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न्यायिक शुचिता: न्यायाधीश पर महाभियोग

11 Apr 2026

संदर्भ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, जो अपने पद से हटाने के लिए संसदीय प्रस्ताव का सामना कर रहे थे, ने भारत के राष्ट्रपति को अपना त्याग-पत्र सौंप दिया।

संबंधित तथ्य

  • यह त्याग-पत्र न्यायिक कदाचार और न्यायिक शुचिता की कमी से संबंधित गंभीर आरोपों की पृष्ठभूमि में आया है।
  • इस मामले की जाँच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत एक समिति का गठन किया गया।
  • यह जाँच पिछले वर्ष दिल्ली स्थित न्यायाधीश के आधिकारिक आवास से आग की घटना के बाद कथित रूप से बरामद जली हुई नकदी की रिपोर्टों से संबंधित है।

न्यायिक शुचिता (Judicial Probity) के बारे में

  • न्यायिक शुचिता से अभिप्राय न्यायाधीशों से अपेक्षित ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और नैतिक आचरण के उच्चतम मानकों से है।
  • यह संकेत करता है कि न्यायाधीशों को बिना किसी पक्षपात, पक्षधरता या व्यक्तिगत हित के कार्य करना चाहिए, जिससे प्रत्येक निर्णय में निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
  • न्यायिक शुचिता इस सिद्धांत पर आधारित है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
  • न्यायिक शुचिता को दर्शाने वाला उदाहरण
    • हितों के टकराव से बचने हेतु स्वयं को अलग करना (Recusal): जब किसी मामले में व्यक्तिगत या पेशेवर संबंध हो, तो न्यायाधीश स्वेच्छा से स्वयं को उस मामले से अलग कर लेते हैं।
      • उदाहरण: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने पूर्व सहयोगियों या रिश्तेदारों से संबंधित मामलों में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए स्वयं को अलग किया है।

न्यायिक शुचिता के मूल तत्त्व

  • सत्यनिष्ठा: न्यायाधीशों को सार्वजनिक और निजी जीवन दोनों में नैतिक रूप से दृढ़ और भ्रष्टाचार से मुक्त रहना चाहिए।
    • कदाचार की धारणा मात्र भी संस्था को कमजोर कर सकती है।
  • निष्पक्षता: निर्णय केवल तथ्यों और विधि के आधार पर होने चाहिए, जो राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक प्रभावों से मुक्त हों।
  • स्वतंत्रता: न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए, यह सिद्धांत भारत के संविधान में निहित है।
  • जवाबदेही: स्वतंत्र होने के बावजूद, न्यायाधीश कदाचार के लिए उत्तरदायी होते हैं, जिसके लिए महाभियोग जैसे संवैधानिक तंत्र उपलब्ध हैं।
  • आचरण में शालीनता: न्यायाधीशों को गरिमापूर्ण व्यवहार बनाए रखना चाहिए और हितों के टकराव से बचना चाहिए, ताकि उनके पद की गरिमा बनी रहे।

न्यायाधीशों को हटाने के लिए संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-124: संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता वाली महाभियोग प्रक्रिया के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने से संबंधित है।
  • अनुच्छेद-217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने से संबंधित है।

न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया

  • प्रस्ताव की शुरुआत (Initiation of Motion): उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव कम-से-कम 100 लोकसभा सदस्यों या 50 राज्यसभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
  • प्रस्ताव की स्वीकृति: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
  • जाँच समिति का गठन: प्रस्ताव स्वीकार होने पर एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है, जिसमें शामिल होते हैं:
    • एक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश
    • एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और
    • एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता।
  • जाँच प्रक्रिया: समिति विशिष्ट आरोप निर्धारित करती है, न्यायाधीश को उत्तर देने का अवसर प्रदान करती है और यदि अक्षम्यता का आरोप हो तो चिकित्सीय परीक्षण की सिफारिश कर सकती है।
  • समिति की रिपोर्ट: यदि न्यायाधीश दोषी नहीं पाए जाते तो प्रस्ताव समाप्त कर दिया जाता है। यदि दोषी पाए जाते हैं तो रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।
  • संसदीय स्वीकृति: दोनों सदनों को प्रस्ताव को विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई) से पारित करना होता है।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति: संसदीय स्वीकृति के बाद, राष्ट्रपति को संबोधन प्रस्तुत किया जाता है, जिसके बाद वे न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश देते हैं।

न्यायिक शुचिता का महत्त्व

  • कानून के शासन को बनाए रखना: न्यायिक शुचिता यह सुनिश्चित करती है कि कानूनों का निष्पक्ष और समान रूप से अनुप्रयोग हो, जिससे भारत के संविधान में निहित कानून के शासन को सुदृढ़ किया जाता है।
  • जन विश्वास का निर्माण: सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के उच्च मानक न्यायपालिका में नागरिकों के विश्वास को बढ़ाते हैं, जो एक कार्यशील लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
  • निष्पक्ष और समान न्याय सुनिश्चित करना: यह सुनिश्चित करता है कि निर्णय बिना पक्षपात या बाहरी प्रभाव के लिए जाएँ, जिससे सभी के लिए न्याय सुनिश्चित हो।
  • न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करना: शुचिता न्यायपालिका को कार्यपालिका, विधायिका या निजी हितों के अनुचित प्रभाव से बचाती है, जिससे उसकी स्वतंत्रता बनी रहती है।
  • संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखना: न्यायाधीशों का नैतिक आचरण न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता और वैधता की रक्षा करता है, जिससे उसकी प्राधिकरण शक्ति का क्षरण नहीं होता।
  • न्यायिक भ्रष्टाचार की रोकथाम: न्यायिक शुचिता भ्रष्टाचार और न्यायिक अधिकारों के दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे निर्णय निष्पक्ष और विधिसम्मत बने रहते हैं।

चुनौतियाँ

  • पारदर्शी जवाबदेही तंत्र की कमी: महाभियोग प्रक्रिया लंबी, जटिल और कम ही उपयोग में लाई जाती है, जिससे व्यवहार में जवाबदेही सीमित हो जाती है।
    • उदाहरण: भारत में आरोपों के बावजूद बहुत कम न्यायाधीशों का सफलतापूर्वक महाभियोग संपन्न हुआ है।
  • संस्थागत संकोच: न्यायपालिका अक्सर अपने ही सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई करने में संस्थागत अनिच्छा दिखाती है, जिससे आंतरिक अनुशासन प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: कथित कदाचार के मामलों में आंतरिक जाँच प्रारंभ करने में विलंब।
  • महाभियोग प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव: चूँकि हटाने के लिए संसदीय स्वीकृति आवश्यक है, इसलिए राजनीतिक विचार परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
    • पूर्व के महाभियोग प्रस्ताव राजनीतिक सहमति के अभाव के कारण असफल रहे, न कि केवल मेरिट के आधार पर।
  • जन विश्वास का क्षरण: कदाचार के आरोपों का समय पर समाधान न होने से न्यायपालिका में जन विश्वास कमजोर हो सकता है।
    • न्यायाधीशों से संबंधित विवाद दोष सिद्ध होने से पहले ही धारणा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।
  • समर्पित निगरानी निकाय का अभाव: भारत में न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों के निपटान के लिए कोई स्वतंत्र वैधानिक प्राधिकरण नहीं है, जिससे जवाबदेही में अंतराल उत्पन्न होता है।
    • उदाहरण: कई लोकतंत्रों में समर्पित न्यायिक परिषद होती हैं, जबकि भारत में निगरानी तंत्र खंडित और मुख्यतः आंतरिक है।
  • जाँच और निर्णय में विलंब: जाँच और महाभियोग से संबंधित कार्यवाही में अक्सर महत्त्वपूर्ण विलंब होता है, जिससे निवारक प्रभाव कम हो जाता है।
    • लंबी जाँच प्रक्रियाएँ जवाबदेही को कमजोर करती हैं और आरोप लंबे समय तक अनुत्तरित बने रहते हैं।

आगे की राह

  • आंतरिक तंत्र को सुदृढ़ करना: शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए न्यायपालिका के भीतर मजबूत आंतरिक नैतिक समितियों की स्थापना की जाए।
  • कार्यवाहियों में पारदर्शिता बढ़ाना: जन विश्वास बनाए रखने के लिए समयबद्ध और पारदर्शी जाँच प्रक्रियाएँ सुनिश्चित की जाएँ।
    • न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए जाँच के परिणामों का सार्वजनिक प्रकटीकरण किया जाए।
  • जवाबदेही के लिए संस्थागत सुधार: न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों के निपटान हेतु एक राष्ट्रीय न्यायिक परिषद की स्थापना पर विचार किया जाए।
  • स्वतंत्रता और जवाबदेही के मध्य संतुलन: ऐसे तंत्र विकसित किए जाएँ, जो न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए जवाबदेही सुनिश्चित करें।
    • उदाहरण: भारत के संविधान के अंतर्गत न्यायिक आचरण और हितों के टकराव पर स्पष्ट दिशा-निर्देश शामिल किए जाएँ।
  • न्यायिक नैतिकता का संहिताकरण: न्यायपालिका में समान नैतिक मानकों को सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों के लिए एक व्यापक और लागू करने योग्य आचार संहिता विकसित करने की आवश्यकता है।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग और डिजिटल पारदर्शिता: प्रौद्योगिकी का उपयोग शिकायतों के निपटान और न्यायिक कार्यवाहियों की निगरानी में पारदर्शिता और दक्षता को बढ़ा सकता है।
    • उदाहरण: शिकायत दर्ज करने और उनकी स्थिति की निगरानी करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल स्थापित करना, जिससे समयबद्ध समाधान और अधिक जन विश्वास सुनिश्चित हो सके।

 न्यायिक शुचिता (संबंधित अवधारणा)

अवधारणा अर्थ न्यायिक निष्पक्षता से संबंध
न्यायिक सत्यनिष्ठा न्यायाधीशों द्वारा सभी कार्यों में नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों का पालन करना। यह निष्पक्षता के मूल आधारला का निर्माण करता है।
न्यायिक स्वतंत्रता न्यायपालिका की कार्यपालिका और विधायिका के हस्तक्षेप से स्वतंत्रता यह निष्पक्ष निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करता है, जो निष्पक्षता का एक प्रमुख पहलू है।
न्यायिक जवाबदेही कदाचार के लिए न्यायाधीशों को उत्तरदायी ठहराने की व्यवस्थाएँ यह निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करता है।

न्यायिक शुचिता: न्यायाधीश पर महाभियोग

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