संदर्भ:
अत्यधिक गर्मी/तापमान के प्रति भारत की प्रतिक्रिया सतही, प्रतिक्रियात्मक उपायों से हटकर एक अधिक संरचनात्मक दृष्टिकोण की ओर बढ़ रही है, जो एक प्रस्तावित ‘राष्ट्रीय कूलिंग डॉक्ट्रिन’ पर केंद्रित है।
वर्तमान प्रतिक्रियाओं की विफलता:
- बार-बार आने वाली लू (हीटवेव्स): भारत विगत 10-12 वर्षों से बार-बार अत्यधिक गर्मी की घटनाओं का गवाह बन रहा है।
- नियमित दिशानिर्देश: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) वार्षिक हीटवेव दिशानिर्देश जारी करता है, जिसे राज्य अक्सर बिना किसी ठोस नवाचार के दोहराते हैं।
- अल्पकालिक उपाय: वर्तमान प्रतिक्रियाएँ काफी हद तक अस्थायी हस्तक्षेपों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जैसे कि पानी के कियोस्क, छायादार बस स्टॉप और लोगों को घरों के अंदर रहने की सलाह देना।
- कमजोर श्रमिकों की उपेक्षा: मौजूदा उपाय गिग वर्कर्स (gig workers), अनौपचारिक श्रमिकों, कारखाने के श्रमिकों और गोदाम के कर्मचारियों की रक्षा करने में अपर्याप्त हैं, जिनकी आजीविका के लिए लंबे समय तक गर्मी में रहना पड़ता है।
राष्ट्रीय कूलिंग डॉक्ट्रिन
- अधिकार के रूप में कूलिंग: कूलिंग (शीतलन) को एक विलासिता की बजाय एक बुनियादी अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य की आवश्यकता के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
- कार्यस्थल के मानक: सरकार को कारखानों, वाणिज्यिक रसोइयों, गोदामों और कार्यालय स्थानों के लिए न्यूनतम कूलिंग मानक निर्धारित करने चाहिए।
- कठोर प्रवर्तन: बिजली लागत की चिंताओं के कारण होने वाले गैर-अनुपालन को रोकने के लिए प्रभावी कार्यान्वयन के तहत कठोर निरीक्षणों की आवश्यकता है।
- जैविक सीमा : 35°C से अधिक का निरंतर शारीरिक तापमान मानव कार्यप्रणाली को गंभीर रूप से बाधित कर सकता है, जिससे कूलिंग एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बन जाता है।
संरचनात्मक और स्वदेशी समाधान:
- पैसिव कूलिंग : इमारतों में पैसिव कूलिंग तकनीकों को शामिल किया जाना चाहिए जैसे कि परावर्तक सफेद छतें और ऊष्मा प्रतिरोधी डिजाइन।
- स्वदेशी एसी डिजाइन: भारत को आर्द्र गर्मी की स्थिति (humid heat conditions) और अस्थिर बिजली आपूर्ति वाले वातावरण के अनुकूल ऊर्जा-कुशल एयर-कंडीशनिंग सिस्टम की आवश्यकता है।
- डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम: सिंगापुर और दुबई के मॉडल के समान केंद्रीकृत कूलिंग नेटवर्क, कुशल बड़े पैमाने पर शहरी कूलिंग प्रदान कर सकते हैं।
नीतिगत और वित्तीय ढाँचा:
- राष्ट्रीय आपदा के रूप में हीटवेव: अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग ने हीटवेव को “राष्ट्रीय आपदा” के रूप में वर्गीकृत करने की सिफारिश की है।
- समर्पित फंडिंग: ऐसा वर्गीकरण राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के माध्यम से गर्मी प्रबंधन के लिए समर्पित केंद्रीय वित्तपोषण को सक्षम करेगा।
- साइलेंट किलर के रूप में गर्मी: बाढ़ या भूकंप के विपरीत, गर्मी से होने वाली मौतें महत्त्वपूर्ण मृत्यु दर का कारण बनने के बावजूद अक्सर कम दिखाई देती हैं, जिसके लिए अधिक नीतिगत प्राथमिकता की आवश्यकता होती है।
- सफलता से सीखना:
- अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान (HAP): इसे एक सफल स्थानीय मॉडल के रूप में उद्धृत किया गया है जिसने कथित तौर पर हजारों लोगों की जान बचाई है।
- अहमदाबाद ने 2010 की विनाशकारी हीटवेव के बाद अपना हीट एक्शन प्लान विकसित किया, जिसने 1,300 से अधिक अतिरिक्त मौतों का कारण बना था। यह दक्षिण एशिया में पहला नगरपालिका HAP था और तब से अत्यधिक गर्मी की तैयारी के लिए एक वैश्विक मॉडल बन गया है।
निष्कर्ष:
भारत को अल्पकालिक हीटवेव प्रतिक्रियाओं से हटकर एक व्यापक कूलिंग रणनीति की ओर बढ़ने की आवश्यकता है जो थर्मल सुरक्षा (thermal safety) को सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम और शहरी शासन की प्राथमिकता के रूप में मानती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में हीट एक्शन प्लान अपनी सीमा पर पहुंच चुके हैं। इस कथन का गंभीर रूप से परीक्षण कीजिए और एक प्रणालीगत नीतिगत प्रतिक्रिया के रूप में राष्ट्रीय कूलिंग डॉक्ट्रिन की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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