संदर्भ
हाल ही में विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के विरुद्ध एक विशेषाधिकार नोटिस प्रस्तुत किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उनके हालिया संबोधन ने संसद की गरिमा और उसके सदस्यों की स्वतंत्रता को कम किया है।
संबंधित तथ्य
- यह नोटिस संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित न होने पर प्रधानमंत्री की टिप्पणियों से संबंधित है, जो आवश्यक विशेष बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा। विपक्ष ने तर्क दिया है कि ऐसी टिप्पणियाँ:
- सांसदों के मतदान व्यवहार पर उद्देश्य आधारित होने का आरोप लगाती हैं, जो संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है।
- विधायी स्वायत्तता और सदन की गरिमा को कमजोर करती हैं।
विशेषाधिकार प्रस्ताव के बारे में
- परिभाषा: विशेषाधिकार प्रस्ताव एक औपचारिक सूचना है, जिसे किसी सांसद (या विधायक) द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें सदन के विशेषाधिकार के उल्लंघन या सदन की अवमानना का आरोप लगाया जाता है।
- कौन प्रस्तुत कर सकता है: सदन का कोई भी सदस्य।
- प्रक्रिया: यह एक हाल की घटना से संबंधित होना चाहिए।
- सूचना प्रातः 10:00 बजे से पूर्व अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत की जाती है।
- इसके लिए पीठासीन अधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है।
- पीठासीन अधिकारी की भूमिका: अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव की प्रारंभिक जाँच करते हैं।
- वे मामले का सीधे निर्णय कर सकते हैं या
- इसे विस्तृत परीक्षण के लिए विशेषाधिकार समिति को भेज सकते हैं।
- यदि प्रस्ताव स्वीकृत (नियम 222 के अंतर्गत) हो जाता है, तो सदस्य को सदन के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाती है।
- लोकसभा में कार्य संचालन का नियम 222 सदन में विशेषाधिकार के प्रश्न उठाने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

संसदीय विशेषाधिकार के बारे में
- परिभाषा: संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियाँ और छूट हैं, जिनका उपभोग संसद के दोनों सदनों, उनकी समितियों और उनके सदस्यों द्वारा किया जाता है।
- सीमा: संविधान उन व्यक्तियों तक भी संसदीय विशेषाधिकारों का विस्तार करता है, जिन्हें संसद के किसी सदन या उसकी किसी समिति की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार प्राप्त है।
- इनमें भारत के महान्यायवादी और केंद्रीय मंत्री शामिल हैं।
- अपवाद: संसदीय विशेषाधिकार राष्ट्रपति तक विस्तारित नहीं होते, यद्यपि वे संसद का अभिन्न अंग हैं।
- संविधान का अनुच्छेद-361 राष्ट्रपति के लिए पृथक विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ प्रदान करता है।
- संवैधानिक आधार: संविधान का अनुच्छेद-105 दो विशेषाधिकारों का स्पष्ट उल्लेख करता है:
- संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह सुनिश्चित करता है कि सदस्य सदन के नियमों के अधीन रहते हुए बिना किसी कानूनी परिणाम के भय के बोल सकें।
- कार्यवाही के प्रकाशन का अधिकार: यह संसद को अपनी बहसों और कार्यवाहियों के प्रकाशन को नियंत्रित तथा विनियमित करने की अनुमति देता है।
- वैधानिक प्रावधान: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 निम्नलिखित प्रावधान प्रदान करती है:
- नागरिक मामलों में गिरफ्तारी से स्वतंत्रता
- नागरिक प्रक्रिया के अंतर्गत गिरफ्तारी और निरोध से स्वतंत्रता, निम्न अवधि के दौरान:
- सदन या समिति की बैठक के दौरान
- बैठक प्रारंभ होने से 40 दिन पूर्व
- बैठक समाप्त होने के 40 दिन पश्चात्।
- स्वरूप: संसद ने अब तक सभी संसदीय विशेषाधिकारों का संपूर्ण संहिताकरण करने हेतु कोई विशेष कानून अधिनियमित नहीं किया है।
- अतः, विशेषाधिकार आंशिक रूप से संहिताबद्ध हैं और बड़े पैमाने पर परंपराओं एवं उदाहरणों पर आधारित हैं।
विशेषाधिकार समिति—जाँच तंत्र के बारे में
- संरचना
- लोकसभा: 15 सदस्य (अध्यक्ष द्वारा नामित)
- राज्यसभा: 10 सदस्य (उपसभापति की अध्यक्षता में)।
- कार्य
- कथित उल्लंघन की जाँच करना, साक्ष्यों का परीक्षण करना और संबंधित पक्षों को सुनना।
- सदन को एक अनुशंसात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
- शक्तियाँ एवं परिणाम
- विशेषाधिकार का उल्लंघन एक दंडनीय अपराध है।
- अंतिम निर्णय सदन के पास होता है, जो चेतावनी या निलंबन जैसे दंड आरोपित कर सकता है।
निष्कर्ष
यह प्रकरण संस्थागत गरिमा और विधायी स्वतंत्रता को बनाए रखने में संसदीय विशेषाधिकारों की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। साथ ही, यह एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील वातावरण में विशेषाधिकारों के दायरे तथा जवाबदेही एवं लोकतांत्रिक बहस के बीच संतुलन की आवश्यकता से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न भी उठाता है।