NBFC का अपर लेयर फ्रेमवर्क

11 Apr 2026

संदर्भ

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क के अंतर्गत NBFCs–अपर लेयर (NBFC-UL) के पहचान संबंधी मानदंडों में संशोधन हेतु मसौदा प्रस्तावित किया है।

संबंधित तथ्य

  • वर्तमान में, सरकारी स्वामित्व वाली NBFCs को नियामक ढाँचे के अंतर्गत बेस लेयर (NBFC-BL) या मिडिल लेयर (NBFC-ML) में रखा जाता है।
    • प्रस्तावित परिवर्तन पात्र सरकारी स्वामित्व वाली NBFCs को उनके परिसंपत्ति के  आकार के आधार पर अपर लेयर (NBFC-UL) में शामिल करने का प्रयास करते हैं, जिससे एक अधिक समान (Uniform) और स्वामित्व रूप से तटस्थ नियामक दृष्टिकोण सुनिश्चित किया जा सके।

NBFCs के लिए स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क के बारे में

  • स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क एक नियामक दृष्टिकोण है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को उनके आकार, गतिविधि और जोखिम प्रोफाइल के आधार पर वर्गीकृत तथा विनियमित करने के लिए प्रस्तुत किया गया है।

स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी (SBR) फ्रेमवर्क की प्रमुख विशेषताएँ

  • वृद्धिमान और जोखिम-आधारित वर्गीकरण: NBFCs को उनके आकार, जटिलता और विकसित होते जोखिम प्रोफाइल के आधार पर विभिन्न स्तरों में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे विनियमन में लचीलापन सुनिश्चित होता है।
    • उदाहरण: तेजी से परिसंपत्तियों में वृद्धि करने वाली कोई NBFCs मिडिल लेयर से अपर लेयर में स्थानांतरित हो सकती है।
  • अनुपातिक विनियमन: NBFCs द्वारा उत्पन्न जोखिम के स्तर के अनुसार नियामकीय आवश्यकताएँ बढ़ती हैं, जिससे संतुलित निगरानी सुनिश्चित होती है।
    • उदाहरण: बेस लेयर की छोटी NBFCs पर हल्के नियम लागू होते हैं, जबकि बड़ी NBFCs पर अधिक सख्त अनुपालन लागू होता है।
  • उन्नत गवर्नेंस और अनुपालन मानदंड: उच्च स्तरों पर कॉरपोरेट गवर्नेंस मानक, बोर्ड की निगरानी और पारदर्शिता आवश्यकताएँ अधिक कठोर होती हैं।
    • अपर लेयर NBFCs को बैंकों के समान सख्त प्रकटीकरण मानदंड और गवर्नेंस प्रथाओं का पालन करना होता है।
  • सुदृढ़ पूँजी और जोखिम प्रबंधन संबंधी आवश्यकताएँ: उच्च स्तरों की NBFCs को अधिक पूँजी पर्याप्तता और कड़े जोखिम प्रबंधन मानदंड बनाए रखने होते हैं।
    • उदाहरण: बड़ी NBFCs को वित्तीय तनावों को सहन करने हेतु अतिरिक्त पूँजी बफर रखना होता है।
  • वित्तीय स्थिरता और प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण पर फोकस: यह फ्रेमवर्क बड़ी NBFCs से उत्पन्न प्रणालीगत जोखिमों को रोकने और व्यापक वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा करने का लक्ष्य रखता है।
    • उदाहरण: NBFC-UL संस्थाओं पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा कड़ी निगरानी रखी जाती है, ताकि IL&FS जैसे संकटों से बचा जा सके।

NBFCs के लिए स्केल-बेस्ड रेगुलेशन फ्रेमवर्क

लेयर श्रेणी मापदंड / शामिल संस्थाएँ
बेस लेयर (NBFC-B) कम जोखिम वाली NBFCs ₹1000 करोड़ से कम परिसंपत्ति आकार वाली गैर-जमा स्वीकार करने वाली NBFCs, NBFCs पीयर-टू-पीयर, NBFCs अकाउंट एग्रीगेटर
मिडिल लेयर (NBFC-ML) मध्यम जोखिम वाली NBFCs जमा स्वीकार करने वाली NBFCs, आकार की परवाह किए बिना ₹1000 करोड़ और उससे अधिक परिसंपत्ति आकार वाली NBFCs
अपर लेयर (NBFC-UL) उच्च जोखिम / प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण NBFCs RBI द्वारा मापदंडों और स्कोरिंग पद्धति के आधार पर पहचानी गई NBFCs परिसंपत्ति आकार के आधार पर पात्र NBFCs, अन्य किसी कारक की परवाह किए बिना।
टॉप लेयर (NBFC-TL) अत्यधिक जोखिम (डिफॉल्ट रूप से रिक्त) आदर्श रूप से रिक्त रहता है, अपर लेयर की कुछ विशिष्ट NBFCs से प्रणालीगत जोखिम में उल्लेखनीय वृद्धि होने पर (RBI के अनुसार)।

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी–अपर लेयर (NBFC-UL) के बारे में

  • NBFC-UL एक नियामक वर्गीकरण है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपने स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR) फ्रेमवर्क के अंतर्गत NBFCs के लिए प्रस्तुत किया गया है।
    • उदाहरण: बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, टाटा कैपिटल।
  • NBFC-UL: इसमें वे संस्थाएँ शामिल होती हैं, जो अपने आकार, जटिलता और अंतर्संबंध के कारण महत्वपूर्ण प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न करती हैं।
  • NBFC-UL के प्रमुख पहलू
    • वर्गीकरण: इसमें परिसंपत्ति के आकार के आधार पर शीर्ष दस NBFCs के साथ-साथ स्कोरिंग-आधारित विधि के माध्यम से चयनित अन्य अभिकर्त्ता शामिल होते हैं।
    • नियामकीय मानदंड: ये सख्त नियामकीय मानदंडों के अधीन होते हैं, जैसे— तीन वर्षों के भीतर अनिवार्य लिस्टिंग, उन्नत गवर्नेंस मानक (उच्च कैपिटल बफर, लिक्विडिटी आवश्यकताएँ) और निगरानी।
    • समय अवधि: एक बार अपर लेयर के अंतर्गत वर्गीकृत होने पर, NBFCs को कम-से-कम पाँच वर्षों तक इन मानदंडों का पालन करना आवश्यक होता है, भले ही उनके जोखिम मानक कम हो जाएँ।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा प्रस्तावित संशोधित ढाँचा

आधार मौजूदा ढाँचा (SBR) भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रस्तावित संशोधित ढाँचा
पहचान की विधि दो-स्तरीय दृष्टिकोण:

शीर्ष 10 NBFCs (संपत्ति आकार के आधार पर)

पैरामीट्रिक स्कोरिंग (आकार, लीवरेज, पारस्परिक जुड़ाव)

एकल मानदंड:

संपत्ति आकार आधारित पहचान

संपत्ति आकार सीमा कोई निश्चित पूर्ण सीमा नहीं ₹1,00,000 करोड़ और उससे अधिक
पारदर्शिता एवं सरलता अनेक मानकों के कारण जटिल अधिक पारदर्शी, सरल और वस्तुनिष्ठ
सरकारी स्वामित्व वाले NBFCs केवल बेस या मिडिल लेयर में रखा जाता है। अब NBFC-UL के लिए पात्र (स्वामित्व-तटस्थ दृष्टिकोण)।
विनियामक सिद्धांत स्वामित्व के आधार पर भिन्न व्यवहार। स्वामित्व-तटस्थ विनियामक व्यवस्था।
NBFC-UL संस्थाओं की संख्या लगभग 15 की पहचान व्यापक समावेशन के कारण बढ़ने की संभावना।
ऋण जोखिम हस्तांतरण सीमित लचीलापन NBFC-UL को राज्य सरकार की गारंटी का असीमित उपयोग करने की अनुमति (शर्तों के अधीन)।

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