संदर्भ
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति को निर्देश दिया है कि वह जेलों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने हेतु एक समग्र कार्ययोजना तैयार करे।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन
- हिरासत में भी मौलिक अधिकारों की उपस्थिति: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि कारावास केवल आवागमन की स्वतंत्रता को सीमित करता है, न कि संवैधानिक अधिकारों को; अतः कैदियों के अधिकार बने रहते हैं।
- अनुच्छेद-14 के अंतर्गत वास्तविक समानता: सार्थक समानता के लिए उचित समायोजन आवश्यक है, जिससे दिव्यांग कैदियों को विशेष सहायता (जैसे- रैंप, सुलभ सुविधाएँ, सहायक उपकरण) प्रदान कर संरचनात्मक असमानताओं की क्षतिपूर्ति की जा सके।
- गरिमा, स्वायत्तता एवं अनुच्छेद-21: जीवन के अधिकार का दायरा केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण और स्वतंत्र जीवन को भी सम्मिलित करता है, जिससे राज्य पर आवश्यक सहायक अवसंरचना और देखभाल उपलब्ध कराने का सकारात्मक दायित्व आता है।
- प्रशासनिक सुविधा पर संवैधानिक नैतिकता की प्राथमिकता: न्यायालय ने कहा कि सुरक्षा चिंताएँ या प्रशासनिक बाधाएँ मूल अधिकारों को सीमित नहीं कर सकतीं; मानव गरिमा को प्रक्रियात्मक सुविधा पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुद्दे की पृष्ठभूमि
- चिकित्सा एवं सुगमता की उपेक्षा: जी. एन. साईबाबा के मामले ने जेलों में स्वास्थ्य सेवा और सुगम अवसंरचना की गंभीर कमियों को प्रदर्शित किया, जहाँ एक गंभीर रूप से दिव्यांग कैदी को पर्याप्त सुविधाओं और विशेषज्ञ देखभाल के अभाव में स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना करना पड़ा।
- मूलभूत सहायक समर्थन से वंचित: स्टैन स्वामी के मामले ने संस्थागत असंवेदनशीलता को उजागर किया, जहाँ पार्किंसन रोग से पीड़ित एक कैदी को एक साधारण सहायक उपकरण (सिपर) तक प्रदान नहीं किया गया।
- यह घटना इस बात का सशक्त उदाहरण बन गई कि गरिमा के लिए आवश्यक छोटे-छोटे समायोजन भी हिरासत में अक्सर उपेक्षित रह जाते हैं।
- वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: ऐसे मामलों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उल्लंघन पाया गया, जो सभी सार्वजनिक संस्थानों, जिनमें जेलें भी शामिल हैं, में भेदभाव-रहित व्यवहार, सुगमता और उचित समायोजन को अनिवार्य करता है।
जेल सुधार हेतु प्रमुख निर्देश
- सहायक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: न्यायालय ने निर्देश दिया कि जेलों में व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र तथा अन्य सहायता प्रणालियों सहित व्यापक सहायक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, जिन्हें प्रत्येक कैदी की विशिष्ट कार्यात्मक आवश्यकताओं के अनुसार प्रदान किया जाए।
- यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि कैदियों को मूलभूत सहायता के अभाव में निर्भरता या गरिमा-हीन स्थिति का सामना न करना पड़े।
- प्रभावी क्रियान्वयन हेतु संस्थागत अभिसरण: दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग तथा राज्य सामाजिक न्याय विभागों की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि नीति-निर्माण और क्रियान्वयन दिव्यांगों के अधिकारों और सामाजिक कल्याण विशेषज्ञता के अनुरूप हो।
- सुगमता मानकों का मानकीकरण: न्यायालय ने राष्ट्रीय स्तर पर समान मानकों की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि सुगमता, सहायक उपकरणों की खरीद और रखरखाव में एकरूपता हो तथा विभिन्न राज्यों में कैदियों को समान सुविधाएँ प्राप्त हों।
- समयबद्ध अनुपालन तंत्र: रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए चार माह की समय-सीमा निर्धारित की गई, जिससे सुधार प्रक्रिया समयबद्ध और परिणामोन्मुख बनी रहे।
भारत में दिव्यांग-अनुकूल जेलों की स्थिति
- डेटा का अभाव
- NCRB डेटा संबंधी अंतराल: प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया (PSI) 2023 रिपोर्ट ( वर्ष 2025 में जारी) के अनुसार, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो अब भी कैदियों की दिव्यांगता स्थिति पर कोई केंद्रीकृत डेटा संधारित नहीं करता है।
- हाशियाकरण का अंत:संबंध: विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी (2026) के शोध से संकेत मिलता है कि यद्यपि दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय से संबंधित कैदी जेलों में अधिक हैं, परंतु दिव्यांगता संबंधी डेटा के अभाव में उनकी विशिष्ट सुगमता आवश्यकताएँ सांख्यिकीय रूप से अदृश्य रह जाती हैं।
- अर्जित दिव्यांगता: एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि अनेक कैदी कारावास के दौरान ही दिव्यांग हो जाते हैं, जो खराब स्वास्थ्य सेवा, अभिरक्षात्मक हिंसा या वृद्धावस्था देखभाल के अभाव के कारण होती है।
- अवसंरचना — सुधार में बाधा
- औपनिवेशिक वास्तुकला: भारत की 70% से अधिक केंद्रीय एवं जिला जेलें स्वतंत्रता-पूर्व निर्मित भवनों में स्थित हैं। ये संरचनाएँ समावेशन के बजाय नियंत्रण के लिए बनाई गई थीं, जिससे पुनर्संरचना (रैंप, सुलभ मार्ग जोड़ना) संरचनात्मक रूप से कठिन हो जाती है।
- स्वच्छता अंतराल: स्वतंत्र आकलनों के अनुसार, आधुनिकीकृत जेलों में भी 10% से कम शौचालय ही व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए आवश्यक सार्वभौमिक सुगमता मानकों को पूरा करते हैं।
- सहायक उपकरणों से वंचित: स्टैन स्वामी (पार्किंसन रोग) और जी. एन. साईबाबा के मामले इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि सिपर या व्हीलचेयर जैसे मूलभूत उपकरणों से वंचित करना एक प्रणालीगत समस्या है, न कि अलग घटना।
- “दोहरी सजा” का सिद्धांत: विधिक सिद्धांत में इसे “अनधिकृत कष्ट का सिद्धांत” कहा जाता है:
- प्राथमिक दंड: स्वतंत्रता का ह्रास (न्यायालय द्वारा अधिकृत)।
- द्वितीयक दंड: बाधित वातावरण के कारण गरिमा, स्वास्थ्य और स्वायत्तता का ह्रास (कानून द्वारा अनधिकृत)।
- न्यायिक दृष्टिकोण (2026): अप्रैल 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक उच्च-स्तरीय समिति को “सहायक पारिस्थितिकी तंत्र” विकसित करने का निर्देश दिया तथा यह घोषित किया कि गतिशीलता सहायता उपलब्ध न कराना दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।
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जेल सुधार का संस्थागत एवं विधिक परिप्रेक्ष्य
- जेल प्रशासन की संघीय प्रकृति: संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘जेल’ राज्य सूची का विषय है, जिससे विभिन्न राज्यों में अवसंरचना, वित्तपोषण और सुधार पहलों में भिन्नता उत्पन्न होती है।
- जेल कानूनों की औपनिवेशिक विरासत: कारागार अधिनियम, 1894 पर निरंतर निर्भरता एक नियंत्रण-उन्मुख और दंडात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो आधुनिक पुनर्वास और मानवाधिकारों के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
- सुधार-उन्मुख दिशानिर्देश: मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 ने पुनर्वास, कल्याण और मानव गरिमा पर बल देते हुए एक प्रगतिशील ढाँचा प्रस्तुत किया, परंतु इसकी अबंधनकारी प्रकृति के कारण इसका कार्यान्वयन असमान रहा है।
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न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों थी?
- “दोहरी सजा” की समस्या: एक दिव्यांग कैदी दो बार पीड़ित होता है—पहली बार स्वतंत्रता के ह्रास (कानूनी दंड) के माध्यम से और दूसरी बार असुगम अवसंरचना के कारण दैनिक कठिनाइयों के रूप में, जो एक अतिरिक्त और अन्यायपूर्ण बोझ के समान है।
- स्वतंत्रता एवं गरिमा का ह्रास: सहायक उपकरणों और सुगम सुविधाओं के अभाव में कैदियों को बुनियादी कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है, जिससे आत्मसम्मान में गिरावट और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के बावजूद जेलें बड़े पैमाने पर अनुपालन में विफल रही हैं, जो प्रणालीगत असंवेदनशीलता और अधिकार उल्लंघन को दर्शाता है।
- पुरानी एवं असमावेशी अवसंरचना: अधिकांश जेलें औपनिवेशिक, सुरक्षा-केंद्रित डिजाइन पर आधारित हैं, जिनमें समावेशन का अभाव है, जिससे शारीरिक एवं मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए परिस्थितियाँ और अधिक कठोर हो जाती हैं।
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भारत में जेल सुधार से संबंधित पहलें
- विधायी एवं नीतिगत आधुनिकीकरण: भारत 19वीं शताब्दी के औपनिवेशिक कानूनों से आगे बढ़कर 21वीं शताब्दी की सुधारात्मक प्रणाली की ओर अग्रसर है।
- आदर्श कारागार एवं सुधार सेवा अधिनियम, 2023: यह कारागार अधिनियम, 1894 को प्रतिस्थापित करने की एक महत्त्वपूर्ण पहल है, जो प्रतिशोध से हटकर सुधार एवं पुनर्वास पर बल देती है।
- मॉडल प्रिजन मैनुअल (2016): यह राज्यों को अधिकार-आधारित ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें आहार, चिकित्सा देखभाल और विधिक सहायता शामिल हैं।
- दिव्यांग-अनुकूल जेल पहल (2026): यह सुनिश्चित करती है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का जेलों में प्रभावी क्रियान्वयन हो, जिससे उचित समायोजन और बाधा-रहित पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
- संरचनात्मक सुधार एवं कारावास-न्यूनता: ये पहले अतिभार (ओवरक्राउडिंग) और विचाराधीन कैदियों की समस्या को संबोधित करती हैं।
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979): इस निर्णय ने त्वरित सुनवाई के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी, जिससे हजारों विचाराधीन कैदियों की रिहाई हुई।
- अंडरट्रायल रिव्यू कमेटियाँ (UTRCs): प्रत्येक जिले में स्थापित, जो जमानत के पात्र कैदियों या अधिकतम सजा के आधे समय की अवधि पूरी कर चुके कैदियों (धारा 436A दंड प्रक्रिया संहिता) के मामलों की त्रैमासिक समीक्षा करती हैं।
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) पहलें: यह जेलों के भीतर निःशुल्क विधिक सहायता केंद्र प्रदान करता है, जिससे गरीबी न्याय तक पहुँच में बाधा न बने।
- राममूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य (1997): इसने चिकित्सा सुविधा के अभाव और अपर्याप्त अवसंरचना सहित 9 प्रमुख प्रणालीगत समस्याओं की पहचान की तथा सुधारात्मक प्रणाली की ओर परिवर्तन पर बल दिया।
- प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल अवसंरचना: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के माध्यम से आधुनिकीकरण से पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि होती है।
- ई-प्रिजन्स परियोजना: इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के अंतर्गत एक डिजिटल डाटाबेस, जो कैदियों के रिकॉर्ड, स्वास्थ्य इतिहास और न्यायालय तिथियों का संधारण करता है।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC): आभासी न्यायालय सुनवाई और टेलीमेडिसिन के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे कैदियों के परिवहन से जुड़े लॉजिस्टिक बोझ और सुरक्षा जोखिम कम होते हैं।
- राष्ट्रीय कारागार सूचना पोर्टल: यह “ई-मुलाकात” (ऑनलाइन मुलाकात) सुविधा प्रदान करता है, जिससे परिवारी जन कैदियों से आभासी या प्रत्यक्ष मुलाकात बुक कर सकते हैं।
- पुनर्वास एवं व्यावसायिक कल्याण: सुधार का अंतिम उद्देश्य पुनरावृत्ति (Recidivism) को कम करना और सफल सामाजिक पुनर्समावेशन सुनिश्चित करना है।
- खुली एवं अर्द्ध-खुली जेलें: राजस्थान जैसे राज्यों में सफलतापूर्वक लागू, जहाँ कम-जोखिम वाले कैदियों को परिवार के साथ रहने और समुदाय में कार्य करने की अनुमति दी जाती है, जिससे आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
- कौशल विकास: राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) और इग्नू (IGNOU) के साथ साझेदारी के माध्यम से कैदियों को शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण (बढ़ईगीरी, डिजिटल साक्षरता) प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
- आर. डी. उपाध्याय बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2007): यह निर्णय महिला कैदियों के साथ रहने वाले बच्चों के कल्याण पर केंद्रित था, जिसमें उनके भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार सुनिश्चित किए गए।
- मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम: टेली-मनोचिकित्सा और विपश्यना जैसे कल्याण सत्रों का उपयोग बढ़ रहा है, जिससे कारावास के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को कम किया जा सके।
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वैश्विक पहलें एवं श्रेष्ठ प्रथाएँ
- संयुक्त राष्ट्र न्यूनतम मानक नियम (नेल्सन मंडेला नियम): ये नियम कैदियों के मानवीय व्यवहार के लिए न्यूनतम स्तरीय मानक निर्धारित करते हैं, जिनमें उचित समायोजन और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुगमता से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
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- दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD): भारत, एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में, न्याय तक समान पहुँच और सार्वजनिक संस्थानों (जेलों सहित) में भौतिक एवं संस्थागत बाधाओं को हटाकर समावेशन सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है।
- अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथा—नॉर्वे मॉडल: नॉर्वे की जेल प्रणाली मानव गरिमा, सुगमता और पुनर्वास पर बल देती है, जहाँ अवसंरचना बाधा-रहित है तथा जीवन परिस्थितियाँ मानवीय हैं, इस सिद्धांत पर आधारित कि स्वतंत्रता का ह्रास ही राज्य द्वारा दिया गया एकमात्र दंड है।
क्रियान्वयन में चुनौतियाँ
- अवसंरचनात्मक सीमाएँ: अनेक जेलें पुरानी हैं और संरचनात्मक रूप से सुगम नहीं हैं, जिससे पुनर्रचना (रेट्रोफिटिंग) तकनीकी रूप से जटिल और संसाधन-गहन हो जाती है।
- वित्तीय एवं मानव संसाधन बाधाएँ: पर्याप्त वित्तपोषण, सहायक उपकरणों और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी के कारण सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन सीमित रहता है।
- सुरक्षा संबंधी चिंताएँ एवं प्रशासनिक प्रतिरोध: प्राधिकरण अक्सर सहायक उपकरणों के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ व्यक्त करते हैं।
- अंतर-राज्यीय असमानताएँ: संघीय संरचना के कारण विभिन्न राज्यों में सुधारों का असमान कार्यान्वयन होता है, जिससे जेलों की परिस्थितियों में भिन्नता उत्पन्न होती है।
आगे की राह
- सुगमता ऑडिट का संस्थानीकरण: सभी जेल सुविधाओं में नियमित और व्यापक सुगमता ऑडिट स्थापित करना आवश्यक है, जिसमें अवसंरचना, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ और सेवा वितरण तंत्र शामिल हों।
- ये ऑडिट समयबद्ध कार्ययोजनाओं में परिवर्तित होने चाहिए, जिनके लिए समर्पित वित्तीय समर्थन उपलब्ध हो, ताकि सुगमता जेल आधुनिकीकरण का अभिन्न अंग बन सके।
- संस्थागत मानसिकता में परिवर्तन: सतत् सुधार के लिए संस्थागत दृष्टिकोण को नियंत्रण-उन्मुख कार्यप्रणाली से हटाकर सहानुभूति-आधारित प्रशासन की ओर परिवर्तित करना आवश्यक है।
- नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम के माध्यम से जेल अधिकारियों को दिव्यांगता अधिकार, विधिक दायित्व और मानवीय प्रथाओं का ज्ञान प्रदान करना, जिससे क्रियान्वयन परिणामों में सुधार हो।
- स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग: टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य मंचों का उपयोग कारावास की सीमाओं और स्वास्थ्य आवश्यकताओं के बीच के अंतराल को समाप्त कर सकता है, विशेषकर दीर्घकालिक रोगों या गतिशीलता संबंधी बाधाओं से प्रभावित कैदियों के लिए, जिससे निरंतर और विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल सुनिश्चित हो सके।
- निगरानी और जवाबदेही को सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण जैसे संस्थानों को नियमित निरीक्षण, अनुपालन की निगरानी और सुगम शिकायत निवारण तंत्र प्रदान करने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए, जिससे सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो।
- समग्र विधायी सुधार: भारत को आधुनिक, अधिकार-आधारित जेल कानूनों की दिशा में अग्रसर होना चाहिए, जो पुराने औपनिवेशिक कानूनों का स्थान लेकर सुगमता मानकों, पुनर्वास लक्ष्यों और जवाबदेही तंत्र को समाहित करें तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हों।
निष्कर्ष
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप समावेशी और मानवीय सुविधाओं से युक्त जेलों की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकार अभिरक्षा में भी बने रहते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि राज्य शक्ति, मानव गरिमा द्वारा सीमित रहे, ताकि स्वतंत्रता का ह्रास, गरिमा के ह्रास में परिवर्तित न हो।