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दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026

6 Apr 2026

संदर्भ

हाल ही में संसद ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।

संबंधित तथ्य 

  • दिसंबर 2025 तक, IBC ने 1,376 कंपनियों के समाधान में मदद की है, जिससे लेनदारों को 4.11 लाख करोड़ रुपये की वसूली करने में सहायता मिली है।
    • वित्तीय लेनदारों को अपने दावों का 34% से अधिक हिस्सा वापस मिला है।

दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 के बारे में

  • दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 प्रक्रियाओं को सरल बनाकर, देरी को कम करके और लेनदारों द्वारा संचालित समाधान को बढ़ावा देकर भारत के दिवाला ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास करता है।
  • इसका उद्देश्य दिवाला कार्यवाही में दक्षता, पारदर्शिता और पूर्वानुमान को बढ़ाकर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में सुधार करना भी है।

दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 के बारे में

  • कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Processes-CIRP) और परिसमापन के माध्यम से ऋण समाधान के लिए एक मजबूत ढाँचा प्रदान करने हेतु वर्ष 2016 में IBC (दिवाला और दिवालियापन संहिता) को लागू किया गया था।
  • इसका उद्देश्य परिसंपत्ति के मूल्य को अधिकतम करना और लेनदारों के बीच उचित आय का वितरण करना है।
  • IBC फर्मों के समयबद्ध समाधान का प्रावधान करता है, जो भारत में फर्मों के बाहर निकलने की समस्या का समाधान करता है।

मुख्य विशेषताएँ

  • दिवाला आवेदनों को स्वीकार करने में देरी: राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के लिए 14 दिनों के भीतर दिवाला आवेदन स्वीकार करना अनिवार्य है, लेकिन अक्सर इसमें कई महीनों की देरी हो जाती है। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य इस प्रारंभिक चरण को सुव्यवस्थित करना है, ताकि दिवाला कार्यवाही की समय पर शुरुआत सुनिश्चित की जा सके।
  • दिवाला आवेदनों की अनिवार्य स्वीकृति: चूक सिद्ध होने पर NCLT को दिवाला आवेदन स्वीकार करना ही होगा, जो केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन और समाधान पेशेवर के विरुद्ध किसी अनुशासनात्मक कार्यवाही की अनुपस्थिति के अधीन होगा।
    • यह विधेयक किसी अन्य आधार पर आवेदन खारिज करने पर रोक लगाता है, जिससे विवेकाधीन शक्तियों में कमी आएगी और प्रक्रिया तीव्र होगी।
  • लेनदार-प्रारंभिक दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIIRP): लेनदार-प्रारंभिक दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIIRP) शुरू की गई है, जो न्यायालय से बाहर (Out-of-court) प्रक्रिया शुरू करने का तंत्र प्रदान करती है। इसे केवल “निर्दिष्ट वित्तीय लेनदारों” द्वारा ही किया जा सकता है।
    •  इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए कम से कम 51% वित्तीय लेनदारों की सहमति अनिवार्य होगी।
  • समूह और सीमा-पार दिवाला ढाँचा: यह विधेयक समूह दिवाला (Group Insolvency) और सीमा-पार दिवाला (Cross-border Insolvency) के लिए एक रूपरेखा पेश करता है, जिसका उद्देश्य निवेशक विश्वास में सुधार करना और घरेलू प्रक्रियाओं को अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाना है।
  • हितों के टकराव को दूर करना: इसमें कॉरपोरेट ऋणी (Corporate Debtor) के समाधान पेशेवर (RP) को परिसमापक (Liquidator) बनने से रोककर हितों के टकराव को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया गया है।
  • निर्धारित समय-सीमा: ‘अनुचित अपीलीय देरी’ को कम करने के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के लिए तीन महीने की समय-सीमा की सिफारिश की गई है।
  • ‘कॉरपोरेट ऋणी’ शब्द का विस्तार: धारा 240C में एक स्पष्टीकरण जोड़ने की सिफारिश की गई है ताकि ‘कॉरपोरेट ऋणी’ शब्द को स्पष्ट और व्यापक बनाया जा सके, जिसमें भारत के बाहर सीमित देयता (Limited Liability) के साथ निगमित किसी भी व्यक्ति को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके।
  • PPIRP वोटिंग में सुधार: इसमें प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (PPIRP) के लिए वोटिंग सीमा को घटाकर 51% करने की सिफारिश की गई है।
    • इसके अलावा, यह भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) को लेनदारों की समिति (CoC) के लिए समय-सीमा और आचरण मानक निर्धारित करने का अधिकार देता है।
  • आपराधिक दंड से नागरिक दंड की ओर परिवर्तन: यह स्थगन या समाधान योजना के उल्लंघन और परिचालन लेनदार द्वारा विवाद का खुलासा न करने या ऋण के भुगतान जैसे अपराधों के लिए आपराधिक दंड के स्थान पर नागरिक दंड (Civil Penalties) का प्रावधान करता है।

प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (PPIRP) के बारे में

  • PPIRP (प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस) दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 के तहत शुरू किया गया एक तीव्र गति वाला दिवाला समाधान तंत्र है।
  • उद्देश्य: ऋणी और लेनदारों के मध्य पूर्व समझौते के माध्यम से तनावग्रस्त MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) का समयबद्ध और लागत प्रभावी पुनर्गठन सक्षम करना।

मुख्य विशेषता 

  • ऋणी-अधिकार मॉडल (Debtor-in-Possession Model): इस प्रक्रिया के दौरान मौजूदा प्रबंधन (मैनेजमेंट) का नियंत्रण बना रहता है।
  • पूर्व-वार्ता समाधान (Pre-negotiated Resolution): औपचारिक शुरुआत से पूर्व समाधान योजना पर अनौपचारिक रूप से सहमति बन जाती है।
  • समयबद्ध प्रक्रिया: इसे 120 दिनों के भीतर पूरा करना अनिवार्य है।
  • न्यूनतम लेनदार स्वीकृति: इसके लिए वित्तीय लेनदारों की 66% सहमति आवश्यक है।
  • आधार समाधान योजना (Base Resolution Plan): प्रमोटर एक आधार योजना प्रस्तुत करता है, जो प्रतिस्पर्द्धी बोली के लिए खुली होती है।
  • सीमित व्यवधान: यह व्यावसायिक गतिविधियों की निरंतरता सुनिश्चित करता है।

दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026

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