संदर्भ
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क के अंतर्गत NBFCs–अपर लेयर (NBFC-UL) के पहचान संबंधी मानदंडों में संशोधन हेतु मसौदा प्रस्तावित किया है।
संबंधित तथ्य
- वर्तमान में, सरकारी स्वामित्व वाली NBFCs को नियामक ढाँचे के अंतर्गत बेस लेयर (NBFC-BL) या मिडिल लेयर (NBFC-ML) में रखा जाता है।
- प्रस्तावित परिवर्तन पात्र सरकारी स्वामित्व वाली NBFCs को उनके परिसंपत्ति के आकार के आधार पर अपर लेयर (NBFC-UL) में शामिल करने का प्रयास करते हैं, जिससे एक अधिक समान (Uniform) और स्वामित्व रूप से तटस्थ नियामक दृष्टिकोण सुनिश्चित किया जा सके।
NBFCs के लिए स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क के बारे में
- स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क एक नियामक दृष्टिकोण है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को उनके आकार, गतिविधि और जोखिम प्रोफाइल के आधार पर वर्गीकृत तथा विनियमित करने के लिए प्रस्तुत किया गया है।
स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क की प्रमुख विशेषताएँ
- वृद्धिमान और जोखिम-आधारित वर्गीकरण: NBFCs को उनके आकार, जटिलता और विकसित होते जोखिम प्रोफाइल के आधार पर विभिन्न स्तरों में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे विनियमन में लचीलापन सुनिश्चित होता है।
- उदाहरण: तेजी से परिसंपत्तियों में वृद्धि करने वाली कोई NBFCs मिडिल लेयर से अपर लेयर में स्थानांतरित हो सकती है।
- अनुपातिक विनियमन: NBFCs द्वारा उत्पन्न जोखिम के स्तर के अनुसार नियामकीय आवश्यकताएँ बढ़ती हैं, जिससे संतुलित निगरानी सुनिश्चित होती है।
- उदाहरण: बेस लेयर की छोटी NBFCs पर हल्के नियम लागू होते हैं, जबकि बड़ी NBFCs पर अधिक सख्त अनुपालन लागू होता है।
- उन्नत गवर्नेंस और अनुपालन मानदंड: उच्च स्तरों पर कॉरपोरेट गवर्नेंस मानक, बोर्ड की निगरानी और पारदर्शिता आवश्यकताएँ अधिक कठोर होती हैं।
- अपर लेयर NBFCs को बैंकों के समान सख्त प्रकटीकरण मानदंड और गवर्नेंस प्रथाओं का पालन करना होता है।
- सुदृढ़ पूँजी और जोखिम प्रबंधन संबंधी आवश्यकताएँ: उच्च स्तरों की NBFCs को अधिक पूँजी पर्याप्तता और कड़े जोखिम प्रबंधन मानदंड बनाए रखने होते हैं।
- उदाहरण: बड़ी NBFCs को वित्तीय तनावों को सहन करने हेतु अतिरिक्त पूँजी बफर रखना होता है।
- वित्तीय स्थिरता और प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण पर फोकस: यह फ्रेमवर्क बड़ी NBFCs से उत्पन्न प्रणालीगत जोखिमों को रोकने और व्यापक वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा करने का लक्ष्य रखता है।
- उदाहरण: NBFC-UL संस्थाओं पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा कड़ी निगरानी रखी जाती है, ताकि IL&FS जैसे संकटों से बचा जा सके।
NBFCs के लिए स्केल-बेस्ड रेगुलेशन फ्रेमवर्क
| लेयर |
श्रेणी |
मापदंड / शामिल संस्थाएँ |
| बेस लेयर (NBFC-B) |
कम जोखिम वाली NBFCs |
₹1000 करोड़ से कम परिसंपत्ति आकार वाली गैर-जमा स्वीकार करने वाली NBFCs, NBFCs पीयर-टू-पीयर, NBFCs अकाउंट एग्रीगेटर |
| मिडिल लेयर (NBFC-ML) |
मध्यम जोखिम वाली NBFCs |
जमा स्वीकार करने वाली NBFCs, आकार की परवाह किए बिना ₹1000 करोड़ और उससे अधिक परिसंपत्ति आकार वाली NBFCs |
| अपर लेयर (NBFC-UL) |
उच्च जोखिम / प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण NBFCs |
RBI द्वारा मापदंडों और स्कोरिंग पद्धति के आधार पर पहचानी गई NBFCs परिसंपत्ति आकार के आधार पर पात्र NBFCs, अन्य किसी कारक की परवाह किए बिना। |
| टॉप लेयर (NBFC-TL) |
अत्यधिक जोखिम (डिफॉल्ट रूप से रिक्त) |
आदर्श रूप से रिक्त रहता है, अपर लेयर की कुछ विशिष्ट NBFCs से प्रणालीगत जोखिम में उल्लेखनीय वृद्धि होने पर (RBI के अनुसार)। |
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी–अपर लेयर (NBFC-UL) के बारे में
- NBFC-UL एक नियामक वर्गीकरण है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपने स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR) फ्रेमवर्क के अंतर्गत NBFCs के लिए प्रस्तुत किया गया है।
- उदाहरण: बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, टाटा कैपिटल।
- NBFC-UL: इसमें वे संस्थाएँ शामिल होती हैं, जो अपने आकार, जटिलता और अंतर्संबंध के कारण महत्वपूर्ण प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न करती हैं।
- NBFC-UL के प्रमुख पहलू
- वर्गीकरण: इसमें परिसंपत्ति के आकार के आधार पर शीर्ष दस NBFCs के साथ-साथ स्कोरिंग-आधारित विधि के माध्यम से चयनित अन्य अभिकर्त्ता शामिल होते हैं।
- नियामकीय मानदंड: ये सख्त नियामकीय मानदंडों के अधीन होते हैं, जैसे— तीन वर्षों के भीतर अनिवार्य लिस्टिंग, उन्नत गवर्नेंस मानक (उच्च कैपिटल बफर, लिक्विडिटी आवश्यकताएँ) और निगरानी।
- समय अवधि: एक बार अपर लेयर के अंतर्गत वर्गीकृत होने पर, NBFCs को कम-से-कम पाँच वर्षों तक इन मानदंडों का पालन करना आवश्यक होता है, भले ही उनके जोखिम मानक कम हो जाएँ।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा प्रस्तावित संशोधित ढाँचा
| आधार |
मौजूदा ढाँचा (SBR) |
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रस्तावित संशोधित ढाँचा |
| पहचान की विधि |
दो-स्तरीय दृष्टिकोण:
शीर्ष 10 NBFCs (संपत्ति आकार के आधार पर)
पैरामीट्रिक स्कोरिंग (आकार, लीवरेज, पारस्परिक जुड़ाव) |
एकल मानदंड:
संपत्ति आकार आधारित पहचान |
| संपत्ति आकार सीमा |
कोई निश्चित पूर्ण सीमा नहीं |
₹1,00,000 करोड़ और उससे अधिक |
| पारदर्शिता एवं सरलता |
अनेक मानकों के कारण जटिल |
अधिक पारदर्शी, सरल और वस्तुनिष्ठ |
| सरकारी स्वामित्व वाले NBFCs |
केवल बेस या मिडिल लेयर में रखा जाता है। |
अब NBFC-UL के लिए पात्र (स्वामित्व-तटस्थ दृष्टिकोण)। |
| विनियामक सिद्धांत |
स्वामित्व के आधार पर भिन्न व्यवहार। |
स्वामित्व-तटस्थ विनियामक व्यवस्था। |
| NBFC-UL संस्थाओं की संख्या |
लगभग 15 की पहचान |
व्यापक समावेशन के कारण बढ़ने की संभावना। |
| ऋण जोखिम हस्तांतरण |
सीमित लचीलापन |
NBFC-UL को राज्य सरकार की गारंटी का असीमित उपयोग करने की अनुमति (शर्तों के अधीन)। |