अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता

8 Apr 2026

संदर्भ

अमेरिका-नेतृत्व वाली पहल, जिसमें दो सप्ताह के युद्धविराम को हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पुनः खोलने से जोड़ा गया है, इजरायल–ईरान गतिरोध को कम करने का एक निर्णायक प्रयास दर्शाती है।

  • इस सशर्त व्यवस्था को प्रस्तुत करके, प्रशासन ने ध्यान को सैन्य मुद्रा से हटाकर कूटनीतिक मध्यस्थता की ओर स्थानांतरित कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता के बारे में

  • स्वरूप एवं वैचारिक आधार: मध्यस्थता एक स्वैच्छिक, गैर-बाध्यकारी और शांतिपूर्ण विवाद समाधान तंत्र का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें एक पारस्परिक रूप से स्वीकार्य तृतीय पक्ष संवाद को सुगम बनाता है, शत्रुता को कम करता है और विवादित पक्षों को वार्तात्मक समाधान तक पहुँचने में सक्षम बनाता है।
    • यह अनौपचारिक कूटनीति और औपचारिक न्यायनिर्णयन के बीच एक मध्य मार्ग के रूप में कार्य करती है, जहाँ कानूनी अधिकार की अपेक्षा अनुनय (Persuasion) पर अधिक निर्भरता होती है।

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  • मुख्य विशेषताएँ: मध्यस्थता की प्रभावशीलता इसके सहमति-आधारित स्वरूप में निहित है, क्योंकि पक्षों को बलपूर्वक रणनीतियों की सीमाओं को स्वीकार करना और रचनात्मक संवाद में भाग लेने की इच्छा प्रदर्शित करनी होती है।
    • इसका गैर-बाध्यकारी स्वरूप सुनिश्चित करता है कि समझौते राजनीतिक स्वीकृति से वैधता प्राप्त करें, न कि प्रवर्तन से।
    • मध्यस्थ की विश्वसनीयता और तटस्थता—चाहे वह राज्य, संगठन या व्यक्ति हो—केंद्रीय महत्त्व रखती है, जबकि प्रक्रिया स्वयं क्रमिक और पुनरावृत्त होती है, जो विश्वास-निर्माण और हितों के अभिसरण पर केंद्रित होती है, न कि तात्कालिक समाधान पर।
  • सैद्धांतिक आधार: कंटिजेंसी मॉडल (Jacob Bercovitch) यह रेखांकित करता है कि मध्यस्थता के परिणाम परिस्थिति, संघर्ष की तीव्रता, पक्षों के व्यवहार और मध्यस्थ की क्षमता से प्रभावित होते हैं।
    • इसके पूरक रूप में, राइपनेस सिद्धांत (I. William Zartman) यह दर्शाता है कि मध्यस्थता तभी प्रभावी होती है जब पक्ष पारस्परिक रूप से पीड़ादायक गतिरोध (Mutually Hurting Stalemate)” की स्थिति में पहुँच जाते हैं, जहाँ निरंतर संघर्ष की लागत संभावित लाभों से अधिक हो जाती है, जिससे समझौते के लिए प्रोत्साहन उत्पन्न होता है।

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मध्यस्थता पर कानूनी स्थिति

  • मानक वैधता का विकास: हेग सम्मेलन (1899 और 1907) ने युद्ध के विकल्प के रूप में मध्यस्थता, सुलह (Conciliation) और आर्बिट्रेशन को मान्यता देकर शांतिपूर्ण विवाद समाधान को संस्थागत रूप देने का पहला औपचारिक प्रयास किया।
    • इस प्रक्रिया को आगे ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (Permanent Court of Arbitration) की स्थापना के माध्यम से सुदृढ़ किया गया, जिसने तृतीय-पक्ष हस्तक्षेप के लिए एक संस्थागत मंच प्रदान किया।
  • संयुक्त राष्ट्र ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र चार्टर, विशेषकर अध्याय VI के अंतर्गत अनुच्छेद-33, राज्यों को विवादों का समाधान शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से करने के लिए बाध्य करता है, जिसमें मध्यस्थता को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
    • यह कानूनी दायित्व संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 65/283 द्वारा और सुदृढ़ होता है, जो मध्यस्थता को संघर्ष निवारण का एक महत्त्वपूर्ण साधन मान्यता देता है।
    • इसके अतिरिक्त, प्रभावी मध्यस्थता के लिए संयुक्त राष्ट्र मार्गदर्शन (2012) में समावेशिता, निष्पक्षता, राष्ट्रीय स्वामित्व और स्थिरता जैसे आवश्यक सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं, जिससे प्रभावी मध्यस्थता के लिए एक मानक ढाँचा प्रदान होता है।
      • इस प्रकार, मध्यस्थता केवल एक कूटनीतिक विकल्प नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत एक मान्यता प्राप्त साधन है।

मध्यस्थता बनाम अन्य विवाद निवारण तंत्र

पहलू मध्यस्थता वार्ता आर्बिट्रेशन / न्यायनिर्णयन सुलह सद्भावना सेवाएँ
प्रक्रिया की प्रकृति तृतीय-पक्ष द्वारा सुगमित पक्षों के बीच प्रत्यक्ष संवाद औपचारिक विधिक/न्यायिक प्रक्रिया तृतीय-पक्ष द्वारा सहायक तृतीय-पक्ष द्वारा सुगमकारी
तृतीय-पक्ष की भूमिका सक्रिय सुगमकर्ता; समाधान सुझा सकता है। कोई तृतीय-पक्ष नहीं परिणाम का निर्णय करता है। सीमित भूमिका; शर्तें सुझाता है। न्यूनतम भूमिका; केवल पक्षों को साथ लाता है।
बाध्यकारी प्रकृति अबाध्य अबाध्य बाध्यकारी और प्रवर्तनीय अबाध्य अबाध्य
औपचारिकता का स्तर अर्द्ध-औपचारिक, संरचित अनौपचारिक से औपचारिक अत्यधिक औपचारिक और नियम-आधारित मध्यस्थता से कम संरचित अनौपचारिक
हस्तक्षेप की मात्रा मध्यम से उच्च कोई नहीं उच्च (निर्णय थोपने वाला) निम्न से मध्यम न्यूनतम
उद्देश्य पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान को सुगम बनाना प्रत्यक्ष समझौता कानून के आधार पर विधिक समाधान समझौते का सुझाव देना संवाद प्रारंभ करना
उपयुक्तता जटिल, संवेदनशील विवाद जब संचार मौजूद हो ऐसे विधिक विवाद जिन्हें अंतिम निर्णय चाहिए प्रारंभिक चरण के विवाद पूर्व-वार्ता चरण।

मध्यस्थता के ऐतिहासिक उदाहरण

  • परिवर्तनकारी अध्ययन: कैंप डेविड समझौते ने दर्शाया कि तृतीय-पक्ष सहभागिता गहरी शत्रुता को भी समाप्त कर सकती है, जबकि ओस्लो समझौते ने संवाद आरंभ करने में बैकचैनल कूटनीति के महत्त्व को रेखांकित किया।
    • डेटन समझौते ने संरचित और निर्देशात्मक मध्यस्थता की प्रभावशीलता को प्रदर्शित किया, वहीं गुड फ्राइडे समझौता ने समावेशिता और विश्वास-निर्माण के महत्त्व को उजागर किया।
  • समकालीन प्रासंगिकता: कोफी अन्नान की केन्या (2008) में भूमिका यह दर्शाती है कि समय पर मध्यस्थता बड़े पैमाने की हिंसा को रोक सकती है, जबकि सऊदी–ईरान सामंजस्य समझौता बहुध्रुवीय मध्यस्थता के उदय को दर्शाता है, जिसमें चीन जैसे गैर-पश्चिमी अभिनेताओं की निर्णायक भूमिका रही।
    • निष्कर्ष: सफल मध्यस्थता समय-निर्धारण, मध्यस्थ की विश्वसनीयता, और प्रक्रिया की रूपरेखा पर निर्भर करती है।

सफल मध्यस्थता के उदाहरण

समझौता संबंधित पक्ष मध्यस्थ मुख्य अंतर्दृष्टि
कैंप डेविड समझौते मिस्र – इजरायल जिमी कार्टर (अमेरिका) सतत् उच्च-स्तरीय मध्यस्थता
ओस्लो समझौते इजरायल – फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) नॉर्वे बैकचैनल कूटनीति
डेटन समझौता बोस्निया – क्रोएशिया – सर्बिया अमेरिका निर्देशात्मक एवं संरचित मध्यस्थता
गुड फ्राइडे समझौता यूके – आयरलैंड – उत्तरी आयरलैंड समूह जॉर्ज मिशेल (अमेरिका) समावेशिता एवं विश्वास-निर्माण।
केन्या मध्यस्थता (2008) किबाकी बनाम ओडिंगा कोफी अन्नान समय पर संघर्ष की रोकथाम।
सऊदी–ईरान सामंजस्य समझौता सऊदी अरब – ईरान चीन बहुध्रुवीय मध्यस्थता का उदय।

मध्यस्थता का प्रकार

अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता एक समान प्रक्रिया नहीं है; बल्कि यह मध्यस्थ द्वारा किए गए हस्तक्षेप और भागीदारी के स्तर के अनुसार भिन्न होती है। इसके आधार पर, मध्यस्थता को विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  • सुविधात्मक मध्यस्थता: सुविधात्मक मध्यस्थता सबसे कम हस्तक्षेप वाला रूप है, जिसमें मध्यस्थ मुख्यतः:
    • विवादित पक्षों के बीच संपर्क स्थापित करता है;
    • शत्रुता और गलत धारणाओं को कम करता है;
    • रचनात्मक संचार और संवाद को प्रोत्साहित करता है।
    • इस दृष्टिकोण में, मध्यस्थ वार्ता के विषयवस्तु को प्रभावित नहीं करता, बल्कि स्वैच्छिक समझौते के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है।
      • यह संघर्ष के प्रारंभिक चरणों में सबसे उपयुक्त होता है, जहाँ विश्वास की कमी अधिक होती है, लेकिन पक्ष संवाद के लिए तैयार होते हैं।
  • सूत्रात्मक/प्रक्रियात्मक मध्यस्थता: इस रूप में, मध्यस्थ एक अधिक संरचित और प्रबंधकीय भूमिका निभाता है, जैसे:
    • वार्ता के ढाँचे का निर्माण करना;
    • एजेंडा निर्धारित करना और चर्चाओं का क्रम तय करना;
    • सहमति और असहमति के क्षेत्रों की पहचान करना।
    • मध्यस्थ, गतिरोध को दूर करने के लिए प्रक्रियात्मक मार्ग भी सुझा सकता है, परंतु ठोस समाधान थोपने से बचता है।
      • यह दृष्टिकोण तब प्रभावी होता है, जब पक्ष वार्ता के लिए तैयार हों, लेकिन प्रक्रिया में स्पष्टता या संगठन का अभाव हो।
  • निर्देशात्मक/हस्तक्षेपात्मक मध्यस्थता: निर्देशात्मक मध्यस्थता, मध्यस्थ की अधिकतम भागीदारी को दर्शाती है, जिसमें मध्यस्थ सक्रिय रूप से:
    • ठोस समाधान और समझौते के ढाँचे प्रस्तावित करता है;
    • परिणामों को प्रभावित करने के लिए प्रभाव, प्रोत्साहन या दबाव का उपयोग करता है;
    • समझौता न होने की लागत और समझौते के लाभों को रेखांकित करता है।
    • यहाँ मध्यस्थ अंतिम समझौते को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाता है और केवल सुविधा प्रदान करने से आगे बढ़कर सक्रिय हस्तक्षेप करता है।
      • यह उच्च तीव्रता या दीर्घकालिक संघर्षों में सबसे प्रासंगिक होता है, जहाँ पक्ष स्वतंत्र रूप से समझौते तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं।

इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर मेडिएशन (IOMed)

  • संस्थागत मध्यस्थता मंच: इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर मेडिएशन का उद्देश्य मध्यस्थता के लिए एक स्थायी, संरचित वैश्विक तंत्र स्थापित करना है, जो एड-हॉक कूटनीतिक प्रयासों से आगे बढ़कर नियम-आधारित विवाद समाधान की ओर अग्रसर हो।
  • चीन-नेतृत्व वाली पहल: चीन द्वारा अग्रणी इस पहल से बहुध्रुवीय वैश्विक शासन का उदय परिलक्षित होता है, जहाँ गैर-पश्चिमी कारक अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान मानदंडों को आकार दे रहे हैं।
  • स्वैच्छिक एवं गैर-बाध्यकारी ढाँचा: भागीदारी सहमति-आधारित रहती है और परिणाम गैर-बाध्यकारी होते हैं, जब तक कि उन्हें स्वीकार न किया जाए; इससे संप्रभुता की रक्षा होती है तथा सहयोगात्मक समाधान को प्रोत्साहन मिलता है।
  • विस्तृत विवाद संबंधी कवरेज: इसे अंतर-राज्यीय संघर्ष, निवेशक–राज्य विवाद और वाणिज्यिक असहमति जैसे मामलों के प्रबंधन हेतु परिकल्पित किया गया है, जिससे विवादों के राजनीतिक और आर्थिक आयामों के बीच सेतु स्थापित होता है।
  • मौजूदा संस्थाओं के पूरक: इसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसी व्यवस्थाओं को प्रतिस्थापित करने के बजाय पूरक के रूप में डिजाइन किया गया है, जो एक लचीला और कम टकरावपूर्ण विकल्प प्रदान करता है।
  • विश्वसनीयता एवं स्वीकृति की चुनौतियाँ: तटस्थता, भू-राजनीतिक प्रभाव और मौजूदा संस्थाओं के साथ ओवरलैप को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं, जो इसकी वैश्विक वैधता और प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती हैं।

मध्यस्थ के व्यवहार का महत्त्व

  • संचार–सुविधा दृष्टिकोण: प्रारंभिक चरण में, मध्यस्थ प्रायः कम हस्तक्षेप वाली भूमिका अपनाते हैं; वे संचार चैनल स्थापित करने, शत्रुता कम करने और धारणाओं को स्पष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे संवाद के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित होता है।
  • प्रक्रियात्मक–सूत्रात्मक रणनीति: जैसे-जैसे वार्ता आगे बढ़ती है, मध्यस्थ एक अधिक सक्रिय भूमिका ग्रहण करते हैं; वे एजेंडा संरचित करने, स्थान निर्धारित करने और चर्चाओं का क्रम तय करने का कार्य करते हैं, जिससे अनिश्चितता कम होती है तथा सहमति की दिशा में अभिसरण को बढ़ावा मिलता है।
  • निर्देशात्मक रणनीति: उन्नत चरणों में, मध्यस्थ उच्च-स्तरीय हस्तक्षेप रणनीतियों का उपयोग कर सकते हैं; इसमें समाधान प्रस्तावित करना, प्रोत्साहन देना या कूटनीतिक दबाव डालना शामिल होता है, जिससे अंतिम समझौते के स्वरूप को आकार मिलता है।
  • मुख्य अंतर्दृष्टि: इन रणनीतियों की प्रभावशीलता किसी स्थिर श्रेणीक्रम पर निर्भर नहीं करती; बल्कि यह संघर्ष के चरण और उसकी परिपक्वता पर निर्भर करती है।

पश्चिम एशिया संकट में मध्यस्थता

  • पूर्व-मध्यस्थता गतिशीलता: वर्तमान स्थिति संघर्ष और संरचित मध्यस्थता के बीच एक संक्रमणकालीन चरण को दर्शाती है, न कि एक पूर्णतः संस्थागत प्रक्रिया को।
    • युद्धविराम अभी अस्थायी, सशर्त और प्रत्यावर्तनीय बना हुआ है, जो एक रणनीतिक समाधान के स्थान पर सामरिक विराम को इंगित करता है।
  • उभरती कूटनीतिक संरचना: इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ताएँ प्रक्रियात्मक भागीदारी की दिशा में संकेत देती हैं, जबकि ईरान का 10-सूत्रीय ढाँचा एजेंडा का विस्तार करते हुए प्रतिबंधों में राहत, परमाणु आश्वासन और क्षेत्रीय तनाव-न्यून को शामिल करने का प्रयास करता है।
    • समानांतर पहलों, जैसे चीन–पाकिस्तान शांति प्रस्ताव, से एक बहु-स्तरीय मध्यस्थता तंत्र का उदय परिलक्षित होता है, जहाँ पाकिस्तान एक “सामरिक सेतु” की भूमिका निभा रहा है।
  • स्थलीय वास्तविकताएँ एवं बाधाएँ: कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद, मिसाइल और ड्रोन गतिविधियों की निरंतरता, इजरायल के वर्तमान में संचालित अभियान तथा परमाणु संवर्द्धन प्रावधानों पर अस्पष्टता यह दर्शाती है कि मूल विवाद अभी भी अनसुलझे हैं और विश्वास की कमी बनी हुई है, जिससे प्रभावी मध्यस्थता की तात्कालिक संभावनाएँ सीमित होती हैं।

मध्यस्थता की आवश्यकता

  • क्षेत्रीय विस्तार को रोकना: मध्यस्थता आवश्यक है ताकि इराक, लेबनान और यमन जैसे परस्पर जुड़े संघर्ष क्षेत्रों में इसके विस्तार को रोका जा सके और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को नियंत्रित किया जा सके।
  • वैश्विक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना: हॉर्मुज जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्त्व, जिसके माध्यम से वैश्विक तेल का एक बड़ा हिस्सा प्रवाहित होता है, इसके स्थायी संचालन को वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है।
  • संरचनात्मक कारणों का समाधान: मध्यस्थता ऐसे अंतर्निहित मुद्दों, जैसे-परमाणु महत्त्वाकांक्षाएँ, प्रतिबंध व्यवस्था और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के समाधान के लिए एक ढाँचा प्रदान करती है, जिन्हें केवल सैन्य माध्यमों से हल नहीं किया जा सकता है।
  • मानवीय अनिवार्यताएँ: यह नागरिक आबादी और अवसंरचना की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे मानवीय संकटों को कम किया जा सके।

उठाए गए कदम (मध्यस्थता पूर्व चरण) 

  • कूटनीतिक पहल: संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सशर्त युद्धविराम की घोषणा कूटनीति और प्रतिरोध (Deterrence) के संयोजन वाली एक संतुलित रणनीति को दर्शाती है, जबकि ईरान की प्रत्युत्तर प्रतिक्रिया मूल माँगों के बिना सतर्क भागीदारी को इंगित करती है।
  • बहुपक्षीय सहभागिता: इस्लामाबाद संवाद की योजना, साथ ही चीन और पाकिस्तान से जुड़ी पहलें, संरचित वार्ताओं की दिशा में प्रगति को दर्शाती हैं, जहाँ क्षेत्रीय अभिकर्ता भी जोखिमों के प्रबंधन में भूमिका निभा रहे हैं।
  • समग्र मूल्यांकन: ये कदम विश्वास-निर्माण और एजेंडा निर्धारण का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि पूर्ण विकसित मध्यस्थता का।

मध्यस्थता पर भारत का दृष्टिकोण

अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता के प्रति भारत का दृष्टिकोण शांतिपूर्ण विवाद समाधान के प्रति उसकी प्रतिबद्धता तथा रणनीतिक स्वायत्तता एवं गैर-हस्तक्षेप पर उसके दीर्घकालिक जोर के मध्य संतुलन से निर्मित होता है।

  • तृतीय-पक्ष मध्यस्थता के स्थान पर द्विपक्षीयता की प्राथमिकता: भारत ने निरंतर यह रुख अपनाया है कि विवाद, विशेषकर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ, बिना बाहरी मध्यस्थता के द्विपक्षीय रूप से सुलझाए जाने चाहिए। यह स्थिति निम्नलिखित पर आधारित है:
    • शिमला समझौता (1972);
    • लाहौर घोषणा (1999)
      • भारत तृतीय-पक्ष मध्यस्थता को कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों के अंतरराष्ट्रीयकरण की संभावना के रूप में देखता है।
  • अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन: भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित शांतिपूर्ण विवाद समाधान के सिद्धांतों—जैसे मध्यस्थता, वार्ता का दृढ़ समर्थन करता है।
    • हालाँकि, यह समर्थन संदर्भ-विशिष्ट है, और भारत निम्नलिखित के मध्य अंतर करता है:
      • सामान्य अंतरराष्ट्रीय संघर्ष (जहाँ मध्यस्थता उपयोगी हो सकती है);
      • मुख्य राष्ट्रीय मुद्दे (जहाँ मध्यस्थता का विरोध किया जाता है)।
  • रणनीतिक स्वायत्तता और गुटनिरपेक्षता की विरासत: भारत की गुटनिरपेक्षता के प्रति ऐतिहासिक प्रतिबद्धता मध्यस्थता पर उसके सतर्क दृष्टिकोण को प्रभावित करती है:
    • शक्ति-गठबंधनों के साथ संरेखण से बचना;
    • स्वतंत्र कूटनीतिक सहभागिता को प्राथमिकता देना।
      • यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि भारत, वैश्विक संघर्ष समाधान में भाग लेते हुए भी नीतिगत लचीलापन बनाए रखे।
  • वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता की चयनात्मक स्वीकृति: अपने द्विपक्षीय विवादों में मध्यस्थता का विरोध करने के बावजूद, भारत मध्यस्थता की अवधारणा को अस्वीकार नहीं करता। वह:
    • संयुक्त राष्ट्र-नेतृत्व वाली या बहुपक्षीय मध्यस्थता का समर्थन करता है;
    • पश्चिम एशिया जैसे संकटों में संवाद और कूटनीति की वकालत करता है।
      • इस प्रकार, भारत का दृष्टिकोण सिद्धांतात्मक होते हुए भी व्यावहारिक है।
  • संभावित मध्यस्थ के रूप में भारत: भारत ने स्वयं को एक विश्वसनीय और तटस्थ संवादकर्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है, विशेषकर विकासशील देशों के बीच:
    • ईरान और इजरायल दोनों के साथ मजबूत संबंध;
    • बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और कूटनीतिक विश्वसनीयता।
      • हालाँकि, भारत एक दृढ़ मध्यस्थ के बजाय संवाद-सुविधाकर्ता की भूमिका को प्राथमिकता देता है, जो उसकी सतर्क कूटनीतिक परंपरा के अनुरूप है।
      • उदाहरण: कोरियाई युद्ध के दौरान, भारत ने एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य किया; उसने संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम की वकालत की, न्यूट्रल नेशंस रिपैट्रिएशन कमीशन (NNRC) की अध्यक्षता की (युद्धबंदियों की स्वैच्छिक वापसी के लिए), तथा कस्टोडियन फोर्स ऑफ इंडिया (CFI) को तैनात किया—जिससे एक प्रभावी वैश्विक मध्यस्थ के रूप में उसकी विश्वसनीयता स्थापित हुई।
  • बल प्रयोग के बजाय संवाद पर जोर: भारत निरंतर निम्नलिखित की वकालत करता है:
    • सैन्य विस्तार के बजाय कूटनीतिक सहभागिता;
    • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान।
      • यह दृष्टिकोण मध्यस्थता के सिद्धांतों के अनुरूप है, परंतु अनुकूल परिस्थितियों के बिना प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से बचता है।
  • सक्रिय मध्यस्थता में व्यावहारिक बाधाएँ: सक्रिय मध्यस्थता में भारत की सीमित भागीदारी निम्नलिखित कारणों से है:
    • रणनीतिक उलझाव का जोखिम;
    • महाशक्तियों की तुलना में दबाव क्षमता संबंधी कमी;
    • संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे प्रमुख भू-राजनीतिक कारकों से जुड़े संघर्षों की संवेदनशीलता।

प्रमुख चुनौतियाँ एवं चिंताएँ

  • विश्वास की कमी और रणनीतिक अस्पष्टता: मध्यस्थता के लिए न्यूनतम विश्वास स्तर आवश्यक होता है, जो दीर्घकालिक संघर्षों में प्रायः अनुपस्थित रहता है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के मध्य चल रहे तनाव में, सशर्त युद्धविराम प्रतिबद्धताएँ—जहाँ प्रत्येक पक्ष अपनी संयम पूर्ण नीति को दूसरे के कार्यों से जोड़ता है, विश्वास-निर्माण के स्थान पर प्रतिरोध आधारित सहभागिता को दर्शाती हैं, जिससे वार्ताएँ संवेदनशील और प्रत्यावर्तनीय बन जाती हैं।
  • समय निर्धारण की समस्या: मध्यस्थता तभी सफल होती है, जब संघर्ष पारस्परिक रूप से पीड़ादायक गतिरोध” तक पहुँच जाए।
    • परंतु जब पक्षों को अभी भी रणनीतिक या सैन्य लाभ की संभावना दिखाई देती है, तो वे समझौता करने से बचते हैं। उदाहरणतः, पश्चिम एशिया में युद्धविराम घोषणाओं के बावजूद जारी संघर्ष यह दर्शाता है कि समाधान के लिए स्थिति अभी पूर्णतः परिपक्व नहीं हुई है।
  • गैर-बाध्यकारी स्वरूप और प्रवर्तन का अभाव: मध्यस्थता के परिणाम स्वाभाविक रूप से गैर-बाध्यकारी होते हैं और इनमें औपचारिक प्रवर्तन तंत्र का अभाव होता है।
    • इससे समझौते उल्लंघन के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं, जैसा कि विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में कमजोर युद्धविराम से स्पष्ट है। विश्वसनीय निगरानी या दंडात्मक उपायों के बिना, मध्यस्थता केवल अस्थायी विराम तक सीमित रह सकती है।
  • सामरिक उपयोग और संघर्ष के स्थिरीकरण का जोखिम: पक्ष मध्यस्थता का उपयोग समाधान के लिए नहीं, बल्कि समय प्राप्त करने, सैन्य पुनर्गठन या अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने के लिए कर सकते हैं।
    • इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहाँ मध्यस्थता केवल संघर्ष को स्थिर कर देती है, परंतु उसके मूल कारणों का समाधान नहीं करती है।
  • शक्ति असमानता और दबावपूर्ण परिणाम: असमान शक्ति वाले संघर्षों में मध्यस्थता से न्यायसंगत परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते हैं।
    • शक्तिशाली पक्ष अपने प्रभाव का उपयोग कर कमजोर पक्षों को समझौतों को स्वीकार करने के लिए बाध्य कर सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित होती है।
  • मध्यस्थ की विश्वसनीयता और तटस्थता: मध्यस्थता की सफलता मध्यस्थ की स्वीकार्यता और निष्पक्षता पर निर्भर करती है।
    • वर्तमान परिदृश्य में, चीन या पाकिस्तान जैसे पक्षों की भू-राजनीतिक झुकाव की धारणा उनकी विश्वसनीयता को सीमित कर सकती है।
  • कार्यान्वयन और अनुपालन की चुनौतियाँ: समझौते होने के बाद भी उनकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन तंत्र—जैसे निगरानी, सत्यापन और विश्वास-निर्माण उपायों—पर निर्भर करती है।
    • कमजोर संस्थागत अनुवर्ती या बहु-अभिकर्ताओं से संघर्षों में खंडित नियंत्रण संरचना समझौतों के उल्लंघन और पुनः संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर सकती है।
  • हिंसात्मक गतिविधियाँ: प्रॉक्सी समूह, वैचारिक गुट और कठोर घरेलू समूह जैसे पक्ष, जो संघर्ष से लाभान्वित होते हैं, मध्यस्थता प्रयासों को बाधित कर सकते हैं।
    • उनकी हिंसा भड़काने या समझौते का विरोध करने की क्षमता शांति प्रक्रिया को विफल कर सकती है।

विद्यमान अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान संस्थाएँ

  • न्यायिक समाधान (बाध्यकारी निर्णय): अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) अंतर-राज्यीय विवादों के लिए प्रमुख न्यायिक निकाय है, जो अंतरराष्ट्रीय विधि के आधार पर बाध्यकारी निर्णय देता है, यद्यपि इसका अधिकार क्षेत्र राज्यों की सहमति पर निर्भर करता है।
  • समुद्र विधि तंत्र: अंतरराष्ट्रीय समुद्र विधि न्यायाधिकरण (ITLOS), UNCLOS के अंतर्गत समुद्री सीमाएँ, नौवहन अधिकार और समुद्री संसाधनों से जुड़े विवादों का समाधान करता है।
  • व्यापार विवाद समाधान: विश्व व्यापार संगठन (WTO) का विवाद निपटान निकाय (DSB) सदस्य देशों के मध्य व्यापार विवादों को हल करने हेतु एक अर्द्ध-न्यायिक तंत्र प्रदान करता है।
  • आर्बिट्रेशन’ आधारित तंत्र: परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (PCA) राज्यों, राज्य संस्थाओं और निजी पक्षों के बीच विवादों में ‘आर्बिट्रेशन’ और सुलह की सुविधा प्रदान करता है, जो लचीली और पक्ष-आधारित प्रक्रियाएँ सुनिश्चित करता है।
  • निवेशक–राज्य विवाद समाधान: अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद निपटान केंद्र (ICSID) विदेशी निवेशकों और राज्यों के बीच विवादों के समाधान हेतु एक मंच प्रदान करता है, जिससे निवेश संधियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • क्षेत्रीय एवं मिश्रित तंत्र: यूरोपीय न्यायालय (ECJ) और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) जैसे निकाय क्षेत्रीय कानूनी विवादों और अंतरराष्ट्रीय अपराधों से निपटते हैं, जो विवाद समाधान ढाँचों के विविधीकरण को दर्शाते हैं।

आगे की राह

  • सामरिक से संरचनात्मक मध्यस्थता की ओर संक्रमण: वर्तमान इस्लामाबाद संवाद को केवल एक आपातकालीन विराम” से आगे बढ़कर एक संरचित मध्यस्थता ढाँचा स्थापित करना होगा।
    • इसमें एक स्पष्ट कूटनीतिक रोडमैप निर्धारित करना शामिल है, जिसमें पूर्व-निर्धारित वार्ता चरण हों, ताकि सैन्य तनाव को न्यून करने से आगे बढ़कर मूल भू-राजनीतिक शिकायतों के समाधान तक पहुँचा जा सके।
  • संयुक्त सत्यापन तंत्र (JVM) की स्थापना: विश्वास की कमी और विकेंद्रीकृत सैन्य कमान से उत्पन्न जोखिम को देखते हुए, एक तटस्थ निगरानी निकाय, संभवतः संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षकों या मध्यस्थ देशों (चीन और पाकिस्तान) की संयुक्त समिति के रूप में आवश्यक है, जो युद्धविराम अनुपालन का सत्यापन करे और आकस्मिक तनाव वृद्धि को रोके।
  • समकालिक पारस्परिकता (‘मोर-फॉर-मोर’ एप्रोच): आर्थिक-सुरक्षा संबंध को संबोधित करने हेतु, मध्यस्थों को समकालिक तनाव को न्यून करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए।
    • उदाहरणतः, हॉर्मुज जलडमरूमध्य को क्रमिक प्रतिबंधों में राहत को ईरानी परिसंपत्तियों की चरणबद्ध स्वतंत्रता के रूप में जोड़ा जा सकता है, जिससे प्रोत्साहन-आधारित शांति मार्ग निर्मित हो।
  • तकनीकी और राजनीतिक भाषा का समन्वय: एक महत्त्वपूर्ण तात्कालिक कदम शांति प्रस्तावों का तकनीकी समन्वय है।
    • मध्यस्थों को निर्देशात्मक रणनीतियों का उपयोग कर परमाणु समृद्धिकरण” जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भाषायी अंतर को समाप्त करना होगा, ताकि फारसी और अंग्रेजी संस्करण कानूनी और राजनीतिक रूप से समान हों तथा भविष्य में भ्रामक कूटनीति” के आरोपों से बचा जा सके।
  • समावेशी क्षेत्रीय ढाँचा: एक स्थायी समाधान केवल द्विपक्षीय नहीं हो सकता है।
    • प्रक्रिया को अंततः एक बहु-स्तरीय कूटनीतिक मंच में परिवर्तित करना होगा, जिसमें इजरायल और खाड़ी अरब देश जैसे क्षेत्रीय पक्ष शामिल हों।
    • यह सुनिश्चित करता है कि सभी सुरक्षा-प्रभावित पक्षों की चिंताओं का समाधान हो और विकृतकारी” हस्तक्षेप को रोका जा सके।
  • परिपक्वता” का उपयोग कर परमाणु कूटनीति: मध्यस्थों को वर्तमान पारस्परिक रूप से पीड़ादायक गतिरोध” का लाभ उठाकर दीर्घकालिक विश्वास-निर्माण उपाय (CBMs) सुनिश्चित करने चाहिए।
    • इसमें अस्थायी परमाणु स्थगन को एक स्थायी सत्यापन व्यवस्था में परिवर्तित करना शामिल है, जहाँ सार्वभौमिक सुरक्षा आश्वासन के बदले उच्च-स्तरीय समृद्धिकरण की समाप्ति सुनिश्चित की जाए।
  • हॉर्मुज पारगमन प्रोटोकॉल” की स्थापना: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की निगरानी में एक बहुपक्षीय पारगमन प्रबंधन ढाँचा प्रस्तावित किया जाना चाहिए।
    • इससे यह जलमार्ग राजनीतिक सौदेबाजी के साधन से हटकर एक तटस्थ, नियम-आधारित वैश्विक ऊर्जा गलियारा बन सकता है।
  • साइबर डी-एस्केलेशन पैक्ट” का संस्थानीकरण: ड्रोन और मिसाइल आधारित युद्ध की प्रकृति को देखते हुए, एक विशिष्ट साइबर डी-एस्केलेशन पैक्ट आवश्यक है।
    • यह AI-आधारित लक्ष्य निर्धारण और स्वायत्त प्रणालियों के लिए रेड-लाइन” निर्धारित करेगी, जिससे एल्गोरिदमिक त्रुटियों या डिजिटल प्रक्रिया से उत्पन्न आकस्मिक तनाव वृद्धि को रोका जा सके।

निष्कर्ष

मध्यस्थता जटिल बहुध्रुवीय व्यवस्था में संघर्ष को सहयोग में परिवर्तित करने का एक अनिवार्य साधन बनी हुई है। हालाँकि, इसकी सफलता परिपक्वता, विश्वास और संस्थागत ढाँचे पर निर्भर करती है। वर्तमान पश्चिम एशिया युद्धविराम एक अवसर प्रदान करता है, परंतु निरंतर प्रतिबद्धता के अभाव में यह एक स्थायी शांति में परिवर्तित होने के बजाय केवल अस्थायी विराम बनकर रह सकता है।

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