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भारत में गर्भनिरोधकों का उपयोग और प्रजनन स्वायत्तता

13 Jun 2026

संदर्भ

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6, 2023-24) भारत के परिवार नियोजन परिदृश्य में एक प्रतिमानात्मक परिवर्तन को रेखांकित करता है।

  • संपूर्ण प्रजनन दर (TFR) के 2.0 पर स्थिर होने के साथ, अब ध्यान जनसांख्यिकीय लक्ष्यों से हटकर महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता एवं निर्णय क्षमता को सुदृढ़ करने की ओर स्थानांतरित हो रहा है।

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NFHS-6 रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • कुल प्रजनन दर (TFR): भारत की TFR 2.0 पर स्थिर हो गई है, जो मानक प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से कम है।
  • गर्भनिरोधक प्रचलन दर (CPR): समग्र CPR 66.7% (NFHS-5) से बढ़कर 69.1% हो गई है।
  • लैंगिक असंतुलन: महिला नसबंदी अभी भी प्रमुख विधि बनी हुई है, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर हिस्सा 36.5% (ग्रामीण क्षेत्रों में 38.1%) है, जबकि पुरुष नसबंदी मात्र 0.5% पर अत्यंत न्यून है।
  • प्रतिवर्ती विधियों की कमी: आधुनिक, अंतराल-आधारित वैज्ञानिक विधियों (जैसे- गोलियाँ, IUDs, निरोध) का उपयोग 56.4% से घटकर 52.7% हो गया है। इसके विपरीत, अवैज्ञानिक पारंपरिक ट्रैकिंग विधियों का उपयोग 10.3% से बढ़कर 16.4% हो गया है।

विशेषता कुल आधुनिक विधियाँ पुनर्वर्ती (रिवर्सिबल) विधियाँ
परिभाषा सभी वैज्ञानिक रूप से मान्य गर्भनिरोधक, जिनमें स्थायी और अस्थायी दोनों विधियाँ शामिल हैं। केवल अस्थायी विधियाँ, जिनके बंद करने पर प्रजनन क्षमता पुनः प्राप्त की जा सकती है।
क्या स्थायी विधियाँ शामिल हैं? हाँ (महिला नसबंदी, पुरुष नसबंदी) नहीं
क्या अस्थायी अंतराल विधियाँ शामिल हैं? हाँ (गोलियाँ, IUD, निरोध, इंजेक्टेबल, इम्प्लांट) हाँ
NFHS रिपोर्टिंग में उद्देश्य आधुनिक गर्भनिरोधक के समग्र उपयोग को मापता है। विधि-मिश्रण, प्रजनन विकल्प और अंतराल स्वायत्तता को मापता है।
नीतिगत निहितार्थ वैज्ञानिक गर्भनिरोधक के कवरेज को दर्शाता है। परिवार नियोजन में स्वायत्तता, विकल्प और लैंगिक समानता को दर्शाता है।
उदाहरण (NFHS-6) महिला नसबंदी 36.5%, पुरुष नसबंदी 0.5%, साथ ही पुनर्वर्ती विधियाँ गोलियाँ, IUD, निरोध, अंतरा इंजेक्टेबल, छाया गोलियाँ (नसबंदी को छोड़कर)।

मुख्य शब्दावली

  • कुल प्रजनन दर (TFR): यह उस औसत बच्चों की संख्या को दर्शाता है, जिन्हें एक महिला अपने प्रजनन काल (सामान्यतः 15–49 वर्ष) के दौरान जन्म देती है, यदि वर्तमान आयु-विशिष्ट प्रजनन दरें स्थिर बनी रहें।
  • प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर: यह वह प्रजनन स्तर है, जिस पर एक पीढ़ी स्वयं को अगली पीढ़ी से प्रतिस्थापित कर लेती है। सामान्यतः इसे प्रति महिला लगभग 2.1 बच्चे माना जाता है, क्योंकि इसमें मृत्यु दर, जन्म के समय लिंग अनुपात तथा सभी बच्चों के प्रजनन आयु तक जीवित न रहने की संभावना को शामिल किया जाता है।
    • यदि प्रजनन दर लंबे समय तक इस स्तर से नीचे बनी रहती है, तो जनसंख्या वृद्धि धीमी होकर अंततः घट सकती है, जब तक कि प्रवासन या जनसंख्यास्थिरता इस गिरावट की भरपाई न करें।
  • गर्भनिरोधक प्रचलन दर (CPR): यह उस प्रतिशत को दर्शाता है, जिसमें महिलाएँ या उनके साथी किसी भी प्रकार के गर्भनिरोधक साधन का उपयोग कर रहे होते हैं।
    • इसे सामान्यतः 15–49 वर्ष की प्रजनन आयु की विवाहित या सहजीवन में रहने वाली महिलाओं के संदर्भ में मापा जाता है।

समाधान हेतु आवश्यक चुनौतियाँ

  • प्रारंभिक विवाह एवं विस्तारित प्रजनन अवधि: राष्ट्रीय स्तर पर 20.1% महिलाएँ (आयु 20–24 वर्ष) 18 वर्ष से पूर्व विवाह कर चुकी थीं (ग्रामीण क्षेत्रों में 23.3%)।
    • प्रारंभिक विवाह महिलाओं की जीवनकालीन गर्भधारण अवधि को बढ़ाता है तथा परिवार के भीतर उनकी निर्णय क्षमता को सीमित करता है।
  • किशोर स्वास्थ्य आपात स्थिति: कम गर्भनिरोधक जागरूकता एवं सामाजिक दबाव के कारण 15–19 वर्ष आयु वर्ग की 6.7% लड़कियाँ सर्वेक्षण के समय मातृत्व धारण कर चुकी थीं या गर्भवती थीं (ग्रामीण भारत में 7.9%)।
  • लक्ष्य-आधारित सार्वजनिक अवसंरचना: अपर्याप्त वित्तपोषण वाले ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र प्रायः बड़े पैमाने पर संचालित स्थायी नसबंदी शिविरों पर निर्भर रहते हैं।
    • यह प्रवृत्ति महिलाओं पर शारीरिक भार बढ़ाती है तथा सर्जिकल संबंधी जोखिमों को जन्म देती है।
  • वास्तविक स्वायत्तता का अभाव: स्थायी नसबंदी से दूर जाने की प्रक्रिया, आधुनिक प्रतिवर्ती वैज्ञानिक विकल्पों को अपनाने के स्थान पर अनौपचारिक पारंपरिक विधियों की ओर पुनः झुकाव देखा गया है।

वैश्विक पहल एवं प्रयास

  • FP2030 (परिवार नियोजन 2030): यह एक वैश्विक साझेदारी है, जिसका उद्देश्य अधिकार-आधारित परिवार नियोजन प्रणाली को बढ़ावा देना, व्यक्तिगत विकल्प को प्राथमिकता देना तथा महिलाओं को आधुनिक गर्भनिरोधक विकल्पों की विविधता तक पहुँच सुनिश्चित करना है।
  • अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या एवं विकास सम्मेलन (ICPD): यह संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में एक महत्त्वपूर्ण पहल है, जिसने वैश्विक दृष्टिकोण को संख्या-आधारित जनसंख्या नियंत्रण से हटाकर व्यक्तिगत प्रजनन अधिकारों एवं मातृ सुरक्षा की ओर स्थानांतरित किया।
  • SDG 3.7 एवं 5.6: संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्य वर्ष 2030 तक यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच तथा पूर्ण प्रजनन अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं।

भारत द्वारा उठाए गए कदम

  • मिशन परिवार विकास (MPV): प्रारंभ में उच्च-प्रजनन दर वाले जिलों में लागू इस पहल का उद्देश्य स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भनिरोधक साधनों एवं अंतराल विधियों तक पहुँच को सुदृढ़ करना है।
  • विस्तारित गर्भनिरोधक विकल्प: सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में नए अंतराल-आधारित साधनों को शामिल किया है, जिनमें त्वचा में दिए जाने वाले इंजेक्टेबल गर्भनिरोधक (अंतरा कार्यक्रम) एवं साप्ताहिक गोलियाँ (छाया) शामिल हैं।
  • बाल विवाह निषेध अधिनियम: इस कानूनी ढाँचे के माध्यम से बाल विवाह को दंडनीय बनाया गया है; साथ ही सुकन्या समृद्धि योजना जैसी योजनाएँ परिवारों को बालिकाओं की शिक्षा जारी रखने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती हैं।

आगे की राह

  • माध्यमिक शिक्षा को प्राथमिकता: ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं को विद्यालय में बनाए रखना बाल विवाह को स्वाभाविक रूप से विलंबित करता है तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं प्रजनन निर्णय क्षमता को सुदृढ़ करता है।
  • प्रणालीगत लक्ष्यों का पुनर्संरेखन: सार्वजनिक स्वास्थ्य के लक्ष्यों को केवल अनुपालन से हटाकर विकल्प एवं स्वायत्तता की ओर स्थानांतरित किया जाए तथा ग्राम स्तर पर अस्थायी, प्रतिवर्ती वैज्ञानिक विधियों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • पुरुष गर्भनिरोधक संबंधी उपेक्षा का निवारण:नॉन-स्केल्पल’ नसबंदी से जुड़े पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों को समाप्त कर परिवार नियोजन के शारीरिक दायित्व को साझी जिम्मेदारी में परिवर्तित किया जाए।
भारत में गर्भनिरोधकों का उपयोग और प्रजनन स्वायत्तता

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