भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘डीप स्पेस’ में दूरियों को मापने की नई विधि विकसित की

9 Apr 2026

संदर्भ

IIT-कानपुर के भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में पल्सरों से निकलने वाले रेडियो संकेतों के विरूपण का अध्ययन करके ब्रह्मांड में दूरियों को मापने की एक नई विधि विकसित की है।

अंतरिक्ष में दूरी मापने की पारंपरिक विधियाँ

  • पारंपरिक विधि दूरी का अनुमान लगाने के लिए इलेक्ट्रॉनों के कारण रेडियो संकेतों में होने वाले समय अंतराल (Time Delay) (डिस्पर्शन मेजर) का उपयोग करती है।
  • सीमा: यह जटिल क्षेत्रों में कम सटीक है क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन वितरण के अनिश्चित मॉडलों पर निर्भर करती है।

अंतरिक्ष में दूरी मापने की नई विधि

  • सिद्धांत: यह विधि अंतरिक्ष में यात्रा करते समय पल्सर रेडियो संकेतों के विरूपण का अध्ययन करती है।
  • वैज्ञानिकों ने दूरी को अधिक सटीकता से मापने के लिए पल्सर संकेतों के ‘सिग्नल डिले’ (Signal Delay) (डिस्पर्शन) और ‘सिग्नल स्प्रेडिंग’ (Signal Spreading) (स्कैटरिंग) दोनों का उपयोग किया है।
  • उपयोग किया गया डेटा: इस अध्ययन में विधि का परीक्षण करने के लिए गम नेबुला क्षेत्र के 10 पल्सरों का विश्लेषण किया गया।
    • गम नेबुला (Gum Nebula) आकाशगंगा के सबसे बड़े आयनित गैस बादलों (नेबुला) में से एक है।
  • बेहतर सटीकता: यह प्लाज्मा विक्षोभों को ध्यान में रखता है, जिससे परिणाम पुरानी विधियों की तुलना में अधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • भविष्य में उपयोग: बेहतर आकाशगंगा मानचित्रण के लिए इस तकनीक का विस्तार सैकड़ों पल्सरों के अध्ययन तक किया जाएगा।

पल्सर (Pulsars) क्या होते हैं? 

  • पल्सर मृत तारों के घने, तेजी से घूमने वाले अवशेष कोर (Core) होते हैं, जो रेडियो तरंगों की किरणें उत्सर्जित करते हैं जो ब्रह्मांडीय लाइटहाउस की तरह पृथ्वी से होकर गुजरती हैं।
  • निर्माण: पल्सर का निर्माण तब होता हैं जब विशाल तारे में विस्फोट होता हैं, और अपने पीछे एक अत्यंत संकुचित कोर (Core) छोड़ जाते हैं जो अविश्वसनीय गति से घूमता रहता है।
  • लाइटहाउस प्रभाव: पल्सर अपने चुंबकीय ध्रुवों से रेडियो तरंगों की किरणें उत्सर्जित करते हैं जो उनके घूमने के साथ अंतरिक्ष में चक्कर लगाती हैं, और जब ये किरणें पृथ्वी की ओर होती हैं, तो सतत् पल्स (तरंग) उत्पन्न करती हैं।
  • ब्रह्मांडीय घड़ियाँ: पल्सर की घूर्णन दर असाधारण रूप से स्थिर होती है, जिससे उनकी तरंग बहुत ही नियमित और पूर्वानुमानित रूप से पहुँचती है, इसी कारण उन्हें ‘प्रकृति की सबसे सटीक घड़ियाँ’ कहा जाता है।

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