संदर्भ
भारत का संविधान प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर कोई औपचारिक सीमा निर्धारित नहीं करता है, जिससे लोकसभा के विश्वास के आधार पर पद पर बने रहने की अनुमति मिलती है।
- वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा निर्वाचित कार्यकारी भूमिकाओं में 8,931 दिन पूरे करने के साथ, यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है, जो कमजोर होते संस्थागत नियंत्रणों के बीच लंबे समय तक पद पर बने रहने से संबंधित चिंताओं को उजागर करता है।
कार्यपालिका की असीमित शक्तियों के पीछे का तर्क
- संसदीय आधार: प्रधानमंत्री के लिए कार्यकाल की कोई सीमा न होना न तो कोई संयोग था और न ही संविधान में कोई कमी थी।
- यह भारत द्वारा अपनाई गई शासन की संसदीय प्रणाली की एक सुविचारित विशेषता थी। संसदीय प्रणाली में, राष्ट्रपति प्रणाली के विपरीत, प्रधानमंत्री का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित कार्यकाल के लिए नहीं होता है।
- इसके बजाय, प्रधानमंत्री केवल तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उन्हें लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है।
- इसका अर्थ यह है कि इस पद को हर समय राजनीतिक रूप से संसद पर निर्भर रहना चाहिए।
- संविधान निर्माताओं का तर्क: संविधान निर्माताओं का मानना था कि प्रधानमंत्री के लिए किसी निश्चित कार्यकाल सीमा की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह पद पहले से ही सतत् लोकतांत्रिक नियंत्रण के अधीन था।
- प्रधानमंत्री से संसद में प्रश्न पूछे जा सकते हैं, बहसों में उनकी आलोचना की जा सकती है, प्रस्तावों के माध्यम से उन्हें चुनौती दी जा सकती है और अविश्वास प्रस्ताव (NCM) के माध्यम से हटाया जा सकता है।
- इसलिए, संविधान निर्माताओं को यह अपेक्षा थी कि यह पद केवल पाँच वर्ष में एक बार चुनावों के दौरान ही नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन जवाबदेह बना रहेगा।
- अविश्वास प्रस्ताव (NCM) एक संसदीय उपकरण है, जिससे यह जाँचा जाता है कि क्या मंत्रिपरिषद को अभी भी लोकसभा का विश्वास प्राप्त है। यह अनुच्छेद-75(3) के तहत सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत में निहित है।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस संवैधानिक तर्क को स्पष्ट रूप से समझाया था। उन्होंने लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के दो रूपों की बात की:- संसद के माध्यम से दैनिक जवाबदेही और चुनावों के माध्यम से आवधिक जवाबदेही।
- संसद के माध्यम से दैनिक जवाबदेही: इसका अर्थ था कि कार्यपालिका को निर्वाचित प्रतिनिधियों की निरंतर जाँच का सामना करना पड़ेगा।
- चुनावों के माध्यम से आवधिक जवाबदेही: इसका अर्थ था कि जनता चुनावों के माध्यम से अपना अंतिम निर्णय देगी।
- सरल शब्दों में, संविधान ने यह मान लिया था कि प्रधानमंत्री का पद बहुत अधिक शक्तिशाली या स्थायी नहीं हो सकता है क्योंकि संसद हमेशा सरकार पर नियंत्रण रखने और आवश्यकता पड़ने पर उसे हटाने की स्थिति में होगी।
असीमित कार्यकारी अधिकार से संबंधित उभरती चिंताएँ
- संस्थागत परिवर्तन: वर्तमान में मुख्य समस्या यह है कि राजनीतिक व्यवस्था अब ठीक वैसे कार्य नहीं करती जैसा संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी।
- संविधान की संरचना भले ही वही हो, लेकिन कार्यपालिका की शक्ति को नियंत्रित करने वाली संस्थाएँ वास्तविक कामकाज में बहुत कमजोर हो गई हैं।
- परिणामस्वरूप, कार्यकाल की सीमा का न होना, अब ऐसे सवाल खड़े करता है, जो संविधान सभा के समय शायद उत्पन्न नहीं हुए थे।

- दल-बदल विरोधी कानून का प्रभाव: एक बड़ा परिवर्तन वर्ष 1985 में 52वें संशोधन द्वारा लाई गई दसवीं अनुसूची के साथ आया।
- इसे सामान्यतः ‘दल-बदल विरोधी कानून’ कहा जाता है, जिसे अस्थिर सरकारों को रोकने के लिए लाया गया था।
- हालाँकि इसने राजनीतिक स्थिरता तो दी, लेकिन इसका एक बड़ा दुष्प्रभाव भी हुआ: इसने सांसदों को अपने विवेक से मतदान करने की स्वतंत्रता को कम कर दिया, क्योंकि वे अब पार्टी के व्हिप (Whip) से संबद्ध होते हैं।
- व्हिप (Whip): किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने विधायकों/सांसदों को एक विशिष्ट तरीके से मतदान करने के लिए जारी किया गया निर्देश।
- दसवीं अनुसूची के तहत, इसका उल्लंघन करने पर सदस्यता रद्द हो सकती है, जो एक ‘लॉक-इन’ बहुमत सुनिश्चित करता है और कार्यपालिका के प्रति संसदीय जवाबदेही को कमजोर करता है।
- सांसद अब स्वतंत्र रूप से सरकार को चुनौती नहीं दे सकते: इस कानून के तहत, यदि सत्ताधारी दल का कोई सांसद पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- इसका अर्थ है कि यदि किसी सांसद का प्रधानमंत्री से विश्वास उठ भी जाए, तो भी वह सदन में आसानी से सरकार के विरुद्ध वोट नहीं दे सकता है।
- अपनी सदस्यता जाने का डर असहमति व्यक्त करना बहुत जोखिम भरा बना देता है।
- अविश्वास प्रस्ताव का कमजोर होना: अविश्वास प्रस्ताव को वह मुख्य संवैधानिक तरीका माना गया था, जिसके माध्यम से अगले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री को हटाया जा सके।
- हालाँकि, जब सत्ताधारी दल के सांसद पार्टी व्हिप और दल-बदल विरोधी कानून से संबद्ध होते हैं, तो इस उपकरण की व्यावहारिक शक्ति क्षीण हो जाती है।
- यह विधिक रूप से तो मौजूद है, लेकिन पूर्ण बहुमत वाली सरकार में इसका लोकतांत्रिक प्रभाव बहुत कम हो गया है। इस प्रकार, जिस तंत्र को कार्यकाल की सीमा की आवश्यकता को समाप्त करना था, वह स्वयं कम प्रभावी हो गया है।
- अध्यक्ष (Speaker) की भूमिका और देरी: दसवीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष की विवेकाधीन शक्तियाँ अक्सर अयोग्यता के निर्णयों में देरी या राजनीतिक प्रभाव का कारण बनती हैं, जिससे ‘दैनिक जवाबदेही’ कमजोर होती है।
- कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्पक्षता के लिए इस शक्ति को एक स्वतंत्र निकाय को सौंपने का सुझाव दिया था।
- प्रतीकात्मक अविश्वास प्रस्ताव: मजबूत बहुमत वाली व्यवस्था में, अविश्वास प्रस्ताव काफी सीमा तक प्रतीकात्मक बनकर रह गए हैं। चूँकि दल-बदल विरोधी कानून परिणाम पहले से ही तय कर देता है, इसलिए एक संवैधानिक नियंत्रण केवल एक संसदीय बहस तक सीमित हो कर रह जाता है।
- नेतृत्व परिवर्तन में आंतरिक और बाहरी बाधाएँ: भारत में राजनीतिक दल अक्सर अत्यधिक केंद्रीकृत होते हैं।
- एक और बड़ी समस्या राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमजोर स्थिति है।
- ज्यादातर दलों में महत्त्वपूर्ण निर्णय एक छोटे नेतृत्व समूह या एक अकेले प्रभावशाली नेता द्वारा नियंत्रित होते हैं।
- नेतृत्व परिवर्तन आमतौर पर खुली प्रतिस्पर्द्धा, नियमित आंतरिक चुनाव या संस्थागत समीक्षा के माध्यम से नहीं होता है।
- मंत्रिमंडल बनाम प्रधानमंत्री-स्तरीय परिवर्तन: संसदीय मॉडल में एक कैबिनेट सरकार की परिकल्पना की गई है, जिसमें प्रधानमंत्री को ‘प्राइमस इंटर पेरेस’ (समान शक्ति वालों में प्रथम) का दर्जा प्राप्त होता है।
- हालाँकि लंबे और अनियंत्रित कार्यकाल के कारण यह व्यवस्था ‘प्रधानमंत्री-प्रधान सरकार’ में परिवर्तित हो सकती है, जहाँ कैबिनेट की विचार-विमर्श वाली भूमिका कम हो जाती है और वह मुख्य रूप से नेता के निर्णयों का ही समर्थन करती है, जिससे आंतरिक कार्यकारी नियंत्रण कमजोर पड़ जाते हैं।
- अंतर-दलीय नियंत्रण का कमजोर होना: मजबूत संसदीय प्रणालियों में, सत्ताधारी दल अपने नेता को बदल सकता है, जो संसदीय निष्कासन के बिना भी एक आंतरिक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है।
- भारत में, नेता-केंद्रित पार्टी संरचनाएँ और नेतृत्व को चुनौती देने की दुर्लभता इस तंत्र को कमजोर बनाती है।
- ‘डबल शील्ड’ (दोहरा सुरक्षा कवच) प्रभाव: प्रधानमंत्री को दोहरा संरक्षण प्राप्त हो जाता है:-
- संसद से: सांसदों पर दल-बदल विरोधी कानून के प्रतिबंधों के कारण।
- राजनीतिक दल से: आंतरिक लोकतंत्र के कमजोर होने के कारण।
- इससे एक ‘दोहरा सुरक्षा कवच’ तैयार हो जाता है, जो न केवल जनता के समर्थन के कारण, बल्कि चुनावों के मध्य चुनौती देने वाले संस्थागत माध्यमों के कमजोर पड़ जाने के कारण भी, लंबे कार्यकाल को संभव बनाता है।

दीर्घकालिक कार्यकाल के संरचनात्मक जोखिम
- सत्ता का केंद्रीकरण: चिंता केवल इस बात की नहीं है कि कोई नेता लंबे समय तक पद पर बना रहता है।
- दीर्घावधि का कार्यकाल अपने आप में अलोकतांत्रिक नहीं है, जब तक कि वह मतदाताओं की इच्छा को दर्शाता हो।
- हालाँकि, इससे भी गहरी समस्या यह है कि लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से राजनीतिक, संस्थागत और सूचनात्मक शक्ति धीरे-धीरे किसी एक ही पद पर केंद्रित हो सकती है। समय के साथ, यह स्थिति व्यवस्था को औपचारिक रूप से तो लोकतांत्रिक बनाए रख सकती है, लेकिन वास्तविक रूप से उसे कम संतुलित बना सकती है।
- लंबे कार्यकाल के संरचनात्मक लाभ: कई कार्यकालों तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री को ऐसे ढाँचागत लाभ प्राप्त हो जाते हैं, जिनकी बराबरी कोई भी नया दावेदार आसानी से नहीं कर सकता है।
- पार्टी पर नियंत्रण: पार्टी संगठन और नेतृत्व संरचना पर मजबूत पकड़।
- प्रशासनिक प्रभाव: नौकरशाही और नीति कार्यान्वयन पर अधिक नियंत्रण।
- नियुक्ति की शक्ति: चुनाव आयोग, न्यायपालिका और नियामकों के सदस्यों के चयन में बढ़ती भूमिका।
- विमर्श (Narrative) पर नियंत्रण: सार्वजनिक विमर्श, मीडिया विमर्श और नीतिगत समय को आकार देने की क्षमता।
- इनमें से कोई भी व्यक्तिगत रूप से संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन नहीं करता है, लेकिन साथ मिलकर ये राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में एक संचयी असमानता (Cumulative Asymmetry) उत्पन्न करते हैं।
- लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्द्धा में असंतुलन: भारत में नियमित और प्रतिस्पर्द्धी चुनाव होते रहते हैं, और प्रधानमंत्री कानूनी रूप से तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उन्हें संसदीय विश्वास प्राप्त है।
- हालाँकि, समय के साथ:-
- सत्ता में होने का लाभ कई गुना बढ़ जाता है।
- सरकारी तंत्र तक पहुँच, दृश्यता और नीतिगत प्रभाव में वृद्धि होती है।
- विपक्ष को संसाधनों और विमर्श के मामले में असंतुलन का सामना करना पड़ता है।
- यह एक ऐसी स्थिति उत्पन्न करता है, जहाँ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्द्धा तो मौजूद है, लेकिन वह अब समान रूप से संतुलित नहीं रह गई है।
- उदाहरण: वर्ष 2024 के आम चुनावों में, बहुमत न होने के बावजूद, वर्तमान नेतृत्व ने गठबंधन के माध्यम से सत्ता बरकरार रखी, जो सत्ता में बने रहने की क्षमता और विपक्ष की एकजुटता की सीमाओं को दर्शाता है।
- संस्थागत निष्पक्षता पर प्रभाव: दीर्घकालिक कार्यकाल संस्थागत नियुक्तियों पर निरंतर प्रभाव डालने की अनुमति देता है, जिससे कार्यपालिका की प्राथमिकताओं के साथ संस्थानों के धीरे-धीरे सामंजस्य स्थापित करने की चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- समय के साथ, यह एक ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ या ‘कार्यपालिका के अनुकूल नियामक पारिस्थितिकी तंत्र’ उत्पन्न कर सकता है।
- स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक गुणवत्ता से संबंधित वैश्विक सूचकांकों ने भारत में संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक गुणवत्ता के बारे में चिंताएँ जताई हैं।
- जोखिम प्रत्यक्ष नियंत्रण का नहीं, बल्कि निष्पक्षता के क्रमिक क्षरण का है।
- विपक्षी पारिस्थितिकी तंत्र का कमजोर होना: लंबे समय तक सत्ता में रहना विपक्ष को कई तरह से कमजोर कर सकता है:
- विखंडन और नेतृत्व का अभाव।
- एक विश्वसनीय ‘प्रतीक्षारत सरकार’ (Government-in-waiting) के रूप में कार्य करने की क्षमता में कमी।
- नीति-आधारित प्रतिस्पर्द्धा में गिरावट।
- यू.के. के विपरीत, भारत में औपचारिक ‘शैडो कैबिनेट’ (Shadow Cabinet) प्रणाली का अभाव है, जिसका अर्थ है:-
- सरकार की कोई भी व्यवस्थित और निरंतर, विभाग-वार समीक्षा नहीं होती है।
- जवाबदेही निरंतर होने के बजाय चुनाव-केंद्रित हो जाती है।
- FPTP प्रणाली और बढ़ता प्रभुत्व: भारत की ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ (FPTP) प्रणाली इस असंतुलन को और बढ़ा देती है:
- एक पार्टी लगभग 35-40% वोट शेयर के साथ सीटों का भारी बहुमत हासिल कर सकती है।
- यह ‘विनर टेक्स आल’ (Winner-takes-all) वाला प्रभाव उत्पन्न करता है, विशेष रूप से खंडित चुनावी मुकाबलों में।
- जब इसे लंबे कार्यकाल के साथ जोड़ा जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप:
- अत्यधिक विधायी प्रभुत्व।
- कार्यपालिका के अधिकार को चुनौती देने वाले प्रभावी तंत्रों में कमी।
- फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली: यह बहुलता-आधारित चुनावी पद्धति है, जहाँ सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे पूर्ण बहुमत न मिला हो (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के)।
- यह सरलता, स्थिर सरकार और निर्वाचन क्षेत्र से मजबूत जुड़ाव सुनिश्चित करती है, लेकिन इसमें सीटों का असमान वितरण तथा अल्पमत विजेताओं जैसे दोष भी हैं।
- तुलनात्मक अंतर्दृष्टि: प्रधानमंत्रियों के लिए कार्यकाल की सीमा न होने के मामले में भारत अकेला नहीं है, लेकिन यह मॉडल मजबूत विधायी नियंत्रण की पूर्वधारणा पर आधारित है।
- समस्या तब उत्पन्न होती है, जब कार्यकाल की कोई सीमा न हो, संसदीय जवाबदेही कमजोर हो और पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव हो, ये सब मिलकर संरचनात्मक कार्यपालिका प्रभुत्व उत्पन्न करते हैं।
संवैधानिक बहस के बारे में
- कार्यपालिका के संयम में असमानता: भारत अपने संवैधानिक व्यवहार में एक अप्रत्याशित विरोधाभास प्रस्तुत करता है। भारत के राष्ट्रपति, काफी सीमा तक एक औपचारिक प्राधिकारी होने के बावजूद, एक सुस्थापित अनौपचारिक परंपरा से शासित रहे हैं कि किसी भी व्यक्ति को सामान्यतः दो से अधिक कार्यकाल के लिए सेवा नहीं देनी चाहिए।
- समय के साथ, सभी पदधारकों द्वारा इस संयम का सम्मान किया गया है, जिसने इसे व्यवहार में एक संवैधानिक मानक की शक्ति प्रदान की है।
- इसके विपरीत, प्रधानमंत्री, जो वास्तविक कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हैं, न तो किसी औपचारिक कार्यकाल सीमा के अधीन हैं और न ही संयम की किसी स्थापित परंपरा के।
- पद पर बने रहना लगभग पूरी तरह से चुनावी परिणामों पर निर्भर करता है, जिसमें स्वैच्छिक सीमा की कोई समानांतर अपेक्षा नहीं होती है।
- संवैधानिक विषमता और असंतुलन: यह भिन्नता एक संवैधानिक विषमता उत्पन्न करती है। वह पद जिसके पास सीमित वास्तविक अधिकार हैं, उसने संयम का एक मानक विकसित कर लिया है, जबकि वास्तविक शासन शक्ति वाला पद संस्थागत रूप से अनियंत्रित बना हुआ है।
- यह केवल प्रतीकात्मक नहीं है, यह संवैधानिक व्यवस्था में एक गहरे असंतुलन की ओर इशारा करता है। आदर्श रूप से, शक्तिशाली पदों को अधिक सुरक्षा उपायों के अधीन होना चाहिए, चाहे वे औपचारिक हों या अनौपचारिक।
- हालाँकि, भारत के मामले में, कमजोर पद के इर्द-गिर्द अनौपचारिक सीमाएँ तय हो गई हैं, जबकि मजबूत पद समय-समय पर होने वाले चुनावों और लगातार कमजोर पड़ते संस्थागत नियंत्रणों पर ही निर्भर बना हुआ है।
- चुनावी जवाबदेही की सीमाएँ: कानूनी सीमा या परंपराओं के अभाव में, प्रधानमंत्री का कार्यकाल प्रभावी रूप से केवल चुनावों के माध्यम से विनियमित होता है।
- हालाँकि चुनाव लोकतंत्र के केंद्र में होते हैं, फिर भी वे जवाबदेही के सतत जारी रहने वाले तंत्र के बजाय, अवरुद्ध होने वाले तंत्र हैं।
- इसके अलावा, सत्ता में होने के लाभ, संस्थागत नियुक्तियों पर नियंत्रण और दल-बदल विरोधी कानून द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों जैसे कारकों के कारण, जवाबदेही के अन्य माध्यमों की प्रभावशीलता कम हो गई है।
- परिणामस्वरूप, कार्यपालिका की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए केवल चुनावों को ही एक बहुत बड़ी भूमिका निभानी पड़ती है।
- संवैधानिक नैतिकता—असमान विकास: राष्ट्रपति के लिए दो-कार्यकाल की परंपरा ‘संवैधानिक नैतिकता’ के सिद्धांत को स्पष्ट करती है, यह विचार कि संयम हमेशा कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवहार और साझा मानदंडों के माध्यम से विकसित हो सकता है।
- यह इस सामूहिक समझ को दर्शाता है कि निरंतरता को पद के रोटेशन (बारी-बारी से बदलने) के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, भले ही बाध्यकारी नियम न हों।
- हालाँकि, संयम की यह नैतिकता प्रधानमंत्री पद के लिए विकसित नहीं हुई है, जहाँ इसकी अधिक आवश्यकता है।
- वास्तविक सत्ता के केंद्र में ऐसी परंपरा का अभाव यह बताता है कि भारत में संवैधानिक नैतिकता का विकास असमान रूप से हुआ है, जिसने प्रतीकात्मक पदों को तो मजबूत किया है, लेकिन सबसे शक्तिशाली पद को काफी सीमा तक केवल औपचारिक चुनावी प्रक्रियाओं पर निर्भर छोड़ दिया है।
कार्यपालिका पर नियंत्रण के रूप में मतदाता
- लोकतांत्रिक बचाव- ‘मतदाता की पसंद’ की प्रधानता: मौजूदा व्यवस्था के पक्ष में एक मजबूत तर्क यह है कि लोकतंत्र में, अंतिम सत्ता लोगों के पास होती है।
- यदि मतदाता बार-बार उसी नेता को चुनते हैं, तो इस तरह की निरंतरता में अपने आप में कोई समस्या नहीं है। इस दृष्टिकोण से, कार्यकाल की सीमाएँ थोपना प्रतिबंधात्मक लग सकता है, क्योंकि ये नागरिकों को उस नेता को दोबारा चुनने से रोकती हैं, जिस पर उनका भरोसा बना हुआ है।
- तर्क की मानक शक्ति: इस पक्ष को अत्यधिक लोकतांत्रिक वैधता हासिल है। यह जन संप्रभुता के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ चुनावी नतीजों को जनता की इच्छा की सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति माना जाता है।
- अगर चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं, तो किसी नेता के बार-बार चुने जाने को उसके प्रदर्शन और नेतृत्व के स्पष्ट समर्थन के तौर पर देखा जा सकता है।
- इस तरीके से, कार्यकाल की सीमाएँ बहुसंख्यक-विरोधी या यहाँ तक कि अलोकतांत्रिक भी लग सकती हैं, क्योंकि वे जनता के निरंतर समर्थन की परवाह किए बिना, मतदाताओं की चुनने की आजादी पर एक बाहरी पाबंदी लगाती हैं।
एकमात्र नियंत्रण के रूप में चुनावी जवाबदेही की सीमाएँ
- ‘केवल मतदाता की पसंद’ वाले तर्क की सीमाएँ: हालाँकि चुनावी पसंद लोकतंत्र का केंद्रबिंदु है, फिर भी यह सत्ता के एक जगह संकेंद्रित होने के विरुद्ध पूरी तरह से सुरक्षा नहीं दे पाती है।
- संविधान बनाने वालों ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई थी, जो केवल समय-समय पर होने वाले चुनावों पर निर्भर हो; उन्होंने निरंतर जवाबदेही के एक व्यापक ढाँचे की कल्पना की थी, विशेषकर संसद के माध्यम से।
- इसलिए, यह मान लेना काफी नहीं है कि केवल चुनाव ही कार्यपालिका के अधिकार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं।
- संसदीय नियंत्रणों का कमजोर होना: संवैधानिक ढाँचे में संसद पर बहुत जोर दिया गया था, ताकि वह कार्यपालिका पर निरंतर निगरानी रख सके।
- हालाँकि, दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) और राजनीतिक दलों के बढ़ते केंद्रीकृत ढाँचों जैसी व्यवस्थाओं के कारण, विधायकों की सरकार को स्वतंत्र रूप से चुनौती देने की क्षमता कमजोर हो गई है।
- इसके परिणामस्वरूप, संसदीय निगरानी कम प्रभावी हो जाती है और जवाबदेही का बोझ असंतुलित रूप से चुनावों पर आ जाता है।
- चुनावों पर अत्यधिक बोझ: जब संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़ जाते हैं, तो चुनाव ही जवाबदेही का मुख्य (और अक्सर एकमात्र) माध्यम बन जाते हैं। हालाँकि, चुनाव समय-समय पर होते हैं, यानी कई वर्षों के अंतराल पर।
- इस दौरान, लंबे समय से पद पर आसीन कोई नेता कई महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक लाभ अर्जित कर सकता है, जैसे:-
- संस्थागत नियुक्तियों पर प्रभाव
- राजनीतिक विमर्श और संदेशों पर अधिक नियंत्रण
- चुनावों के बावजूद असंतुलन का बना रहना: इस प्रकार, नियमित चुनाव होने के बावजूद, लोकतंत्र में धीरे-धीरे असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, विशेषकर तब, जब कोई एक नेता इतने लंबे समय तक सत्ता में बना रहे कि वह संस्थागत और राजनीतिक व्यवस्था को अपने पक्ष में ढाल ले।
- इससे जनता के जनादेश का महत्त्व कम नहीं होता है, बल्कि यह एक गहरा प्रश्न खड़ा करता है, क्या, जब अन्य संवैधानिक और राजनीतिक नियंत्रण कमजोर पड़ गए हों, तो जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए केवल चुनाव ही पर्याप्त हैं?
बहस का मूल सार क्या है?
- बहस का मूल सार: इस बहस को किसी निजी या दलीय-राजनीतिक मुद्दे तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। असली चिंता ढाँचागत है।
- प्रश्न यह है कि क्या भारत के संसदीय लोकतंत्र में अब भी वही ‘स्वयं-सुधार की क्षमता’ मौजूद है, जिसके होने का विश्वास इसके निर्माताओं को था।
- जब असीमित कार्यकाल को सुरक्षित माना जाता था: जब यह माना जाता था कि संसद स्वतंत्र रूप से कार्य करेगी, अविश्वास प्रस्ताव प्रभावी होंगे और राजनीतिक दल नेतृत्व परिवर्तन के लिए तत्पर रहेंगे, तब असीमित कार्यकाल का विचार इतना भयावह नहीं लगता था।
- लेकिन जब ये नियंत्रण कमजोर पड़ जाते हैं, तो वही संवैधानिक ढाँचा अधिक जोखिम भरा लगने लगता है।
- संस्थागत वास्तविकता में परिवर्तन: समस्या यह नहीं है कि भारत में सैद्धांतिक रूप से कोई ‘कार्यकाल सीमा’ नहीं है।
- समस्या यह है कि असीमित कार्यकाल अब एक ऐसे तंत्र में कार्य कर रहा है, जहाँ संतुलन बनाने वाली संस्थाएँ पहले की तुलना में कमजोर हो गई हैं। यही बात आज इस मुद्दे को गंभीर बनाती है।
- राजनीतिक आम सहमति की चुनौती: हालाँकि ये सुधार संवैधानिक रूप से सही हैं, लेकिन व्यावहारिक चुनौती ‘राजनीतिक आम सहमति’ बनाने की है।
- कोई भी ऐसा सुधार, जो पार्टी अनुशासन को कमजोर करता हो या कार्यकाल को सीमित करता हो, उसका अक्सर सत्ताधारी दलों द्वारा विरोध किया जाता है, चाहे उनकी विचारधारा कोई भी हो।
- इसलिए, लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीतिक संस्कृति में एक ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है, जहाँ राजनीतिक दल ‘अल्पकालिक कार्यकारी स्थिरता’ के बजाय ‘दीर्घकालिक संस्थागत स्वास्थ्य’ को प्राथमिकता दें।
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आगे की राह
- संसद को मुख्य नियंत्रक के रूप में पुनर्स्थापित करना: सबसे आवश्यक सुधार संसद की मूल भूमिका को पुनः सक्रिय करना है, जो दैनिक जवाबदेही तय करने का एक माध्यम है।
- संविधान निर्माताओं का विचार था कि कार्यपालिका तभी तक बनी रहेगी, जब तक उसे सदन का विश्वास मत प्राप्त रहेगा।
- एक व्यावहारिक कदम यह होगा कि विश्वास और अविश्वास प्रस्तावों को दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) से छूट दी जाए। इससे सांसदों को अयोग्य घोषित होने के भय के बिना, सरकार के अस्तित्व पर स्वतंत्र रूप से मतदान करने की अनुमति मिल जाएगी।
- इस तरह का सुधार पार्टी अनुशासन को पूरी तरह से समाप्त नहीं करेगा, बल्कि यह वास्तविक जवाबदेही के लिए एक संवैधानिक स्थान सुनिश्चित करेगा; जिससे यह सुनिश्चित होगा कि कार्यपालिका की वैधता केवल पार्टी व्हिप द्वारा लागू किए गए संख्यात्मक नियंत्रण से नहीं, बल्कि वास्तविक विधायी विश्वास से प्राप्त हो।
- कार्यकाल की सीमाओं पर पुनः विचार-एक संतुलित दृष्टिकोण: सुधार का एक और विकल्प यह है कि पूरी तरह से कोई सीमा तय करने के बजाय, लगातार कार्यकाल पर सीमा लगाई जाए। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के तौर पर लगातार एक तय संख्या में कार्यकाल पूरा कर सकता है और कुछ समय के अंतराल के बाद वह दोबारा इस पद पर पुनः आसीन हो सकता है।
- यह दृष्टिकोण इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करता है:-
- लोकतांत्रिक चुनाव (मतदाताओं के पास दोबारा चुनने का अधिकार बना रहता है)
- संस्थागत संतुलन (सत्ता के लंबे समय तक एक ही जगह केंद्रित होने से रोकना)।
- यह अनुभवी नेताओं को हमेशा के लिए बाहर किए बिना, नेतृत्व में परिवर्तन सुनिश्चित करता है।
- पार्टी के भीतर लोकतंत्र को मजबूत करना: एक अधिक गहरा और टिकाऊ समाधान स्वयं राजनीतिक दलों के भीतर ही निहित है। आंतरिक चुनावों, नेतृत्व की समीक्षा और सहभागी निर्णय-निर्माण के अभाव के कारण, दलों की संरचनाएँ उत्तरोत्तर अधिक केंद्रीकृत और नेता-केंद्रित होती गई हैं।
- सुधारों का फोकस इन बातों पर होना चाहिए:
- पार्टी के भीतर नियमित चुनाव
- नेतृत्व चुनने की पारदर्शी प्रक्रियाएँ
- निर्णय लेने की प्रक्रिया में सदस्यों की अत्यधिक भागीदारी।
- अगर पार्टियाँ अधिक लोकतांत्रिक बन जाती हैं, तो नेता पार्टी के भीतर ही जवाबदेह बने रहेंगे, जिससे बाहरी संवैधानिक पाबंदियों की आवश्यकता कम हो जाएगी।
- बहस को राज्यों तक विस्तार देना: लंबे समय तक कार्यकारी पद पर बने रहने का मुद्दा केवल केंद्र तक ही सीमित नहीं है। कई राज्यों में भी लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहने वाले नेता हुए हैं, जिससे सत्ता के एक जगह संकेंद्रित होने और नियंत्रण व्यवस्था के कमजोर पड़ने जैसी ही चिंताएँ उजागर होती हैं।
- इसलिए, सुधारों में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री, दोनों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि संघीय ढाँचे में एक समान लोकतांत्रिक मानकों को सुनिश्चित किया जा सके।
- संघीय संतुलन पर प्रभाव: केंद्र स्तर पर लंबे समय तक पद पर बने रहने का असर संघीय गतिशीलता पर भी पड़ सकता है। जब एक ही पार्टी केंद्र और कई राज्यों, दोनों पर प्रभावी होती है, तो व्यवहार में संघीय नियंत्रण कमजोर पड़ सकते हैं। इसका अर्थ है कि निम्नलिखित का जोखिम बना रहता है:
- पार्टी ढाँचों के भीतर सत्ता का केंद्रीकरण
- राज्य नेतृत्व की स्वायत्तता में कमी।
- संघ की शक्ति के प्रतिसंतुलन के रूप में राज्यों का कमजोर होना।
- इससे संघीय सिद्धांत कमजोर हो सकता है, जिसके तहत राज्यों को केंद्रीय सत्ता पर संस्थागत नियंत्रण के रूप में कार्य करना होता है।
- पार्टी लोकतंत्र के लिए कानूनी समर्थन: पार्टी के भीतर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए वैधानिक समर्थन की आवश्यकता हो सकती है, विशेषकर ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951′ (धारा 29A) में सुधारों के जरिए।
- भारत के विधि आयोग और संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग जैसे संस्थानों ने इस बात पर बल दिया है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि राजनीतिक दल स्वयं भी लोकतांत्रिक तरीके से कार्य करें, न कि केंद्रीकृत कमांड संरचनाओं की तरह।
- प्रमुख समितियों की अनुशंसाएँ: कई विशेषज्ञ निकायों ने पहले ही ऐसे सुधारों की रूपरेखा तैयार कर ली है, जिन पर अमल किया जा सकता है:-
- भारत के विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999): इसमें यह सिफारिश की गई कि ‘व्हिप’ (Whip) को केवल महत्त्वपूर्ण मतों (जैसे- विश्वास प्रस्ताव) तक ही सीमित रखा जाए, ताकि अन्य मामलों में विधायी स्वतंत्रता अधिक बनी रहे।
- दिनेश गोस्वामी समिति: इसने सुझाव दिया कि अयोग्यता संबंधी शक्तियाँ स्पीकर से लेकर राष्ट्रपति/राज्यपाल को सौंप दी जाएँ, जो चुनाव आयोग की सलाह पर कार्य करेंगे; ऐसा निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
- संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (2002): इसने पार्टी के भीतर अनिवार्य आंतरिक लोकतंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें नियमित रूप से नेतृत्व के चुनाव कराना भी शामिल है।
निष्कर्ष
भारत ने संसद, राजनीतिक दलों और जवाबदेही तंत्रों पर विश्वास करते हुए प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल की सीमा को समाप्त कर दिया ताकि कार्यपालिका की शक्ति पर नियंत्रण रखा जा सके। चूँकि ये तंत्र कमजोर हो गए हैं, इसलिए लंबे कार्यकाल से सत्ता का केंद्रीकरण और असंतुलन का खतरा है। असली चुनौती संस्थागत नियंत्रणों को बहाल करना या नए सुरक्षा उपाय तैयार करना है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सत्ता जवाबदेह, सीमित और प्रतिस्पर्द्धी बनी रहे।