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रिफॉर्म्स 3.0: परिवर्तनकारी उत्प्रेरक के रूप में AI

30 Jun 2026

संदर्भ 

भारत ने 1950 के दशक से वर्ष 1991 तक की निम्न-वृद्धि वाली “हिंदू संवृद्धि दर” से आगे बढ़कर, वर्ष 1991 के उदारीकरण के बाद सुधार-आधारित विकास पथ अपनाया। अब AI भारत के लिए अगला परिवर्तनकारी अवसर प्रस्तुत करती है, जिसके माध्यम से 8% से अधिक “भारत संवृद्धि दर” प्राप्त की जा सकती है।

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हिंदू संवृद्धि दर (Hindu Rate of Growth) के बारे में

  • अर्थ: ‘हिंदू संवृद्धि दर’ से तात्पर्य 1950 के दशक से 1980 के दशक तक, विशेषकर वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों से पूर्व, भारत की लगभग 3–3.5% प्रति वर्ष की निम्न आर्थिक संवृद्धि दर से है।
  • शब्द की उत्पत्ति: “हिंदू संवृद्धि दर” शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने 1970 के दशक में भारत की अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में धीमी आर्थिक संवृद्धि का वर्णन करने के लिए किया था।
  • निम्न संवृद्धि के कारण
    • लाइसेंस राज: अत्यधिक सरकारी नियंत्रण, औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था तथा नौकरशाही प्रतिबंधों ने निजी निवेश एवं प्रतिस्पर्द्धा को सीमित किया।
    • आयात प्रतिस्थापन नीति: उच्च आयात शुल्क एवं संरक्षणवादी नीतियों के कारण वैश्विक एकीकरण एवं दक्षता प्रभावित हुई।
    • निम्न उत्पादकता: सीमित तकनीकी अपनाने तथा कमजोर अवसंरचना ने आर्थिक विस्तार को बाधित किया।
    • निम्न निवेश: नियंत्रित आर्थिक नीतियों के कारण निजी एवं विदेशी निवेश का स्तर अपेक्षाकृत कम रहा।

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों की तुलना में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सुधार

  • वर्ष 1991 के आर्थिक सुधार: उदारीकरण ने लाइसेंस-परमिट राज को समाप्त किया, बाजारों को खोला, निजी निवेश को प्रोत्साहित किया, विदेशी पूँजी को आकर्षित किया तथा भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत किया, जिससे तीव्र आर्थिक संवृद्धि की आधारशिला रखी गई।
  • AI क्रांति: वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों की भाँति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भी एक संरचनात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है। यह उत्पादकता बढ़ाने, नियमित कार्यों के स्वचालन, नवाचार को बढ़ावा देने, लागत कम करने तथा स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, सुशासन एवं उद्योग जैसे क्षेत्रों में नए अवसर सृजित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

AI अगला सुधार उत्प्रेरक क्यों है?

  • उत्पादकता में वृद्धि: AI स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, सुशासन, न्यायपालिका तथा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में कार्यकुशलता बढ़ाकर, लागत कम करके तथा निर्णय-निर्माण को अधिक प्रभावी बनाकर समग्र उत्पादकता में वृद्धि कर सकता है।
  • नवाचार को गति: AI अनुसंधान, नवाचार, उद्यमिता तथा नए उत्पादों एवं प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित कर प्रौद्योगिकी-संचालित आर्थिक संवृद्धि का आधार तैयार कर सकता है।
  • उत्प्रेरक आधारित विकास का अवसर: आधार, UPI तथा सस्ती डेटा सेवाओं की भाँति, AI भारत को पारंपरिक अवसंरचनात्मक बाधाओं को पार करते हुए तीव्र एवं व्यापक परिवर्तन प्राप्त करने में सक्षम बना सकता है।
  • समावेशी विकास का माध्यम: AI वैयक्तिकृत स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा नागरिक-केंद्रित सुशासन के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं की पहुँच, गुणवत्ता एवं दक्षता में सुधार कर समावेशी विकास को बढ़ावा दे सकता है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: AI के क्षेत्र में सुदृढ़ क्षमताओं का विकास भारत को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में अग्रणी स्थान दिलाने तथा उच्च एवं सतत् आर्थिक संवृद्धि प्राप्त करने में सहायक हो सकता है।

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों और AI युग के मध्य अंतर

पहलू वर्ष 1991 के आर्थिक सुधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) युग 

(रिफॉर्म्स 3.0)

परिवर्तन की प्रकृति नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर केंद्रित। प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से ज्ञान-आधारित एवं AI-संचालित अर्थव्यवस्था के निर्माण पर केंद्रित।
सुधार का प्रेरक कारण भुगतान संतुलन संकट और आर्थिक अस्थिरता से प्रेरित। वैश्विक AI क्रांति और तकनीकी नेतृत्व की प्रतिस्पर्द्धा से प्रेरित।
प्रमुख संसाधन पूँजी, निवेश, व्यापार और निजी उद्यम विकास के प्रमुख आधार थे। डेटा, संगणन शक्ति (Computing Power), AI मॉडल, प्रतिभा और नवाचार विकास के प्रमुख आधार होंगे।
सरकार की भूमिका विनियमों में कमी और बाजार खोलकर नियंत्रक से सुगमकर्ता (Facilitator) की भूमिका में परिवर्तन। अवसंरचना, विनियमन और सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से AI पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माता बनना।
वैश्विक एकीकरण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से भारत का वैश्विक बाजारों से एकीकरण। प्रौद्योगिकी साझेदारी और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से वैश्विक AI पारिस्थितिकी तंत्र से एकीकरण।
मुख्य उद्देश्य आर्थिक दक्षता में सुधार, निवेश आकर्षित करना और GDP वृद्धि को गति देना। उत्पादकता और नवाचार में वृद्धि करना तथा AI-आधारित विकास मॉडल का निर्माण।
उद्योगों पर प्रभाव निजी क्षेत्र, सेवा क्षेत्र और विदेशी निवेश के अवसरों का विस्तार। AI अनुप्रयोगों के माध्यम से स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, विनिर्माण और शासन जैसे क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन।
रोजगार पर प्रभाव सेवा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी और निजी क्षेत्र में नए अवसरों के माध्यम से रोजगार सृजन। AI-आधारित नए रोजगारों का सृजन, किंतु वर्तमान नौकरियों में व्यवधान की संभावना; पुनः कौशल (Reskilling) की आवश्यकता।
प्रमुख अवसंरचना बाजार, उद्योग और वित्तीय प्रणाली जैसी भौतिक एवं आर्थिक अवसंरचना पर बल। डिजिटल अवसंरचना, डेटा केंद्र, AI संगणन क्षमता और सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता।
रणनीतिक महत्त्व मुख्यतः आर्थिक वृद्धि और प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने हेतु आर्थिक सुधार। आर्थिक शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता से जुड़ा एक रणनीतिक प्रौद्योगिकी सुधार।

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों और AI युग के मध्य समानताएँ

समानता वर्ष 1991 के आर्थिक सुधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) युग
परिवर्तनकारी अवसर उदारीकरण ने भारत की आर्थिक क्षमता को उजागर किया। AI भारत की उत्पादकता और नवाचार क्षमता को उजागर कर सकता है।
संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता औद्योगिक नीति, व्यापार और निवेश में सुधार आवश्यक थे। डेटा शासन, AI अवसंरचना, कौशल विकास और अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार आवश्यक हैं।
प्रतिस्पर्द्धा एक प्रेरक शक्ति के रूप में वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा ने भारतीय व्यवसायों की दक्षता में सुधार किया। AI क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा भारत को नवाचार और तकनीकी उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करेगी।
दीर्घकालिक विकास पर प्रभाव भारत को उच्च आर्थिक विकास दर की ओर अग्रसर किया। भारत को प्रौद्योगिकी-आधारित एवं ज्ञान-आधारित विकास पथ पर अग्रसर कर सकता है।
सुधारों की आवश्यकता संरक्षणवाद और अत्यधिक नियंत्रण से बाहर निकलने की आवश्यकता थी। खुलेपन, नवाचार और AI को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

AI रिफॉर्म्स 3.0 को समर्थन देने वाली प्रमुख सरकारी पहलें

  • इंडियाएआई मिशन (2024): इंडियाएआई मिशन को ₹10,371.92 करोड़ के परिव्यय के साथ प्रारंभ किया गया है। इसका उद्देश्य AI कंप्यूट अवसंरचना, डेटासेट, स्वदेशी AI मॉडल, कौशल विकास कार्यक्रम तथा उत्तरदायी AI रूपरेखा विकसित कर एक समग्र AI पारितंत्र का निर्माण करना है।
  • राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता रणनीति (2018): नीति आयोग ने “सभी के लिए AI (AI for All)” की परिकल्पना के साथ राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता रणनीति प्रस्तुत की। इसका प्रमुख फोकस स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, स्मार्ट शहरों तथा सुशासन में AI के उपयोग पर है।
  • डिजिटल इंडिया कार्यक्रम: डिजिटल इंडिया कार्यक्रम ने देशभर में डिजिटल कनेक्टिविटी, ई-गवर्नेंस सेवाओं तथा प्रौद्योगिकी अवसंरचना का विस्तार कर AI के व्यापक उपयोग के लिए आधार तैयार किया है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) ढाँचा: आधार, UPI तथा डिजीलॉकर जैसे प्लेटफॉर्मों पर आधारित भारत का DPI मॉडल यह प्रदर्शित करता है कि खुले (Open) एवं विस्तार योग्य (Scalable) डिजिटल तंत्र किस प्रकार AI-आधारित समावेशी नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • राष्ट्रीय डेटा गवर्नेंस नीति (2023): राष्ट्रीय डेटा गवर्नेंस नीति का उद्देश्य सरकारी डेटासेट की उपलब्धता, गुणवत्ता तथा उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को सुदृढ़ करना है, जो विश्वसनीय एवं भारत-केंद्रित AI मॉडल विकसित करने के लिए आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020: राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में कोडिंग, डिजिटल अधिगम तथा उभरती प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देकर भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए AI-कुशल मानव संसाधन विकसित करने पर बल दिया गया है।
  • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर विनिर्माण एवं डिजाइन क्षमताओं का विकास करना है, जो AI कंप्यूटिंग अवसंरचना के निर्माण तथा विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता कम करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • उत्तरदायी AI शासन रूपरेखा: भारत AI के नैतिक, पारदर्शी, सुरक्षित एवं मानव-केंद्रित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी AI शासन रूपरेखा विकसित कर रहा है, जिससे गोपनीयता, पक्षपात (Bias) तथा उत्तरदायित्व जैसी चुनौतियों का प्रभावी समाधान किया जा सके।

सुशासन में AI के अनुप्रयोग

  • स्वास्थ्य क्षेत्र
    • AI रोगों के त्वरित निदान, पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण तथा जनस्वास्थ्य कार्यक्रमों के अधिक प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता एवं दक्षता में सुधार कर सकता है।
    • यह चिकित्सीय इमेजिंग, रोगों की प्रारंभिक पहचान तथा स्वास्थ्य संसाधनों के कुशल आवंटन में भी सहायक हो सकता है।
  • कृषि क्षेत्र
    • AI फसल परामर्श प्रणालियों, परिशुद्ध कृषि (Precision Farming) तथा जलवायु-आधारित निर्णय-निर्माण के माध्यम से कृषि उत्पादकता में वृद्धि कर सकता है।
    • यह किसानों को मौसम पूर्वानुमान, कीट पहचान, मृदा विश्लेषण तथा बेहतर फसल नियोजन में सहायता प्रदान कर सकता है।
  • न्यायपालिका
    • AI विधिक अनुसंधान, वाद प्रबंधन तथा दस्तावेज विश्लेषण को सुदृढ़ कर न्यायिक कार्यकुशलता में वृद्धि कर सकता है।
    • यह सूचनाओं के त्वरित प्रसंस्करण तथा न्यायालयों के बेहतर प्रशासन के माध्यम से लंबित मामलों के बोझ को कम करने में सहायक हो सकता है।
  • शिक्षा क्षेत्र
    • AI अनुकूली अधिगम मंचों तथा वैयक्तिकृत अधिगम पथों के माध्यम से समावेशी एवं व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा को बढ़ावा दे सकता है।
    • यह अधिगम संबंधी कमियों की पहचान, डिजिटल सहायता उपलब्ध कराने तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच में सुधार करने में सहायक हो सकता है।
  • सुशासन एवं सार्वजनिक सेवा वितरण
    • AI डेटा-आधारित नीति-निर्माण, शिकायत निवारण, धोखाधड़ी की पहचान तथा सरकारी सेवाओं के कुशल वितरण के माध्यम से सुशासन को सुदृढ़ कर सकता है।
    • यह प्रशासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी तथा नागरिक-केंद्रित बना सकता है।
  • आपदा प्रबंधन
    • AI प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, जोखिम मानचित्रण तथा वास्तविक समय में क्षति आकलन के माध्यम से आपदा पूर्व तैयारी को सुदृढ़ कर सकता है।
    • यह बाढ़, भूकंप, चक्रवात तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान त्वरित एवं प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है।
  • शहरी प्रशासन एवं स्मार्ट शहर
    • AI वास्तविक समय के आँकड़ों के विश्लेषण के माध्यम से यातायात प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन, ऊर्जा अनुकूलन तथा शहरी नियोजन को अधिक प्रभावी बना सकता है।
    • यह शहरों को अधिक दक्ष, सतत् तथा नागरिक-अनुकूल बनाने में योगदान दे सकता है।
  • लोक सुरक्षा एवं विधि प्रवर्तन
    • AI अपराध प्रवृत्तियों के विश्लेषण, साइबर सुरक्षा निगरानी तथा बुद्धिमान निगरानी प्रणालियों के माध्यम से विधि प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता को सुदृढ़ कर सकता है।
    • AI का उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग गोपनीयता एवं उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए लोक सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है।

AI संबंधी चुनौतियाँ

  • डिजिटल विभाजन: उच्च गति इंटरनेट, डिजिटल उपकरणों तथा कंप्यूटिंग अवसंरचना तक असमान पहुँच के कारण ग्रामीण, दूरस्थ एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग AI-आधारित सेवाओं के लाभ से वंचित रह सकते हैं।
    • समावेशी डिजिटल अवसंरचना के अभाव में AI वर्तमान सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को और बढ़ा सकता है।
  • डेटा गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: AI प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण पर आधारित होती हैं, जिससे व्यक्तिगत गोपनीयता, सूचित सहमति, डेटा स्वामित्व तथा सुरक्षित डेटा भंडारण से संबंधित चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग से जनविश्वास में कमी आ सकती है तथा निगरानी एवं शोषण का जोखिम बढ़ सकता है।
  • AI में पक्षपात (Bias): AI मॉडल उपलब्ध डेटासेट से सीखते हैं। यदि डेटा पक्षपातपूर्ण अथवा अपूर्ण हो, तो इससे अनुचित निर्णय एवं भेदभावपूर्ण परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
    • AI में पक्षपात का प्रभाव भर्ती, स्वास्थ्य निदान, वित्तीय सेवाओं तथा लोक प्रशासन जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
  • साइबर सुरक्षा जोखिम: AI का उपयोग डीपफेक, भ्रामक सूचना अभियान, स्वचालित साइबर हमलों तथा उन्नत धोखाधड़ी तकनीकों के लिए किया जा सकता है।
    • AI पर बढ़ती निर्भरता के साथ अधिक सुदृढ़ साइबर सुरक्षा तंत्र, डिजिटल सुरक्षा उपायों तथा प्रभावी नियामकीय निगरानी की आवश्यकता है।
  • उच्च ऊर्जा आवश्यकता: उन्नत AI मॉडल के प्रशिक्षण एवं संचालन के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता, विशेषीकृत हार्डवेयर, डेटा सेंटर तथा विद्युत की आवश्यकता होती है।
    • AI की बढ़ती माँग ऊर्जा सुरक्षा, कार्बन उत्सर्जन तथा सतत् प्रौद्योगिकी विकास से संबंधित नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकती है।
  • कौशल की कमी: भारत में बड़े पैमाने पर AI के उपयोग के लिए आवश्यक प्रशिक्षित AI विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, डेटा वैज्ञानिकों तथा प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों की कमी है।
    • नागरिकों एवं कार्यबल में AI साक्षरता का अभाव उत्पादकता में संभावित वृद्धि को सीमित कर सकता है तथा रोजगार संबंधी व्यवधान उत्पन्न कर सकता है।
  • विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: विदेशी AI मॉडल, उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स तथा क्लाउड अवसंरचना पर अत्यधिक निर्भरता सामरिक संवेदनशीलता तथा प्रौद्योगिकी निर्भरता को बढ़ा सकती है।
    • डिजिटल संप्रभुता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी AI क्षमताओं का विकास आवश्यक है।
  • नैतिक एवं नियामकीय चुनौतियाँ: AI के तीव्र विकास से उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, सुरक्षा तथा स्वचालित निर्णयों पर मानवीय नियंत्रण से संबंधित चिंताएँ बढ़ी हैं।
    • भारत को ऐसी संतुलित नियामकीय व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जो नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए AI के दुरुपयोग को प्रभावी रूप से रोक सके।

आगे की राह

  • अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना: भारत को R&D पर होने वाले व्यय को वर्तमान GDP के लगभग 0.65% से बढ़ाकर AI अनुसंधान, नवाचार क्षमता तथा प्रौद्योगिकीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करना चाहिए।
    • विशेष रूप से AI अनुसंधान, कंप्यूटिंग अवसंरचना, सेमीकंडक्टर विकास तथा मानव पूँजी में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • सार्वजनिक–निजी भागीदारी को प्रोत्साहन: भारत को अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट जैसे वैश्विक ‘हाइपरस्केलर्स’ के साथ सहयोग कर बड़े पैमाने पर AI अवसंरचना का विकास करना चाहिए।
    • डेटा सेंटर हेतु भूमि, विद्युत अवसंरचना तथा डेटा संप्रभुता संबंधी नीतिगत समर्थन के माध्यम से सरकार निजी निवेश को आकर्षित कर सकती है।
  • संप्रभु AI अवसंरचना का निर्माण: भारत को केवल AI उपभोक्ता न रहकर AI उत्पादक बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए तथा लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) की होस्टिंग, संचालन, अनुकूलन एवं सुरक्षा की स्वदेशी क्षमता विकसित करनी चाहिए।
    • AI अवसंरचना को अंतरिक्ष एवं परमाणु कार्यक्रमों की भाँति एक सामरिक क्षमता के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
  • हाइब्रिड AI मॉडल अपनाना: भारत को स्वदेशी AI विकास के साथ ओपन-सोर्स वैश्विक मॉडलों का संतुलित उपयोग करना चाहिए, जिससे किसी एक प्रौद्योगिकी पारितंत्र पर निर्भरता कम हो तथा लागत-प्रभावी, सुरक्षित एवं भारत-केंद्रित AI समाधान विकसित किए जा सकें।
  • AI कंप्यूट क्षमता का विकास: अनुसंधान संस्थानों, स्टार्ट-अप्स तथा सार्वजनिक सेवाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सुलभ, विस्तार योग्य AI कंप्यूटिंग अवसंरचना, डेटा सेंटर तथा उन्नत हार्डवेयर पारितंत्र का विकास किया जाना चाहिए।
    • विविधीकृत कंप्यूट क्षमता विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता से जुड़े जोखिमों को कम करेगी।
  • भारत की डिजिटल क्षमता का उपयोग: भारत की विशाल जनसंख्या, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) तथा समृद्ध डेटा पारितंत्र AI नवाचार के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
    • इन क्षमताओं का उपयोग भारतीय भाषाओं, सुशासन तथा विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप AI समाधान विकसित करने में किया जाना चाहिए।
  • AI मानव संसाधन का विकास: AI शिक्षा, अनुसंधान प्रशिक्षण तथा उद्योगोन्मुख कौशल विकास कार्यक्रमों को सुदृढ़ कर एक दक्ष कार्यबल तैयार किया जाना चाहिए।
    • AI के क्षेत्र में दीर्घकालिक वैश्विक नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए मजबूत प्रतिभा आधार का निर्माण अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्ष

जिस प्रकार वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने भारत की अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन का आधार तैयार किया, उसी प्रकार AI-आधारित सुधार भारत को उच्च संवृद्धि, नवाचार-संचालित एवं प्रौद्योगिकी-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने की आधारशिला सिद्ध हो सकते हैं।

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