संदर्भ
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट किए गए मिसाइल हमलों, जिनसे भारतीय नाविकों को लेकर चल रहे व्यापारी जहाज प्रभावित हुए, ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL), UNCLOS तथा समुद्री तटस्थता की विधि (Law of Maritime Neutrality) के अंतर्गत तटस्थ व्यापारिक जहाजों के संरक्षण को लेकर पुनः चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
नौसैनिक युद्ध को नियंत्रित करने वाला अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचा
- अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL)/नौसैनिक युद्ध की विधि: नौसैनिक युद्ध की विधि, अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) की एक शाखा है, जो यह निर्धारित करती है कि अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष के दौरान किन परिस्थितियों में युद्धपोतों एवं व्यापारिक जहाजों की जाँच, तलाशी, अधिग्रहण, नाकेबंदी अथवा उन पर आक्रमण किया जा सकता है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य नागरिकों एवं नागरिक वस्तुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए युद्ध के साधनों एवं तरीकों को विनियमित कर मानवीय पीड़ा को न्यूनतम करना है।
- समुद्र के विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS), 1982: UNCLOS समुद्री क्षेत्रों, नौवहन अधिकारों तथा तटीय राज्यों, ध्वज आधारित राज्यों एवं उपयोगकर्ता राज्यों के अधिकारों एवं दायित्वों से संबंधित विधिक ढाँचा प्रदान करता है।
- यद्यपि कुछ देश इस अभिसमय के पक्षकार नहीं हैं, फिर भी इसके अनेक प्रावधान प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं।
- समुद्री तटस्थता का विधि: समुद्री तटस्थता का विधि सशस्त्र संघर्ष के दौरान युद्धरत राज्यों एवं तटस्थ राज्यों के बीच विधिक संबंधों को नियंत्रित करता है।
- इसका उद्देश्य तटस्थ क्षेत्र, तटस्थ जहाजरानी तथा व्यावसायिक व्यापार की रक्षा करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना कि तटस्थ राज्य संघर्ष के किसी भी पक्ष को सैन्य सहायता प्रदान न करें।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) के मूल सिद्धांत
- विभेद का सिद्धांत (Principle of Distinction): सशस्त्र संघर्ष के पक्षकारों को हर समय सैन्य लक्ष्यों तथा नागरिक व्यक्तियों अथवा नागरिक वस्तुओं के मध्य स्पष्ट भेद करना अनिवार्य है। प्रत्यक्ष आक्रमण केवल वैध सैन्य लक्ष्यों पर ही किया जा सकता है।
- आनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality): यदि कोई वैध सैन्य लक्ष्य मौजूद भी हो, तब भी ऐसा आक्रमण निषिद्ध होगा, जिसमें अपेक्षित आकस्मिक नागरिक क्षति अनुमानित प्रत्यक्ष एवं ठोस सैन्य लाभ की तुलना में अत्यधिक हो।
- सैन्य आवश्यकता का सिद्धांत (Principle of Military Necessity): बल का प्रयोग केवल उतनी सीमा तक किया जाना चाहिए, जितना किसी वैध सैन्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हो। यह आवश्यक सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
- सावधानी का सिद्धांत (Principle of Precaution): आक्रमण प्रारंभ करने से पूर्व युद्धरत पक्षों को सभी व्यावहारिक एवं संभव सावधानियाँ अपनानी चाहिए, ताकि नागरिक हताहतों तथा नागरिक वस्तुओं को होने वाली क्षति से यथासंभव बचा जा सके या उसे न्यूनतम किया जा सके।
तटस्थ व्यापारिक जहाजों का संरक्षण
- सामान्य संरक्षण: ऐसे तटस्थ व्यापारी जहाज, जो सशस्त्र संघर्ष के किसी भी पक्ष का हिस्सा न होने वाले राज्य का ध्वज धारण करते हैं, नागरिक वस्तुएँ माने जाते हैं। अतः उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) तथा समुद्री तटस्थता की विधि (Law of Maritime Neutrality) के अंतर्गत आक्रमण से संरक्षण प्राप्त होता है।
- नागरिक माल का संरक्षण: खाद्य पदार्थ, उर्वरक, पेट्रोलियम उत्पाद, औषधियाँ तथा उपभोक्ता वस्तुओं जैसे नागरिक उपयोग के माल का परिवहन करने वाले वाणिज्यिक जहाज केवल अपने वाणिज्यिक माल के कारण वैध सैन्य लक्ष्य नहीं बन जाते।
- अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से पारगमन: UNCLOS के भाग III (अनुच्छेद 37–44) के अंतर्गत सभी जहाजों एवं विमानों को होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से पारगमन मार्ग (Transit Passage) का अधिकार प्राप्त है, बशर्ते कि वे अंतरराष्ट्रीय विधि के लागू नियमों का पालन करें।
तटस्थ व्यापारी जहाज कब अपना संरक्षण खो सकते हैं?
- सीमित अपवाद: सैन रेमो मैनुअल, 1994 के अनुसार, कोई तटस्थ व्यापारी जहाज केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में ही अपना संरक्षित दर्जा खो सकता है, यदि वह:
- शत्रु के लिए भेजे जा रहे प्रतिषिद्ध वस्तु (Contraband) का परिवहन कर रहा हो।
- विधिपूर्वक स्थापित नौसैनिक नाकेबंदी का जानबूझकर उल्लंघन करे।
- पूर्व चेतावनी दिए जाने के बाद भी निरीक्षण अथवा तलाशी के लिए रुकने से इनकार करे।
- जाँच, तलाशी, अधिग्रहण अथवा मार्ग परिवर्तन का जानबूझकर प्रतिरोध करे।
- शत्रु के सैन्य अभियानों में प्रभावी योगदान देता हो, जिससे उसके विनाश से स्पष्ट एवं निश्चित सैन्य लाभ प्राप्त होता हो।
- इन स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमित परिस्थितियों के अतिरिक्त, तटस्थ व्यापारी जहाजों पर आक्रमण अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत निषिद्ध है।
क्या तेल टैंकरों पर विधिसम्मत आक्रमण किया जा सकता है?
- पारंपरिक व्याख्या: केवल इस आधार पर कि वाणिज्यिक तेल निर्यात किसी युद्धरत राज्य के लिए राजस्व उत्पन्न करता है, वह वैध सैन्य लक्ष्य नहीं बन जाता।
- किसी तेल टैंकर अथवा उसके माल को तभी वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है, जब वह सैन्य अभियानों में प्रभावी योगदान देता हो तथा उसके विनाश से स्पष्ट एवं निश्चित सैन्य लाभ प्राप्त होता हो।
- युद्ध-समर्थन सिद्धांत (War-Sustaining Theory): एक व्यापक व्याख्या के अनुसार, ऐसे वाणिज्यिक संसाधन, जो प्रत्यक्ष रूप से किसी युद्धरत राज्य के सैन्य प्रयासों को बनाए रखने हेतु राजस्व उपलब्ध कराते हैं, उन्हें भी वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है।
- हालाँकि, यह सिद्धांत अब भी विवादास्पद है तथा इसे प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत सार्वभौमिक स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है।
अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत नौसैनिक नाकेबंदी
- अर्थ: नौसैनिक नाकेबंदी एक युद्धरत राज्य द्वारा अपनाया गया उपाय है, जिसका उद्देश्य शत्रु के नियंत्रण वाले बंदरगाहों अथवा तटीय क्षेत्रों में जहाजों एवं विमानों के प्रवेश या निकास को रोककर सैन्य आपूर्ति, आयात तथा निर्यात को प्रतिबंधित करना होता है।
- विधिसम्मत नाकेबंदी की शर्तें: सैन रेमो मैनुअल तथा हेलसिंकी सिद्धांत, 1998 के अनुसार, किसी विधिसम्मत नौसैनिक नाकेबंदी के लिए उसका औपचारिक रूप से घोषित होना, प्रभावी ढंग से लागू होना, सभी राज्यों पर निष्पक्ष रूप से लागू होना तथा केवल आभासी नाकेबंदी (Paper Blockade) न होना आवश्यक है।
- हालाँकि, केवल इन शर्तों का पालन कर लेने मात्र से कोई नाकेबंदी स्वतः संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अंतर्गत विधिसम्मत नहीं हो जाती।
बल प्रयोग की वैधता (Jus ad Bellum) बनाम युद्ध संचालन की विधि (Jus in Bello)
- बल प्रयोग की वैधता (Jus ad Bellum): यह निर्धारित करता है कि कोई राज्य किन परिस्थितियों में विधिसम्मत रूप से बल का प्रयोग कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(4) के अनुसार, बल प्रयोग निषिद्ध है, सिवाय आत्मरक्षा (अनुच्छेद-51) अथवा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा अधिकृत किए जाने की स्थिति में।
- युद्ध संचालन की विधि (Jus in Bello): युद्ध संचालन की विधि, जिसका प्रमुख आधार अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) है, इस बात को विनियमित करती है कि सैन्य अभियान किस प्रकार संचालित किए जाएँ, चाहे स्वयं संघर्ष विधिसम्मत हो अथवा नहीं।
- मुख्य अंतर: कोई नौसैनिक नाकेबंदी युद्ध संचालन की विधि के अनुरूप हो सकती है, किंतु यदि उसके पीछे बल प्रयोग का वैध विधिक आधार न हो, तो वह बल प्रयोग की वैधता (Jus ad Bellum) का उल्लंघन कर सकती है।
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विधिक साधन
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर, 1945: बल के अवैध प्रयोग पर प्रतिबंध लगाता है तथा अनुच्छेद-42 के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को नौसैनिक नाकेबंदी सहित प्रवर्तनात्मक उपायों को अधिकृत करने की शक्ति प्रदान करता है।
- जिनेवा अभिसमय, 1949: अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) के मूल नियम स्थापित करते हैं, जो नागरिकों, नागरिक वस्तुओं, युद्धबंदियों तथा अन्य संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
- UNCLOS, 1982: समुद्री क्षेत्रों, नौवहन की स्वतंत्रता, पारगमन मार्ग (Transit Passage) तथा समुद्र में राज्यों के अधिकारों एवं दायित्वों से संबंधित विधिक ढाँचे का संहिताकरण करता है।
- सैन रेमो मैनुअल, 1994: यद्यपि यह विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं है, फिर भी इसे समुद्र में सशस्त्र संघर्षों से संबंधित प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का सर्वाधिक प्रामाणिक पुनर्व्याख्यान माना जाता है।
- समुद्री तटस्थता के विधि पर हेलसिंकी सिद्धांत, 1998: समुद्री सशस्त्र संघर्षों के दौरान युद्धरत राज्यों एवं तटस्थ राज्यों के अधिकारों एवं दायित्वों के संबंध में प्रामाणिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
भारत के लिए निहितार्थ
- भारतीय नाविकों का संरक्षण: संघर्ष-प्रभावित समुद्री क्षेत्रों में संचालित व्यापारिक जहाजों पर कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा एवं विधिक संरक्षण सुनिश्चित करना भारत का एक वैध हित है।
- राजनयिक संरक्षण: राजनयिक संरक्षण के सिद्धांत (Doctrine of Diplomatic Protection) के अंतर्गत भारत अपने नागरिकों को हुई क्षति से संबंधित दावों का समर्थन कर सकता है, स्पष्टीकरण माँग सकता है, जवाबदेही एवं क्षतिपूर्ति की माँग कर सकता है तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के उल्लंघनों की स्वतंत्र जाँच की माँग कर सकता है।
- समुद्री एवं ऊर्जा सुरक्षा: कच्चे तेल के आयात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर एक प्रमुख समुद्री व्यापारिक राष्ट्र होने के कारण, नौवहन की स्वतंत्रता तथा तटस्थ जहाजरानी की सुरक्षा बनाए रखना भारत का एक महत्त्वपूर्ण सामरिक हित है।
मुख्य तथ्य
- सामरिक समुद्री संकीर्ण मार्ग: होर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व के समुद्री मार्ग द्वारा होने वाले लगभग 20% तेल व्यापार का आवागमन होता है।
- UNCLOS के अंतर्गत पारगमन मार्ग: UNCLOS के अनुच्छेद 37–44 अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से पारगमन मार्ग (Transit Passage) के अधिकार की गारंटी प्रदान करते हैं।
- नौसैनिक युद्ध पर प्रामाणिक दस्तावेज: सैन रेमो मैनुअल, 1994 को नौसैनिक युद्ध से संबंधित प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का सर्वाधिक प्रभावशाली पुनर्व्याख्यान माना जाता है।
- तटस्थ जहाजरानी का संरक्षण: तटस्थ व्यापारी जहाज तब तक संरक्षित रहते हैं, जब तक वे सीमित एवं स्पष्ट रूप से परिभाषित अपवादों के अंतर्गत वैध सैन्य लक्ष्य न बन जाएँ।
- UNSC की प्रवर्तन शक्तियाँ: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद-42, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को नौसैनिक नाकेबंदी सहित प्रवर्तनात्मक उपायों को अधिकृत करने की शक्ति प्रदान करता है।
- बल प्रयोग की वैधता (Jus ad Bellum) बनाम युद्ध संचालन की विधि (Jus in Bello): अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि युद्ध संचालन को विनियमित करती है, जबकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर बल प्रयोग की वैधता को नियंत्रित करता है।
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महत्त्व
- नागरिकों एवं वाणिज्यिक जहाजरानी का संरक्षण: अंतरराष्ट्रीय विधि सशस्त्र संघर्ष के दौरान नागरिक नाविकों, व्यापारी जहाजों तथा वाणिज्यिक माल को अनावश्यक क्षति से संरक्षण प्रदान करती है।
- नौवहन की स्वतंत्रता का संरक्षण: तटस्थ जहाजरानी का संरक्षण सामरिक समुद्री संकीर्ण मार्गों से निर्बाध अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुनिश्चित करता है।
- वैश्विक समुद्री स्थिरता: नौसैनिक युद्ध के विधि का पालन वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में व्यवधान को कम करता है।
- अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही: यह विधिक ढाँचा उल्लंघनों की जाँच, प्रतिकर (Reparations) तथा नागरिक जहाजरानी पर किए गए अवैध आक्रमणों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायक होता है।
- भारत के सामरिक हितों का संरक्षण: तटस्थ जहाजरानी की सुरक्षा से संबंधित अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन भारत की समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक समुद्री मार्गों पर कार्यरत भारतीय नाविकों की सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL), नौवहन की स्वतंत्रता तथा तटस्थ जहाजरानी के संरक्षण को बनाए रखना वैश्विक समुद्री स्थिरता, नागरिक जीवन की सुरक्षा तथा भारत के सामरिक, ऊर्जा एवं वाणिज्यिक हितों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर ऐसे समय में जब समुद्री क्षेत्र निरंतर अधिक प्रतिस्पर्द्धी एवं संवेदनशील बनता जा रहा है।