संदर्भ
हाल ही में भारत ने अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम में एक उपलब्धि प्राप्त की, जब कल्पक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकलिटी की अवस्था प्राप्त की।
- यह विकास केवल एक प्रौद्योगिकीय सफलता का संकेत नहीं है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक परिकल्पित त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा रणनीति के द्वितीय चरण में संचालनात्मक प्रवेश को भी चिह्नित करता है।
‘क्रिटिकलिटी’ की अवस्था
- स्वरूप एवं वैचारिक आधार: क्रिटिकलिटी उस अवस्था को संदर्भित करती है, जिसमें एक परमाणु रिएक्टर एक स्व-स्थायी शृंखला अभिक्रिया प्राप्त करता है, जहाँ प्रत्येक विखंडन (fission) की घटना पर्याप्त न्यूट्रॉन उत्पन्न करती है ताकि नियंत्रित संतुलन में अगली अभिक्रियाएँ संचालित होती रहें।
- यह उस बिंदु को दर्शाती है, जहाँ रिएक्टर में न्यूट्रॉन उत्पादन और न्यूट्रॉन हानि के बीच संतुलन स्थापित हो जाता है, जिससे रिएक्टर भौतिकी में स्थिरता सुनिश्चित होती है।
- मुख्य विशेषताएँ: क्रिटिकलिटी की स्थिति स्थिर न्यूट्रॉन अर्थव्यवस्था द्वारा परिभाषित होती है, जहाँ गुणन गुणांक (k = 1) यह सुनिश्चित करता है कि अभिक्रिया न तो घटती है और न ही अनियंत्रित रूप से बढ़ती है।
- हालाँकि, क्रिटिकलिटी का अर्थ विद्युत उत्पादन या पूर्ण परिचालन क्षमता नहीं है, बल्कि यह रिएक्टर डिजाइन, ईंधन विन्यास और नियंत्रण प्रणालियों के सत्यापन को दर्शाता है।
- क्रिटिकलिटी के पश्चात्, रिएक्टर दीर्घकालिक निम्न-शक्ति संचालन, सुरक्षा परीक्षण और कैलिब्रेशन से गुजरते हैं, जिसके बाद धीरे-धीरे शक्ति में वृद्धि की जाती है।
- तकनीकी महत्त्व: क्रिटिकलिटी रिएक्टर कमीशनिंग में एक प्रवेश-द्वार चरण के रूप में कार्य करती है, जो यह सुनिश्चित करती है कि कोर भौतिकी और अभियांत्रिकी प्रणालियाँ नियंत्रित परिस्थितियों में अपेक्षित रूप से कार्य कर रही हैं।
- यह आगे के चरणों, जैसे-विद्युत उत्पादन, सुरक्षा सत्यापन और ग्रिड एकीकरण के लिए आधार तैयार करती है।
- इस प्रकार, क्रिटिकलिटी एक वैज्ञानिक सीमा-बिंदु का प्रतिनिधित्व करती है, जो डिजाइन सत्यापन से परिचालन क्रियान्वयन की ओर संक्रमण को चिह्नित करती है, न कि रिएक्टर की कार्यक्षमता का अंतिम चरण।

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के बारे में
- PFBR दशकों के स्वदेशी अनुसंधान, डिजाइन और अभियांत्रिकी का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रौद्योगिकी का विकास इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा किया गया, जो परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत एक अनुसंधान एवं विकास केंद्र है।
- स्थान: PFBR एक 500 MWe सोडियम-शीतित फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है, जो तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्थित है।
- ईंधन एवं डिजाइन संरचना: यह रिएक्टर मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करता है, जिसमें प्लूटोनियम और यूरेनियम शामिल होते हैं, जिससे विखंडनीय पदार्थों का कुशल उपयोग संभव होता है।
- यह यूरेनियम-238 (U-238) के संवर्द्धित रूप से युक्त होता है, जो न्यूट्रॉन अवशोषण के माध्यम से अतिरिक्त प्लूटोनियम के उत्पादन को संभव बनाता है।
- प्रौद्योगिकीय महत्त्व: PFBR भारत का पहला बड़े पैमाने का ब्रीडर रिएक्टर है, जो पारंपरिक तापीय रिएक्टरों से उन्नत फास्ट रिएक्टर प्रौद्योगिकी की ओर संक्रमण को चिह्नित करता है।
- यह क्लोज्ड फ्यूल साइकिल और संसाधन गुणन के सिद्धांतों को मूर्त रूप देता है, जो दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा स्थिरता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) का कार्यप्रणाली
- प्रकृति एवं परिचालन: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तीव्र न्यूट्रॉन विखंडन के सिद्धांत पर कार्य करते हैं, जबकि पारंपरिक रिएक्टर तापीय (धीमे) न्यूट्रॉन पर निर्भर होते हैं।
- ये मॉडरेटर की आवश्यकता को समाप्त करते हैं, जिससे न्यूट्रॉन ऊर्जा बनी रहती है और ब्रीडिंग दक्षता बढ़ती है।
- मुख्य कार्य तंत्र: रिएक्टर का कोर उच्च-ऊर्जा न्यूट्रॉन उत्पन्न करता है, जो न केवल प्लूटोनियम ईंधन में विखंडन को बनाए रखते हैं, बल्कि आस-पास के संवर्द्धित रूप से भी अंतःक्रिया करते हैं।
- नाभिकीय रूपांतरण के माध्यम से संवर्द्धित समस्थानिक विखंडनीय पदार्थों में परिवर्तित हो जाते हैं:
- यूरेनियम (U)-238 → प्लूटोनियम (Pu)-239
- थोरियम (Th)-232 → यूरेनियम (U)-233
- मुख्य परिणाम: FBRs की प्रमुख विशेषता ब्रीडिंग अनुपात एक से अधिक होना है, जिससे उपभोग की तुलना में अधिक ईंधन का उत्पादन संभव होता है।
- ये पारंपरिक रिएक्टरों (~1%) की तुलना में अत्यधिक ईंधन उपयोग (~10%) सुनिश्चित करते हैं।
- इसके अतिरिक्त, ये क्लोज्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल को सक्षम बनाते हैं, जिससे रेडियोधर्मी अपशिष्ट में कमी आती है और स्थिरता बढ़ती है।
- इस प्रकार, FBRs परमाणु ऊर्जा को सीमित संसाधन प्रणाली से बदलकर एक पुनरुत्पादक और स्व-स्थायी ऊर्जा प्रतिमान में परिवर्तित करते हैं।
- आर्थिक एवं भौतिक संतुलन
- तापीय बनाम ‘फास्ट रिएक्टर’ संबंधी भौतिकी: चरण-I के रिएक्टरों के विपरीत, जिन्हें न्यूट्रॉन को धीमा करने हेतु मॉडरेटर (भारी जल) की आवश्यकता होती है, FBRs उच्च-ऊर्जा “फास्ट” स्पेक्ट्रम बनाए रखते हैं।
- यह एक भौतिक अनिवार्यता है; केवल उच्च-ऊर्जा न्यूट्रॉन ही थोरियम और U-238 को प्रभावी रूप से विखंडनीय समस्थानिकों में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक सीमा ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- सोडियम का चयन: द्रव सोडियम को कूलेंट के रूप में उपयोग करने से उत्कृष्ट ऊष्मीय चालकता और उच्च क्वथनांक (882.8°C) प्राप्त होता है, जिससे रिएक्टर उच्च तापमान और वायुमंडलीय दाब पर संचालित हो सकता है, और दाब विफलता के जोखिम में कमी आती है।
- हालाँकि, इससे एक “जटिलता” उत्पन्न होती है, सोडियम की वायु और जल के साथ उच्च रासायनिक अभिक्रियाशीलता के कारण मध्यवर्ती ऊष्मा परिवहन ‘लूप’ की आवश्यकता होती है, जिससे पारंपरिक रिएक्टरों की तुलना में प्रारंभिक पूँजीगत व्यय (CAPEX) बढ़ जाता है।
भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के बारे में
- रणनीतिक विजन: होमी जहाँगीर भाभा द्वारा परिकल्पित, यह कार्यक्रम भारत की विशिष्ट संसाधन संरचना—सीमित यूरेनियम भंडार और प्रचुर थोरियम भंडार के प्रति एक दीर्घकालिक, रणनीतिक प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है।
- प्रयुक्त सिद्धांत: यह क्लोज्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें प्रयुक्त ईंधन का पुनर्संसाधन (Reprocessing) कर उपयोगी विखंडनीय पदार्थ निकाला जाता है, जिससे ईंधन दक्षता और स्थिरता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- मुख्य फोकस: यह रणनीति विखंडनीय पदार्थ की क्रमिक वृद्धि पर केंद्रित है, जिसमें यूरेनियम पर निर्भरता से थोरियम आधारित आत्मनिर्भरता की ओर संक्रमण किया जाता है, जिससे सदियों तक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- अतः, यह कार्यक्रम वैज्ञानिक दूरदर्शिता, रणनीतिक स्वायत्तता, और अंतरपीढ़ी ऊर्जा नियोजन का एक समन्वित रूप प्रस्तुत करता है।

चरण I – PHWRs – विखंडनीय आधार का निर्माण
प्रथम चरण में प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWRs) का उपयोग किया जाता है, जो प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करते हैं, जिससे महँगी संवर्द्धन (Enrichment) प्रक्रिया की अवसंरचना की आवश्यकता नहीं होती।
- भारी जल (D₂O) मॉडरेटर और कूलेंट दोनों के रूप में कार्य करता है, जिससे न्यूट्रॉन अर्थव्यवस्था कुशल होती है और कम विखंडनीय सामग्री के साथ भी शृंखला अभिक्रिया निरंतर बनी रहती है।
- रिएक्टर के संचालन के दौरान, संवर्द्धन U-238 न्यूट्रॉन को अवशोषित कर प्लूटोनियम-239 (Pu-239) में परिवर्तित हो जाता है, जो प्रयुक्त ईंधन में संचित होता है।
- कार्यात्मक परिणाम: विद्युत उत्पादन और रणनीतिक प्लूटोनियम भंडार का एक साथ सृजन।
- यह चरण II को प्रारंभ करने के लिए आवश्यक विखंडनीय आधार स्थापित करता है।
- यह चरण केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि संसाधन निर्माण भी करता है, क्योंकि यह सीमित यूरेनियम आधार को उन्नत परमाणु ईंधन चक्रों के लिए एक प्रवेश-द्वार में परिवर्तित करता है।
चरण II – FBRs – ईंधन गुणन की ओर संक्रमण
द्वितीय चरण फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) के माध्यम से परमाणु ईंधन के उपभोग से उत्पादन की ओर एक परिदृश्य परिवर्तन को चिह्नित करता है।
- ये रिएक्टर चरण I के पुनर्संसाधित प्रयुक्त ईंधन से प्राप्त प्लूटोनियम-आधारित मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करते हैं।
- फास्ट न्यूट्रॉन (बिना मॉडरेशन) के साथ संचालन करते हुए और सामान्यतः द्रव सोडियम द्वारा शीतित, FBRs उच्च न्यूट्रॉन फ्लक्स प्राप्त करते हैं, जो ब्रीडिंग के लिए आवश्यक है।
- मुख्य तंत्र – ब्रीडिंग प्रक्रिया
- विखंडनीय उपभोग: Pu-239 ऊर्जा उत्सर्जित करने हेतु विखंडन करता है।
- संवर्द्धन संबंधी रूपांतरण: आस-पास के संवर्द्धित (U-238 या Th-232) न्यूट्रॉन को अवशोषित कर निम्न में परिवर्तित होती है:
- अधिक Pu-239 (यूरेनियम से)
- यूरेनियम-233 (U-233) (थोरियम से)
- एक प्रमुख विशेषता ब्रीडिंग अनुपात का एक से अधिक होना है, अर्थात विखंडनीय पदार्थ का शुद्ध उत्पादन उपभोग से अधिक होता है।
- भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इस चरण के संचालनात्मक क्रियान्वयन का प्रतिनिधित्व करता है, जो एक महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकीय उपलब्धि है।
- कार्यात्मक परिणाम: विखंडनीय भंडार का घातीय विस्तार
- यूरेनियम और थोरियम ईंधन चक्रों के बीच सेतु निर्माण
- चरण II “ईंधन गुणन का इंजन” के रूप में कार्य करता है, जो सीमित इनपुट को स्व-प्रबलित परमाणु संसाधन आधार में परिवर्तित करता है, साथ ही थोरियम उपयोग के लिए आधार तैयार करता है।
चरण III – थोरियम-आधारित रिएक्टर, दीर्घकालिक स्थिरता की प्राप्ति
- तृतीय चरण थोरियम (Th-232) के उपयोग के लिए डिजाइन किया गया है, जो एक संवर्द्धन लेकिन अविखंडनीय पदार्थ है, जो न्यूट्रॉन अवशोषण के पश्चात् यूरेनियम-233 (U-233) में परिवर्तित हो जाता है, जो एक अत्यधिक कुशल विखंडनीय समस्थानिक है।
- उन्नत रिएक्टर डिजाइन, जैसे एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर (AHWR), U-233 को प्राथमिक ईंधन के रूप में उपयोग करने हेतु विकसित किए जा रहे हैं, प्रायः थोरियम के साथ संयोजन में।
- मुख्य प्रौद्योगिकीय विशेषताएँ
- सतत् थोरियम उपयोग चक्र
- उन्नत रिएक्टर डिजाइन के कारण बेहतर सुरक्षा विशेषताएँ
- पारंपरिक यूरेनियम चक्रों की तुलना में दीर्घकालीन रेडियोधर्मी अपशिष्ट में कमी
- कार्यात्मक परिणाम: स्व-स्थायी थोरियम ईंधन चक्र की स्थापना
- बड़े पैमाने पर, दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन को सक्षम बनाना
- यह चरण भारत की परमाणु दृष्टि का परिपूर्ण रूप प्रस्तुत करता है, जो उसके भौगोलिक लाभ (थोरियम) को एक रणनीतिक ऊर्जा संसाधन में परिवर्तित करता है, जिससे सदियों तक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम: तुलनात्मक विशेषताएँ
| विशेषता |
चरण I: PHWR |
चरण II: FBR |
चरण III: थोरियम चक्र |
| रिएक्टर का प्रकार |
दाबित भारी जल रिएक्टर |
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (जैसे प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) |
उन्नत भारी जल रिएक्टर / थोरियम-आधारित उन्नत रिएक्टर |
| प्राथमिक ईंधन |
प्राकृतिक यूरेनियम (U-238 के साथ U-235 विखंडनीय अंश) |
MOX ईंधन (प्लूटोनियम-239 + यूरेनियम-238) पुनःप्रसंस्कृत प्रयुक्त ईंधन से प्राप्त |
थोरियम-232 + यूरेनियम-233 (उत्पन्न विखंडनीय पदार्थ) |
| न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रम |
ऊष्मीय न्यूट्रॉन रिएक्टर |
तीव्र न्यूट्रॉन रिएक्टर (कोई मॉडरेशन नहीं) |
ऊष्मीय / एपिथर्मल स्पेक्ट्रम (डिजाइन पर निर्भर) |
| मॉडरेटर |
न्यूट्रॉन मॉडरेशन हेतु भारी जल (D₂O) |
मॉडरेटर की आवश्यकता नहीं (तीव्र न्यूट्रॉन व्यवस्था) |
रिएक्टर डिजाइन के अनुसार हल्का/भारी जल या उन्नत मॉडरेटर |
| कूलेंट |
भारी जल (D₂O) |
द्रव सोडियम (उच्च ऊष्मा स्थानांतरण, न्यूट्रॉन मॉडरेशन नहीं) |
जल / पिघला लवण / गैस (उन्नत डिजाइन) |
| ईंधन चक्र का प्रकार |
खुला से आंशिक रूप से बंद चक्र (सीमित पुनःप्रसंस्करण) |
बंद ईंधन चक्र (पुनःप्रसंस्करण और पुनर्चक्रण सहित) |
पूर्णतः बंद थोरियम-आधारित ईंधन चक्र |
| मुख्य उत्पादन / उप-उत्पाद |
यूरेनियम-238 से प्लूटोनियम-239 (Pu-239) का उत्पादन |
थोरियम-232 से यूरेनियम-233 (U-233) का उत्पादन; अतिरिक्त प्लूटोनियम उत्पादन |
यूरेनियम-233 के माध्यम से सतत् ऊर्जा उत्पादन (स्व-निर्भर थोरियम चक्र) |
| मुख्य उद्देश्य |
विद्युत उत्पादन + अगले चरण हेतु प्लूटोनियम भंडार निर्माण |
ईंधन प्रजनन और गुणन (उपभोग से अधिक विखंडनीय पदार्थ उत्पादन) |
थोरियम उपयोग द्वारा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा |
| रणनीतिक भूमिका |
सीमित यूरेनियम संसाधनों का उपयोग करते हुए आधारभूत चरण |
थोरियम अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण हेतु सेतु चरण |
लगभग असीमित, स्वदेशी ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने वाला अंतिम चरण |
एकीकृत ईंधन चक्र तर्क – क्रमिक परस्पर निर्भरता
- यह कार्यक्रम एक सघन रूप से एकीकृत, क्रमिक प्रणाली के रूप में कार्य करता है; जहाँ प्रत्येक चरण अगले चरण को पोषित और सुदृढ़ करता है:
- चरण I → Pu-239 का उत्पादन करता है;
- चरण II → Pu-239 का गुणन करता है और U-233 का उत्पादन करता है;
- चरण III → थोरियम-आधारित चक्र में U-233 का उपयोग करता है।
- परिणाम: क्लोज्ड-लूप, स्व-पुनर्भरणीय परमाणु ईंधन पारितंत्र का निर्माण;
- दुर्लभ से प्रचुर संसाधनों की ओर क्रमिक संक्रमण।
- विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि: यह परस्पर संबंध इस कार्यक्रम को संसाधन अनुकूलन का वैश्विक रूप से अद्वितीय मॉडल बनाता है; जो न्यूनतम अपशिष्ट और अधिकतम ऊर्जा निष्कर्षण सुनिश्चित करता है।
वर्तमान परमाणु ऊर्जा परिदृश्य (2026)
अप्रैल 2026 तक, भारत ने अपने राष्ट्रीय ग्रिड में परमाणु ऊर्जा को एक ‘बेसलोड’ स्तंभ के रूप में सफलतापूर्वक एकीकृत कर लिया है।
- स्थापित क्षमता: भारत की वर्तमान संचालित क्षमता 8.78 गीगावाट है, जो 24 रिएक्टरों द्वारा उत्पन्न की जाती है। वित्तीय वर्ष 2024–25 में, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों ने 56,681 मिलियन यूनिट का रिकॉर्ड उत्पादन किया, जो कुल विद्युत उत्पादन का 3.1% है।
- विस्तार पाइपलाइन: एक सुदृढ़ विस्तार योजना के अंतर्गत इस क्षमता को वर्ष 2031–32 तक लगभग तीन गुना बढ़ाकर 22.38 गीगावाट करने का लक्ष्य है।
- PFBR संबंधी उपलब्धि: कल्पक्कम स्थित 500 MWe PFBR ने 6 अप्रैल, 2026 को अपनी पहली क्रिटिकलिटी की अवस्था प्राप्त की। यह सोडियम-शीतित फास्ट रिएक्टर यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करता है और इसे उपभोग से अधिक ईंधन ‘उत्पन्न’ करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- वैश्विक स्थिति: PFBR के संचालन में आने के साथ, भारत रूस के साथ उन एकमात्र देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्रौद्योगिकी है।

भारत की परमाणु ऊर्जा के संबंध में पहलें और कार्यवाही
- रणनीतिक मिशन और वित्तीय प्रतिबद्धता
- न्यूक्लियर एनर्जी मिशन (NEM): वित्त वर्ष 2025–26 के केंद्रीय बजट में प्रारंभ किया गया; यह मिशन वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता प्राप्त करने का रणनीतिक लक्ष्य निर्धारित करता है।
- समर्पित वित्तपोषण: सरकार ने लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) के डिजाइन, विकास और तैनाती हेतु ₹20,000 करोड़ का महत्त्वपूर्ण वित्तीय आवंटन किया है।
- SMR परिचालन रोडमैप: भारत ने वर्ष 2033 तक कम-से-कम पाँच स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए SMRs को परिचालन में लाने के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा रोडमैप को सुदृढ़ किया जा सके।
- विधायी और नियामक सुधार
- शांति अधिनियम, 2025: ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ अधिनियम को कानूनी ढाँचे के आधुनिकीकरण हेतु अधिनियमित किया गया; इसने वर्ष 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम का स्थान लिया।
- निजी क्षेत्र का एकीकरण: पहली बार, यह कानून परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के पर्यवेक्षण में संयंत्र निर्माण, घटक निर्माण और डीकमीशनिंग में नियंत्रित निजी भागीदारी को सक्षम बनाता है।
- सशक्त विनियमन: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है, जिससे अधिक स्वतंत्र और कठोर सुरक्षा शासन सुनिश्चित होता है।
- दायित्व आधुनिकीकरण: इस अधिनियम ने ‘नो-फॉल्ट’ दायित्व व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप पुनर्संतुलित किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय संयुक्त उपक्रमों और बीमा पूलिंग को सुविधा मिलती है।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकीय प्रगति (BARC एवं IGCAR)
- प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR): IGCAR द्वारा विकसित, कल्पक्कम स्थित 500 MWe PFBR ने 6 अप्रैल, 2026 को क्रिटिकलिटी की अवस्था प्राप्त की, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के द्वितीय चरण में संचालनात्मक प्रवेश को चिह्नित करता है।
- अगली पीढ़ी के रिएक्टर डिजाइन: भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के नेतृत्व में, भारत उन्नत रिएक्टरों की एक शृंखला विकसित कर रहा है:
- BSMR-220: एक 220 MWe भारत लघु मॉड्यूलर रिएक्टर।
- SMR-55: एक संक्षिप्त 55 MWe रिएक्टर डिजाइन।
- उच्च-ताप गैस-शीतित रिएक्टर (HTGR): एक 5 MWth तक की क्षमता वाला रिएक्टर, जो विशेष रूप से हाइड्रोजन उत्पादन और उच्च-ताप औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए डिजाइन किया गया है।
- विस्तार और विविधीकरण संबंधी कार्यवाही
- फ्लीट मोड निर्माण: भारत अपने स्वदेशी 700 मेगावाट PHWRs की तैनाती को “फ्लीट मोड” के माध्यम से तेज कर रहा है, जिससे निर्माण का मानकीकरण, समय-सीमा में कमी और पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ प्राप्त की जा सकें।
- ईंधन चक्र का समापन: पुनर्संसाधन क्षमता और फास्ट रिएक्टर तैनाती के विस्तार हेतु कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे यूरेनियम-सीमित प्रणाली से थोरियम-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण सुनिश्चित हो सके।
- अंतर-क्षेत्रीय समन्वय: “डुअल-यूज” अनुप्रयोगों के लिए परमाणु विशेषज्ञता का उपयोग करने हेतु पहलें जारी हैं, जैसे गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTGs) और समुद्री रणनीतिक प्लेटफॉर्मों के लिए ऊर्जा मॉड्यूल।
PFBR तथा भारत के परमाणु कार्यक्रम के चरण II का महत्त्व
- थोरियम अर्थव्यवस्था की ओर रणनीतिक संक्रमण: PFBR भारत की परमाणु दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है; यह यूरेनियम-सीमित प्रथम चरण से थोरियम-आधारित दीर्घकालिक ऊर्जा ढाँचे की ओर संक्रमण को सक्षम बनाता है, जो भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के अंतर्गत है।
- भारत के विशाल थोरियम भंडार तक पहुँच सुनिश्चित कर यह दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा, संसाधन स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है।
- ईंधन गुणन और दक्षता में वृद्धि: PFBR परमाणु ऊर्जा की संसाधन दक्षता की अवधारणा को मूल रूप से परिवर्तित करता है।
- जहाँ पारंपरिक प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम का केवल लगभग 1% उपयोग करते हैं, वहीं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर, फास्ट न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रम और क्लोज्ड फ्यूल साइकिल के माध्यम से उपयोग को 60–70% से अधिक तक बढ़ाते हैं।
- संवर्द्धित यूरेनियम-238 को विखंडनीय प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित कर, PFBR शुद्ध ईंधन उत्पादन सुनिश्चित करता है, जिससे परमाणु ऊर्जा एक स्व-स्थायी प्रणाली में परिवर्तित हो जाती है।
- थोरियम ईंधन चक्र की ओर प्रवेश-द्वार: PFBR चरण III के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकीय सेतु के रूप में कार्य करता है, जहाँ थोरियम प्राथमिक ईंधन बनता है।
- रिएक्टर में थोरियम-232 के विकिरण के माध्यम से यह यूरेनियम-233 का उत्पादन करता है, जिससे थोरियम ईंधन चक्र का संचालन संभव होता है।
- यह भारत को अपने थोरियम भंडार में वैश्विक नेतृत्व का लाभ उठाने में सक्षम बनाता है, जिससे एक दीर्घकालिक, स्वदेशी और स्थायी ऊर्जा मार्ग सुनिश्चित होता है।
- ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ और अपशिष्ट में कमी: फास्ट ब्रीडर प्रौद्योगिकी एक ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ को सक्षम बनाती है, जिसमें प्रयुक्त ईंधन का पुनर्संसाधन और पुन: उपयोग किया जाता है।
- इसके अतिरिक्त, PFBR दीर्घ एक्टिनाइड्स का उपभोग कर सकता है, जिससे परमाणु अपशिष्ट की मात्रा, विषाक्तता और दीर्घायु में उल्लेखनीय कमी आती है।
- यह एक चक्रीय परमाणु अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है और दीर्घकालिक अपशिष्ट निपटान प्रणालियों पर बोझ को कम करता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता और सुरक्षा लचीलापन: PFBR भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” का एक प्रमुख स्तंभ है। आयातित लाइट वाटर रिएक्टर (LWRs) के विपरीत, जो स्थायी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रावधानों के अंतर्गत संचालित होते हैं, स्वदेशी PFBR भारत को अपने विखंडनीय भंडार का प्रबंधन राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार करने की अनुमति देता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि चरण I में उत्पन्न प्लूटोनियम सामग्री बाहरी आपूर्ति शृंखला तनावों से सुरक्षित रहे और थोरियम-आधारित चरण III की ओर एक संप्रभु विकल्प प्रदान करे।
- रणनीतिक एवं जलवायु प्रासंगिकता: PFBR की सफल तैनाती भारत को रूस और फ्रांस जैसे उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी वाले देशों की श्रेणी में स्थापित करती है, जिससे प्रौद्योगिकीय संप्रभुता और वैश्विक स्थिति सुदृढ़ होती है।
- साथ ही, यह विश्वसनीय निम्न-कार्बन ऊर्जा प्रदान कर पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं को समर्थन देता है और अनियमित नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के पूरक के रूप में कार्य करता है।
परमाणु विस्तार की चुनौतियाँ
- प्रौद्योगिकीय जटिलता और सुरक्षा जोखिम: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अत्यधिक उन्नत इंजीनियरिंग जटिलता से युक्त होते हैं, विशेषकर द्रव सोडियम कूलेंट के उपयोग के कारण, जो वायु और जल के साथ अत्यधिक अभिक्रियाशील होता है।
- यह कड़े सुरक्षा तंत्र, लीकेज-रोधी डिजाइन और उन्नत निगरानी प्रणालियों की आवश्यकता उत्पन्न करता है, साथ ही ऐसे पदार्थों के उपयोग की भी, जो तीव्र न्यूट्रॉन विकिरण को सहन कर सकें।
- उच्च पूँजी लागत और लंबी निर्माण अवधि: परमाणु ऊर्जा परियोजनाएँ उच्च प्रारंभिक निवेश और दीर्घ निर्माण समय (8–15 वर्ष) से चिह्नित होती हैं।
- “फ्लीट मोड” निर्माण जैसे प्रयासों के बावजूद, परमाणु ऊर्जा को तेजी से घटती नवीकरणीय ऊर्जा लागतों से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है, जिससे इसके लेवलाइज्ड कॉस्ट ऑफ एनर्जी (LCOE) और समग्र आर्थिक व्यवहार्यता पर प्रश्न उठते हैं।
- जन धारणा और सामाजिक स्वीकृति: विकिरण जोखिम, परमाणु दुर्घटनाएँ और भूमि अधिग्रहण से जुड़ी चिंताएँ जन-स्वीकृति को प्रभावित करती रहती हैं।
- फुकुशिमा आपदा जैसे वैश्विक घटनाक्रमों ने जोखिम की धारणा को और बढ़ाया है, जिससे अधिक पारदर्शिता, हितधारक सहभागिता और विश्वास-निर्माण उपायों की आवश्यकता होती है।
- आपूर्ति शृंखला और ईंधन सीमाएँ: परमाणु क्षमता के विस्तार के लिए एक मजबूत घरेलू औद्योगिक पारितंत्र आवश्यक है, जो न्यूक्लियर-ग्रेड सामग्री, भारी उपकरण और उन्नत नियंत्रण प्रणालियाँ तैयार कर सके।
- ‘हाई-असे लो-एनरिच्ड यूरेनियम’ (HALEU) जैसे ईंधनों पर निर्भरता रणनीतिक संवेदनशीलता उत्पन्न करती है, जिससे पूरी परमाणु मूल्य शृंखला में स्वदेशीकरण की आवश्यकता रेखांकित होती है।
- “बेसलोड” एकीकरण की चुनौती: जैसे-जैसे भारत का विद्युत ग्रिड अनियमित नवीकरणीय ऊर्जा (RE) से अधिक प्रभावित होता जा रहा है, परमाणु ऊर्जा की भूमिका को भी विकसित होना आवश्यक है।
- यद्यपि PFBR स्थिर बेसलोड ऊर्जा प्रदान करते हैं, उनकी उच्च पूँजी लागत उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने हेतु उच्च क्षमता उपयोग कारक (CUF) पर संचालित करने की माँग करती है।
- परमाणु ऊर्जा के “मस्ट-रन” दर्जे और सौर एवं पवन ऊर्जा की परिवर्तनशीलता के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु उन्नत ग्रिड प्रबंधन और ऊर्जा भंडारण समाधान आवश्यक हैं, ताकि कटौती से बचा जा सके।
PWOnlyIAS विशेष
पिंक हाइड्रोजन के बारे में
- पिंक हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है, जो परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न विद्युत और ऊष्मा का उपयोग कर इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा उत्पादित किया जाता है। यह ग्रीन हाइड्रोजन (नवीकरणीय आधारित) और ‘ग्रे हाइड्रोजन’ (जीवाश्म ईंधन आधारित) से भिन्न है, क्योंकि यह मौसम की परिवर्तनशीलता से स्वतंत्र, विश्वसनीय, 24×7, कार्बन-मुक्त आपूर्ति प्रदान करता है।
- प्रौद्योगिकीय सक्षमकर्ता: भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा विकसित हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टर (HTGR) इस परिवर्तन का प्रमुख आधार है।
- उच्च परिचालन तापमान (900–950°C) ऊष्मीय दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाता है।
- यह थर्मोकेमिकल जल-विभाजन को सक्षम बनाता है, जो बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन उत्पादन हेतु पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस की तुलना में अधिक दक्ष है।
- कठिन-नियंत्रणीय क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन: पिंक हाइड्रोजन परमाणु ऊर्जा को विद्युत उत्पादन से आगे बढ़ाकर औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन तक विस्तारित करता है, जिससे निम्नलिखित क्षेत्रों को स्वच्छ ऊर्जा स्रोत मिलता है:
- इस्पात और सीमेंट (कोयला/कोक के स्थान पर)
- उर्वरक (ग्रीन अमोनिया उत्पादन)
- रसायन उद्योग (निम्न-कार्बन औद्योगिक इनपुट)
- नेट-जीरो में रणनीतिक भूमिका: राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के साथ पिंक हाइड्रोजन का एकीकरण भारत को द्वि-मार्गीय डीकार्बोनाइजेशन रणनीति अपनाने में सक्षम बनाता है, नवीकरणीय ऊर्जा वितरित उपयोग के लिए और परमाणु ऊर्जा स्थिर, उच्च-तीव्रता औद्योगिक माँग के लिए।
- यह समन्वय नेट जीरो 2070 और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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आगे की राह
- पैमाने और दक्षता हेतु फ्लीट मोड: 700 मेगावाट PHWRs की फ्लीट मोड तैनाती को तीव्र करने से मानकीकरण और पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं के माध्यम से निर्माण समय और लागत में कमी लाई जा सकती है, जिससे तीव्र और अधिक पूर्वानुमेय क्षमता वृद्धि संभव होगी।
- विविधीकरण और डीकार्बोनाइजेशन हेतु SMRs: स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) को अपनाने से परमाणु ऊर्जा का उपयोग इस्पात और सीमेंट जैसे कठिन-नियंत्रणीय क्षेत्रों तक विस्तारित किया जा सकता है, साथ ही यह विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन को भी समर्थन देता है।
- हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टर (HTGR) जैसे उन्नत तंत्र पिंक हाइड्रोजन उत्पादन और उच्च-ताप औद्योगिक प्रक्रियाओं को सक्षम बना सकते हैं।
- नियामक सुदृढ़ीकरण और सुधार: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को एक आधुनिक, स्वतंत्र और अनुकूलनशील नियामक के रूप में विकसित होना चाहिए, जो नई पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों और निजी भागीदारी को समर्थन देते हुए “सुरक्षा प्रथम” दृष्टिकोण बनाए रखे।
- ईंधन चक्र में आत्मनिर्भरता: पुनर्संसाधन क्षमताओं और फास्ट रिएक्टर की तैनाती का विस्तार ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, जिससे दीर्घकालिक स्थिरता और बाहरी निर्भरता में कमी सुनिश्चित होगी।
- जन-विश्वास और हितधारक सहभागिता: पारदर्शी संचार, सामुदायिक सहभागिता और न्यायसंगत लाभ-साझाकरण को संस्थागत रूप देकर सामाजिक वैधता का निर्माण आवश्यक है, ताकि परमाणु विस्तार तकनीकी रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से स्वीकार्य बन सके।
- बहु-क्षेत्रीय समन्वय (परमाणु–अंतरिक्ष–रक्षा): PFBR के माध्यम से विकसित प्लूटोनियम प्रबंधन और कॉम्पैक्ट फास्ट-रिएक्टर भौतिकी विशेषज्ञता का उपयोग “ड्यूल-यूज” अनुप्रयोगों में किया जाना चाहिए।
- इसमें डीप-स्पेस मिशनों हेतु ‘रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर्स’ (RTGs) का विकास तथा समुद्री सामरिक प्लेटफॉर्म्स के लिए उच्च-घनत्व ऊर्जा मॉड्यूल की संभावना शामिल है, जिससे एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रौद्योगिकीय पारितंत्र सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष
कल्पक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का क्रिटिकलिटी की अवस्था प्राप्त करना भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह भारत के चरण II (फास्ट ब्रीडर प्रौद्योगिकी) में प्रवेश का संकेत देता है, जिससे क्लोज्ड फ्यूल साइकिल, ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक थोरियम-आधारित परमाणु रणनीति को सुदृढ़ता मिलती है।