संदर्भ
हाल ही में, भारत के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह तक पहुँचने की आधिकारिक अमेरिकी छूट समाप्त हो गई है, जिससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर दबाव पड़ रहा है। भारत को अब अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी का प्रबंधन करते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाना होगा।
चाबहार का रणनीतिक महत्त्व
- ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित, यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान से हटकर संबंध निर्माण की अनुमति देता है।
- भारत ने बंदरगाह में लगभग $620 मिलियन का निवेश, विशेष रूप से ‘शहीद बेहिश्ती’ (Shahid Behesti) टर्मिनल का विकास किया है।
भारत की दुविधा
भारत की मुख्य चुनौती अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को अपनी आर्थिक निर्भरता के साथ संतुलित करना है।
PW ONLYIAS विशेष (प्रमुख शब्द):
- प्रतिबंध (Sanctions): ये ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक दंड हैं। अमेरिका चाबहार जैसी ईरानी परियोजनाओं में व्यापार और निवेश रोकने के लिए, भारत सहित अन्य देशों पर दबाव बनाने हेतु इन प्रतिबंधों का उपयोग करता है।
- छूट (Waiver): पहले, अमेरिका ने भारत को चाबहार में काम जारी रखने के लिए एक विशिष्ट “छूट” दी थी।
- इसकी अनुमति इसलिए दी गई थी, क्योंकि एक स्थिर अफगानिस्तान (जिसे बंदरगाह के माध्यम से भारतीय मानवीय सहायता प्राप्त थी) अमेरिकी हितों की पूर्ति करता था।
- हालाँकि, इस छूट में एक “सनसेट क्लॉज” शामिल था, जो 26 अप्रैल, 2026 को समाप्त हो गया।
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- विकल्प A: ईरान के साथ संबंधों को बनाए रखना – भारत ने पाकिस्तान को दरकिनार करने और अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक पहुँच प्राप्त करने के लिए चाबहार बंदरगाह (विशेष रूप से शहीद बेहिश्ती टर्मिनल) में $620 मिलियन का निवेश किया है। इसे छोड़ने का अर्थ एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक गलियारे को खोना और भारी वित्तीय निवेश को बर्बाद करना होगा।
- विकल्प B: अमेरिकी दबाव के आगे झुकना – अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। अमेरिकी माँगों का विरोध करने से ‘द्वितीयक प्रतिबंध’ लग सकते हैं, जिससे भारत के व्यापक आर्थिक हितों और उसके प्राथमिक निर्यात बाजार को नुकसान पहुँच सकता है।
मुख्य बिंदु:
- अमेरिकी दबाव और प्रतिबंध: अमेरिका ने पहले छूट दी थी क्योंकि एक स्थिर अफगानिस्तान उसके हित में था। हालाँकि, छूट समाप्त होने और अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के साथ, भारत संबंधों को कम करने के लिए ‘अधिकतम दबाव’ में है।
- JCPOA पृष्ठभूमि: 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) ने शुरुआत में प्रतिबंधों में ढील दी थी, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के तहत 2017 में अमेरिकी वापसी ने उन्हें पुनः लागू कर दिया, जिससे भारत की प्रगति बाधित हुई।
- बहु-संरेखण रणनीति: भारत अमेरिका के साथ जुड़ने, चीन को प्रबंधित, यूरोप का विकास और रूस को आश्वस्त करने की नीति का पालन करता है।
- यह “कठिन मार्ग पर चलना” आवश्यक है क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है, फिर भी ईरान कनेक्टिविटी के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- वर्तमान स्थिति: भारत ने अपने कर्मचारियों को वापस बुला लिया है और शहीद बेहिश्ती टर्मिनल को ईरानी अधिकारियों को वापस सौंप दिया है, हालाँकि यह भविष्य में पुन: संबंध निर्माण के लिए खुला है।

ऐतिहासिक समयरेखा : व्यापक संबंध (2003–2026):
- 2003 – वाजपेयी युग: 2003 में, भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए अपने पहले समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
- हालाँकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका के दबाव के कारण प्रगति में देरी हुई।
- 2004–2013 – मनमोहन सिंह सरकार: इस अवधि के दौरान चाबहार बंदरगाह परियोजना पर प्रगति सीमित रही।
- फिर भी, भारत ने एक बड़ा रणनीतिक उदाहरण प्रस्तुत किया, क्योंकि सीमा सड़क संगठन (BRO) ने अफगानिस्तान में ‘ज़रंज-डेलाराम राजमार्ग’ का निर्माण किया।
- 2015 – JCPOA समझौता: 2015 में, ईरान ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (JCPOA) के तहत अपने परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण लगाने हेतु सहमत हुआ।
- फलस्वरूप, अमेरिका ने ईरान पर से प्रतिबंध हटा लिए।
- इसने एक अनुकूल वातावरण निर्मित किया, तथा भारत के लिए चाबहार परियोजना को आगे बढ़ाने का अवसर खोला।
- 2016 – मोदी युग: 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के मध्य एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
- इस समझौते ने चाबहार के माध्यम से व्यापार और सहायता गलियारे को क्रियान्वित किया।
- फलस्वरूप, परियोजना ने महत्त्वपूर्ण गति सुनिश्चित की।
- 2018–2020 – ट्रंप प्रशासन का दबाव: अमेरिका JCPOA से बाहर हो गया तथा ईरान पर पुनः प्रतिबंध लगा दिए।
- ईरान के खिलाफ ‘अधिकतम दबाव’ अभियान पुनः प्रारंभ किया गया।
- परिणामस्वरूप, भारत को ईरान से तेल आयात बंद करने और संबंधित बुनियादी ढाँचा योजनाओं को रद्द करने हेतु बाध्य होना पड़ा।
- 2026 – छूट समाप्त: 2026 में चाबहार संचालन के लिए भारत को दी गई प्रतिबंध छूट समाप्त हो गई।
- भारत ने परियोजना से अपने कर्मियों को वापस बुलाना शुरू कर दिया।
- यह शहीद बेहिश्ती टर्मिनल में अपनी भागीदारी एक ईरानी संस्था को हस्तांतरित करने पर भी विचार कर रहा है।
आगे की राह
- निरंतर राजनयिक जुड़ाव: भारत को अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को संतुलित करने के लिए अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय भागीदारों सहित सभी प्रमुख हितधारकों के साथ राजनयिक संबंधों को जारी रखना चाहिए।
- ऐसा जुड़ाव भारत को दीर्घकालिक कनेक्टिविटी लक्ष्यों की रक्षा करते हुए, भू-राजनीतिक दबावों को प्रबंधित करने में मदद करेगा।
- रणनीतिक विकल्पों को खुला रखना: भारत को ईरान के साथ भविष्य में पुन: जुड़ाव के लिए अपने रणनीतिक विकल्पों को खुला रखना चाहिए, विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं में।
- यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि चाबहार क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और मध्य एशिया तक पहुँच के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक परिसंपत्ति बना हुआ है।
- व्यापार और कनेक्टिविटी का विविधीकरण: भारत को किसी भी एक मार्ग या भू-राजनीतिक भागीदार पर निर्भरता कम करने के लिए अपने व्यापार मार्गों और कनेक्टिविटी गलियारों में विविधता लानी चाहिए।
- वैकल्पिक गलियारों को मजबूत करने और चाबहार जैसी परियोजनाओं को व्यापक नेटवर्क के साथ एकीकृत करने से लचीलापन तथा आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
निष्कर्ष
चाबहार केवल अफगानिस्तान से संबंधित नहीं है, यह ‘अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (INSTC) का प्रवेश द्वार है। हालाँकि भारत दबाव में अस्थायी रूप से पीछे हट गया है, लेकिन मध्य एशिया में अपने दीर्घकालिक कनेक्टिविटी लक्ष्यों के लिए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी प्रतिबंध छूट की समाप्ति भारत की ‘बहु-संरेखण’ की नीति का परीक्षण करती है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पर चाबहार परियोजना के स्थगन के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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