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मोटापे से संबंधित जीन और पॉलीजेनिक रोगों का विज्ञान

13 Jun 2026

संदर्भ

व्यावसायिक घरेलू आनुवंशिक परीक्षण यह दावा करते हैं कि वे स्वास्थ्य परिणामों की भविष्यवाणी कर सकते हैं। हालाँकि, प्रमुख वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि किसी विशेष जीन विविधता का होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि व्यक्ति अवश्य ही मोटापे का शिकार होगा। यह सिद्ध करता है कि हमारा आनुवंशिक विन्यास कोई निश्चित नियति नहीं है।

जीन, उत्परिवर्तन एवं रोग की समझ

यह समझने के लिए कि DNA कोई अंतिम निर्धारक नहीं है, इसके कार्य-तंत्र को सरल रूप में समझना आवश्यक है:

  • जीन: ये DNA के छोटे-छोटे भाग होते हैं, जो एक जैविक निर्देश पुस्तिका की तरह कार्य करते हैं।
    • ये हमारे शरीर को प्रोटीन निर्माण का निर्देश देते हैं, जो आगे चलकर आँखों के रंग जैसे गुणों का निर्धारण करते हैं।

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  • 2% नियम: मानव DNA का केवल लगभग 2% भाग ही प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक सूचनाएँ रखता है, जबकि शेष 98% भाग ‘नॉन-कोडिंग DNA’ होता है।
    • यह अन्य जीनों को नियंत्रित करते हुए उन्हें सक्रिय या निष्क्रिय करने का कार्य करता है।
  • उत्परिवर्तन: जब कोशिका विभाजन के दौरान DNA की प्रतिलिपि बनती है, तो कभी-कभी त्रुटियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
    • इन परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहा जाता है, जो जीन के विभिन्न रूपों (एलील्स) को उत्पन्न करते हैं। कुछ उत्परिवर्तन प्रोटीन के कार्य को बाधित करते हैं और सीधे रोग के जोखिम को बढ़ा सकते हैं

मोनोजेनिक (Monogenic) बनाम पॉलीजेनिक (Polygenic) आधारित रोगों के प्रकार

  • व्यावसायिक परीक्षणों की सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि वे प्रत्येक स्वास्थ्य स्थिति को एक समान तरीके से देखते हैं। वास्तव में, आनुवंशिक गुण दो भिन्न श्रेणियों में विभाजित होते हैं:
    • मोनोजेनिक (Monogenic) रोग: ये तब उत्पन्न होते हैं, जब केवल एक जीन में दोष होता है।
      • यदि किसी व्यक्ति को वह विशिष्ट दोषपूर्ण जीन विरासत में प्राप्त होता है, तो रोग होने की संभावना लगभग निश्चित होती है।
      • उदाहरण के लिए हंटिंगटन रोग, जो HTT जीन में उत्परिवर्तन से जुड़ा होता है और मस्तिष्क कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करता है। ऐसे रोग अपेक्षाकृत दुर्लभ होते हैं।
    • पॉलीजेनिक (Polygenic) स्थितियाँ: इनमें मोटापा, मधुमेह एवं स्किजोफ्रेनिया जैसे सामान्य वैश्विक स्वास्थ्य संकट शामिल हैं।
      • ये किसी एक जीन द्वारा नियंत्रित नहीं होते, बल्कि सैकड़ों विभिन्न जीनों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, जहाँ प्रत्येक जीन का योगदान अत्यंत सूक्ष्म होता है।

‘फैट मास एंड ओबेसिटी-असोसिएटेड (FTO) जीन’ के बारे में

FTO जीन को प्रायः “मोटापे से संबंधित जीन” कहा जाता है, क्योंकि इसका संबंध शरीर के वजन से सबसे अधिक पाया गया है।

  • हालाँकि, वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि FTO में उत्परिवर्तन केवल अति अल्प वजन वृद्धि का कारण बनता है। यह यह निर्धारित नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति वास्तव में मोटापे का शिकार होगा या नहीं।

एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) के बारे में

  • एपिजेनेटिक्स वह अध्ययन है, जिसमें यह समझा जाता है कि हमारी दैनिक आदतें एवं बाहरी वातावरण—जैसे भोजन, शारीरिक गतिविधि, तनाव एवं सामाजिक परिवेश—कैसे हमारे शरीर द्वारा DNA के वास्तविक अनुक्रम को बदले बिना DNA की कोडिंग की प्रक्रिया को परिवर्तित कर देते हैं ।
  • पियानो एनालोजी (Piano Analogy): DNA को एक पियानो (Piano) के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ प्रत्येक कुंजी एक जीन (Gene) का प्रतिनिधित्व करती है। यदि कोई कुंजी थोड़ी असंतुलित है, तो वह उत्परिवर्तन (Mutation) को दर्शाती है।
    • हालाँकि व्यक्ति अपनी दैनिक जीवनशैली के माध्यम से जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) को नियंत्रित कर सकता है—अर्थात् जोखिम युक्त जीनों के प्रभाव को कम करना एवं स्वास्थ्यवर्धक जीनों के प्रभाव को बढ़ाना।
  • प्रमाण : अध्ययनों से पता चलता है कि यदि FTO जीन वाले व्यक्ति उच्च-तीव्रता व्यायाम करें या कम प्रोटीन वाला आहार अपनाएँ, तो वे उस जीन के प्रभाव को कम कर सकते हैं और मोटापे के जोखिम को सामान्य स्तर तक घटा सकते हैं

मुख्य शब्दावली

  • जीन (Gene): DNA का वह खंड, जो प्रोटीन निर्माण के निर्देश देता है तथा गुणों एवं जैविक क्रियाओं को प्रभावित करता है।
  • DNA: वह आनुवंशिक पदार्थ, जिसमें जीवों के विकास, वृद्धि एवं कार्यप्रणाली हेतु आवश्यक सूचनाएँ संगृहीत होती हैं।
  • नॉन-कोडिंग DNA (Non-Coding DNA): DNA का वह भाग, जो प्रोटीन नहीं बनाता, बल्कि जीनों को सक्रिय या निष्क्रिय करके उनकी गतिविधि को नियंत्रित करता है।
  • उत्परिवर्तन (Mutation): DNA अनुक्रम में परिवर्तन, जो प्रतिकृति के दौरान होता है और प्रोटीन के कार्य एवं रोग जोखिम को प्रभावित कर सकता है।
  • एलील (Allele): उत्परिवर्तन के कारण उत्पन्न जीन का भिन्न रूप या प्रकार।
  • मोटापे से संबंधित जीन (Obesity Gene): एक भ्रामक शब्द, जो यह संकेत देता है कि एक ही जीन मोटापा निर्धारित करता है; जबकि वास्तव में मोटापा अनेक जीनों, जीवनशैली एवं पर्यावरण पर निर्भर करता है।
  • एफटीओ जीन (FTO Gene): मोटापे के जोखिम से संबंधित जीन, जिसकी भिन्नताएँ केवल हल्की वजन वृद्धि की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हैं और अकेले मोटापे की भविष्यवाणी नहीं कर सकती हैं।
  • आनुवंशिक प्रवृत्ति (Genetic Predisposition): किसी रोग के विकसित होने की संभावना में वृद्धि, किंतु यह रोग की निश्चितता को नहीं दर्शाती।
  • जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression): वह प्रक्रिया, जिसके माध्यम से आनुवंशिक सूचना का उपयोग कर प्रोटीन बनाए जाते हैं तथा जैविक कार्य सम्पन्न होते हैं।
  • जीनोम-वाइड एसोसिएशन स्टडीज (GWAS): एक विधि, जिसमें बड़ी जनसंख्या के DNA की तुलना कर रोगों से संबंधित आनुवंशिक भिन्नताओं की पहचान की जाती है।
  • आनुवंशिक परीक्षण: DNA की जाँच द्वारा स्वास्थ्य जोखिमों या वंशानुगत स्थितियों से संबंधित आनुवंशिक भिन्नताओं की पहचान।
  • आनुवंशिक परामर्श: विशेषज्ञ मार्गदर्शन, जो व्यक्तियों को आनुवंशिक परीक्षण के परिणाम एवं वास्तविक रोग जोखिम समझने में सहायता करता है।
  • लक्षित उपचार: ऐसी उपचार पद्धति, जो रोग से संबंधित विशिष्ट जैविक मार्गों पर कार्य करती है।
  • PCSK9 जीन: कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण से संबंधित जीन, जिसकी भिन्नताओं के आधार पर कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली चिकित्सा पद्धतियाँ विकसित की गई हैं।
  • जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट (Genome India Project): भारत की विविध जनसंख्या में आनुवंशिक भिन्नताओं के मानचित्रण हेतु एक पहल, जिससे बेहतर स्वास्थ्य अनुसंधान को बढ़ावा मिलता है।
  • व्यक्तिगत चिकित्सा: ऐसा स्वास्थ्य दृष्टिकोण, जिसमें व्यक्ति के आनुवंशिक, पर्यावरणीय एवं जीवनशैली संबंधी कारकों के आधार पर उपचार एवं रोकथाम को अनुकूलित किया जाता है।

आनुवंशिक परीक्षण के लाभ

चिकित्सीय आनुवंशिक विज्ञान सार्वजनिक स्वास्थ्य और नैदानिक अनुसंधान के लिए अत्यंत उपयोगी है:

  • लक्षित उपचार (Targeted Therapy) का विकास: बड़ी जनसंख्या के अध्ययन से वैज्ञानिक जैविक तंत्र (Biological Mechanisms) को समझ पाते हैं तथा उपयोगी दुर्लभ उत्परिवर्तनों की पहचान करते हैं।
    • उदाहरण के लिए, जिन व्यक्तियों में पीसीएसके9 जीन (PCSK9 Gene) स्वाभाविक रूप से निष्क्रिय पाया गया, उनके अध्ययन से वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रभावी औषधियाँ विकसित कीं, जो खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करती हैं तथा हृदयाघात (Heart Attack) की संभावना घटाती हैं।
  • सुरक्षित परिवार नियोजन: आनुवंशिक जाँच, विशेषकर अधिक आयु के माता-पिता के लिए, गर्भस्थ शिशु में दुर्लभ एवं गंभीर मोनोजेनिक रोगों की पहचान करने में सहायक होती है।
  • जनसंख्या मानचित्रण (Population Mapping): जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट (Genome India Project) जैसे कार्यक्रम विविध जनसंख्याओं में विशिष्ट आनुवंशिक भिन्नताओं का मानचित्र तैयार करते हैं, जिससे अनुकूलित स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना संभव होता है।

आनुवंशिक परीक्षण की सीमाएँ

विपणन संबंधी दावों के बावजूद, वाणिज्यिक DNA किट्स की गंभीर सीमाएँ हैं:

  • सामान्य रोगों के लिए कमजोर भविष्यवाणी: किसी जीन भिन्नता की पहचान का अर्थ रोग का निश्चित विकास नहीं होता। मोटापा या मधुमेह जैसी पॉलीजेनिक (Polygenic) स्थितियों में श्लेष्मा-आधारित परीक्षणों की पूर्वानुमान क्षमता अत्यंत सीमित होती है, क्योंकि वे जीवनशैली एवं पर्यावरणीय कारकों की उपेक्षा करते हैं।
  • झूठी चेतावनियाँ: व्यावसायिक रिपोर्ट छोटे सांख्यिकीय जोखिमों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं, जिससे अनावश्यक भय एवं चिंता उत्पन्न हो सकती है।
  • अपूर्ण जनसंख्या डेटा: वैश्विक आनुवंशिक डेटाबेस में विविध जनसंख्याओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होता, जिससे उनके निष्कर्ष क्षेत्रीय स्तर पर कम तार्किक हो जाते हैं।

आगे की राह

प्रौद्योगिकी और उपभोक्ता सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु बहु-स्तरीय दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • अनिवार्य आनुवंशिक परामर्श: आनुवंशिक परीक्षणों की व्याख्या कभी भी अकेले नहीं की जानी चाहिए। इन्हें आनुवंशिक परामर्श (Genetic Counseling) के साथ जोड़ा जाना आवश्यक है, जहाँ प्रशिक्षित विशेषज्ञ व्यक्तियों को उनके वास्तविक जोखिम स्तर को समझने तथा सूचित जीवनशैली निर्णय लेने में सहायता करते हैं।
  • नियामकीय निगरानी: सरकारों को उपभोक्ता परीक्षण कंपनियों को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि भ्रामक स्वास्थ्य दावों को रोका जा सके।
  • जन-जागरूकता: जनता को इसलिए शिक्षित करना आवश्यक है कि जीवनशैली हस्तक्षेप—जैसे शारीरिक गतिविधियाँ एवं संतुलित आहार—जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) को बदलकर जैविक जोखिमों को प्रभावी रूप से कम कर सकते हैं।
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