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रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का प्रस्ताव

11 Apr 2026

संदर्भ

भारत रुपे आधारित ऑफशोर डेरिवेटिव ट्रेड्स’ की रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाने के प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ने की योजना बना रहा है, भले ही बैंकों द्वारा इस पर आपत्तियाँ जताई गई हों।

संबंधित तथ्य

  • इसका उद्देश्य मुद्रा बाजारों में पारदर्शिता बढ़ाना और अस्थिरता को कम करना है।

रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ पर RBI प्रस्ताव के प्रमुख प्रावधान

  • बैंकों पर लागू होना: घरेलू बैंकों को पहले से ही सभी डेरिवेटिव लेन-देन, जिसमें उनके विदेशी कार्यालयों द्वारा किए गए लेन-देन भी शामिल हैं, की रिपोर्टिंग करना आवश्यक है। विदेशी ऋणदाता वर्तमान में केवल अपनी भारत स्थित इकाइयों द्वारा किए गए डेरिवेटिव लेन-देन की रिपोर्ट करते हैं, न कि ऑफशोर यूनिट्स द्वारा किए गए लेन-देन की।
    • यह प्रस्ताव भारतीय और विदेशी बैंकों के मध्य समान अवसर (Level Playing Field) सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
  • कार्यान्वयन समय-सीमा: RBI चाहता है कि ऋणदाता फरवरी 2027 से ऐसे डेरिवेटिव लेन-देन के कम-से-कम 70 प्रतिशत डेटा को साझा करना प्रारंभ करें।

रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ के बारे में

  • रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स वे वित्तीय साधन हैं, जो भारतीय रुपया (INR) से जुड़े होते हैं और जिनका व्यापार भारत के बाहर किया जाता है।
  • ये अनुबंध अपना मूल्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले INR की विनिमय दर से प्राप्त करते हैं।
  • प्रमुख ट्रेडिंग केंद्र: प्रमुख ‘ऑफशोर हब’ में शामिल हैं:- सिंगापुर, हांगकांग, लंदन, दुबई

रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ के प्रमुख प्रकार

  • नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड्स (NDFs): NDFs सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ साधन हैं, जिनका व्यापार मुख्यतः भारत के बाहर किया जाता है।
    • ये अनुबंध विदेशी मुद्रा (आमतौर पर US डॉलर) में होते हैं, न कि भारतीय रुपये में।
  • करेंसी ‘ऑप्शंस’: करेंसी ‘ऑप्शंस’ बाजार प्रतिभागियों को भविष्य की एक निर्धारित दर पर INR को खरीदने या बेचने का अधिकार देते हैं, लेकिन बाध्यता नहीं होती।
    • इनका उपयोग सामान्यतः विनिमय दर की अस्थिरता के विरुद्ध हेजिंग के लिए किया जाता है, साथ ही लाभ की संभावना भी बनी रहती है।
  • करेंसी स्वैप्स: करेंसी स्वैप्स में दो पक्षों के बीच विभिन्न मुद्राओं, जिसमें INR भी शामिल है, में ‘कैश फ्लो’ का आदान-प्रदान होता है।
    • इनका उपयोग सामान्यतः दीर्घकालिक मुद्रा जोखिम और तरलता आवश्यकताओं के प्रबंधन के लिए किया जाता है।

ऑफशोर बाजार क्यों मौजूद हैं?

  • आंशिक पूँजी खाता परिवर्तनीयता: भारत आंशिक पूँजी खाता परिवर्तनीयता की प्रणाली का पालन करता है, जो सीमा-पार पूँजी प्रवाह में पूर्ण स्वतंत्रता को सीमित करता है।
    • इसके परिणामस्वरूप, विदेशी प्रतिभागी ऐसे ऑफशोर बाजारों को प्राथमिकता देते हैं, जहाँ ऐसे प्रतिबंध न्यूनतम होते हैं।
  • घरेलू नियामकीय बाधाएँ: घरेलू वित्तीय बाजारों में नियामकीय प्रतिबंध और परिचालन सीमाएँ विदेशी निवेशकों को भारत के बाहर लेन-देन करने के लिए प्रेरित करती हैं।
    • ऑफशोर बाजार अधिक लचीलापन और कम अनुपालन बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
  • वैश्विक निवेशकों के लिए भागीदारी में सुविधा: ऑफशोर बाजार वैश्विक निवेशकों और संस्थानों के लिए सरल पहुँच और उच्च तरलता प्रदान करते हैं।
    • इससे उन्हें भारत के नियामकीय ढाँचे के अधीन हुए बिना आसानी से भाग लेने की सुविधा मिलती है।

रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ बाजार की चुनौतियाँ

  • सीमित नियामकीय नियंत्रण: रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ बाजार भारतीय रिजर्व बैंक के प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्र के बाहर संचालित होते हैं।
    • इससे RBI की लेन-देन की प्रभावी निगरानी और विनियमन करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
  • विनिमय दर में अस्थिरता: ऑफशोर बाजारों में उच्च स्तर का सट्टा व्यापार भारतीय रुपये के मूल्य में तीव्र उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकता है।
    • ऐसी गतिविधियाँ घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार को अस्थिर कर सकती हैं।
  • पारदर्शिता की कमी: लेन-देन संबंधी डेटा की सीमित उपलब्धता के कारण नियामकों के लिए बाजार प्रवृत्तियों और जोखिमों की निगरानी करना कठिन हो जाता है।
    • यह अस्पष्टता प्रभावी नीति निर्माण और हस्तक्षेप को बाधित करती है।
  • आर्बिट्राज’ के अवसर: ऑफशोर और ऑनशोर बाजारों के मध्य मूल्य अंतर व्यापारियों के लिए आर्बिट्राज के अवसर उत्पन्न करता है।
    • ऐसी गतिविधियाँ मूल्य खोज (Price Discovery) को विकृत कर सकती हैं और भारतीय रिजर्व बैंक की घरेलू मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता को कमजोर कर सकती हैं।
  • घरेलू बाजारों पर स्पिलओवर जोखिम: ऑफशोर बाजारों में होने वाले विकास घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार में तेजी से तनाव उत्पन्न कर सकते हैं।
    • इससे प्रणालीगत जोखिम बढ़ता है और भारत में विनिमय दर प्रबंधन अधिक जटिल हो जाता है।

रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स का महत्त्व

  • घरेलू विनिमय दर पर प्रभाव: ऑफशोर डेरिवेटिव बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव भारत में ऑनशोर विनिमय दर प्रवृत्तियों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
    • इन बाजारों में तीव्र उतार-चढ़ाव घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को प्रसारित कर सकते हैं।
  • वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ एकीकरण: रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ भारत के वैश्विक वित्तीय प्रणाली के साथ एकीकरण को सुदृढ़ करते हैं।
    • ये अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की भागीदारी को सुगम बनाते हैं, जिससे तरलता और बाजार पहुँच में वृद्धि होती है।
  • जोखिम प्रबंधन और ‘हेजिंग’: ऑफशोर डेरिवेटिव्स वैश्विक निवेशकों, निर्यातकों और आयातकों के लिए मुद्रा जोखिम के विरुद्ध प्रभावी ‘हेजिंग’ उपकरण प्रदान करते हैं, जो भारतीय रुपये से संबंधित लेन-देन करते हैं।
    • इससे भारत से जुड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश में अनिश्चितता कम होती है।
  • बाजार तरलता में वृद्धि: ऑफशोर बाजारों की उपस्थिति, वैश्विक स्तर पर INR ट्रेडिंग की कुल तरलता को बढ़ाती है।
    • अधिक तरलता से बेहतर दक्षता, कम प्रसार और मुद्रा बाजारों का सुचारू संचालन सुनिश्चित होता है।
रुपे आधारित ‘ऑफशोर डेरिवेटिव्स’ पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का प्रस्ताव

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