संदर्भ
संयुक्त राष्ट्र (UN) के अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी येरुशलम तथा इजरायल शामिल हैं, पर गठित स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग ने अपनी जून 2026 की रिपोर्ट में इजरायली प्राधिकारियों द्वारा गाजा में नरसंहार के उद्देश्य का संकेत देने वाले कृत्यों के एक सुसंगत प्रतिरूप के साक्ष्य पाए हैं।
- यद्यपि यह कोई न्यायिक निर्णय नहीं है, फिर भी यह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) तथा अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के समक्ष लंबित मामलों में सहायक साक्ष्य के रूप में उपयोगी हो सकती है।
UN आयोग की रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- नरसंहार के उद्देश्य के आरोप: आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि फिलिस्तीनी बच्चों को प्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाए जाने के अनेक प्रलेखित मामलों से नरसंहार के उद्देश्य का एक महत्त्वपूर्ण संकेत मिलता है।
- आयोग के अनुसार, फिलिस्तीनी बच्चे फिलिस्तीनी समुदाय के अस्तित्व एवं निरंतरता के केंद्र में हैं। इसलिए उनके विरुद्ध किए गए हमले नरसंहार के उद्देश्य का आकलन करते समय विधिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- यातना एवं यौन हिंसा के आरोप: आयोग ने निम्नलिखित आरोप भी दर्ज किए:
- हिरासत में लिए गए बच्चों के साथ यातना एवं दुर्व्यवहार।
- यौन हिंसा, जिसमें बलात्कार, बलात्कार की धमकी, जबरन निर्वस्त्र करना तथा बंदियों के विरुद्ध यौन हिंसा शामिल है।
- सिफारिशें: आयोग ने इजरायल से निम्नलिखित सिफारिशें की हैं:
- नागरिकों को हानि पहुँचाने वाले सैन्य अभियानों को रोका जाए।
- मृत फिलिस्तीनी बच्चों के शव उनके परिजनों को लौटाए जाएँ।
- बच्चों से संबंधित उल्लंघनों की निष्पक्ष जाँच कराई जाए।
- उपयुक्त न्यायिक तंत्र के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- इजरायल की प्रतिक्रिया: इजरायल ने रिपोर्ट को राजनीतिक रूप से प्रेरित, मानहानिकारक तथा विश्वसनीयता से रहित बताते हुए अस्वीकार कर दिया। साथ ही उसने यह दोहराया कि उसके सैन्य अभियान हमास के विरुद्ध हैं तथा अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुरूप संचालित किए जा रहे हैं।
UN स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग के बारे में
- स्थापना: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा मई 2021 में स्थापित किया गया।
- जनादेश (Mandate): आयोग को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए हैं:
- अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी येरुशलम तथा इजरायल शामिल हैं, में अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) एवं अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि (IHRL) के कथित उल्लंघनों की जाँच करना।
- बार-बार होने वाली हिंसा के प्रतिरूपों एवं मूल कारणों की पहचान करना।
- भविष्य में जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु साक्ष्यों का संरक्षण करना।
- संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) को समय-समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
- संरचना: वर्तमान में इस आयोग की अध्यक्षता न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर, भारत (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, ओडिशा उच्च न्यायालय) कर रहे हैं। अन्य सदस्यों में फ्लोरेंस मुंबा (जांबिया) तथा क्रिस सिडोटी (ऑस्ट्रेलिया) शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत नरसंहार (Genocide) क्या है?
- विधिक परिभाषा: नरसंहार अपराध की रोकथाम एवं दंड संबंधी अभिसमय, 1948 (Genocide Convention) के अनुच्छेद-II के अनुसार, यदि किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय अथवा धार्मिक समूह को पूर्णतः या आंशिक रूप से नष्ट करने के इरादे से निम्नलिखित में से कोई भी कृत्य किया जाता है, तो उसे नरसंहार माना जाता है:
- समूह के सदस्यों की हत्या करना।
- उन्हें गंभीर शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाना।
- जानबूझकर ऐसी जीवन परिस्थितियाँ उत्पन्न करना, जिनसे उस समूह का भौतिक विनाश हो।
- जन्मों को रोकने के उद्देश्य से उपाय लागू करना।
- बच्चों का बलपूर्वक किसी अन्य समूह में स्थानांतरण करना।
- आवश्यक तत्त्व: अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत नरसंहार सिद्ध करने के लिए दो तत्त्वों का प्रमाण आवश्यक है:
- भौतिक तत्त्व (Actus Reus): अनुच्छेद-II में वर्णित एक या अधिक निषिद्ध कृत्यों का किया जाना।
- मानसिक तत्त्व (Dolus Specialis): किसी संरक्षित समूह को पूर्णतः या आंशिक रूप से नष्ट करने का विशिष्ट उद्देश्य।
- विशिष्ट उद्देश्य को सिद्ध करना अनिवार्य होने के कारण, नरसंहार अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत सिद्ध किए जाने वाले सबसे कठिन अपराधों में से एक माना जाता है।
नरसंहार, युद्ध अपराध एवं मानवता के विरुद्ध अपराध में अंतर
| पहलू |
नरसंहार (Genocide) |
युद्ध अपराध (War Crimes) |
मानवता के विरुद्ध अपराध (Crimes Against Humanity) |
| कानूनी आधार |
नरसंहार अभिसमय, 1948 |
जिनेवा अभिसमय एवं रोम संविधि |
रोम संविधि |
| सशस्त्र संघर्ष की आवश्यकता |
आवश्यक नहीं |
आवश्यक |
आवश्यक नहीं |
| विशेष आशय (Special Intent) की आवश्यकता |
हाँ |
नहीं |
नहीं |
| पीड़ित |
संरक्षित समूह (राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक) |
सशस्त्र संघर्ष के दौरान संरक्षित व्यक्ति |
नागरिक आबादी |
| उद्देश्य |
संरक्षित समूह का विनाश |
युद्ध संबंधी कानूनों का उल्लंघन |
नागरिकों पर व्यापक या व्यवस्थित हमले। |
रिपोर्ट का विधिक महत्त्व
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में साक्ष्य: यद्यपि आयोग आपराधिक दायित्व निर्धारित नहीं कर सकता और न ही कोई दंड आरोपित कर सकता है, फिर भी उसकी रिपोर्टें निम्नलिखित के रूप में प्रयुक्त हो सकती हैं:
- दस्तावेजी साक्ष्य।
- पुष्टिकारी साक्ष्य।
- विशेषज्ञों के तथ्यात्मक निष्कर्ष।
- ऐसी सामग्री का उपयोग निम्नलिखित न्यायालयों में लंबित कार्यवाहियों में किया जा सकता है:
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC)।
- ICJ में लंबित मामले के संदर्भ में प्रासंगिकता: यह रिपोर्ट दक्षिण अफ्रीका द्वारा इजरायल के विरुद्ध नरसंहार अभिसमय (Genocide Convention) के अंतर्गत ICJ में दायर मामले में साक्ष्यों को और सुदृढ़ कर सकती है।
- हालाँकि, ICJ को स्वतंत्र रूप से यह निर्धारित करना होगा कि नरसंहार सिद्ध करने हेतु आवश्यक विधिक मानदंड पूरे हुए हैं या नहीं।
- ICC के संदर्भ में प्रासंगिकता: यह रिपोर्ट ICC के समक्ष व्यक्तिगत राजनीतिक एवं सैन्य नेताओं की आपराधिक उत्तरदायित्व संबंधी जाँच में भी सहायक हो सकती है।
- ICJ, जहाँ राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है, वहीं ICC अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन चलाता है।
अंतरराष्ट्रीय विधिक स्थिति
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
- राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों का निपटारा करता है।
- अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत राज्य की उत्तरदायित्व का निर्धारण करता है।
- अंतरिम उपाय (Provisional Measures) तथा प्रतिकर (Reparations) का आदेश दे सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC)
- नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध तथा आक्रमण के अपराध के आरोपित व्यक्तियों का अभियोजन करता है।
- पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध होने पर गिरफ्तारी वारंट जारी करता है।
- वर्तमान में इजरायली नेताओं के विरुद्ध ICC द्वारा जारी वारंट मुख्यतः कथित युद्ध अपराधों एवं मानवता के विरुद्ध अपराधों से संबंधित हैं। नरसंहार सिद्ध करने के लिए विशिष्ट इरादे (Specific Intent) का उच्चतर मानदंड आवश्यक होता है, जिसे स्वतंत्र रूप से स्थापित किया जाना अनिवार्य है।
- संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC)
- स्वतंत्र जाँच आयोगों का गठन करती है।
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि के कथित उल्लंघनों की जाँच करती है।
- इसके पास न्यायिक अथवा प्रवर्तन संबंधी शक्तियाँ नहीं होती है।
रिपोर्ट के निहितार्थ
- अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही को सुदृढ़ करना: यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय न्यायिक एवं जाँच निकायों के समक्ष लंबित मामलों के लिए साक्ष्यों के आधार का विस्तार करती है, जिससे कथित उल्लंघनों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयास और मजबूत होते हैं।
- कूटनीतिक दबाव में वृद्धि: रिपोर्ट के निष्कर्षों से हथियार प्रतिबंध, लक्षित आर्थिक प्रतिबंध, स्वतंत्र जाँच तथा गाजा तक निर्बाध मानवीय सहायता पहुँच सुनिश्चित करने की अंतरराष्ट्रीय माँग और तीव्र हो सकती है।
- ICC के सदस्य देशों पर प्रभाव: रोम संविधि के पक्षकार देशों पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के साथ सहयोग करने तथा जहाँ लागू हो, वहाँ ICC द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंटों के क्रियान्वयन के लिए अधिक कूटनीतिक एवं विधिक दबाव पड़ सकता है।
- प्रवर्तन की सीमाएँ: यह रिपोर्ट स्वयं किसी व्यक्ति के आपराधिक दोष का निर्धारण नहीं करती और न ही कोई बाध्यकारी विधिक दायित्व उत्पन्न करती है। इसका प्रवर्तन सक्षम अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के निर्णयों तथा राज्यों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
PWOnly IAS विशेष
- संस्थागत ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग की स्थापना वर्ष 2021 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा की गई थी।
- यह आयोग अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र एवं इजरायल में अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि (IHRL) के कथित उल्लंघनों की जाँच करता है।
- अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचा: नरसंहार की परिभाषा नरसंहार अभिसमय, 1948 के अनुच्छेद II में दी गई है तथा इसके लिए किसी संरक्षित समूह को नष्ट करने के विशिष्ट इरादे (Dolus Specialis) का प्रमाण आवश्यक होता है।
- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) की रोम संविधि के अनुच्छेद-6 में भी नरसंहार की यही परिभाषा अपनाई गई है।
- न्यायिक संस्थाएँ: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन संचालित करता है।
- रिपोर्ट की विधिक स्थिति: संयुक्त राष्ट्र के जाँच आयोगों की रिपोर्टें न्यायिक निर्णय नहीं होती हैं, किंतु अंतरराष्ट्रीय विधिक कार्यवाहियों में पुष्टिकारी साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त की जा सकती हैं।
- भारत की स्थिति: भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है, किंतु ICC की रोम संविधि का पक्षकार नहीं है। अतः भारत पर ICC द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंटों का क्रियान्वयन करने का कोई संधि-आधारित दायित्व नहीं है।
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