संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजस्थान को शैक्षिक उद्देश्यों हेतु राजस्थानी भाषा को मान्यता प्रदान करने तथा प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा-आधारित शिक्षण को बढ़ावा देने का निर्देश दिया गया है।
राजस्थानी भाषा के बारे में
- राजस्थानी एक इंडो-आर्यन भाषा समूह है, जो मुख्यतः राजस्थान और आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है, जिसमें मुख्य रूप से मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावटी और हाड़ौती बोलियाँ शामिल हैं।
- सांस्कृतिक महत्त्व: राजस्थानी एक समृद्ध साहित्यिक और लोक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकगीतों, भक्ति काव्य, रंगमंच, मौखिक कथाओं और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत में परिलक्षित होती है।
- भाषायी पहचान: यद्यपि प्रशासनिक रूप से इसे प्राय: हिंदी भाषा के अंतर्गत रखा जाता है, कई विद्वान और भाषायी संस्थाएँ राजस्थानी को एक स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता प्रदान करते हैं, जिसकी अनेक बोलियाँ हैं।
- भाषायी रूप में मान्यता
- राज्य स्तर पर मान्यता: वर्ष 2003 में एक प्रस्ताव पारित कर राजस्थान विधानसभा ने राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सिफारिश की।
- शैक्षिक मान्यता: राजस्थानी भाषा को राजस्थान के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।
- संवैधानिक बहस: वर्तमान में राजस्थानी भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, जिसके कारण औपचारिक संवैधानिक मान्यता की माँग निरंतर बनी हुई है।
- साहित्य अकादमी मान्यता: साहित्य अकादमी राजस्थानी भाषा को एक स्वतंत्र साहित्यिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान करती है और राजस्थानी साहित्य के लिए पुरस्कार प्रदान करती है।
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मामले (केस) की पृष्ठभूमि
- याचिका की माँग: याचिका में REET परीक्षाओं में राजस्थानी को शामिल करने और राजस्थान में मातृभाषा-आधारित प्राथमिक शिक्षा शुरू करने की माँग की गई।
- राज्य का पक्ष: राजस्थान का तर्क था कि राजस्थानी भाषा आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध नहीं है, इसलिए शिक्षण हेतु कोई नीति ढांँचा उपलब्ध नहीं है।
- न्यायालय की प्रतिक्रिया: न्यायालय ने राज्य के “शिथिल दृष्टिकोण” अपनाने की आलोचना की और कहा कि नीति का अभाव संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का औचित्य नहीं हो सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश
- नीति निर्माण: न्यायालय ने राजस्थान को राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (NEP 2020) के अनुरूप मातृभाषा-आधारित शिक्षा पर एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया।
- राजस्थानी भाषा की मान्यता: राजस्थानी भाषा को शैक्षिक उद्देश्यों के लिए स्थानीय और क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने का निर्देश दिया गया।
- क्रमिक परिचय: राज्य को आधारभूत स्तर पर राजस्थानी भाषा को विषय और शिक्षण माध्यम दोनों के रूप में क्रमिक रूप से लागू करने के लिए कहा गया है।
न्यायिक अवलोकन
- भाषा और पहचान: न्यायालय ने कहा कि भाषा अभिव्यक्ति, पहचान और सांस्कृतिक संबद्धता का केंद्र है।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: अपरिचित भाषा में दी गई शिक्षा को सार्थक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अवधारणा के विपरीत माना गया।
- कागजी अधिकार बनाम वास्तविक अधिकार: न्यायिक अवलोकन के अनुसार, यदि संवैधानिक अधिकारों को प्रशासनिक क्रियान्वयन और नीतिगत कार्रवाई का प्राप्त नहीं होता है, तो उनका महत्त्व कम हो जाता है।
मातृभाषा आधारित शिक्षा के बारे में
- संवैधानिक मान्यता: सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, बच्चों द्वारा समझी जाने वाली भाषा में शिक्षा गरिमा, पहचान और समाज में सार्थक भागीदारी से जुड़ी हुई है।
- संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-21A: न्यायालय ने अनुच्छेद-21A के तहत शिक्षा के अधिकार की व्याख्या इस रूप में की है कि इसमें समझ में आने वाले शिक्षण के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच शामिल है।
- अनुच्छेद-19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस प्रकार विस्तारित किया गया है कि इसमें शिक्षार्थी के लिए सार्थक भाषा में सूचना प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।
- अनुच्छेद-350A: अनुच्छेद-350A राज्यों को भाषायी अल्पसंख्यक बच्चों के लिए मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करने का दायित्व प्रदान करता है।
- अनुच्छेद-14: न्यायिक अवलोकन के अनुसार, अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग को विद्यालयों में अनुमति देते हुए राजस्थानी भाषा का प्रयोग न करना, मनमाना भेदभाव हो सकता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भूमिका
- बहुभाषी शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 कम-से-कम कक्षा V तक और अधिमानतः कक्षा VIII तक घरेलू या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षण की सिफारिश करती है।
- अधिगम परिणाम: नीति यह निर्धारित करती है कि बच्चे परिचित भाषाओं में मूलभूत अवधारणाओं को बेहतर ढंग से समझते हैं, जिससे समझ और संज्ञानात्मक विकास में सुधार होता है।
- न्यायिक दृष्टांत
- कर्नाटक राज्य बनाम एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ इंग्लिश मीडियम प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स (2014): न्यायालय ने प्राथमिक स्तर पर शिक्षण के माध्यम चुनने के माता-पिता और बच्चों के अधिकार को अनुच्छेद-19(1)(a) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना।
- इंग्लिश मीडियम स्टूडेंट्स पेरेंट्स एसोसिएशन बनाम कर्नाटक राज्य (1993): न्यायालय ने कहा कि माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध छात्रों को उनकी मातृभाषा में पढ़ने के लिए बाध्य करना अनुचित है और यह संवैधानिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन है।
- अहमदाबाद सेंट जेवियर्स कॉलेज बनाम गुजरात राज्य (1974): सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-30 के तहत भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मान्यता प्रदान की, जिसमें शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और अपने शिक्षण माध्यम का निर्धारण करने का अधिकार शामिल है।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रावधान: शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29(2)(f) के अनुसार, जहाँ तक संभव हो, शिक्षण का माध्यम बच्चे की मातृभाषा में होना चाहिए।
निष्कर्ष
मातृभाषा-आधारित शिक्षा समानता, गरिमा और समावेशिता जैसे संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करती है, साथ ही अधिगम परिणामों में सुधार, सांस्कृतिक संरक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सार्थक पहुँच को बढ़ावा देती है।