संदर्भ:
भारत वर्त्तमान में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है (2024-25 में 6.5% वास्तविक GDP वृद्धि)। हालाँकि, इस विकास की स्थिरता को लेकर कई चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं।
- देश के पास 15-59 वर्ष आयु वर्ग की विशाल युवा आबादी के रूप में एक बड़ा जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) है, लेकिन दीर्घकालिक समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए अर्थव्यवस्था को केवल वृद्धि पर नहीं, बल्कि उत्पादकता और मानव पूंजी निवेश पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
तीन मुख्य संकेतक: विशेषज्ञ की अंतर्दृष्टि
श्रम बाज़ार को समझने के तीन मुख्य संकेतक
- श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): कार्यशील आयु की उस जनसंख्या का प्रतिशत जो या तो रोजगार में है या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रही है।
- कार्यबल भागीदारी दर (WPR): जनसंख्या का वह प्रतिशत जो वास्तव में कार्यरत है।
- बेरोज़गारी दर: LFPR और WPR के बीच का अंतर, अर्थात वे लोग जो कार्य करना चाहते हैं लेकिन उन्हें कार्य नहीं मिल रहा।
भारत में युवाओं का श्रम बाज़ार में प्रवेश
- भारत का जनसांख्यिकीय लाभ कार्यबल में बड़ी संख्या में युवाओं के प्रवेश द्वारा परिलक्षित होता है।
- प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख से 1 करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। यह पीढ़ी भारत के इतिहास की सबसे अधिक शिक्षित पीढ़ी है, फिर भी अर्थव्यवस्था इनके लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने में संघर्ष कर रही है।
अमर्त्य सेन के विचार
- अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा कि मानव पूँजी में निवेश के बिना आर्थिक विकास स्थाई नहीं हो सकता।
- यदि कोई देश आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ लोगों की शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करता, तो विकास की गति अंततः धीमी पड़ जाएगी।
प्रमुख संकेतक [PLFS 2025]
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2025 के आंकड़ों के अनुसार:
- LFPR: 59%
- WPR: 57%
- बेरोज़गारी दर: 3%
रोजगार की गुणवत्ता में बदलाव
अधिक स्थिर रोजगार की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है:
- नियमित वेतनभोगी रोजगार: 22% से बढ़कर 24% हो गई हैं, जिससे रोजगार की स्थिरता, PF और बीमा जैसी सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।
- स्वरोज़गार: 58% से घटकर 56% हो गया है, जिसे औपचारिक रोजगार की दिशा में सकारात्मक बदलाव माना जाता है।
महिला LFPR में वृद्धि की प्रवृत्ति
- महिलाओं की भागीदारी, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, नए उच्च स्तर तक पहुँच रही है। सितंबर 2025 तक ग्रामीण महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) अपने सर्वोच्च स्तर पर है, जो यह दर्शाती है कि अधिक महिलाएँ घर से बाहर निकलकर अर्थव्यवस्था में योगदान दे रही हैं।
महिलाओं की आय में अधिक वृद्धि
- वेतन वृद्धि के संदर्भ में, वेतनभोगी पदों पर कार्यरत महिलाओं के वेतन में 7% वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों के लिए यह वृद्धि दर 6% रही।
संरचनात्मक परिवर्तन – लुईस विकास मॉडल (Lewis Growth Model)
- भारत कृषि से अलग एक संरचनात्मक बदलाव का अनुभव कर रहा है। कृषि क्षेत्र में रोजगार 50% से घटकर 43% रह गया है। हालाँकि, पारंपरिक मॉडलों (जैसे Lewis Model) के विपरीत, भारत ने विनिर्माण क्षेत्र को “पुल” के रूप में पर्याप्त विकसित किए बिना सीधे सेवा क्षेत्र की ओर छलांग लगाई है, जो संपत्ति का सृजन तो करता है लेकिन “बड़े पैमाने पर रोजगार” प्रदान करने की क्षमता को सीमित करता है।
चुनौतियाँ
- डिग्री और रोजगार योग्यता में असंगति: वर्ष 2004 से 2023 के बीच प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख छात्र स्नातक हुए, लेकिन केवल 28 लाख को ही रोजगार मिल पाई। कॉलेज विद्यार्थियों को “उद्योग के लिए तैयार” किए बिना ही डिग्रियाँ प्रदान कर रहे हैं।
- कौशल संकट: भारत के 15–59 आयु वर्ग में केवल 4% लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जबकि दक्षिण कोरिया में यह 96% और जर्मनी में 75% है।
- महिलाओं पर दोहरा बोझ: महिलाओं को “दोहरी चुनौती” का सामना करना पड़ता है, जिसमें उन्हें वेतनभोगी कार्य के साथ-साथ बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसे बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों का भारी बोझ भी संभालना पड़ता है। जहाँ पुरुष अक्सर कौशल उन्नयन (upskilling) के लिए नौकरी छोड़ते हैं, वहीं महिलाएँ अधिकतर घरेलू जिम्मेदारियों के कारण कार्य छोड़ने को मजबूर होती हैं।
- NEET समस्या: 15–29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 25% (हर 4 में से 1) युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण (NEET) में शामिल नहीं हैं। यह समूह न तो रोजगार की तलाश कर रहा है और न ही अपने कौशल में सुधार कर रहा है, जिससे यह एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक जोखिम उत्पन्न करता है।
जनसांख्यिकीय अवसर की खिड़की बंद हो रही है
- “जनसांख्यिकीय लाभांश” एक बार मिलने वाला ऐतिहासिक अवसर है। भारत के लिए यह लाभकारी खिड़की वर्ष 2030 के बाद बंद होना शुरू हो जाएगी। यदि देश इस कार्यबल का अभी उपयोग नहीं करता है, तो वह “ऐतिहासिक अवसर” को हमेशा के लिए खो देगा।
आगामी तीन चुनौतियाँ
श्रम बाजार को तीन प्रमुख वैश्विक परिवर्तन खतरे में डाल रहे हैं:
- AI और स्वचालन (Automation): पारंपरिक रोजगरों को सीमित कर रहा है।
- हरित संक्रमण (Green Transition): जीवाश्म ईंधन से हरित ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए बड़े पैमाने पर पुनः प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।
- भू-राजनीतिक परिवर्तन: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन (जैसे China+1 रणनीति) के कारण भारत को नए विनिर्माण अवसरों के लिए तैयार रहना होगा।
चार प्राथमिक हस्तक्षेप
- पाठ्यक्रम का पुनर्संरेखन: शिक्षा प्रणाली को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना।
- लैंगिक-संवेदनशील नीतियाँ: अधिक महिलाओं को कार्यबल में प्रवेश करने और बने रहने में सक्षम बनाने के लिए क्रेच और डे-केयर केंद्र जैसी सहायता प्रणालियों को लागू करना।
- NEET युवाओं के लिए अप्रेंटिसशिप: निष्क्रिय 25% युवाओं को पुनः उत्पादक अर्थव्यवस्था में लाने के लिए कार्यस्थल पर प्रशिक्षण (on-the-job training) प्रदान करना।
- हरित क्षेत्रों में निवेश: सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) विनिर्माण और जलवायु-लचीले (climate-resilient) क्षेत्रों में भूमिकाओं के लिए युवाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित करना।
निष्कर्ष
- भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ ऊँची विकास दरें श्रम बाज़ार की गहरी संरचनात्मक समस्याओं को छिपा रही हैं। “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल GDP वृद्धि पर नहीं, बल्कि श्रम उत्पादकता और मानव पूँजी के संवर्धन पर केंद्रित करना होगा।
- NEET संकट का समाधान करना, कौशल अंतर को कम करना और महिलाओं की भागीदारी को समर्थन देना केवल सामाजिक आवश्यकताएँ ही नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यताएँ भी हैं, अन्यथा, जनसांख्यिकीय लाभांश भविष्य में जनसांख्यिकीय बोझ बन सकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: PLFS में उत्साहजनक रुझानों के बावजूद, भारत का श्रम बाज़ार ‘NEET’ युवाओं और व्यापक लैंगिक असमानता जैसी संरचनात्मक बाधाओं का सामना कर रहा है। विश्लेषण कीजिए। उत्पादकता-आधारित आर्थिक विकास सुनिश्चित करने हेतु नीतिगत उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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