मानव–वन्यजीव संघर्ष क्षेत्रों में सह-अस्तित्व का प्रबंधन

मानव–वन्यजीव संघर्ष क्षेत्रों में सह-अस्तित्व का प्रबंधन 13 May 2026

संदर्भ:

मानव–वन्यजीव संघर्ष आवास विनाश, अवसंरचना विस्तार और वन पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते मानव दबाव के कारण एक प्रमुख सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौती के रूप में उभरा है।

मानव–वन्यजीव संघर्ष के बारे में

  • मानव–वन्यजीव संघर्ष उन परिस्थितियों को संदर्भित करता है, जहाँ मनुष्यों और जंगली जानवरों के बीच होने वाली अंतःक्रियाएँ मानव जीवन, आजीविका, संपत्ति या वन्यजीव आबादी पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।
  • यह संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब कृषि, शहरीकरण, अवसंरचना विकास तथा वनों की कटाई जैसी बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ प्राकृतिक आवासों में अतिक्रमण करती हैं, जिससे मनुष्यों और जंगली जानवरों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क बढ़ जाता है।

मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण

  • आवास खंडन: राजमार्गों, रिसॉर्ट्स, खनन तथा शहरीकरण जैसी विकास गतिविधियाँ वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) और प्राकृतिक प्रवासन मार्गों को बाधित करती हैं।
  • संसाधनों की कमी: प्राकृतिक शिकार, जल उपलब्धता और वन संसाधनों में गिरावट के कारण जंगली जानवर भोजन और जीवन-निर्वाह की तलाश में मानव बस्तियों की ओर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
    • परिणामस्वरूप, हाथी अक्सर गन्ने के खेतों में घुस जाते हैं, जबकि तेंदुए वन के पास पालतू पशुओं पर हमला करते हैं, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
  • जनसंख्या दबाव: तेजी से बढ़ती जनसंख्या और वन क्षेत्रों के आसपास मानव बस्तियों के विस्तार ने वन्यजीव आवासों और मानव निवास के बीच पारिस्थितिकीय बफर को कम कर दिया है।
    • वनों के निकट अतिक्रमण, कृषि, सड़कें और अवसंरचना विकास मनुष्यों और जंगली जानवरों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को बढ़ाते हैं, जिससे संघर्ष और अधिक तीव्र हो जाते हैं।

संघर्ष प्रबंधन संबंधित वैश्विक मॉडल

वैश्विक मॉडल प्रमुख विशेषताएँ महत्व
बोत्सवाना-नामीबिया मॉडल सामुदायिक आधारित संरक्षण को बढ़ावा देता है, जिसमें स्थानीय समुदायों को वन्यजीव एवं वन संसाधनों से प्राप्त पर्यटन राजस्व का हिस्सा दिया जाता है। स्थानीय लोगों को वन्यजीव संरक्षण और संरक्षण गतिविधियों में भाग लेने हेतु आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है, जिससे वे जानवरों को नुकसान पहुँचाने के बजाय उनकी रक्षा करते हैं।
कोस्टा रिका मॉडल विकास परियोजनाओं में पारिस्थितिक प्रभाव आकलन (Ecological Impact Assessment) किया जाता है ताकि अवसंरचना विस्तार के दौरान वन्यजीव आवास एवं प्रवासन गलियारे प्रभावित न हों। वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण सुनिश्चित कर विकास एवं पारिस्थितिकीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायता करता है।
फिनलैंड मॉडल वन्यजीव हमलों से हुए नुकसान के लिए किसानों एवं पशुपालकों को त्वरित और प्रभावी मुआवजा प्रदान किया जाता है। स्थानीय समुदायों में असंतोष कम होता है तथा जंगली जानवरों की प्रतिशोधात्मक हत्या की घटनाएँ में कमी आती हैं।

भारत में कार्यरत वर्त्तमान उपाय

  • कानूनी और प्रशासनिक उपाय: भारत ने वन्यजीवों को कानूनी संरक्षण प्रदान करने तथा पूरे देश में संरक्षण प्रयासों को विनियमित करने के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू किया है।
    • सरकार ने संवेदनशील क्षेत्रों में सौर बाड़बंदी लगाई है और मनुष्यों तथा जंगली जानवरों के बीच सीधे संपर्क को कम करने के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ शुरू की हैं।
    • विभिन्न राज्य सरकारें फसल क्षति, पशुधन हानि और वन्यजीवों के हमलों से होने वाली मानव मृत्यु या चोट के लिए किसानों और स्थानीय समुदायों को मुआवज़ा भी प्रदान करती हैं।
  • विद्यमान चुनौतियाँ: संरक्षण उपायों की प्रभावशीलता मुआवजे में देरी के कारण सीमित हो जाती है, जिससे प्रभावित समुदायों में अक्सर असंतोष उत्पन्न होता है।
    • कमज़ोर प्रवर्तन और खराब क्रियान्वयन के कारण वन्यजीव संरक्षण नीतियों का प्रभाव जमीनी स्तर पर कम हो जाता है।
    • मौजूदा तकनीकें जैसे सौर बाड़बंदी और चेतावनी प्रणालियाँ तकनीकी सीमाओं का सामना करती हैं, विशेषकर घनी आबादी वाले वन-सीमा क्षेत्रों में।
  • जलवायु परिवर्तन: एक खतरा बढ़ाने वाला कारक: बढ़ते तापमान, जल स्रोतों का सूखना और संसाधनों में कमी मनुष्यों और जानवरों दोनों को भोजन और जल की तलाश में नए क्षेत्रों की ओर धकेलेगा। इससे मानव–वन्यजीव संघर्ष में काफी वृद्धि होगी।
    • खतरा बढ़ाने वाला’ (Threat Multiplier) शब्द का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?
      • यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन नए संघर्ष उत्पन्न नहीं करता, बल्कि पहले से मौजूद संघर्षों को और बढ़ा देता है।

आगे की राह

  • वन्यजीव गलियारों का संरक्षण: वन्यजीव गलियारों का संरक्षण और पुनर्स्थापन किया जाना चाहिए ताकि जानवर बिना मानव बस्तियों में प्रवेश किए वन आवासों के बीच सुरक्षित रूप से आवाजाही कर सकें।
  • भूमि उपयोग योजना में सुधार: बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ, राजमार्ग और शहरी विस्तार वैज्ञानिक तरीके से योजनाबद्ध होने चाहिए ताकि आवास विखंडन और पारिस्थितिक व्यवधान से बचा जा सके।
  • त्वरित मुआवजा तंत्र: फसल क्षति, पशुधन हानि और मानव चोट के लिए मुआवजा शीघ्र और पारदर्शी रूप से प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वन्यजीवों के प्रति शत्रुता को कम किया जा सके।
  • सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना: स्थानीय समुदायों को सहभागी वन एवं वन्यजीव प्रबंधन प्रथाओं के माध्यम से संरक्षण में सक्रिय हितधारक के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
  • वन-सीमा क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाना: जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय आबादी को वन्यजीवों के व्यवहार, सुरक्षा उपायों और सतत सह-अस्तित्व की प्रथाओं के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
  • सामुदायिक आधारित वन प्रबंधन अपनाना: समुदाय-नेतृत्व वाले वन शासन मॉडल स्थानीय ज्ञान को सतत संसाधन प्रबंधन प्रथाओं के साथ जोड़कर संरक्षण के परिणामों में सुधार कर सकते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict – HWC) अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक (socio-ecological) चुनौती बन चुका है। भारत में बढ़ते HWC के कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा सतत सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने हेतु सफल वैश्विक मॉडलों पर आधारित बहु-आयामी (multi-pronged) दृष्टिकोण सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

मानव–वन्यजीव संघर्ष क्षेत्रों में सह-अस्तित्व का प्रबंधन

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