संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026

16 Apr 2026

संदर्भ

संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 में राज्य विधानसभा के आकार और निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को अद्यतन जनसंख्या आँकड़ों के आधार पर संशोधित करने के लिए परिसीमन पर लगी रोक को समाप्त करने का प्रस्ताव है।

संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान

  • सीटों पर लगी रोक हटाना: अनुच्छेद-170 के तहत वर्ष 1976 में लगाई गई रोक को हटाता है, जिससे भविष्य की जनगणना के पश्चात् सीटों का नया समायोजन संभव हो सकेगा।
  • जनसंख्या के आधार को पुनर्परिभाषित करना: सीट आवंटन के लिए “जनसंख्या” संसद द्वारा निर्दिष्ट जनगणना पर आधारित होगी।
  • विधानसभा के आकार में परिवर्तन: राज्य विधानसभाओं में सीटों की कुल संख्या जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुसार भिन्न होगी।
  • महिला आरक्षण का कार्यान्वयन: परिसीमन के बाद महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (अनुच्छेद-334A के माध्यम से) लागू करता है।
  • आदिवासी प्रतिनिधित्व के लिए सुरक्षा उपाय: यह सुनिश्चित करता है कि अनुसूचित जनजातियों (ST) की सीटों का हिस्सा कम न हो, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में।

प्रस्तावित संशोधनों की आवश्यकता

  • समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना: वर्ष 1971 के बाद से जनसंख्या में हुए परिवर्तनों ने “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत को विकृत कर दिया है।
  • चुनावी सीमाओं का अद्यतन: शहरीकरण और प्रवासन के कारण निर्वाचन क्षेत्रों का तर्कसंगत पुनर्निर्धारण आवश्यक है।
  • महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सक्षम बनाना: महिलाओं के लिए आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए परिसीमन आवश्यक है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन का समाधान: सीटों का पुनर्आवंटन राज्यों में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
  • संघीय लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाना: प्रतिनिधि संस्थाओं की वैधता और जवाबदेही में सुधार करता है।

परिसीमन आयोग के बारे में

  • परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय है, जिसका गठन परिसीमन आयोग अधिनियम के तहत जनगणना आँकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करने और चुनावी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

भारत में प्रमुख परिसीमन आयोग

  • 1952 का आयोग: वर्ष 1951 की जनगणना पर आधारित।
  • 1963 का आयोग: वर्ष 1961 की जनगणना और राज्य पुनर्गठन के बाद गठित।
  • 1973 का आयोग: वर्ष 1971 की जनगणना के बाद 1972 अधिनियम के तहत गठित, जिसमें 2001 तक कुल सीटों की संख्या को स्थिर रखा गया था।
  • 2002 का आयोग: वर्ष 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करके सीमाओं को अद्यतन करने के लिए वर्ष 2002 अधिनियम लागू किया गया था।
  • वर्ष 2020 का आयोग: विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश और पूर्व में चयनित उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए स्थापित।

संरचना

  • अध्यक्ष: सेवानिवृत्त/वर्तमान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश
  • सदस्य: मुख्य चुनाव आयुक्त या नामित व्यक्ति
  • राज्य चुनाव आयुक्त (संबंधित राज्य)
  • सहयोगी सदस्य: सांसद और विधायक (सलाहकार भूमिका)।

भूमिका

  • सीमाओं का पुनर्निर्धारण: जनसंख्या समानता सुनिश्चित करने के लिए लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण।
  • सीटों का आरक्षण: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और महिला आरक्षण के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान।
  • सीटों का आवंटन: राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और विधानसभाओं के लिए सीटों की संख्या निर्धारित करना।

शक्तियाँ और कानूनी स्थिति

  • अंतिम और बाध्यकारी निर्णय: संसद/विधानसभाओं के समक्ष रखे गए आदेशों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  • न्यायिक समीक्षा से छूट: निर्णयों को न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • कानून का बल: भारत के राजपत्र में प्रकाशन के बाद आदेश कानूनी रूप से लागू हो जाते हैं।

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