हॉर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र

21 Feb 2026

संदर्भ

हाल ही में ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने सरकारी मीडिया के अनुसार, हॉर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य अभ्यास का एक नया चरण आरंभ किया है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पूर्व तनावपूर्ण घटनाएँ

  • वर्ष 2019: लगभग 21 मील चौड़ा हॉर्मुज जलडमरूमध्य अवरोध के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। वर्ष 2019 में तेल टैंकरों पर हमले तथा संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने यह दर्शाया कि क्षेत्रीय संघर्ष कितनी शीघ्रता से वैश्विक तेल मूल्यों में वृद्धि कर सकते हैं।
  • वर्ष 1980: ईरान-इराक युद्ध के दौरान दोनों देशों ने तेल टैंकरों और वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया। यह संघर्ष “टैंकर युद्ध” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
    • इस दौरान समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाई गईं और नौवहन मार्ग अस्थायी रूप से बाधित हुए।

संबंधित तथ्य

  • संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ वार्ता से पूर्व आरंभ किए गए ये सैन्य अभ्यास हॉर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित सुरक्षा एवं सैन्य खतरों से निपटने की तैयारी के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।
  • विशेष रूप से भारत के संदर्भ में, इस संकीर्ण समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति तथा समग्र आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

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हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बारे में

  • भौगोलिक विस्तार: यह एक ओर ओमान और संयुक्त अरब अमीरात तथा दूसरी ओर ईरान के मध्य स्थित है।
    • यह उत्तर में फारस की खाड़ी को दक्षिण में ओमान की खाड़ी तथा अरब सागर से जोड़ता है।
  • सुरक्षा क्षेत्र: अपने सबसे संकीर्ण बिंदु पर यह केवल 33 किलोमीटर चौड़ा है। इसके भीतर निर्धारित नौवहन मार्ग दोनों दिशाओं में लगभग 3–3 किलोमीटर चौड़े हैं, जिनके बीच एक पृथक सुरक्षा क्षेत्र निर्धारित है।
  • कानूनी स्थिति और समुद्री विनियमन: संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार, तटीय राज्यों को अपने तट से 12 समुद्री मील (लगभग 22 किलोमीटर) तक संप्रभु अधिकार प्राप्त होते हैं।
    • अपने सबसे संकीर्ण’ बिंदु पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के प्रादेशिक जल क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

महत्त्व

  • प्रमुख ऊर्जा मार्ग: हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है और विश्व के सबसे संवेदनशील ऊर्जा अवरोध बिंदुओं में से एक है।
    • उदाहरण: अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, प्रतिदिन लगभग 17–20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं, जो वैश्विक पेट्रोलियम उपभोग का लगभग 20 प्रतिशत है।
  • जोखिम में प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ: भारत, जापान और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देश इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भर हैं। अतः किसी भी बाधा की स्थिति में इन देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
  • महत्त्वपूर्ण वैश्विक समुद्री मार्ग: ओपेक (तेल निर्यातक देशों का संगठन) के सदस्य- सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक अपने अधिकांश कच्चे तेल का निर्यात इसी जलडमरूमध्य के माध्यम से, मुख्यतः एशिया की ओर करते हैं।
    • उदाहरण: विश्व के प्रमुख द्रवीकृत प्राकृतिक गैस निर्यातकों में से एक कतर भी अपने अधिकांश गैस निर्यात इसी मार्ग से करता है।
  • ईरान की रणनीतिक बढ़त: हॉर्मुज जलडमरूमध्य अपनी सामरिक स्थिति के कारण लंबे समय से भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र रहा है।
    • ईरान का समुद्री तट इस जलडमरूमध्य के पूरे उत्तरी किनारे पर फैला हुआ है। संकीर्ण नौवहन मार्गों के कारण जहाजों को ईरानी जलसीमा के निकट से गुजरना पड़ता है, जिससे तेहरान को महत्त्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त प्राप्त होती है।
  • सीमित विकल्प: हॉर्मुज जलडमरूमध्य के व्यावहारिक विकल्प बहुत कम हैं।
    • उदाहरण: कुछ खाड़ी देशों ने वैकल्पिक मार्ग विकसित किए हैं, जैसे सऊदी अरब की पूर्व–पश्चिम पाइपलाइन (लाल सागर तक) तथा संयुक्त अरब अमीरात की फुजैराह तक पाइपलाइन। किंतु इनकी क्षमता इतनी नहीं है कि वे प्रतिदिन होने वाले संपूर्ण समुद्री परिवहन की पूर्ति कर सकें।
  • हिंद महासागर तक पहुँच: यह जलडमरूमध्य ही वह एकमात्र समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से फारस की खाड़ी का जल खुली समुद्री सीमा (हिंद महासागर) तक पहुँचता है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अवरोध का भारत पर संभावित प्रभाव

  • ऊर्जा मूल्य: भारत, जो कच्चे तेल का शुद्ध आयातक है, अपनी तेल आपूर्ति का 40 प्रतिशत से अधिक भाग उन खाड़ी देशों से प्राप्त करता है, जो निर्यात के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य का उपयोग करते हैं।
    • इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बाधा से वैश्विक कच्चे तेल के मूल्य बढ़ सकते हैं, जिससे देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि होगी।
  • मुद्रा पर दबाव: आयात व्यय बढ़ने से चालू खाता घाटा विस्तृत हो सकता है और रुपया कमजोर पड़ सकता है।
  • क्षेत्रीय प्रभाव: विमानन, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, टायर तथा विनिर्माण क्षेत्र में लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

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