दल-बदल विरोधी कानून तथा हालिया मुद्दा

दल-बदल विरोधी कानून तथा हालिया मुद्दा 27 Apr 2026

संदर्भ

आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सहित 7 अन्य राज्यसभा सांसदों के हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने (दल-बदल) के बाद, दसवीं अनुसूची की प्रयोज्यता और संभावित अयोग्यता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।

दल-बदल विरोधी कानून की पृष्ठभूमि 

  • दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य बार-बार पार्टी बदलने के कारण होने वाली राजनीतिक अस्थिरता को रोकना है।

दल-बदल विरोधी कानून के पीछे का तर्क

  • आया राम गया राम” राजनीति पर अंकुश लगाना: राजीव गांधी सरकार के दौरान 52वें संविधान संशोधन (1985) के माध्यम से “आया राम गया राम” की राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए 10वीं अनुसूची जोड़ी गई थी।
  • प्रारंभ में, इसने ‘विभाजन’ (split – 1/3 सदस्य) और ‘विलय’ (merger – 2/3 सदस्य) की अनुमति दी थी।

मुख्य बिंदु:

  • विभाजन खंड को हटाना: 91वें संविधान संशोधन ने ‘विभाजन’ प्रावधान (पैराग्राफ 3) को समाप्त कर दिया, क्योंकि इसमें हेरफेर करना बहुत आसान था। वर्तमान में, केवल एक विलय (पैराग्राफ 4) अयोग्यता से छूट प्रदान करता है।
  • पैराग्राफ 4 : एक विलय तब मान्य होता है, जब पार्टी के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य दल बदलने के लिए सहमत हों। हालाँकि, इनके बीच एक विधिक सूक्ष्मता (nuance) मौजूद है:
    • क्रमिक पठन : मूल राजनीतिक दल का भी विलय होना चाहिए, और 2/3 विधायी सदस्यों को भी सहमत होना चाहिए।
    • वियोजक पठन : यदि 2/3 विधायी सदस्य सहमत हैं, तो मूल पार्टी के दृष्टिकोण की चिंता किए बिना इसे वैध विलय माना जाता है।
  • न्यायिक उदाहरण :
    • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य मामला : सर्वोच्च न्यायालय ने क्रमिक पठन का पक्ष लिया, और ‘टू-हेड थ्योरी’ (Two-Head Theory – एक व्यक्ति दो दलों में शामिल नहीं हो सकता) प्रस्तुत की। यह विलय खंड के दुरुपयोग को रोकता है।
    • गोवा मामला (2019/2022): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वियोजक पठन पर भरोसा किया, और केवल 2/3 विधायी सीमा के आधार पर विलय को मान्य किया।

विद्यमान चुनौतियाँ 

  • पीठासीन अधिकारी के पास अधिकार: दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता के मामलों का फैसला करने की शक्ति लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के पास होती है।
  • राजनीतिक पूर्वाग्रह की संभावना: चूँकि पीठासीन अधिकारी आमतौर पर सत्ताधारी दल या गठबंधन से जुड़े होते हैं, इसलिए पक्षपातपूर्ण निर्णय का जोखिम बना रहता है।
  • निर्णय में देरी: दल-बदल के मामलों पर निर्णय लेने में लंबे समय तक होने वाली देरी कानून की प्रभावशीलता को कम करती है, क्योंकि परिणाम अक्सर राजनीतिक परिवर्तन होने के बाद आते हैं।

आगे की राह

  • विधिक स्पष्टता की आवश्यकता: अस्पष्टता को दूर करने के लिए दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 की स्पष्ट न्यायिक या विधायी व्याख्या की आवश्यकता है।
  • स्वतंत्र निर्णय लेने वाला तंत्र: निष्पक्षता और तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए दल-बदल के मामलों का फैसला करने हेतु, एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निकाय स्थापित किया जाना चाहिए।
  • समयबद्ध प्रक्रिया: न्याय-निर्णयन प्रक्रिया को समयबद्ध बनाया जाना चाहिए, ताकि निर्णय तुरंत दिए जाएँ और प्रासंगिक बने रहें।

निष्कर्ष

मूल चर्चा यह बनी हुई है, कि क्या 10वीं अनुसूची राजनीतिक दल की अखंडता की रक्षा करती है या विधायी बहुमत  की। यह सुनिश्चित करने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, कि दल-बदल विरोधी कानून विधिक खामियों को उजागर किए बिना भारतीय राजनीति में अपने दीर्घकालिक उद्देश्य को पूरा करें।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: दसवीं अनुसूची में पैराग्राफ 4 के अस्पष्ट मसौदे ने दल-बदल विरोधी कानून को भारतीय राजनीति में केवल एक मूकदर्शक बना दिया है। हालिया राजनीतिक दल-बदल और न्यायिक घोषणाओं के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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