मोंगला बंदरगाह (Mongla Port)

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चीन और बांग्लादेश ने जून 2026 में मोंगला बंदरगाह के निकट एक आर्थिक क्षेत्र (Economic Zone) के विकास हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसने पूर्व में प्रस्तावित भारत-समर्थित परियोजना का स्थान ले लिया है।
मोंगला बंदरगाह के बारे में
- मोंगला बंदरगाह बांग्लादेश का चट्टोग्राम (चिटगाँव) के बाद दूसरा सबसे बड़ा समुद्री बंदरगाह है।
- यह बंदरगाह बागेरहाट जिले में पासुर (Pasur) और मोंगला नदियों के संगम पर, बंगाल की खाड़ी से लगभग 62 किमी. उत्तर में स्थित है।
- यह सुंदरबन मैंग्रोव वन, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, से घिरा हुआ है।
- सामरिक महत्त्व
- मोंगला बंदरगाह बंगाल की खाड़ी तक समुद्री पहुँच प्रदान करता है तथा हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों के निकट स्थित होने के कारण सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- इसमें चीन की भागीदारी उसकी बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) को सुदृढ़ करती है तथा बंगाल की खाड़ी एवं व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में उसकी सामरिक उपस्थिति का विस्तार करती है।
- यह विकास भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी तथा इंडो-पैसिफिक हितों के लिए सामरिक निहितार्थ रखता है।
- भारत–बांग्लादेश परियोजना का प्रतिस्थापन
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- वर्ष 2026 का यह समझौता मोंगला बंदरगाह के निकट प्रस्तावित भारत-समर्थित आर्थिक क्षेत्र का स्थान लेता है।
- 2015 में भारत और बांग्लादेश ने चट्टोग्राम तथा मोंगला बंदरगाहों के उपयोग पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।
- इस MoU के तहत जलमार्ग, रेलमार्ग एवं सड़क मार्ग के माध्यम से बांग्लादेश होकर भारतीय वस्तुओं का परिवहन पूर्वोत्तर राज्यों तक सुगम बनाया गया।
- मोंगला आर्थिक क्षेत्र, जिसे मूल रूप से भारत के लिए आरक्षित किया गया था, को वर्ष 2025 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा सूची से हटा दिया गया।
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ग्रामीण आंतरिक लेखा-परीक्षा पोर्टल
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केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा प्रौद्योगिकी-संचालित सुशासन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ग्रामीण आंतरिक लेखा-परीक्षा पोर्टल (Rural Internal Audit Portal) का शुभारंभ किया है।
ग्रामीण आंतरिक लेखा-परीक्षा पोर्टल के बारे में
- ग्रामीण आंतरिक लेखा-परीक्षा पोर्टल एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence–AI) सक्षम, क्लाउड-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो ग्रामीण विकास योजनाओं की आंतरिक लेखा-परीक्षा की संपूर्ण प्रक्रिया का प्रबंधन करता है।
- नोडल निकाय: इस पोर्टल की परिकल्पना ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत मुख्य लेखा नियंत्रक (Chief Controller of Accounts) के कार्यालय द्वारा की गई है तथा इसका विकास राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के सहयोग से किया गया है।
- प्रमुख विशेषताएँ
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- एंड-टू-एंड डिजिटल लेखा-परीक्षा प्रबंधन: यह पोर्टल लेखा-परीक्षा योजना, क्षेत्रीय निरीक्षण, रिपोर्ट निर्माण, कार्रवाई प्रतिवेदन तथा अभिलेख प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया का डिजिटलीकरण करता है, जिससे कागज-आधारित विखंडित प्रणाली का स्थान एकीकृत डिजिटल प्रणाली लेती है।
- जोखिम-आधारित एवं अनुपालन लेखा-परीक्षा: यह उच्च-जोखिम वाली इकाइयों के लिए जोखिम-आधारित लेखा-परीक्षा तथा वित्तीय अनुशासन एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने हेतु अनुपालन लेखा-परीक्षा को एकीकृत करता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम विश्लेषण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं मशीन लर्निंग का उपयोग पूर्वानुमानित जोखिम आकलन, पैटर्न रिकग्निशन तथा वित्तीय अनियमितताओं एवं संसाधन-रिसाव की प्रारंभिक पहचान के लिए किया जाता है।
- रियल-टाइम निगरानी एवं भू-स्थानिक डैशबोर्ड: यह प्लेटफार्म लेखा-परीक्षा की प्रगति की रियल-टाइम निगरानी, लंबित कार्यवाहियों की स्वचालित एस्केलेशन तथा बेहतर प्रशासनिक पर्यवेक्षण हेतु भू-स्थानिक डैशबोर्ड उपलब्ध कराता है।
- महत्त्व: यह पोर्टल लोक वित्तीय प्रबंधन को सुदृढ़ करता है, पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देता है तथा डेटा-आधारित गवर्नेंस के माध्यम से ग्रामीण विकास की प्रमुख योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करता है।
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एनीमिया मुक्त भारत अभियान 2.0 (Anaemia Mukt Bharat Abhiyaan 2.0 AMB 2.0)

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा संशोधित एनीमिया मुक्त भारत अभियान (AMB) के दिशा-निर्देश प्रारंभ किए जाएँगे, जिनमें 7×7×7 रणनीति, विस्तारित लाभार्थी दायरा, आहार संबंधी हस्तक्षेप तथा डिजिटल निगरानी व्यवस्था शामिल होगी।
एनीमिया मुक्त भारत अभियान (AMB) के अंतर्गत नए प्रावधान
- विस्तारित 7×7×7 रणनीति”: कार्यक्रम को पूर्व की 6×6×6 रणनीति से विस्तारित कर 7×7×7 ढाँचे में परिवर्तित किया गया है। इसमें कम जन्म-भार (LBW) वाले शिशुओं (0–6 माह) को एनीमिया की प्रारंभिक रोकथाम हेतु एक नए लाभार्थी समूह के रूप में शामिल किया गया है:
- 7×7×7 रणनीति में 7 लक्षित लाभार्थी समूह, 7 प्रमुख हस्तक्षेप तथा 7 संस्थागत तंत्र शामिल हैं।
- सात लक्षित लाभार्थी समूह: यह रणनीति संपूर्ण जीवन-चक्र (Life Cycle) को शामिल करती है—
- 6–59 माह के बच्चे, 5–9 वर्ष के बच्चे, 10–19 वर्ष के किशोर एवं किशोरियाँ, प्रजनन आयु वर्ग (WRA) (15–49 वर्ष) की महिलाएँ, गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली महिलाएँ तथा कम जन्म-भार (LBW) वाले शिशु (0–6 माह)।
- पोषण एवं उपचार को सुदृढ़ करना: ‘ईटिंग राइट (Eating Right)’ पहल के माध्यम से आयरन (Iron) से भरपूर एवं विविधतापूर्ण आहार को बढ़ावा दिया जाएगा। वहीं, गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं में गंभीर एनीमिया के मामलों का उपचार इंट्रावीनस आयरन थेरेपी (Intravenous Iron Therapy) जैसे फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज (Ferric Carboxymaltose) एवं आयरन सुक्रोज (Iron Sucrose) द्वारा किया जाएगा।
- T4 दृष्टिकोण के माध्यम से डिजिटल निगरानी: कार्यक्रम में पूर्व के टेस्ट, ट्रीट एंड टॉक (T3) दृष्टिकोण के स्थान पर टेस्ट, ट्रीट, टॉक एंड ट्रैक (T4) दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसके अंतर्गत जननी (JANANI), RBSK, U-WIN तथा प्रस्तावित AMB अभियान पोर्टल के माध्यम से लाभार्थियों की डिजिटल ट्रैकिंग की जाएगी।
एनीमिया मुक्त भारत (AMB) के बारे में
- एनीमिया मुक्त भारत (AMB), भारत सरकार की प्रमुख पहल (Flagship Initiative) है, जिसका उद्देश्य निवारक, नैदानिक, पोषण संबंधी तथा उपचारात्मक हस्तक्षेपों के माध्यम से संपूर्ण जीवन-चक्र में एनीमिया की व्यापकता को कम करना है।
- प्रारंभ: इस कार्यक्रम का शुभारंभ वर्ष 2018 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा पोषण अभियान के अंतर्गत किया गया। इसमें पोषण संबंधी एनीमिया से निपटने के लिए जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया।
- प्रमुख लक्ष्य: इस कार्यक्रम का लक्ष्य बच्चों, किशोरों, प्रजनन आयु की महिलाओं तथा गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की व्यापकता को प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत तक कम करना है, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हो सके।
- एनीमिया मुक्त भारत का समर्थन करने वाली प्रमुख पहलें
- पोषण अभियान: अभिसरण, व्यवहार परिवर्तन संचार तथा सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से मातृ एवं शिशु पोषण में सुधार को बढ़ावा देता है।
- एनीमिया मुक्त भारत आयरन-फॉलिक एसिड अनुपूरण: संवेदनशील आयु-समूहों को आयु-विशिष्ट आयरन-फोलिक एसिड (IFA) की गोलियाँ एवं सिरप उपलब्ध कराए जाते हैं।
- राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस: वर्ष में दो बार कृमिनाशन (Deworming) अभियान संचालित कर कृमि संक्रमण को कम किया जाता है, जो एनीमिया का एक प्रमुख कारण है।
- फूड फोर्टिफिकेशन पहल: सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने हेतु चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों में आयरन, फॉलिक एसिड एवं विटामिन B12 का फोर्टिफिकेशन किया जाता है।
- मिशन इंद्रधनुष एवं मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रम: गर्भावस्था पूर्व देखभाल, टीकाकरण तथा प्रारंभिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ कर एनीमिया की रोकथाम एवं प्रबंधन में सहायता प्रदान करते हैं।
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मंगल ग्रह से जीवन के समर्थन संबंधी साक्ष्य

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नासा (NASA) के पर्सिवरेंस रोवर ने जेजेरो क्रेटर (Jezero Crater) में अब तक के सबसे जटिल ऑर्गेनिक कार्बन (Complex Organic Carbon) के साक्ष्य खोजे हैं, जिससे मंगल ग्रह पर प्राचीन जीवन की खोज को और बल मिला है।
मंगल ग्रह पर जीवन-समर्थक प्रमुख साक्ष्य
- जटिल ऑर्गेनिक कार्बन की खोज: स्कैनिंग हैबिटेबल एनवायरनमेंट्स विद रमन एंड ल्यूमिनेसेंस फॉर ऑर्गेनिक्स एंड केमिकल्स (SHERLOC) उपकरण ने मंगल ग्रह की मडस्टोन (Mudstones) चट्टानों में मैक्रोमॉलिक्यूलर कार्बन का पता लगाया, जो जेजेरो क्रेटर (Jezero Crater) में संरक्षित कार्बनिक पदार्थ का अब तक का सबसे सशक्त साक्ष्य है।
- प्राचीन जल-आधारित पर्यावरण: कार्बनिक पदार्थ कार्बोनेट एवं सल्फेट के साथ पाए गए, जिससे संकेत मिलता है कि वे संभवतः प्राचीन जल-आधारित भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा संरक्षित हुए थे।
- नेरेत्वा वैलिस चैनल से प्राप्त साक्ष्य: नेरेत्वा वैलिस (Neretva Vallis) नदी-चैनल से प्राप्त निष्कर्ष संकेत देते हैं कि कार्बनिक यौगिक मंगल ग्रह पर पूर्व अनुमान की तुलना में अधिक व्यापक रूप से विद्यमान हो सकते हैं।
- अरबों वर्षों तक संरक्षण: अध्ययन से यह सिद्ध हुआ है कि जटिल कार्बन यौगिक मंगल ग्रह के कठोर विकिरण वाले वातावरण में भी अरबों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं, जिससे महत्त्वपूर्ण एस्ट्रोबायोलॉजिकल अभिलेख संरक्षित रहते हैं।
- संभावित निवास योग्यता: यद्यपि इन कार्बनिक यौगिकों का निर्माण अजैविक प्रक्रियाओं से भी हुआ हो सकता है, फिर भी ये ऐसे पर्यावरण का संकेत देते हैं, जो प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के लिए अनुकूल रहा हो।
इन साक्ष्यों का महत्त्व
- एस्ट्रोबायोलॉजी अनुसंधान को बढ़ावा: यह खोज इस बात के साक्ष्यों को और सुदृढ़ करती है कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान थीं तथा भविष्य के जैविक अनुसंधानों के लिए संभावित स्थलों की पहचान करती है।
- मार्स सैंपल रिटर्न मिशन को समर्थन: इन निष्कर्षों से पर्सिवरेंस द्वारा एकत्रित रॉक सैंपल्स का वैज्ञानिक महत्त्व बढ़ गया है, जिनका भविष्य में पृथ्वी पर प्रयोगशाला विश्लेषण किया जाएगा।
- ग्रहों के विकास की बेहतर समझ: यह साक्ष्य वैज्ञानिकों को अरबों वर्षों में मंगल ग्रह के भू-वैज्ञानिक, जलवायवीय (Climatic) तथा जलवैज्ञानिक (Hydrological) विकासक्रम के पुनर्निर्माण में सहायता प्रदान करते हैं।
पर्सिवरेंस मार्स रोवर के बारे में
- पर्सिवरेंस नासा के मार्स 2020 मिशन के अंतर्गत प्रमुख रोबोटिक रोवर है, जिसे जेजेरो क्रेटर (Jezero Crater) में प्राचीन निवास हेतु स्थितियों का अध्ययन करने तथा रॉक सैंपल्स एकत्रित करने के लिए भेजा गया है।
- उद्देश्य: प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन (Microbial Life) के साक्ष्यों की खोज, मंगल ग्रह के भूविज्ञान एवं जलवायु का अध्ययन, पृथ्वी पर वापसी हेतु रॉक सैंपल्स का संग्रह तथा भविष्य के मानव अभियानों के लिए प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करना।
- प्रक्षेपण विवरण: पर्सिवरेंस का प्रक्षेपण 30 जुलाई 2020 को एटलस V रॉकेट द्वारा किया गया तथा इसने 18 फरवरी 2021 को जेजेरो क्रेटर में सफलतापूर्वक लैंड किया।
प्रमुख विशेषताएँ
- उन्नत वैज्ञानिक उपकरण: इसमें Mastcam-Z एवं SHERLOC सहित सात अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं, जो खनिजीय एवं कार्बनिक विश्लेषण करते हैं।
- नमूना संग्रह प्रणाली: यह रोवर मंगल ग्रह की शैल एवं मृदा के नमूनों को ड्रिल कर, सील कर तथा भविष्य में पृथ्वी पर लाने के लिए सुरक्षित रूप से संगृहीत करता है।
- प्रौद्योगिकी प्रदर्शन: इसने मार्स ऑक्सीजन इन-सीटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन एक्सपेरिमेंट (MOXIE) के माध्यम से ऑक्सीजन उत्पादन का सफल परीक्षण किया तथा इंजेन्यूइटी हेलीकॉप्टर को तैनात किया, जिसने किसी अन्य ग्रह पर पहली नियंत्रित शक्ति-संचालित उड़ान भरी।
- स्वायत्त संचालन: उन्नत नेविगेशन प्रणाली इसे स्वायत्त रूप से मार्ग निर्धारण में सक्षम बनाती है, जबकि मल्टी-मिशन रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (MMRTG) इसे दीर्घकालिक एवं विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध कराता है।
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नालंदा विश्वविद्यालय
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प्रधानमंत्री ने नालंदा विश्वविद्यालय द्वारा शास्त्रार्थ की परंपरा के पुनर्जीवन की सराहना करते हुए इसे भारत की सभ्यतागत विरासत को आधुनिक शिक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित अधिगम के साथ एकीकृत करने का आदर्श मॉडल बताया।
शास्त्रार्थ क्या है?
- शास्त्रार्थ प्राचीन भारत की संरचित विद्वत् वाद-विवाद की परंपरा है, जिसमें विभिन्न विचारों पर तर्कपूर्ण चर्चा की जाती है।
- मुख्य सिद्धांत: यह तर्क, प्रमाण, सम्मानपूर्ण संवाद तथा आलोचनात्मक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को पराजित करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है।
- महत्त्व: शास्त्रार्थ ने भारतीय दर्शन, बौद्ध दर्शन, न्याय तथा वेदांत के विकास में खुली बौद्धिक चर्चा के माध्यम से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में
- प्राचीन शिक्षा केंद्र: नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ईसवी (गुप्त काल) में कुमारगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी। यह विश्व के प्रथम आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था।
- वैश्विक ज्ञान केंद्र: यहाँ चीन (ह्वेनसांग, यीचिंग), कोरिया, तिब्बत, जापान तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्वान अध्ययन हेतु आते थे। यहाँ बौद्ध दर्शन, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, गणित, व्याकरण एवं तर्कशास्त्र का अध्ययन कराया जाता था।
- पतन: लगभग 1193 ईसवी में बख्तियार खिलजी द्वारा इसे नष्ट कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत के महानतम शिक्षा केंद्रों में से एक का पतन हो गया।
- आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय: नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 के अंतर्गत बिहार के राजगीर में प्राचीन स्थल के निकट इसे एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में पुनः स्थापित किया गया।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थान: यह गैर-राज्य (Non-State), गैर-लाभकारी (Non-profit) अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में कार्य करता है, जिसमें 17 से अधिक सदस्य देशों की भागीदारी है।
- यूनेस्को मान्यता: नालंदा महाविहार के पुरातात्त्विक स्थल को वर्ष 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया, जिससे इसके असाधारण सार्वभौमिक महत्त्व को मान्यता मिली।
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पीएम फैमिली केयर ट्रैकर (PM-FCT) पायलट प्रोजेक्ट

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हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात के गांधीनगर में पीएम फैमिली केयर ट्रैकर (PM Family Care Tracker–PM-FCT) पायलट प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया।
पीएम फैमिली केयर ट्रैकर (PM-FCT) पायलट प्रोजेक्ट के बारे में
- यह एक पायलट डिजिटल गवर्नेंस पहल है, जो जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण के आँकड़ों को एकीकृत कर प्रत्येक बच्चे को एक विशिष्ट पहचान संख्या (Unique ID) प्रदान करती है। इससे बच्चों की समेकित निगरानी तथा सरकारी कल्याणकारी लाभों का स्वचालित एवं समयबद्ध वितरण सुनिश्चित होता है।
- जीवन-चक्र आधारित निगरानी: यह एकीकृत डिजिटल प्लेटफार्म गर्भावस्था से लेकर 18 वर्ष की आयु तक बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण एवं शिक्षा की सतत् निगरानी करता है।
- डेटा एकीकरण: यह प्रणाली पोषण ट्रैकर के माध्यम से स्वास्थ्य अभिलेखों तथा चाइल्ड ट्रैकिंग पोर्टल (CTS) के माध्यम से शिक्षा संबंधी आँकड़ों को जोड़ती है। साथ ही, ABHA एवं जन्म पंजीकरण संख्या के आधार पर प्रत्येक माता एवं बच्चे को एक विशिष्ट डिजिटल पहचान प्रदान करता है।
महत्त्व
- कल्याणकारी लाभों का स्वचालित वितरण: यह सुनिश्चित करता है कि पात्र लाभार्थियों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ स्वचालित एवं समय पर प्राप्त हो।
- समेकित निगरानी: यह जरूरतमंद लाभार्थियों की पहचान कर उन्हें विशेष प्राथमिकता प्रदान करता है तथा कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता करता है।
- गवर्नेंस को सुदृढ़ करना: यह लाभार्थियों की पहचान, सरकारी पहुँच तथा कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी वितरण से संबंधित चुनौतियों का समाधान करता है।
- लक्षित कल्याण को सशक्त बनाना: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से लाभों का अधिक दक्ष, पारदर्शी एवं लक्षित वितरण सुनिश्चित करता है।
- बाल-केंद्रित दृष्टिकोण: प्रत्येक बच्चे के लिए आजीवन डिजिटल पहचान का निर्माण करता है, जिससे उसे विभिन्न कल्याणकारी लाभों तक सुगम पहुँच प्राप्त होती है।
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