में प्रतिनिधित्व: भारत ने निम्नलिखित निकायों में स्थान प्राप्त किया:
    • विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास हेतु आयोग
    • गैर-सरकारी संगठनों की समिति
    • कार्यक्रम और समन्वय समिति।

ECOSOC के बारे में

  • ECOSOC संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है, जो वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय नीतियों का समन्वय करता है।
  • उत्पत्ति: वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर (अध्याय X) के अंतर्गत स्थापित, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • मुख्यालय: न्यूयॉर्क में स्थित है, जबकि इसके प्रमुख सत्र जिनेवा में भी आयोजित होते हैं।
  • उद्देश्य: सतत् विकास, मानवाधिकार, उच्च जीवन स्तर और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • मुख्य संरचना: ECOSOC में 54 सदस्यीय पूर्ण निकाय होता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा तीन-वर्षीय अवधि के लिए चुना जाता है और यही प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था है।
  • सहायक निकाय: यह कार्यात्मक आयोगों, क्षेत्रीय आयोगों और विशेषज्ञ निकायों के माध्यम से कार्य करता है, जो आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक मुद्दों पर विशेषज्ञ सुझाव प्रदान करते हैं।
  • निर्णय-निर्माण कार्य: ECOSOC प्रस्ताव और सिफारिशें अपनाता है, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का समन्वय करता है और गैर-सरकारी संगठनों को परामर्शदात्री दर्जा प्रदान करता है (NGO समिति के माध्यम से)।
  • निर्णय प्रक्रिया: निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिनका केंद्र संवाद, समन्वय और नीतिगत मार्गदर्शन होता है, न कि बाध्यकारी प्रवर्तन।
  • मुख्य भूमिकाएँ
    • संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और कार्यक्रमों का समन्वय करना।
    • आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
    • नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहभागिता को बढ़ावा देना।

महत्त्व

भारत का यह निर्वाचन वैश्विक शासन और सतत् विकास एजेंडा में उसकी भूमिका को सुदृढ़ करता है तथा बहुपक्षीय निर्णय-निर्माण मंचों में उसके प्रभाव को और बढ़ाता है।

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