उच्च तापमान: भारत और बढ़ती गर्मी

उच्च तापमान: भारत और बढ़ती गर्मी 24 Apr 2026

संदर्भ:

भारत वर्त्तमान में गंभीर गर्मी संकट का सामना कर रहा है, जहाँ कम से कम आठ राज्यों में तापमान 40°C से अधिक हो गया है। इसके कारण विशेष रूप से बाहरी (आउटडोर) श्रमिकों की आजीविका पर भारी प्रभाव पड़ा है, और वर्ष 2024 में लगभग 247 अरब कार्य घंटे नष्ट होने का अनुमान है।

हीटवेव क्या है? (IMD की परिभाषाएँ)

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर हीटवेव को इस प्रकार परिभाषित करता है:

  • मैदानी क्षेत्र: जब अधिकतम तापमान 40°C तक पहुँच जाता है और सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक होता है। यदि यह सामान्य से 6.4°C से अधिक (कुल मिलाकर 46.5°C से ऊपर) हो जाए, तो इसे गंभीर हीटवेव कहा जाता है।
  • तटीय क्षेत्र: जब तापमान 37°C से अधिक हो।
  • पहाड़ी क्षेत्र: जब तापमान 30°C से अधिक हो।

परिस्थितियाँ और कारण: वर्त्तमान उच्च तापमान को पाँच मुख्य कारक प्रेरित कर रहे हैं:

  • एल नीनो प्रभाव: प्रशांत महासागर में गर्मी बढ़ने से भारतीय मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे तापमान में बढ़ोत्तरी होती है।
  • कमजोर पश्चिमी विक्षोभ: सर्दियों और वसंत की वर्षा (मावठ) की कमी से प्राकृतिक ठंडक की स्थिति क्षीण हो गई है।
  • कमजोर संवहन धाराएँ: स्थानीय वायु के ऊपर उठकर बादलों में संघनित न होने के कारण प्राकृतिक रूप से दोपहर ठंडा नहीं हो पा रहा है।
  • शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव: शहरों में कंक्रीट और डामर दिन में गर्मी को अवशोषित करते हैं जिससे शहर के आसपास के क्षेत्रों से अधिक गर्म रहते हैं।
  • वेट बल्ब तापमान: उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता का एक घातक संयोजन, जो पसीने को वाष्पित होने से रोकता है, जिससे 35°C का तापमान भी जानलेवा बन जाता है।

हीट एक्शन प्लान (HAPs) के बारे में

  • वर्त्तमान में भारत में हीट एक्शन प्लान मुख्यतः स्थानीय स्तर (राज्य या जिला) पर लागू होते हैं, न कि किसी मानकीकृत राष्ट्रीय ढाँचे के तहत।

चुनौतियाँ

  • प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण: प्रयास आमतौर पर हीटवेव जैसी घटना होने के बाद ही शुरू किए जाते हैं, बजाय इसके कि पहले से सक्रिय (प्रोएक्टिव) तैयारी की जाए।
  • वित्तीय कमी: गर्मी से निपटने के लिए दीर्घकालिक और स्थायी वित्त पोषण का अभाव है।
  • असंगठित क्षेत्र की संवेदनशीलता: असंगठित क्षेत्र के श्रमिक कम सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य जोखिमों और आय हानि का सबसे अधिक बोझ झेलते हैं।
  • शहरी पुनः हरितीकरण का अभाव: शहरों का विस्तार लगातार जारी है, लेकिन ऊष्मा द्वीप प्रभाव को कम करने के लिए पर्याप्त हरित क्षेत्रों का विकास नहीं किया जा रहा है।

आगे की राह

  • सक्रिय योजना: संकट आने से पहले उपाय लागू करना।
  • स्थायी अवसंरचना: मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ और श्रमिकों की सुरक्षा के लिए हीट सुरक्षा कानून का निर्माण करना।
  • शहरी हरितकरण: शहरों में पेड़ लगाना और स्थानीय पारिस्थितिकी को पुनर्स्थापित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: जीवाश्म ईंधनों से दूर जाने के लिए जलवायु वित्त और तकनीक तक पहुँच प्राप्त करने हेतु कोलंबिया कोएलिशन (Columbia Coalition) जैसे समूहों में शामिल होना।

निष्कर्ष

भारत में हीटवेव संकट बढ़ती जलवायु संवेदनशीलता को दर्शाता है, जिसका स्वास्थ्य, आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। वर्त्तमान प्रयास, जो मुख्यतः प्रतिक्रियात्मक और अपर्याप्त वित्त पोषित हैं, संरचनात्मक कारणों को संबोधित करने में विफल हैं। यदि दीर्घकालिक निवेश, सक्रिय शासन और वैश्विक सहयोग नहीं किया गया, तो भारत के कुछ हिस्से मानव जीवन के लिए असहनीय हो सकते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: भारत में मानसून-पूर्व हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता केवल एक मौसम संबंधी घटना नहीं है, बल्कि एक जटिल सामाजिक-आर्थिक संकट है। भारत के हीट एक्शन प्लान (HAPs) की संरचनात्मक सीमाओं का विश्लेषण कीजिए तथा इस संकट के समाधान हेतु व्यापक उपाय सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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