संदर्भ:
ईरान पर इजरायली-अमेरिकी हमले और बढ़ते अमेरिकी आर्थिक व भू-राजनीतिक दबाव के बीच, यूरोप के साथ हालिया रक्षा और व्यापार साझेदारी के बावजूद अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने की भारत की क्षमता पर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
ईरान संघर्ष और संयुक्त राज्य अमेरिका का दबाव:
- भारत ईरान में अपनी महत्त्वपूर्ण जरूरतों और संयुक्त राज्य अमेरिका की माँगों के मध्य फंसा हुआ है। जबकि अमेरिका ने अपने चल रहे संघर्ष के कारण भारत पर ईरान के साथ संबंधों को पूरी तरह से तोड़ने का दबाव डाला है, भारत कई कारणों से ईरान पर निर्भर बना हुआ है:
- ऊर्जा और कनेक्टिविटी: भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और चाबहार बंदरगाह के लिए ईरान की आवश्यकता है, जो पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए मध्य एशिया और अफगानिस्तान के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है।
- भू-राजनीति: ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है, जो इसे क्षेत्रीय संतुलन में भारत के लिए एक रणनीतिक भागीदार बनाताbox है।
- प्रत्यक्ष टकराव: भारत की रणनीतिक स्थिति को एक बड़ा झटका तब लगा जब एक अमेरिकी पनडुब्बी ने एक ईरानी जहाज पर हमला किया जिसने अभी-अभी भारत में अभ्यास पूरा किया था और वह घर लौट रहा था, जिससे मेजबान के रूप में भारत की भूमिका के प्रति सम्मान की कमी दिखाई देती है।
- विशिष्ट अमेरिकी माँगें: अमेरिका सक्रिय रूप से माँग कर रहा है कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करे, चाबहार बंदरगाह को छोड़ दे और ब्रिक्स (BRICS) ढाँचे के भीतर डॉलर के किसी भी विकल्प को अपनाने से बचे।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौतियाँ:
- गुट/समूह आधारित मानसिकता: हालाँकि भारत ने ऐतिहासिक रूप से शक्ति गुटों में शामिल होने से मना किया है (जैसे- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दौरान), वर्तमान ध्रुवीकृत दुनिया भारत को एक विशिष्ट कैंप, विशेष रूप से अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी कैंप की ओर धकेल रही है।
- रक्षा और प्रौद्योगिकी सीमाएँ: भारत ने अमेरिका और रूस पर निर्भरता कम करने के लिए डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल विमानों के सौदे जैसे अपने रक्षा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है।
- हालाँकि, फ्रांस स्रोत कोड (source codes) और एल्गोरिदम जैसी मुख्य तकनीक साझा करने से इनकार करता है, जिसका अर्थ है कि भारत अभी तक इन उन्नत विमानों का घरेलू स्तर पर उत्पादन नहीं कर सकता है।
- यूरोपीय संघ (EU) के साथ असमानता: यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, यूरोपीय संघ अक्सर भारत को एक समान भागीदार के रूप में मानने में विफल रहता है, इसके बजाय वह इसे एक विकासशील या ग्लोबल साउथ देश के नजरिए से देखता है।
- एकध्रुवीय बनाम बहुध्रुवीय विश्व: भारत एक बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करता है जहाँ शक्ति विभिन्न देशों के बीच वितरित हो, लेकिन अमेरिका इस तरह से काम करना जारी रखता है जैसे कि दुनिया एकध्रुवीय हो, जिसमें वह खुद प्रमुख महाशक्ति हो।
अमेरिकी विश्वसनीयता और ताइवान का सबक:
- अमेरिका-चीन विरोधाभास: जहाँ अमेरिका जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे सहयोगियों को चीन के साथ गहरे जुड़ाव से बचने का आग्रह करता है, वहीं उसने अमेरिकी कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए चीन के साथ सीधे आर्थिक सौदे भी किए हैं।
- रणनीतिक अस्पष्टता: ताइवान की स्थिति एक चेतावनी के रूप में कार्य करती है।
- समर्थन के पिछले संकेतों के बावजूद, ताइवान को डर है कि उच्च स्तरीय अमेरिका-चीन जुड़ाव के बाद अमेरिका पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं हो सकता है, जिससे सुरक्षा मामलों में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को बल मिलता है।
आगे की राह:
- बहु-संरेखण सिद्धांत (Multi-alignment Doctrine): भारत को बहु-संरेखण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, और एक साथ कई शक्ति केंद्रों के साथ जुड़ना चाहिए।
- चीन को संतुलित करना: भारत केवल अमेरिकी समर्थन की उम्मीदों पर चीन के साथ स्थायी टकराव नहीं झेल सकता।
- यदि अमेरिका और चीन के बीच कोई समझौता हो जाता है, तो भारत रणनीतिक रूप से असुरक्षित हो सकता है; इसलिए, सीमा पर स्थिरता बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है।
- प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताएँ: किसी भी एकल शक्ति गुट पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को भू-आर्थिक विसंयोजन (geo-economic decoupling), रणनीतिक हेजिंग (strategic hedging) और तकनीकी संप्रभुता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
निष्कर्ष:
ईरान संघर्ष इस बात को रेखांकित करता है कि यूरोप के साथ बढ़ते जुड़ाव के बावजूद, भारत बड़े भू-राजनीतिक संकट के क्षणों में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए यूरोपीय शक्तियों पर भरोसा नहीं कर सकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत संयुक्त राज्य अमेरिका का एक स्वाभाविक सहयोगी है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के संदर्भ में इस कथन का गंभीर रूप से परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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